Sushil Kumar
इश्क़ करना है तो बस किताबों से कर
जिंदगी तेरी इक दिन सुधर जाएगी
~ सुशील कुमार
12/11/2025
9 नवम्बर को कभीकवि द्वारा आयोजित भव्य कवि सम्मेलन में
अपना काव्य-पाठ प्रस्तुत करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
कार्यक्रम की अध्यक्षता आदरणीय स्वयं श्रीवास्तव जी ने की,
साथ ही आयोजन की सफलता के सूत्रधार
श्रद्धेय अनिल मिश्र जी एवं कभीकवि परिवार के प्रति
हृदय से आभार 🙏
यह मंच केवल कवियों को स्वर नहीं देता,
बल्कि भावनाओं को उड़ान भी देता है।
सभी श्रोताओं, साहित्यप्रेमियों और आयोजकों को
हार्दिक धन्यवाद एवं स्नेह 💐
— सुशील कुमार
(कवि एवं रचनाकार)
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30/03/2025
माँ नव दुर्गा स्तुति
दोहा:-
मातु पिता गुरु नाय सिर, प्रथम मनाय गणेश।
कारज आय सॅंवारिए, बह्मा, विष्णु, महेश॥
जय जय माँ जगदम्बिका, करो कंठ में वास।
कीरति गाऊँ आपकी, कीजै पूर्ण प्रयास॥
चौपाई:-
सब भक्तों ने तुम्हे पुकारा। आओ मातु सजा है द्वारा॥
शरण पडा़ मैं मातु भवानी। कृपा करो आकर महरानी॥
कह लगि कहौ तोर मैं करनी। सहस्त्रों मुख जाय नहि बरनी॥
रूप तेज गुन ललित विशाला। पावत दरश मिटहिं सब ब्याला॥
प्रथम दिवस माँ शैलपुत्री। सुयश कीर्ति बल ज्ञान धात्री॥
सिंह वाहिनी मातु भवानी। महिमा अमित न जात बखानी॥
धूप देई अरु जपे हमेशा। ताके उर नहिं रहे कलेशा ॥
निर्मल मन जो ध्यान लगावे। ताहि दरिद्र निकट नहि आवे॥
सरल शांति और सौम्य धारणी। रूप दूसरा ब्रह्मचारिणी॥
सहस पांच तप कीन्हा भारी। तव दर्शन दीन्हा त्रिपुरारी॥
श्वेत-पीत पट मातु सुहावे। व्यंजन क्षीर मनहि अति भावे॥
ज्ञान, प्रेम अरु बुद्धि विवेका। नाम जपत पावै हर एका॥
तृतीय नाम जानहिं जग सारा। मातु चंद्रघण्टा अति प्यारा॥
अर्ध चन्द्रमा भाल सुहावे। मातु चंद्रघण्टा अति भावे॥
महिषासुर जब भयो कराला। दस भुज मातु हते तेहि काला॥
मातु तुमहि जो ध्यान लगावे। साहस शांति परम पद पावे॥
मंद हास्य प्रगटेव ब्रह्मांडा। नाम पडा़ तव माँ कुष्मांडा॥
शंख, गदा, धनु-बाण, कमण्डल, चक्र, जलज कर में गंगाजल॥
अष्टभुजा माँ शेर सवारी। हरे भक्त की विपदा सारी॥
जो सीताफल, लौंग चढावै। स्वस्थ लाभ धन संपति पावै॥
तरकासुर राक्षस अति भारी। जासे सकल देव गए हारी॥
तव शिव अंश कार्तिकेय जायो। तेहि बहु बिधि रण ज्ञान सिखायो॥
पुत्र लालसा जेहि मन होई। ध्यान धरे मन में नर सोई॥
जो कदलीफल भोग लगावै। माँ स्कंद तेहि गृह आवै॥
ऋषि कत्यायन सुता सयानी। नाम पडा़ तेहि माँ कत्यायनी॥
अस्त्र-शस्त्र कर पंकज सोहे। वाहन सिंह सकल जग मोहे॥
यादव कुल की आदि भवानी। शक्तिपीठ वृंदावन माही॥
कुमकुम, रोली आन चढावै। सो उत्तम सहचर जग पावै॥
रक्त-बीज जब बढ्यो अचारा। कालरात्रि तव रूप संवारा॥
रूप कराल धरयो तव माता। रक्त-बीज मारयो निज हांथा॥
होय अति क्रुद्ध लड्यो समरांगण। रूंड-मुण्ड पाट्यो पूरा रण॥
लाल फूल, फल, वस्त्र चढावै। सो नर मातु मनहि अति भावै॥
रजत समान रूप महमाई। मातु महागौरी कहलाई॥
वाहन सोहे शेर सवारी। सदा होय भक्तन हितकारी॥
धूप, दीप, नैवेद्य चढावै। हलवा पूरी भोग लगावै॥
ध्यान सदा जो नर मन लावै। जनम-मरण से मुक्ति पावै॥
नवम रूप माँ सिद्ध दात्री। विद्या, बुद्धि, ज्ञान अधिष्ठात्री॥
कमलासन, भुज चारि सोहाहीं। होहि सिद्ध सुमिरत मन मानी॥
जप, तप करहिं होम बिधि नाना। कीरति बहु बिधि वेद बखाना॥
पुआ, नारियल, खीर चढावै। तेहि ढिग मातु तुरत चलि आवै॥
होहु प्रसन्न आदि जगदम्बा। केहि कारण माँ कींह बिलम्बा॥
रूप सरस्वती अधिक पियारा। जनमानस दे ज्ञान संवारा॥
ज्ञान ज्योति हे मातु जलाओ। मोह मदादिक दूर भगाओ॥
तुम गरीब की बहुत पियारी। रूप लक्ष्मी जगत दुलारी॥
सुमिरहुं तोहि बली अति जानी। रक्षा करहुँ मातु मम आनी॥
करहु शत्रु कर नाश भवानी। बार बार विनवऊँ कल्याणी
आशा तृष्णा मोहि सताए। कामरूप निशदिन भरमाए॥
ध्यान धरे जो तुमको मन से। दोष मुक्त हो जाए तन से॥
जो छल छाडि जपै नित तोही। काल रूप नहीं व्यापे सोई॥
जोरि पानि करि विनय बढाई। करहु कृपा दीनन पर माई॥
दोहा:- तन बंजर धरती हुई, मानस रूप करील।
अमिय ज्ञान बरसाय माँ, कीजै मोहि सुशील॥
सुशील कुमार
25/03/2025
धन्यवाद सृजन फिर से
@टॉप फ़ैन everyone
तुझपे तन मन सब वारे हम
बस तुझको अपना माने हम
जीवन की सारी खुशियां कर दे तुझपे न्योछार प्रिये
तू कह दे बस एक बार प्रिये
तुझको मुझसे है प्यार प्रिये
तेरी गंधमयी इन जुल्फों में मेरा मन आकार उलझा है
तुमको ही माना रब अपना बस तुमको ही तो पूजा है
तेरा रूप बना है छलिया मृग
अरु सेतु बने है फिर ये दृग
दो रूह एक होने को तब आई है उस पार प्रिये
तू कह दे बस एक बार.......
जाने वो कौन भाग्यशाली जिसका मन में आदर होगा
माथे का कुमकुम बिंदिया पायल और महावार होगा
कौन बनेगा तेरा अपना
किसका टूटेगा फिर सपना
दे नीति नियति के हाथों में आया करने इज़हार प्रिये
तू कह दे बस एक बार .......
यह खेद रहेगा जीवन भर कि विशेष नहीं हो पाए हम
थे यमक यमक ही रहे सदा क्यों श्लेष नहीं हो पाए हम
अब जीवन की क्या अभिलाषा है
पर खुद को यही दिलासा है
देखना कौन वो है जिसपर मुझसे ज्यादा ऐतबार प्रिये
@सुशील कुमार
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01/03/2025
भावों के मीत
आशा, पीड़ा, प्रेम, विरह सब, कागज पर नव रूप सँवारे।
छंद, गीत, ग़ज़लें, मुक्तक, ही मीत बने हैं आज हमारे।
जब भी जीवन थका अकेला,
भावों ने आ बाहें खोलीं।
स्याही के आँचल में सिमटी,
सुख-दुख की सब भूली बोली।
मन की वीणा झंकृत होकर, गीत सुनाए प्रेम के प्यारे।
छंद, गीत, ग़ज़लें, मुक्तक, ही मीत बने हैं आज हमारे।
अक्षर गढ़ते पीर हमारी,
कभी सिसकते, कभी सँवारे।
कुछ ने आँगन ज्योत सजाई,
कुछ ने आँसू और उबारे।
भावनाओं के दीप जले जब, बिखर गए चहुं दिश उजियारे।
छंद, गीत, ग़ज़लें, मुक्तक, ही मीत बने हैं आज हमारे।
कभी हवा सी बहती कविता,
कभी समंदर जैसी गहरी।
दिल के कोमल तारों से ये,
बनती कभी प्रेम की प्रहरी।
राग-विराग सभी संग मेरे, जीवन के ये सुखद सहारे।
छंद, गीत, ग़ज़लें, मुक्तक, ही मीत बने हैं आज हमारे।
पथ में चाहे कांटे आएं,
या हो निशा घनेरी काली।
शब्दों की दुनिया में फिर भी,
रहती मधुरिम धूप निराली।
हम लिखते हैं उम्मीदों को, हर अक्षर हैं प्राण हमारे।
छंद, गीत, ग़ज़लें, मुक्तक, ही मीत बने हैं आज हमारे।
सुशील कुमार
Sushil Kumar
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