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संघर्ष, सिद्धांत और सत्ता की राजनीति : तीन नेताओं की तीन राहें
बिहार की राजनीति में तीन बड़े नाम ऐसे रहे हैं जो जयप्रकाश नारायण के ऐतिहासिक आंदोलन की कोख से निकले—लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार और रामविलास पासवान। तीनों समाजवादी विचारधारा से प्रेरित थे और शुरुआत में गरीब, शोषित और वंचित वर्ग की आवाज बनने का दावा करते थे। लेकिन समय के साथ इन तीनों नेताओं की राजनीतिक यात्रा ने अलग-अलग दिशा पकड़ी और उनके निर्णयों ने उनकी अलग पहचान गढ़ दी।
अगर इन तीनों नेताओं के राजनीतिक जीवन को देखा जाए तो लालू प्रसाद यादव एक ऐसे नेता के रूप में उभरते हैं जिन्होंने संघर्ष का रास्ता चुना। सत्ता से बाहर होना पड़ा, मुकदमों का सामना करना पड़ा, जेल भी जाना पड़ा, लेकिन उन्होंने अपने राजनीतिक रुख को बदलने से इनकार किया। कई गंभीर बीमारियों से जूझने के बावजूद उनका मनोबल कभी कमजोर नहीं पड़ा। राजनीतिक संकट के समय भी वे अपने समर्थकों और विचारधारा के साथ खड़े दिखाई दिए।
दूसरी तरफ नीतीश कुमार की राजनीति को अक्सर परिस्थितियों के अनुसार बदलने वाली राजनीति के रूप में देखा जाता है। उन्होंने कई बार राजनीतिक समीकरणों के आधार पर अपने सहयोगी बदले। कभी भाजपा के साथ सरकार बनाई, कभी उससे अलग होकर महागठबंधन बनाया, फिर दोबारा भाजपा के साथ गए और बाद में फिर से गठबंधन बदल लिया। यह सब उनकी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा माना गया, लेकिन आलोचक इसे विचारधारा से समझौता भी कहते हैं।
रामविलास पासवान की राजनीति भी अलग तरह की रही। उन्हें अक्सर ऐसे नेता के रूप में देखा गया जो सत्ता के समीकरणों के साथ खुद को ढालने में माहिर थे। देश की लगभग हर बड़ी सरकार में उनकी मौजूदगी रही—चाहे वह किसी भी दल की सरकार क्यों न हो। समर्थक इसे उनकी राजनीतिक कुशलता कहते हैं, जबकि आलोचक इसे सत्ता के लिए समझौता करने की राजनीति बताते हैं।
इतिहास के पन्नों में अक्सर वही नेता याद किए जाते हैं जिन्होंने कठिन रास्ता चुना। लालू प्रसाद यादव की राजनीति को कई लोग इसी दृष्टि से देखते हैं। उन्होंने कई बार राजनीतिक संकट में अपने साथियों को सहारा दिया—चाहे वह नीतीश कुमार की सरकार को समर्थन देने का दौर हो या राजनीतिक संकट के समय गठबंधन बनाकर सरकार बचाने का सवाल।
आज जब राजनीति में बार-बार गठबंधन बदलने और परिस्थितियों के अनुसार फैसले लेने की चर्चा होती है, तब यह सवाल भी उठता है कि आने वाली पीढ़ियां इन नेताओं को किस नजर से देखेंगी। जब इतिहास लिखा जाएगा और नई पीढ़ी सवाल करेगी कि उस दौर में कौन नेता अपने सिद्धांतों पर अडिग रहा और कौन परिस्थितियों के अनुसार अपने रास्ते बदलता रहा—तब जवाब भी इतिहास के पन्नों में दर्ज होगा।
कई लोगों का मानना है कि संघर्ष, जिद और अपने राजनीतिक रुख पर कायम रहने के कारण लालू प्रसाद यादव का नाम बिहार की राजनीति में एक अलग पहचान के साथ याद किया जाएगा। वहीं नीतीश कुमार को परिस्थितियों के अनुसार राजनीति करने वाले नेता के रूप में देखा जा सकता है और रामविलास पासवान को सत्ता की राजनीति में संतुलन बनाने वाले नेता के रूप में।
समय के साथ राजनीतिक मूल्यांकन बदलता रहता है, लेकिन यह तय है कि जब बिहार की राजनीति का इतिहास लिखा जाएगा, तब इन तीनों नेताओं की भूमिका और उनके फैसलों का जिक्र जरूर होगा—और तब यह भी तय होगा कि किस नेता का नाम संघर्ष की स्वर्णिम पंक्तियों में दर्ज होता है और किसका नाम परिस्थितियों से समझौता करने वाली राजनीति के उदाहरण के रूप में।
हाथ में कट्टा कानून जूती के नोक पर
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