Krishna Bhakti Ras

Krishna Bhakti Ras

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Krishna and His Beloved Radhe are sweet ! Experience Their amazing love by joining us in our journey Krishna Bhakti is the sweetest experience! Jai Radhe!

To stir this Bhakti in our hearts we need to hear and see the Form of the Lord, His Name, His pastimes and His Dham! As our Bhakti increases, Krishna Himself feels attracted to us, and it is He who comes closer to us . We move one step, and He moves 100 steps! On this page, I shall present the many aspects and facets of Krishna, each one sweeter than the other. I shall share my realizations, I sha

12/04/2026

*🌹नाथ ! हौं निपट निरंकुस नीच।*
*नरक-कीट मैं पर्यौ रहौं नित*
*पाप-तापके कीच॥*

*🌹करौं भगति की बात मनोहर,*
*भीतर भरे बिकार।*
*अंतरजामी तुमहू तें मैं*
*करौं कपट-ब्यौहार॥*

*🌹निज सुभावबस, नाथ दयाकर !*
*पकरि उधारौ हाथ।*
*पाप-प्रबाह पतित पामर कौं*
*करौ, कृपालु ! सनाथ॥*

*🌹परम भागवत पद रत्नाकर ग्रंथ, परम पूज्य श्रीभाईजी🌹*

*🌹🌹🌹🌹🌹🌹 बहुत बहुत बड़ा रहस्य : परम पूज्य श्रीभाईजी के जीवन की ऐसी अनुभूति, जिसकी केवल आंशिक समझ आने पर हमारे हाथ जैकपौट लग जाएगा।🌹*

*🌹परम पूज्य श्रीराधा बाबा के दिव्य वचन.... 🌹श्रीभाईजी अनवरत श्रीकृष्ण को ही देखते हैं, उन्हें ही सुनते हैं, उनमें ही जागते-सोते, निवास करते हैं । भाईजी एक अविच्छिन्न अखण्ड भगवत्प्रेम के महान् अप्राकृत चिन्मय समुद्र में डूबकर तन्मय हो गये हैं । उनका जीवन अखण्ड घन श्रीकृष्ण-प्रेमरस ही है । वे श्रीकृष्ण-सुख-तात्पर्यैक प्रीति की जीती-जागती मूर्त्ति हैं। 🌹.....परम पूज्य श्रीभाईजी श्रीराधा रानी (अभिन्न स्वरूपा) हैं। भाईजी की वाणी अपनी वाणी नहीं, साक्षात् श्रीराधा रानी की ही वाणी है।🌹*

*परम भागवत पद रत्नाकर ग्रंथ, पद संख्या 1124 🌹 जय जय श्री राधे 🌹🙏🌹*

🌹 *मेरे* द्वारा बोल रहे हैं केवल मेरे वे *भगवान* ।
मेरे द्वारा छेड़ रहे हैं वे निज मधु मुरलीकी तान॥

🌹 मेरे जीवनमें है अब तो एकमात्र उनका ही स्थान।
अत: *उन्हींकी* होती मुझमें *क्रिया* नित्य सब क्षुद्र-महान॥

12/04/2026

*🌹🌹🌹 अद्भुत, दिव्य सत्संग, परम भागवत पद रत्नाकर ग्रंथ से, पद संख्या 1071 का।🌹 जय जय श्री राधे 🌹🙏🌹*

🌹चाह तुम्हारी ही हो प्यारे !
नित्य-निरन्तर मेरी चाह।
चाह न रहे अलग कुछ मेरी, नहीं किसीकी हो परवाह॥

🌹 चलता रहूँ निरन्तर, प्यारे !
केवल एक तुम्हारी राह।
बिगड़े-बने जगत्का कुछ भी, कहूँ निरन्तर ‘प्यारे ! वाह’॥

*। पद रत्नाकर ग्रंथ से पद संख्या 1124 🌹जय जय श्रीराधे 🌹🙏🌹*

🌹मेरे द्वारा बोल रहे हैं केवल मेरे वे भगवान।
मेरे द्वारा छेड़ रहे हैं वे निज मधु मुरलीकी तान॥

🌹 मेरे जीवनमें है अब तो एकमात्र उनका ही स्थान।
अत: उन्हींकी होती मुझमें क्रिया नित्य सब क्षुद्र-महान॥

12/04/2026

*🌹🌹🌹🌹🌹🌹 बहुत बहुत महत्वपूर्ण बात : सर्वोच्च भाव की प्रप्ति का मूल मंत्र।🌹ऐसा रहस्य जो केवल श्रीभाईजी ने संसार के सामने प्रकट किया।🌹 पद रत्नाकर ग्रंथ से हमें क्या नहीं मिल सकता।🌹परम भागवत पद रत्नाकर ग्रंथ, पद संख्या 469 🌹 जय जय श्री राधे 🌹🙏🌹*

हो चाहे शंकर शुचि अद्वय-ज्ञान-ज्योति-विस्तारक।
हो चाहे चैतन्य मधुरतम प्रेम-प्रवाह-प्रसारक॥

हो चाहे आचार्य अन्य कोई, जग-तमके नाशक।
हो चाहे तुम किसी अन्य प्रभु-पथके परम प्रकाशक॥

हो चाहे तुम देव, पितर, गन्धर्व, भले हो दानव।
हो चाहे तुम योगिराज, हो सत्पथगामी मानव॥

हो चाहे तुम अतिमानव, हो चाहे कोई कारक।
हो चाहे तुम महापुरुष, हो संत लोक-उद्धारक॥

हो चाहे सामान्य मनुज, जो कर्म भोगने आये।
हो चाहे कोई भी प्राणी, जिसपर तम घन छाये॥

नहीं जानना मुझको—तुम हो कौन ? कहाँ क्या परिचय ? तुम मेरे हो, अपने हो, बस, यही सदा दृढ़ प्रत्यय॥

हो चाहे तुम सद्गु ण-निधि, चाहे दोषोंके सागर।
*🌹🌹🌹मेरे वैसे ही हो, जैसे राधाके नट-नागर॥*

मेरा प्रेम तुम्हारा यह शुचि सदा परम निर्गुण है।
बढ़ता रहता प्रतिपल—इसमें यही विलक्षण गुण है॥

12/04/2026

*यमुनानगर (जगाधरी, हरियाणा) में हो रहे परम पूज्य श्रीभाईजी के उत्सव का आरंभ।🌹परम भागवत पद रत्नाकर ग्रंथ, पद संख्या 66 🌹 जय जय श्रीराधे 🌹🙏🌹*

🌹करुणामय ! उदार चूड़ामणि ! प्रभु ! मुझको यह दो वरदान।
देखूँ तुम्हें सभीमें, सभी अवस्थाओंमें हे भगवान॥

🌹शब्द मात्रमें सुन पाऊँ मैं नित्य तुम्हारा ही गुण-गान।
वाणीसे गाऊँ मैं गुणगण, नाम तुम्हारे ही रसखान॥

🌹इन्द्रिय सभी सदा पुलकित हों पाकर मधुर तुम्हारा स्पर्श।
कर्म नित्य सब करें तुम्हारी ही सेवा, पावें उत्कर्ष॥

🌹बुद्धि, चित्त, मन रहें सदा ही एक तुम्हारी स्मृतिमें लीन।
कभी न हो पाये विचार-संकल्प- मनन, प्रभु ! तुमसे हीन॥

🌹सदा तुम्हारी ही सेवामें सब कुछ रहे सदा संलग्र।
यही प्रार्थना—रहूँ तुम्हारे पद-रति-रसमें नित्य निमग्र॥

12/04/2026

*बरसाना धाम से, श्रीराधा रानी के आज के सुंदर मंगला दर्शन, तथा स्वयं श्रीराधा रानी द्वारा लिखी यह दिव्य प्रार्थना।🌹 परम भागवत पद रत्नाकर ग्रंथ, पद संख्या 15 🌹 जय जय श्री राधे 🌹🙏🌹*

🌹करौ कृपा श्रीराधिका, बिनवौं बारंबार।
बनी रहै स्मृति मधुर सुचि, मंगलमय सुखसार॥

🌹श्रद्धा नित बढ़ती रहै, बढ़ै नित्य बिस्वास।
अर्पण हौं अवसेष अब जीवन के सब स्वास॥

*🌹मो सम महापातकी कौ नहिं*
*नरकहु में निस्तार।*
*निज दिसि देखि दयामय करिहैं*
*निस्चै ही उद्धार॥*

*🌹दीनबंधु हरि सहज सुहृदबर,*
*अघहर परम उदार।*
*देहु ग्यान, बैराग्य, भगति, पद-*
*प्रीति अमित-दातार॥*

*🌹परम भागवत पद रत्नाकर ग्रंथ, परम पूज्य श्रीभाईजी🌹*

12/04/2026

*🌹बहुत बहुत सुंदर भाव 🌹*

*राधा राधा राधा राधा राधा 🌹साक्षात् प्रेमावतार, श्रीराधा रानी अभिन्न स्वरूपा परम पूज्य श्रीभाईजी का एक दिव्य सत्संग: 🌹*

🌹 *भगवत्प्रेम के पथिकों का एकमात्र लक्ष्य होता है--भगवत्प्रेम। ये भगवत्प्रेम को छोड़कर मोक्ष भी नहीं चाहते, यदि प्रेममें बाधा आती दीखे तो भगवान् ‌के साक्षात् मिलन की भी अवहेलना कर देते हैं, यद्यपि उनका हृदय मिलन के लिये आतुर रहता है। जगत् का कोई भी पार्थिव पदार्थ, कोई भी विचार, कोई भी मनुष्य, कोई भी स्थिति, कोई भी सम्बन्ध, कोई भी अनुभव उनके मार्ग में बाधक नहीं हो सकता। वे सबका अनायास-- बिना ही किसी संकोच, कठिनता, कष्ट और प्रयास के त्याग कर सकते हैं। संसार के किसी भी पदार्थ में उनका आकर्षण नहीं रहता।🌹*

*🌹कोई भी स्थिति उनकी चित्तभूमि पर आकर नहीं टिक सकती, उनको अपनी ओर नहीं खींच सकती।*🌹*

🌹 *शरीरका मोह मिट जाता है। उनका सारा अनुराग, सारा ममत्व, सारी आसक्ति, सारी अनुभूति, सारी विचारधारा, सारी क्रियाएँ एक ही केन्द्र में आकर मिल जाती है--वैसे ही जैसे विभिन्न पथों में आनेवाली नदियाँ एक ही समुद्र में आकर मिलती है। वह केन्द्र होता है, केवल भगवत्प्रेम।*🌹

*🌹शरीर के सम्बन्ध, शरीर के रक्षण- पोषणका आग्रह, शरीरकी आसक्ति,‌ (अपने या पराये ) शरीरमें आकर्षण, ( अपने या पराये) शरीरकी चिन्ता-- सब वैसे ही मिट जाते हैं, जैसे‌ सूर्यके उदय होनेपर अन्धकार। ये तो बहुत पहले मिट जाते हैं। विषय-वैराग्य, काम-क्रोधादिका नाश, विषाद- चिन्ताका अभाव, अज्ञानान्धकार का विनाश भगवत्प्रेम- मार्ग के अवश्यम्भावी लक्षण हैं। भगवत्प्रेम का मार्ग सर्वथा पवित्र, मोहशून्य, सत्यमय, अव्यभिचारी, त्यागमय और विशुद्ध होता है।🌹*

*🌹भगवत्प्रेम की साधना अत्यन्त बढ़े हुए सत्वगुण में ही होती है। उसमें दीखने वाले काम, क्रोध, विषाद, चिन्ता, मोह आदि तामसिक वृत्तियों के परिणाम नहीं होते। वे तो शुद्ध सत्व की ऊँची अनुभूतियाँ हैं, जिनका स्वरूप बतलाया नहीं जा सकता।* 🌹

🌹 *प्रेमका अनुभव होता है मनमें और मन रहता है सदा अपने प्रेमास्पद के पास। फिर, भला, मनके अभाव में वाणी को यत्किंचित् भी वर्णन करने का असली मसाला कहाँ से मिले ? अतएव प्रेम का जो कुछ भी वर्णन मिलता है, वह केवल सांकेतिक मात्र है--बाह्य है। प्रेम की प्राप्ति हुए बिना तो प्रेम को कोई जानता नहीं और प्राप्ति होने पर वह अपने मनसे हाथ धो बैठता है।🌹*

_*🌹पुस्तक : भाईजी पावनस्मरण 🌹*_

12/04/2026

*वृंदावन धाम से ठाकुर श्री बांके बिहारी जी के सुंदर संध्या दर्शन।🌹
जय जय श्री राधे 🌹🙏🌹*

12/04/2026

*राधा राधा राधा राधा राधा*

*🌹परम पूज्य श्रीभाईजी🌹*

*🌹भगवान् की बड़ी कृपा है🌹*

*🌹तुम नित्य सत्य सच्चिदानन्दघन भगवान्‌के चरणोंमें अपना चित्त समर्पण करके सदाके लिये निर्भय और निश्चिन्त हो जाओ। भगवान् जीवन-मरण, लोक-परलोक, भूत-भविष्य-सभीमें सदा साथ रहते हैं।* *तुमपर भगवान्‌की बड़ी कृपा है। तुम सहज ही उनकी शरण ग्रहणकर कृतार्थ हो सकते हो। वे सर्वसमर्थ सदा ही परम सुहृद हैं।* *उनकी कृपाकी छत्रछायामें पहुँच जानेपर मनुष्यका घोर संताप सदाके लिये मिट जाता है और वे सदा, सबको अपनानेके लिये तैयार हैं। सच्चा भरोसा तो उसीका है, जो हर हालतमें साथ रहता है।* *इससे उनसे ही यह प्रार्थना करनी चाहिये-*

🌹कुटिल कर्म लै जाहि मोहि, जैह-जँह अपनी बरिआई।
🌹तँह-तँह जनि छिन छोह छाँड़ियो, कमठ अंडकी नाई ।।

*🌹अतएव अन्य सब आशा-भरोसा विश्वास छोड़कर, एकमात्र भगवान्पर ही निर्भर होकर, उन्हींका आशा भरोसा विश्वास करना चाहिये।🌹*

*राधा राधा राधा राधा राधा*

*🌹भगवत्कृपा से कठिनाइयों का अन्त 🌹*

*🌹याद रखो—* जगत् के ये सारे दुःख-क्लेश, सारे अभाव-अभियोग, सारे शोक-विषाद तभीतक हैं जबतक तुम्हें भगवान् की कृपाके दर्शन नहीं हुए। जिस क्षण भगवत्कृपाकी झाँकी तुम्हारे मनने की, उसी क्षण भगवत्कृपाका परम बल तुम्हारा सारा अभाव मिटा देगा।

🌹अभावकी वृत्ति मनसे पैदा होती है और जिस वस्तुका यथार्थमें अभाव है, उसकी कल्पनासे अभावकी वृत्ति शान्त होती नहीं, इसीसे प्रत्येक विषयलाभ अभावकी अभिवृद्धि करनेवाला होता है। अभावका नाश तो होगा, जो भाववाली है, सदा है, सदा रहेगी, उस सच्ची वस्तुकी प्राप्तिसे और वह सच्ची वस्तु है—नित्य सत्य भगवान्।🌹

*-🌹 परम पूज्य "भाईजी” श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार*🌹

12/04/2026

*राधा राधा राधा राधा राधा*

*🌹भगवान् को आर्तभाव से पुकारते ही रक्षा हो गयी🌹!*

*🌹 *नोआखाली से लौटते हुए एक परिवार के एक वीर युवक ने हावड़ा स्टेशनपर अपना हाल बतलाया था कि मैं किसी आवश्यक कामसे बाहर गया हुआ था, घरपर मेरे माता-पिता और पत्नी-इतने लोग थे। बाहरसे लौटनेपर पड़ोसियों से ज्ञात हुआ कि आक्रमणकारी गुंडे मेरे पिताकी हत्या करके मेरी माता और पत्नीको अपहरण करके ले गये। यह सुनते ही मैं 'मैं' नहीं रहा। भगवान् से मैंने प्रार्थना की, कहींसे मुझे एक छुरा दिला दो। मुझे तुरंत एक छुरा मिला। उसे उठाकर भगवान् के भरोसे मैं पता लगाता हुआ उन बदमाशोंके अड्डेपर जा पहुँचा। देखा, मेरी माता और पत्नी वहाँ मौजूद हैं और दोनों बदमाश वहाँ अकड़े बैठे हैं। मैंने तुरंत भगवान् का नाम लेकर एकके पेटमें छुरा भोंक दिया।* *वह घावको हाथसे दबाकर उठा, उसका दूसरा साथी भी मुझपर टूट पड़ा। मैंने अपनी माता और स्त्रीको ललकारा कि 'बैठी क्या देखती हो। मारो इन दुष्टोंको।' भगवान् की कृपासे हम तीनोंने मिलकर उन दोनोंका काम तमाम किया और वहाँसे निकलकर चले आ रहे हैं। उस युवकके शरीरमें भी कई घाव थे। तीनों ही भगवान् का स्मरणकर प्रफुल्लित हो उठते थे।* 🌹*

भगवच्चर्चा (भाग-५)

*🌹परम श्रद्धेय भाईजी श्रीहनुमान प्रसादजी पोद्दार 🌹*

*राधा राधा राधा राधा राधा*

*🌹निरन्तर श्रीभगवान्‌ की पवित्र तथा मधुर स्मृति अखण्ड रूपसे बनी रहे तथा संसार के भोगोंसे आत्यन्तिक उपरति रहे, यही साधन-अभ्यास करना है। इसके हो जाने पर अपने-आप ही निर्मल विशुद्ध प्रभु-प्रेम की प्राप्ति हो जाती है। यह निश्चय है।🌹*

*🌹परम पूज्य "भाईजी" श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार*🌹

12/04/2026

*वृंदावन धाम से ठाकुर श्रीबांके बिहारी जी के आज के सुंदर श्रंगार दर्शन , तथा परम भागवत रत्नाकर , पद संख्या 472 🌹जय जय श्री राधे 🌹🙏🌹*

हुआ समर्पण प्रभु-चरणोंमें जो कुछ था सब-मैं-मेरा।
अग-जगसे उठ गया सदाको चिर-संचित सारा डेरा॥

मेरी सारी ममताका अब रहा सिर्फ प्रभुसे सम्बन्ध।
प्रीति, प्रतीति, सगाई सबही मिटी, खुल गये सारे बन्ध॥

प्रेम उन्हींमें, भाव उन्हींका, उनमें ही सारा संसार।
उनके सिवा, शेष कोई भी बचा न जिससे हो व्यवहार॥

नहीं चाहती जाने कोई मेरी इस स्थितिकी कुछ बात।
मेरे प्राणप्रियतम प्रभुसे भी यह सदा रहे अज्ञात॥

सुन्दर सुमन सरस सुरभित मृदुसे मैं नित अर्चन करती।
अति गोपन, वे जान न जायें कभी, इसी डरसे डरती॥

मेरी यह शुचि अर्चा चलती रहे सुरक्षित काल अनन्त।
रहूँ कहीं भी कैसे भी, पर इसका कभी न आये अन्त॥

इस मेरी पूजासे पाती रहूँ नित्य मैं ही आनन्द।
बढ़े निरन्तर रुचि अर्चामें, बढ़े नित्य ही परमानन्द॥

बढ़ती अर्चा ही अर्चाका फल हो एकमात्र पावन।
नित्य निरखती रहूँ रूप मैं उनका अतिशय मनभावन॥

वे न देख पायें पर मुझको, मेरी पूजाको न कभी।
देख पायँगे वे यदि, होगा भाव-विपर्यय पूर्ण तभी॥

रह नहिं पायेगा फिर मेरा यह एकाङ्गी निर्मल भाव।
फिर तो नये-नये उपजेंगे प्रियसे सुख पानेके चाव॥

12/04/2026

*राधा राधा राधा राधा राधा*

*साधना*

*🌹मनुष्य चाहे समझे नहीं, कहे नहीं, परन्तु वह ‘पूर्ण’ को चाहता है। इसलिये वह चाहता है ‘भगवान्’ को ही। जगत् में उसे कहीं भी पूर्णता दीखती नहीं, इसीलिये वह प्रत्येक स्थितिमें अतृप्त और असन्तुष्ट रहता है और किसी दूसरी स्थितिकी खोजमें लगा रहता है। परन्तु वह मोहवश पूर्णतम भगवान् की ओर न जाकर दुःख और अतृप्तिकी उत्पत्ति करनेवाले, अभावभरे भोगोंमें ही सुख मानकर उन्हींकी प्राप्तिके लिये प्रयत्न करता है, इसीसे वह सच्चे सुखसे सदा वंचित रहता है। वह करता है अपनी जानमें सुखकी साधना, परन्तु उसे मिलता है दुःख, असफलता, अशान्ति और अतृप्ति! इसीलिये भोगोंके निमित्त किया जानेवाला प्रयत्न यथार्थमें साधना नहीं है। साधना शब्दकी सार्थकता वस्तुतः वही है, जहाँ वह परमानन्दस्वरूप श्रीभगवान् के लिये होती है।🌹*

*- 🌹परम पूज्य "भाईजी” श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार*🌹

*राधा राधा राधा राधा राधा*

*🌹मरने के समय मन में जैसा भाव होता है, दूसरे जन्म में वैसी ही गति होती है, इसलिये जीवन भर भगवान् के स्मरण की आवश्यकता है, जिससे मृत्यु के समय केवल भगवान् ही याद आवें ।🌹*

*🌹परम पूज्य भाईजी श्रीहनुमान प्रसादजी पोद्दार के अमृत वचन*🌹

*राधा राधा राधा राधा राधा*

*🌹परम पूज्य श्रीभाईजी🌹*

*🌹घर में अतिथि की भाँति रहो🌹*

*🌹घरमें अतिथि की भाँति रहना तो बहुत उत्तम है। वास्तवमें घर अपना है ही नहीं। जिसके मनसे घर और संसार निकल जाता है, उसका मन-मन्दिर भगवान्‌के लिये आप ही सज जाता है। मनको संसारसे खाली करना ही भगवान्‌के लिये सजाना है।* *भगवान् किसी भी पूजाकी वस्तुको नहीं चाहतेः वे हैं चाहसे हीन। वे सहज प्रेमसे सना खाली घर चाहते हैं। ऐसा घर पाते ही वे उसमें सदाके लिये बस जाते हैं।🌹*

12/04/2026

*राधा राधा राधा राधा राधा*

*🌹भगवत्कृपा से कठिनाइयों का अन्त 🌹*

*🌹तुम भगवान् के कृपापात्र हो, स्नेहपात्र हो, अपने हो, प्यारे हो। जगत् में चाहे तुम दीन, दुःखी, घृणित, अपमानित, उपेक्षित, विषय-पदार्थ-हीन, मलीन कुछ भी माने जाते हो, कैसे भी दीखते हो—भगवान, की आत्मीयता, उनका प्यार किसी अवस्थामें जरा भी कम नहीं होता। नित्य सम एकरस भगवान् का सर्वभूत-सौहार्द भी नित्य है; क्योंकि वह उनका स्वभाव है। फिर तुम जो अपनेको सर्वलोकमहेश्वर, सर्वशक्तिमान्, सर्वज्ञके सर्वथा और सर्वदा प्रीतिभाजन, प्रिय होनेपर भी दिन-हीन, भाग्य-हीन मानते हो, इसीसे तुम दीन-दुःखी रहते हो। अपनी इस झूठी मान्यताको छोड़ दो। भगवान् के अनुग्रहका, उनके सौहार्दका, उनकी प्रीतिका अनुभव करो और उनके कृपा-बलको अपनी सम्पत्ति मानकर, उसपर अपना हक मानकर उससे सम्पन्न हो जाओ।🌹*

*- 🌹परम पूज्य "भाईजी” श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार*🌹

*राधा राधा राधा राधा राधा*

*🌹साधना🌹*

*🌹किसी साध्य वस्तुकी प्राप्तिके लिये जो प्रयत्न किया जाता है उसे ‘साधना’ कहते हैं। जगत् में सभी जीव सुखकी इच्छा करते हैं, सुख ही सबका साध्य है। सुख भी ऐसा—जो सबसे बढ़कर हो, जिसमें किसी तरहकी जरा भी कमी न हो, जो सदा एक-सा बना रहे, कभी घटे नहीं—कभी हटे नहीं; जो अनन्त हो, असीम हो, नित्य हो और पूर्ण हो। ऐसा सुख विनाशी और परिवर्तनशील संसारकी किसी वस्तुमें हो नहीं सकता। यहाँ अनन्त, असीम, अखण्ड, नित्य और पूर्ण कुछ भी नहीं है। नित्य, सत्य, सनातन, सम, एकरस, अनन्त, असीम, अखण्ड और पूर्ण तो एकमात्र भगवान् ही हैं। इसलिए वही पूर्ण सुखस्वरूप हैं और वही सबके परम साध्य हैं।🌹*

*- 🌹परम पूज्य "भाईजी” श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार*🌹

*राधा राधा राधा राधा राधा*

*🌹परम पूज्य श्रीभाईजी🌹*

*🌹जीवन भगवान्‌ के चरणों में न्योछावर कर दो🌹*

*🌹तुम अपना जीवन श्रीभगवानके चरणोंमें न्योछावर कर दो, फिर उनकी कृपासे सदा मस्ती बनी रहेगी। शोक, विषाद, दुःख, क्लेश, कष्ट, संताप, भय, उद्वेग आदि कुछ रहेंगे ही नहीं यह निश्चय है। अपना सारा मन, सारी बुद्धि, सारा जीवन- प्रत्येक श्वास उन्हींके अर्पण कर देना चाहिये। बहुत-बहुत प्रसन्न रहना चाहिये। भगवान्‌का आश्रय लेनेवाला सदा प्रसन्न ही रहता है। आनन्दघन भगवान्‌के आश्रयमें तो नित्य आनन्द ही रहा करता है।* *उनके पास आनन्दका अभाव वैसे ही कभी नहीं होता, जैसे सूर्यके पास प्रकाशका अभाव नहीं होता।🌹*

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