Kripa Raghunath Ki

Kripa Raghunath Ki

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अब कछु नाथ न चाहिय मोरे। दीन दयाल अनुग्रह तोरे।।
सीता राम राम राम सीता राम राम राम।।

18/03/2026

जिस प्रकार समुद्र का ही अंश होने के कारण लहर और समुद्र में जातीय एकता है अर्थात् जिस जाति की लहर - उसी जाति का समुद्र है, उसी प्रकार संसार का ही अंश होने के कारण शरीर की संसार से जातीय एकता है।
मनुष्य संसार को तो 'मैं' नहीं मानता, पर भूल से शरीर को 'मैं' मानता है।
जिस प्रकार समुद्र के बिना लहर का अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है, उसी प्रकार संसार के बिना शरीर का अपना कोई अस्तित्व नहीं है। परंतु अहंकार से मोहित अंतःकरण वाला मनुष्य जब शरीर को ' मैं ' अर्थात अपना स्वरूप मान लेता है तब उसमें अनेक प्रकार की कामनाएं उत्पन्न होने लगती हैं।
नारायण 🙏

17/01/2026

26/12/2025
14/12/2025
19/07/2025

https://youtu.be/YASBQVID4yQ?si=M8fAWv6aTvu3QuoQ

पूरा वीडियो के लिए
Link..
https://youtu.be/YASBQVID4yQ?si=M8fAWv6aTvu3QuoQ

19/07/2025

Full videos ke liye youtube search kare, Kripa Raghunath Ki

25/05/2025

दो साधु और नदी"

एक बार दो साधु तीर्थ यात्रा पर जा रहे थे। रास्ते में उन्हें एक गहरी और तेज़ बहती हुई नदी मिली। वहाँ एक युवा महिला खड़ी थी, जो नदी पार करना चाहती थी लेकिन पानी के तेज़ बहाव से डर रही थी।

पहला साधु यह देखकर मुड़ गया, क्योंकि उसके संन्यासी नियमों के अनुसार वह किसी स्त्री को छू नहीं सकता था। लेकिन दूसरा साधु बिना कुछ सोचे-समझे उस स्त्री को गोद में उठाकर नदी पार करवा दिया। स्त्री ने आभार व्यक्त किया और आगे बढ़ गई।

पहला साधु बहुत परेशान था। कुछ घंटों तक चुपचाप चलने के बाद उसने दूसरे साधु से कहा, "तुमने स्त्री को छुआ! तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था।"

दूसरा साधु मुस्कुराया और कहा, "मैंने उस स्त्री को नदी पार करवा दी और वहीं छोड़ दिया, लेकिन तुम अभी भी उसे अपने मन में ढो रहे हो!"

यह कहानी हमें सिखाती है कि जीवन में बाहरी नियमों से अधिक, हमारे भीतर की भावनाएँ और सोच महत्वपूर्ण होती हैं। जो बीत चुका है, उसे छोड़ देना ही सच्ची मुक्ति है

09/05/2025

"Never born, never died.
Only visited this planet...."
-Osho.

09/05/2025

हर आदमी को दूसरों के साथ रहना ही पड़ता है और दूसरे के साथ वही परसन्नतापूर्वक निभ सकता है जो समझदार, सहनशील, दूसरों को समझने वाला तथा दूसरों को महत्व देने वाला होता है ।दूसरों के सहयोग के बिना कोई सामाजिक या बड़ी योजना का काम तो होता ही नहीं, व्यक्तिगत उन्नति भी नहीं होती। अतएव इस संसार में जीने के लिए तथा आत्मकल्याण एवं लोककल्याण का काम करने के लिए जनसहयोग लेना पड़ता है, लोगों के बीच रहना पड़ता है, उनको कुछ देना तथा उनसे कुछ लेना पड़ता है, और इन सबके लिए अच्छी समझदारी, सहनशीलता तथा उत्तम व्यव्हार बरतने की महती आवश्यकता है।
-Osho

01/05/2025

गुरजिएफ कहता था एक कहानी बार—बार कि एक जादूगर के पास बहुत सी भेड़ें थीं। और उसने पाल रखा था भेड़ों को भोजन के लिए। रोज एक भेड़ काटी जाती थी, बाकी भेड़ें देखती थीं, उनकी छाती थर्रा जाती थी। उनको खयाल आता था कि आज नहीं कल हम भी काटे जाएंगे। उनमें जो कुछ होशियार थीं, वे भागने की कोशिश भी करती थीं। जंगल में दूर निकल जाती।

जादूगर को उनको खोज—खोज कर लाना पड़ता। यह रोज की झंझट हो गई थी। और न वे केवल खुद भाग जातीं, और भेड़ों को भी समझातीं कि भागो, अपनी नौबत भी आने की है। कब हमारी बारी आ जाएगी पता नहीं! यह आदमी नहीं है, यह मौत है! इसका छुरा देखते हो, एक ही झटके में गर्दन अलग कर देता है! आखिर जादूगर ने एक तरकीब खोजी, उसने सारी भेड़ों को बेहोश कर दिया और उनसे कहा, पहली तो बात यह कि तुम भेड़ हो ही नहीं।

जो कटती हैं वह भेड़ है, तुम भेड़ नहीं हो। तुममें से कुछ सिंह हैं, कुछ शेर हैं, कुछ चीते हैं, कुछ भेड़िए हैं। तुममें से कुछ तो मनुष्य भी हैं। यही नहीं, तुममें से कुछ तो जादूगर भी हैं। सम्मोहित भेड़ों को यह भरोसा आ गया। उस दिन से बड़ा आराम हो गया जादूगर को। वह जिस भेड़ को काटता, बाकी भेड़ें हंसती कि बेचारी भेड़! क्योंकि कोई भेड़ समझती कि मैं मनुष्य हूं!

और कोई भेड़ समझती कि मैं तो खुद ही जादूगर हूं मुझको कौन काटने वाला है! कोई भेड़ समझती मैं सिंह हूं ऐसा झपट्टा मारूंगी काटने वाले पर कि छठी का दूध याद आ जाएगा। मुझे कौन काट सकता है? यह बेचारी भेड़ है, रें—रें करके काटी जा रही है! और यह भेड़ भी कल तक यही सोचती रही थी जब दूसरी भेड़ें कट रही थीं कि मैं सिंह हूं कि मैं मनुष्य हूं कि मैं जादूगर हूं, कि मैं यह हूं कि मैं वह हूं। उस दिन से भेड़ों ने भागना बंद कर दिया। गुरजिएफ कहता था आदमी करीब—करीब ऐसी हालत में है। तुम सोए हो, गहन निद्रा में सोए हो।

आध्यात्मिक अर्थों में सोने का अर्थ समझ लेना। सोने का अर्थ यह नहीं होता कि जब तुम रात को बिस्तर पर आख बंद करके सोते हो तभी सोते हो। वह शारीरिक निद्रा है। आध्यात्मिक निद्रा का अर्थ होता है, जिसको स्वयं का पता नहीं हैं वह सोया है।

-ओशो".

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