Kripaluforeternity
Let's us join hands in spreading this eternal wisdon in every nook and corner.
Jagadguruttam Shri Kripalu Ji Maharaj has revealed the eternal philosophy, thereby reconciling all the different schools of thought and presenting the Truth before us.
21/08/2022
जग तो है नश्वर गोविंद राधे ।
हरि नित्य अविनाशी हैं बता दे ।।
This world is temporary and will ultimately come to an end. However, god is eternal and indestructible.
: Radha Govind geet
: Jagadguru Swami Shri Kripalu Ji Maharaj
03/06/2019
जो प्रेम हरि जग गोविंद राधे ।
दोनों में हो वह प्रेम ना बता दे ।।
Meaning : - Where there is love for both Hari and the world , it cannot be true love .
: Radha Govind Geet
: Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
12/05/2019
❤️❤️
Happy Mother’s Day
12/05/2019
कृष्णप्रेम आपु ही गोविंद राधे ।
जग प्रेम को बिनु श्रम ही मिटा दे ।।
Meaning : - Love for Shri Krishna effortlessly eliminates love for worldly pleasures .
: Radha Govind Geet
: Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
29/04/2019
सच्चा वैराग्य सोई गोविंद राधे ।
मन नित्य अनुरक्त कृष्ण में बता दे ।।
Meaning : - True detatchment means when the mind remains constantly attached to Shri Krishna .
: Radha Govind Geet
: Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
25/04/2019
भक्त और मैं एक गोविंद राधे।
भक्त को मेरा दूजा रूप बता दे।।
Meaning:-
Shri krishna declares , "Know me and My devotee is my inseparable other form".
: Radha govind Geet
:Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
22/04/2019
अनोखी, वीणा वारी नारि।।
जाकी लखि श्रृंगार माधुरी, अगनित रति बलिहारि।
चिबुक पाणि धरि कुसुम सरोवर, बैठी वीणावारि।
पूछति लली, ‘अली तू को है? काकी है घरवारि?'।
‘हौं लाली! हौं देवलोक की, अब लौं अहौं कुमारि।
यह संसार असार जानि हम, उर विराग लिय धारि।
लली कहीं 'चल, महल हमारे, करिहौं टहल तिहारि'।
'हमहिं लली! लै चलि सक जो मम, आदेशहिं नहिं टारि'।
'हाँ' करि, चलीं ‘कृपालु' छली सँग, भोरी भानुदुलारि।।
भावार्थ- श्यामसुन्दर वीणा वाली नारी का भेष बनाये हुए हैं। जिनके सोलहों श्रृंगार के माधुर्य को देखकर अनन्त कामदेव की स्त्रियाँ बलिहार जाती हैं। वह अनोखी वीणा वाली नारी ठोढ़ी पर हाथ रखे हुए कुसुम सरोवर पर बैठी है। किशोरी जी अचानक वहीं पहुँचकर उससे पूछती हैं। अरी वीणावाली! तू कौन है एवं किसकी स्त्री है? वीणा वाली ने कहा कि मैं देव लोक की हूँ और अभी तक कुमारी हूँ। इस संसार को असार समझ कर मैंने वैराग्य धारण कर लिया है। किशोरी जी ने कहा अरी वीणा वाली ! तू मेरे महल में चल कर रह, मैं स्वयं तेरी सेवा करूँगी। वीणावाली ने कहा, हे किशोरी जी ! हमको वही अपने घर ले जा सकता है जो मेरी एक भी आज्ञा न टाले। किशोरी जी ने स्वीकार कर लिया एवं 'कृपालु' के कथनानुसार अपने भोलेपन के कारण श्यामसुन्दर से ठगी गयीं।
20/04/2019
प्रेम रस मदिरा
वृन्दावन, रसिकन रजधानी।
जा रजधानी की ठकुरानी, महरानी राधा - रानी।
जा रजधानी पनिहारिनि बनि, चारिहुँ मुक्ति भरति पानी।
जा रजधानी रज अज याचत, प्रान-सजीवनि सम जानी।
जा रजधानी बिच नहिं पावत, टुक प्रवेश कमला वानी।
कह 'कृपालु' जेहि महिमा कुछ-कुछ, लालिहिकृपा लाल जानी।।
भावार्थ -एक रसिक कहता है कि-श्री वृन्दावन-धाम रसिकों की राजधानी है। जिस राजधानी में वृषभानुनन्दिनी स्वामिनी रूप से सुशोभित है। जिस राजधानी में चारों मुक्तियाँ पनिहारिन बन कर पानी भरती हैं। जिस राजधानी की धूलि को प्राणाधिक प्रिय जानकर सृष्टिकर्ता ब्रह्मा भिक्षुक बनकर भिक्षा-याचना करता है। जिस राजधानी में महालक्ष्मी तथा सरस्वती को प्रवेश का अधिकार प्राप्त नहीं है। 'कृपालु' कहते हैं कि इतना ही कहना पर्याप्त है कि वृन्दावन की महिमा किशोरी जी के कृपा-कटाक्ष से श्यामसुन्दर भी कुछ-कुछ ही जानते हैं।
रसिया माधुरी पद संख्या २१
प्रेम रस मदिरा
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