Shaheed mandir
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की स्मृतियों को संजोने रखने का एक प्रयास
16/08/2025
#शहीदों_की_दास्तां #शहीदोंकीगाथा
16 अगस्त 1942 – शहीदों की अंत्येष्टि
जैसा कि पहले ही लिख चुका हूँ—जहाँ पुलिस संघर्ष के दौरान जमुनाप्रसाद त्रिपाठी वहीं स्थल पर मस्तक पर गोली खाकर शहीद हो चुके थे, वहीं विद्यार्थी कृष्ण कुमार को पाँच गोलियाँ लगी थीं और सीताराम गुप्त को तीन। दोनों वहीं ज़मीन पर गंभीर रूप से घायल अवस्था में पड़े थे। साथ ही लगभग एक दर्जन क्रांतिवीर—यथा भोलानाथ दीक्षित, लालता प्रसाद, सुरजन सिंह, बाबूराम, रामस्वरूप, आनंद स्वरूप आदि—गोली वर्षा में घायल हुए थे।
घायलों और शहीदों को खींचकर पुलिस ने थाने के अंदर डाल दिया। पुलिस की क्रूरता का आलम यह था कि वहाँ निर्जीव और घायल शरीरों में कोई अंतर न था। “पानी… पानी…” की घायलों की आवाज पुलिस की गलियों और नृशंसता में दबकर रह गई। वहीं हवालात के सींखचों के अंदर रामलाल महाशय अपने भाई को पानी देने की बार-बार गुहार लगा रहे थे, पर यह गुहार नक्कारखाने में तूती की आवाज़ बनकर रह गई। वे चीखते-बिलखते, गुहार लगाते रहे और उनके साथ ही बंद सूबेदार आर्य भी यह हृदयविदारक दृश्य नम आँखों से देखते रहे।
शाम को जेल वैन में अब तक शहीद हो चुके जमुनाप्रसाद त्रिपाठी, सीताराम गुप्त और अब तक सांस ले रहे विद्यार्थी कृष्ण कुमार के शरीर रखे गए। साथ ही, थाने में पहले से बंद क्रांतिवीर—रामलाल महाशय, सूबेदार आर्य और गयाप्रसाद भारद्वाज आदि—को भी हथकड़ियों में जकड़ कर वैन में बैठा दिया गया। बाद में इन्हीं लोगों ने बताया कि मैनपुरी जेल के रास्ते इसन नदी से पहले ही कृष्ण कुमार ने एक ज़ोर की सांस ली और भारत माता के चरणों में अपना सर्वोच्च बलिदान देकर शहीदों के साथ जा खड़े हुए।
क्या मन:स्थिति रही होगी उन बेबस बंदियों की, जिनके सामने उनके तीन साथियों के शव पड़े थे और अन्य देशभक्त शहादत की राह पर थे!
मैनपुरी में पोस्टमार्टम के बाद शहीदों के शव मिलने की आशा थी। इस पर शहीद जमुनाप्रसाद त्रिपाठी के भतीजे रघुवीर सहाय त्रिपाठी, उनके मित्र बांकेलाल दीक्षित और सीताराम गुप्त के छोटे भाई पुत्तूलाल गुप्त मैनपुरी के लिए रवाना हुए। वहाँ कलेक्टर से मिले, पर कोई हल न निकला। प्रशासन ने पार्थिव शरीर देने से साफ़ मना कर दिया।
फिर मैनपुरी कोतवाली के इंस्पेक्टर हरप्रसाद ने बहुत मुश्किल से इन तीनों को तैयार किया कि शहीदों के पार्थिव शरीर को सुबह तड़के लगभग 4 बजे किसी निर्जन स्थान पर ले जाकर जला दिया जाए। मिट्टी का तेल और लकड़ी लदी वैन में शवों के साथ ये लोग बैठे। रात के सन्नाटे को चीरती गाड़ी करहल रोड पर सिंहपुरा की हर के पास रुकी। वहाँ लकड़ियों पर शव रखकर मिट्टी का तेल डाला गया और अंत्येष्टि के नाम पर अधजले शवों को ही नहर में प्रवाहित कर दिया गया।
तीनों शहीदों की पूरी अंत्येष्टि क्रिया रघुवीर सहाय त्रिपाठी ने ही की, क्योंकि शहीद कृष्ण कुमार के घर से कोई आ नहीं पाया था और पुत्तूलाल गुप्त भाई का शव देखकर बेसुध हो गए थे। यदि ये लोग उस समय मौजूद न होते, तो आज हमें पता भी न चलता कि इन तीनों शहीदों के साथ क्या, कहाँ और कैसे किया गया।
आगे—इस घटना के पश्चात नगर की स्थिति, पुलिस का आतंक और क्रांतिकारी दादा योगेश चंद्र चटर्जी की यहाँ उपस्थिति के विषय पर…
क्रमशः…
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15/08/2025
#शहीदों_की_दास्तां
15 अगस्त 1942 दिन शनिवार समय 11 से 11:30 के मध्य ब्रिटिश पुलिस से हुए संघर्ष में #शहीद हुए थे बेवर नगर के तीन #आज़ादी के मतवाले...
आज 15 अगस्त का दिन जहां देश की आज़ादी की ख़ुशियाँ लेकर आता है वही बेवर नगर इसी दिन आज़ादी से पाँच वर्ष पहले यानी 15 अगस्त 1942 को तीन रणबांकुरों ने भारतमाता का अपने रक्त से अभिषेक किया था।इसी दिन अपनी आंखों में आज़ादी का सपना संजोए #विद्यार्थीकृष्णकुमार (उम्र 14 वर्ष) #जमुनाप्रसादत्रिपाठी (40वर्ष) व #सीतारामगुप्त (42 वर्ष) ने थाने के ठीक सामने पुलिस से संघर्ष करते आज़ादी के हवन में अपने प्राणों की आहुति दे दी।
दरअसल 14 अगस्त को छात्रों द्वारा थाने पर झंडा फहरा दिया था। ये उस अंग्रेज़ी सत्ता जिसके राज में कभी सूरज नहीं डूबता था, के अहम पर बहुत बड़ी चोट थी। इसके दमन के लिए 14 ,15 की रात थाने पर ढेर सारी हथियारबंद पुलिस आ गई। रात को दमन की कार्यवाहियां शुरू हुईं। धारा 144 लगा दी गई।गिरफ्तारियां होने लगी। नगर में रात के सन्नाटे रौंदते पुलिसिया बूट की आवाज नागरिकों के मन में दहशत भरने की कोशिश थी। एक कुत्ते के पुलिस को काटने पर पुलिस ने उसे गोली मार दी थी। इस गोली की आवाज़ ने रात को और दहशत से भर दिया। 15 अगस्त को तय कार्यक्रम के अनुसार छात्रों को फिर जलूस निकलना था। चारो ओर पुलिस और दहशत थी।करपिया से मिडिल स्कूल तक लगभग 5 किलोमीटर पहुँचना आसान न था पर कृष्ण कुमार को ये बाधा न रोक पाई। और वो खेतों की पगडंडियों के रास्ते स्कूल पहुंच ही गया। जहां उनके साथी जगदीश नारायण त्रिपाठी के साथ इंतज़ार कर रहे थे। माहौल को देखते हुए जगदीश त्रिपाठी ने जलूस में लाठी डंडा साथ न लेकर निहत्थे ही जुलूस में चलने का प्रस्ताव रखा । जिसका विरोध कृष्ण कुमार ने ये कह कर किया 'कि गोरी सरकार ने हमारे सारे हथियार तो पहले ही छीन लिए है अब हम अपना अंतिम हथियार कैसे छोड़ दें।' इसका समर्थन बाकी साथियों ने कर दिया।तो अब तय हो गया लाठी डंडा साथ लेकर जुलूस में चलेंगे। उस दिन तीज की पर्व था और शनिवार का दिन। जुलूस की शक्ल में छात्र भारतमाता की जय, इंक़लाब ज़िन्दाबाद, महात्मा गांधी की जय के गगनभेदी नारे लगाते हुए मिडिल स्कूल निकल दिए। साथ में चल रहे थे सत्याग्रही का चोला धारण किये गयाप्रसाद भारद्वाज। और उनके साथ झंडा गीत गाते आगे आगे चल रहे वियार्थी कृष्णकुमार और जगदीश नारायण त्रिपाठी। जुलूस जिस गली,सड़क से गुजरता नगर के लोग अपने आप साथ चल देते। धीरे धीरे वो जुलूस थाने से 100 मीटर दूर नाले की पुलिया पर पहुंचा। जहां पुलिस का आगे न बढ़ने की हिदायत देता चेतावनी का एक बोर्ड लगा था। वहां जगदीश नारायण त्रिपाठी का पुलिस को लानत मलामत करता एक जोरदार भाषण हुआ। चेतावनी तोड़ फेक दी गई।औरप आगे बढ़ चले आज़ादी के मतवाले। थाने पर पहले से ही तहसीलदार निजामुद्दीन भी वहां पर पहले से ही मौजूद था और वहीं कल चौराहे पर लाठियों का प्रसाद पा चुके, थानेदार आले अली, सिपाही मखताब सिंह व महताब खां मन ही मन इन क्रांतिकारियों के प्रति मन में प्रतिशोध की धधकती ज्वाला में जल रहे थे। जुलूस के थाने पहुंचने पर वहां खड़ा हल्का इंसपेक्टर, सत्याग्रही के रूप में चल रहे गयाप्रसाद भारद्वाज को अपनी ओर जोर से खींचते हुए गुस्से से बोला- क्या कहते हो? समवेत स्वर से क्रांतिकारी बोले गिरफ्तार होना चाहते हैं। गयाप्रसाद भारद्वाज को खींचकर गिरफ्तार करने की कोशिश करते देखते ही, लाहीम शहीम शरीर के मालिक, पहलवान से बलिष्ठ जमुनाप्रसाद त्रिपाठी ने आगे बढ़कर हल्का इंस्पेक्टर की कलाई पकड़ ली। जिसे वो काफी कोशिश के बाद भी न छुड़ा सका। ये देख क्रांति के पुजारियों का जोश आसमान छूने लगा और भारतमाता की जय और इंक़लाब ज़िन्दाबाद के नारों से आसमान गूंजने लगा। तो हल्का इंसपेक्टर ने तहसीलदार निजामुद्दीन की ओर देखा।निज़ामुद्दीन ने आले अली को देखा। आंखों आंखों में इशारा हुआ और आलेअली कि पहली ही गोली उस क्षण क्रांति की प्रतिमूर्ति जमुनाप्रसाद त्रिपाठी के मस्तिष्क को चीरती हुई निकल गई।और हिंदुस्तान की आज़ादी का सपना आंखों में संजोए वे भारतमाता के आंचल में सदा के लिए सो गए। ये देख, कक्षा 6 के छात्र 14 वर्ष के विद्यार्थी कृष्ण कुमार ने आले अली की पिस्तौल छीनने का लिए झपटे।परन्तु प्रतिशोध की ज्वाला में जलता आले अली तो पहले ही तैयार था। उसने सीधे बालक कृष्णकुमार पर गोली चला दी।पहली गोली बाँह में लगी परन्तु क्रांति के दीवाने को इसकी परवाह कहाँ। बाँह झटक आगे बढ़ा तो अगली गोली जांघ में लगी। 14 वर्ष का वो बालक ज़मीन पर गिर गया परन्तु आंखों में सजा सपना अभी टूटा नहीं था। एक बार फिर अपनी सारी शक्ति समेट अंतिम झपट्टा मारा पर आलेअली की पिस्तौल तक हाथ पहुँचे उनसे पहले ही तीन गर्म जलती गोलियां उस चौदह वर्ष के बालक के पेट में समा गईं। वही थाने के सामने बायीं तरफ खड़े नीम के पेड़ के पास दो गोलियाँ सीताराम गुप्त के पेट में लगीं और वे गिर पड़े। वहैं सैकड़ों गोलियों से अनेको लोग घायल हुए परन्तु किसी तरह वहाँ से निकल गए।पुलिस ने शहीद हो चुके जमुनाप्रसाद त्रिपाठी व घायल अवस्था में विद्यार्थी कृष्ण कुमार व सीताराम गुप्त को खींच कर थाने के अन्दर खींचकर अपमानजनक तरीके से डाल दिया। उस दिन सीताराम गुप्त के भाई रामलाल महाशय थाने के अन्दर ही बंद थे और अपने भाई सीताराम गुप्त व कृष्ण कुमार की पानी की पुकार के साथ सिपाहियों द्वारा किया जा रहा अपमानजनक व्यवहार देख कर व्याकुल हो रहे थे। पानी पिलाने के लिए लगातार सिपाहियों से गुहार लगा रहे थे पर सुनने वाला कोई न था। शनै शनै दोनों क्रांतिवीरों की पानी की चाह कम हो गई। आवाज़ मध्यम हो गई लगभग चार घन्टे बाद पुलिस गाड़ी में शहीद हो चुके जमुनाप्रसाद त्रिपाठी, व अभी तक अंतिम सांस ले रहे विद्यार्थी कृष्णकुमार व सीताराम गुप्त को लेकर मैनपुरी रवाना होगये।रास्ते में भोगांव पहुचते पहुंचते विद्यार्थी कृष्ण कुमार ने जोर की हिचकी के साथ अंतिम सांस ली और वो किशोर शहीदों की टोली में अग्रिम पंक्ति में खड़ा हो गया। सीताराम गुप्त भी अब अंतिम सांस ले चुके थे। इन शहीदों ने बेवर नगर की माटी का अभिषेक अपने रक्त से कर इसे चंदनीय, वंदनीय कर दिया।
16 अगस्त 1942 की घटना कल
क्रमशः
#शहीदमंदिर #भारतछोड़ो #करोयामरो #आज़ादी #शहीदोंकीगाथा #स्वतंत्रतादिवस #15अगस्त
14/08/2025
#शहीदों_की_दास्तां #शहीदोंकीगाथा
आज ही के दिन यानी 14 अगस्त 1942 , #आज़ादी से ठीक पांच वर्ष पहले #बेवर नगर विदेशी दासता से हो गया था आज़ाद....
मिडिल स्कूल (वर्तमान में जूनियर हाईस्कूल पुराना बाजार)के कक्षा 6 व 7 के छात्र व नगर के नौजवान क्रांतिवीर (कक्षा 6के छात्र 14वर्षीय विद्यार्थी कृष्ण कुमार, कक्षा 7 के छात्र 15 वर्षीय जगदीश नारायण त्रिपाठी, व नगर के क्रांतिवीर नौजवान गयाप्रसाद भारद्वाज, बाबूराम झा,मदन मोहन दीक्षित, बाबूराम गुप्ता,रामलाल महाशय,सूबेदार आर्य, शम्भूदयाल, मन्नीलाल, मनफूल, सोनेलाल, भारतचंद्र गुप्ता, परमानंद,आनंद स्वरूप गुप्ता, मुंशीलाल आदि) बेवर नगर में अंग्रेजी सत्ता के सबसे बड़े प्रतीक पुलिस थाने पर तिरंगा झंडा फहराने का संकल्प लेकर नगर को अंग्रेजी राज की दासता से मुक्त कराने चल पड़े। और थाने पर तिरंगा झंडा फहरा दिया। नन्हे क्रांतिवीरों के तेवर के आगे बेवर थाना इंचार्ज आले अली की पिस्तौल और सिपाहियों की बंदूके नतमस्तक हो गईं। ये अंग्रेजी सत्ता के प्रतीक बेवर थाने का आत्मसमर्पण था इन नन्हे क्रांतिवीरों के समक्ष। इस जीत से उत्साहित बाल क्रांतिकारी मिठाईयां बाटने लगे। कुछ ही घण्टों के लिए सही पर 14 अगस्त 1942 को मैनपुरी जनपद का यह नगर बेवर अग्रेजी दासता से आज़ाद हो गया था। पर आलेअली ने जिलाधिकारी से क्रांतिकारियों को कुचलने के लिए और कुमुक व सहायता भेजने की याचना की। आश्वासन मिलने के बाद, पुलिस आतंक मचाने लगी। डाकखाने की तोड़फोड़ की जांच के लिए पहुंची पुलिस का व्यहार जनता को आतंकित और उत्तेजित करने वाला था। पुलिस ने गयाप्रसाद भारद्वाज को डाकखाने के पास ही उनके घर की ओर ,गिरफ्तार कर ले जाने लगी। जैसे ही ये सूचना मिठाई खाते, जश्न मनाती बाल सेना को लगी तो यह बाल सेना अपने नेता जगदीश नारायण त्रिपाठी के नेतृत्व में लाठी डंडा और जो भी हाथ मे पड़ा लेकर दौड़ पड़ी और पुलिस की पलटन को चौराहे पर घेर लिया। तब तक उत्तेजित नगर के लोग भी आ गए। गयाप्रसाद भारद्वाज को पुलिस से छीन लिया, तो थानेदार आलेअली ने पिस्तौल निकाल, लोगों पर तान दी। लगा कि अब गोली चली। परन्तु बंदूकों,तोपों,मशीनगनों से सज्जित विदेशी सत्ता से जो आज़ादी के दीवाने न डरते थे फिर उनके सामने इस पिस्तौल की तो औकात ही क्या थी। कि तभी अचानक भीड़ ने एक नया नेता पैदा कर दिया और एक जोशीले युवक मदनमोहन दीक्षित ने सीने की बटन खोलकर पिस्तौल के सामने अड़ा दी,और आलेअली की ओर चीखकर कहा " कि चला गोली देखते हैं कि तेरी गोली मजबूत है या मेरा सीना" इस जोश ने पुलिस के हौसले पस्त कर दिए और थानेदार आलेअली व उसके मातहत सिपाही मेहताब खां व मेहताब सिंह साइकिलों पर सवार होकर भागने से पहले बाल सेना की लाठी डंडों का स्वाद तो लेते ही गए।
इस प्रकार आज का दिन अंग्रेजी सत्ता से बेवर की आज़ादी का पहला दिन था।
सभी सेनानियों को नमन...
क्रमशः
#शहीदमेला #14अगस्त
शहीद मेला बेवर मैनपुरी उ0प्र0
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