Diwakar pathak
politician
27/04/2026
मेरी कुछ बुनियादी चिंताएं और सुझाव:
1. टैक्सपेयर्स पर बोझ: ईमानदार नागरिक जो टैक्स भरते हैं, उनका पैसा बुनियादी ढांचे के बजाय बढ़ती आबादी की 'मुफ्तखोरी' वाली योजनाओं में खर्च हो रहा है। यह बोझ अब असहनीय होता जा रहा है।
2. सुविधाओं पर पाबंदी: समय आ गया है कि सरकार कड़े कदम उठाए। दो बच्चों से ज्यादा होने पर सरकारी सुविधाओं का लाभ मिलना बंद होना चाहिए।
3. छोटे परिवार को प्रोत्साहन: जो लोग जनसंख्या नियंत्रण में सहयोग कर रहे हैं, उन्हें इनकम टैक्स और अन्य सुविधाओं में विशेष राहत मिलनी चाहिए।
4. शिक्षा ही समाधान है: अनुभव बताता है कि शिक्षित समाज स्वतः जनसंख्या नियंत्रण अपनाता है। हमें हर व्यक्ति तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पहुँचानी होगी ताकि लोग 'संख्या' के बजाय अपने बच्चों के 'भविष्य की गुणवत्ता' पर ध्यान दें।
यदि हम आज नहीं जागे, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए न शुद्ध हवा बचेगी, न पानी और न ही रोजगार। आइए, एक जिम्मेदार नागरिक बनें और इस संदेश को सरकार और समाज तक पहुँचाएं।
21/04/2026
With Vijay Pandit – I just got recognised as one of their top fans! 🎉
भ्रष्टाचार के आगे
सम्राट झुके
केंद्रीय नेतृत्व अक्सर ऐसे चेहरों को प्राथमिकता देता है जो उनके प्रति वफादार हों। एक "स्वच्छ और प्रभावशाली" मुख्यमंत्री की अपनी एक स्वतंत्र जन-आधार (Mass Base) होती है। जब किसी नेता की ताकत जनता से आती है न कि आलाकमान की मेहरबानी से, तो उसे नियंत्रित करना कठिन हो जाता है।
*उत्तराधिकार की चुनौती
यदि कोई मुख्यमंत्री बहुत अधिक लोकप्रिय और सफल हो जाता है, तो वह स्वाभाविक रूप से राष्ट्रीय राजनीति में एक दावेदार के रूप में उभरने लगता है। केंद्रीय नेतृत्व को डर रहता है कि भविष्य में वह व्यक्ति प्रधानमंत्री पद या पार्टी के शीर्ष पद के लिए चुनौती पेश कर सकता है।
*रबर स्टैम्प' की प्राथमिकता
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा अक्सर होती है कि केंद्र ऐसे व्यक्तियों को चुनना पसंद करता है जो दिल्ली के निर्देशों का पालन करें। एक प्रभावशाली और ईमानदार नेता अपनी नीतियों पर अडिग रह सकता है, जिससे कभी-कभी केंद्र और राज्य के बीच टकराव की स्थिति पैदा हो जाती है।
जनता के हितों के लिए लड़ने वाला विजय की तरह दरकिनार कर दिए जाते हैं ।
आज के राजनीतिक परिदृश्य को देखते हुए एक कड़वी सच्चाई सामने आती है…
वर्षों से हम देखते आ रहे हैं कि जो नेता जितना जोर-शोर से भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलते हैं, अक्सर वही सत्ता में आकर उसी भ्रष्टाचार का हिस्सा बन जाते हैं। जो परिवारवाद के विरोध की बात करते हैं, वे भी उससे खुद को अलग नहीं रख पाते। जो दल के भीतर लोकतंत्र की बात करते हैं, वही आगे चलकर पार्टी को अपने नियंत्रण में लेकर अलोकतांत्रिक व्यवस्था खड़ी कर देते हैं।
“सबका साथ, सबका विकास” का नारा देने वाले भी समाज को जाति और धर्म के आधार पर बांटने से नहीं चूकते। महंगाई कम करने और आमदनी बढ़ाने के वादे करने वाले ही ऐसी नीतियाँ बना देते हैं, जिनसे आम जनता की कमर टूटती जाती है।
सवाल यह है कि क्या सच बोलने वाले, सिद्धांतों पर टिके रहने वाले नेता अब हमारे बीच बचे हैं?
या फिर हमें ही जागरूक होकर सच और दिखावे में फर्क करना सीखना होगा।
#सोचिए #जागरूक_बनिए
इतिहास में जब East India Company भारत आई थी, तब वह सिर्फ व्यापार करने के लिए आई थी, लेकिन धीरे-धीरे उसने आर्थिक ताकत के बल पर राजनीतिक व्यवस्था पर प्रभाव जमाया और अंततः शासन तक पहुँच गई।
देश की वर्तमान स्थिति को देखते हुए चिंता जरूर हो रही है कि बड़ी-बड़ी कॉरपोरेट कंपनियाँ राजनीति और नीतियों को प्रभावित कर रही हैं। इसके कुछ कारण हैं:
1. चुनावी फंडिंग (Political Funding)
बड़ी कंपनियाँ राजनीतिक दलों को चंदा देती हैं। इससे यह आशंका बनती है कि नीतियाँ कहीं उनके हितों के अनुसार तो नहीं बन रही हैं।
2. आर्थिक शक्ति का केंद्रीकरण
जब कुछ बड़ी कंपनियों के पास बहुत ज्यादा पूँजी और संसाधन हो जाते हैं, तो उनका बाजार और नीति-निर्माण पर प्रभाव बढ़ सकता है।
3. लॉबिंग और नीति पर प्रभाव
कई बार कंपनियाँ अपने उद्योग के लिए अनुकूल कानून या नियम बनवाने के लिए सरकारों पर दबाव डालती हैं।
4. उपभोक्ता पर निर्भरता
डिजिटल प्लेटफॉर्म, बैंकिंग, टेलीकॉम, ई-कॉमर्स जैसी सेवाओं में बड़ी कंपनियों की पकड़ बढ़ने से आम लोगों की आर्थिक गतिविधियाँ उनसे जुड़ती जा रही हैं।
05/03/2026
जवाब तो मैं दे सकता हूँ लेकिन सोंचा पहले आप लोग ही बता दीजिए ।
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