Shiv Kumar
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12/06/2026
पिता...
आज की कविताओं में कोई विशाल वटवृक्ष नहीं होते,
वे होते हैं बस एक थके हुए कंधे,
जो लोकल ट्रेन और बस की भीड़ में
रोज़ अपने परिवार के कल के लिए,
थोड़ी सी जगह तलाशते हैं।
वे अब लंबी-लंबी चिट्ठियाँ नहीं लिखते,
बस फ़ोन पर पूछ लेते हैं
"ठीक हो?"
या
"पहुँच गए?"
उनके प्यार की आधुनिक डिक्शनरी में,
आज भी शब्द बहुत कम हैं,
और चिंताएँ बहुत ज़्यादा।
आज भी उनका वह पुराना लेदर का बटुआ,
बिल्कुल उनके पुराने उसूलों की तरह है,
जिसमें खुद के लिए पैसे भले ही कम हों,
पर हमारी पुरानी तस्वीरें और हमारी ज़रूरतें,
हमेशा महफ़ूज़ रहती हैं।
वे नहीं जानते कि कैसे गले लगाकर
कहा जाता है "आई लव यू",
पर चुपचाप सिर पर हाथ फेर देना,
या सुबह बाइक में बिना बताए पेट्रोल डलवा देना...
शायद वही उनका गीत है,
जो वे बिना होंठ हिलाए,
हर रोज़ गाते हैं।
पिता...
इस शोर भरी दुनिया की
वह सबसे खामोश और जटिल कविता हैं,
जिसे पूरी तरह से पढ़ने और समझने में,
अक्सर बच्चों की एक पूरी उम्र लग जाती है।
#बाप ❤️
.king_official
12/06/2026
आदतें
11/06/2026
Bad Time,
11/06/2026
नजरिया
11/06/2026
🧐😎😯
11/06/2026
दो ही नसे करता हु....see
10/06/2026
जुबान की कीमत होती हैं
10/06/2026
10/06/2026
सच
10/06/2026
नजर नजर का खेल है सब
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