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if you think you can,you can.
19/02/2026
08/02/2026
“बबुआ, तू कब अइबा…”
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टूटी झोपड़ी के कोने में,
माँ आज फिर बैठी है,
सूनी आँखों में सपना लिए,
तेरी राह निहारे रहती है।
सूखी रोटी, ठंडा चूल्हा,
भूख भी आज सहमी है,
कहती है — “बबुआ आएगा,
तो किस्मत भी बदलेगी।”
फटी चुनरिया, काँपते हाथ,
फिर भी दुआ बुनती है,
हर साँस में तेरा नाम,
हर रात तुझको चुनती है।
गाँव सो जाता है चुपचाप,
माँ जागती रहती है,
दीये की लौ से बातें कर,
तेरी खबर पूछती है।
“शहर बड़ा होगा बेटा,
तू भूल तो नहीं गया?”
हर खत को सौ बार पढ़कर,
दिल को समझाती है माँ।
छत से टपकता पानी जब,
आँसू बन गिर जाता है,
माँ कहती — “कोई बात नहीं,
मेरा लाल तो कमाता है।”
भीड़ में भी वह अकेली है,
दुनिया से अनजानी है,
बस एक उम्मीद ज़िंदा है —
बबुआ की निशानी है।
कभी दरवाज़ा खटके तो,
दिल धक से रुक जाता है,
“आ गया मेरा लाल” कह,
आँचल भीग जाता है।
बबुआ… तू कब अइबा बेटा?
माँ की साँसें थकने लगीं,
तेरे इंतज़ार में जीते-जी,
ज़िंदगी सिसकने लगी।
अगर तू आ जाए एक दिन,
सब दर्द मिट जाएगा,
भूखी माँ की झोली में,
फिर से उजाला आएगा।
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19/02/2026