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#काबिल_ए_तारीफ होने के लिए #वाकिफ_ए_तकलीफ होना पड़ता हैं �� जय श्री राम ��
जय श्रीराम 🚩🚩
🙏🙏🙏🙏🙏
समाज निर्माण तात्कालिक दिखावों से नहीं होता है बल्कि समाज निर्माण के लिए मजबूत बुनियाद तैयार करनी पड़ती है।
हम मृत्युभोज के हर पहलू को लेकर लंबा संवाद कर चुके है।मैं इसलिए नहीं कह रहा हूँ कि मैंने अपने जीवन मे इसको भुगता है बल्कि इसलिए कह रहा हूँ कि इसका कोई धार्मिक औचित्य नहीं है,इसने लाखों बच्चों की शिक्षा के द्वार बंद किये है,लाखों उभरते मेहनतकश परिवारों को गरीबी के दुष्चक्र में डाला है,इसने समाज की माताओं के ऊपर शुभ-अशुभ के कई लांछन लगाएं है,समाज की बेटियों को शिक्षा की राहों से खींचकर बाल-विवाह की डोलियों में बिठाया है।
सब मानते है कि एक बेटी पढ़ेगी तो तीन दो परिवारों की पीढियां सुधरेगी।शिक्षा वो हथियार है जो हासिल करेगा वो गुलामी से मुक्त होकर राज करेगा।हमने लंबे समय से अपने समाज के मेहनतकश लोगों को गरीबी के दलदल में धकेला है,बच्चों की शिक्षा छीनकर उनका भविष्य बर्बाद किया है,मेहनतकशों की जमीनें गिरवी रखवाकर बिक़वाई है।
यह कार्य मानवीय मूल्यों के खिलाफ था।अधर्म था मगर धर्म व आस्था का चोला लपेटकर इस तरह अपनाया कि हम इंसानियत के ही दुश्मन बनकर खड़े रहे!यह हर समाज के ऊपर बदनुमा दाग किसी ऐरे-गैरे ने नहीं बल्कि पाखंडवादी लोगों के साथ खड़े होकर हमारे ही समाज के मौजिज लोगों ने लगाया था।
इंसान का जागना सिर्फ आंखे खोलकर हिलना-डुलना ही नहीं होता है बल्कि अपनी चेतना को जीवंत करके दिखाना होता है।इंसानी कथनी से नहीं बल्कि अपनी करनी से मानवता के लिए कार्य करके महान बनते है।
मैं समाज के बड़े बुजुर्गों का हर हाल में सम्मान करता हूँ।कालखंड के हालात,धार्मिक व राजनैतिक सत्ता ही मानव सभ्यता का नेतृत्व करती है और कई पुराने फैसले गलत हो जाते है और नये फैसले समाजहित में होते है।ऐसा नहीं है कि उस समय हमारे पुरखे लड़े नहीं थे।वो लड़े थे इस सामाजिक कलंक से छुटकारे के लिए और हमसे बेहतर लड़े थे तभी तो उन हालातों में भी मृत्युभोज रोकथाम अधिनियम बना दिया था और आज हमारे समाज के सैंकड़ों अधिकारी इसको रोकने के लिए नियुक्त है मगर अपने कर्तव्यों का ठीक से पालन तक नहीं कर रहे है।हम इस कानून को आज दबाव बनाकर लागू करवाने में खुद को नाकाम खड़ा पा रहे है!
20-30 युवा प्रत्येक पंचायत स्तर पर इस सामाजिक कलंक के विरुद्ध खड़े हो जाये तो यह कलंक चंद दिनों में हमारे माथे से हट सकता है।यह सर्वसमाज के युवाओं के भविष्य की लड़ाई है।युवा लोग इस बात को ठीक से समझे।ज्यादा कुछ करना नहीं है।थानेदार व एसडीएम को लिखित सूचना दो।समझाने का कार्य उनका है हमारा नहीं।कानून को हम याद दिलाएं अगर वो कर्तव्यों का निर्वहन नहीं करते है तो फिर उस मामले को अदालत तक ले जाएंगे और किसी कानून को जनहित याचिका दायर करके लागू करवाने के लिए हमारे वकील साथी निस्वार्थ भाव से सहयोग करने को तैयार है।
मामला सामाजिक कुरीति का है और मामला भावी पीढ़ी के भविष्य का है इसलिए जितनी देरी की जायेगी उतने फलते-फूलते परिवार गुरबत में चले जायेंगे।
पहला रास्ता समाज के बड़े-बुजुर्गों को साथ लेकर समझाइश के माध्यम से इस बुराई से पीछा छुड़वाने का है।दूसरा रास्ता जिम्मेदार लोगों से अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए रुकवाने का है।तीसरा रास्ता कोर्ट का है।अगर तीनों जगह निराशा हाथ लगे तो फिर भगतसिंह का है जो बारह साल की उम्र में घर से निकलकर स्कूल के बजाय जलियांवाला बाग पहुंचे और एक शीशी में शहीदों के खून से सनी मिट्टी को घर लाकर भाई-बहनों को बताया था कि यह मंदिर-मस्जिदों से पवित्र है और इसका सम्मान हमें करना चाहिए।
जब युवाओं की इच्छाओं को व्यवस्था कुंठाओं में बदलने का कार्य करती रहेगी तो हमारे घरों में गरीब सुदामा नहीं बल्कि भगतसिंह पैदा होंगे!
प्रकाश चन्द्र हिन्दू DkT🚩🚩
13/07/2020
ख़्वाब टूटे है मगर, हौसले अभी ज़िंदा है..!!
मैं वो शख्स हूँ जिससे, मुश्किलें भी शर्मिंदा है..! 🖤✍
13/04/2020
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