Mekchand nirala nirala

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जय भीम जय सतनाम

18/01/2026

सत्ता हमेशा सच्चा से डरती हैं,
इसलिए वह सवाल करने वालों को चुप करता है।

18/01/2026

बाबा बने तो आस्था, अंबेडकर बने तो FIR — ये कैसी दोहरी नीति सरकार की?

जब कोई ढोंगी बाबा बनकर समाज को गुमराह करे तो सब ठीक,
लेकिन संविधान निर्माता अंबेडकर की बात उठे तो FIR तय!
कानून सबके लिए बराबर होना चाहिए, विचारधारा देखकर नहीं।
ये सवाल सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं, लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आज़ादी का है।

Photos from Mekchand nirala nirala's post 09/10/2025

शोषित जन को राह दिखायी
जिसने अपनी रूह जलायी
घर-परिवार को पीछे छोड़ा
दिल में बहुजन ज्योति जलायी
15 मार्च सन् 34 को समेटकर
रूपनगर को मैं नमन करूँ
शिक्षा के फूलों को समेटूँ
और अर्पित श्रद्धा सुमन करुँ🌍🙏
9 अक्टूबर 2025 को मान्यवर साहब कांशीराम जी को
[महापरिनिर्वाण दिवस पर कोटि कोटि नमन।

02/10/2025

I like the religion that teaches liberty equality and fraternity
~ Dr. Babasaheb ambedkar

Happy ashoka vijya dashmi

Jai bhim, namo buddhay

03/09/2025

भारी बारिश में मैं अभी घर लौटा हूँ कदम भीग चुके हैं, पर मन को मना रहा हूँ कि फाइनली, फाइनली… प्रताप बर्मन को न्याय मिल गया।
रेलवे, राज्य सरकार, कलेक्टर और ठेकेदार सभी ने मिलकर लगभग 31 लाख रुपये थमा रहे हैं। पत्नी को नौकरी का आश्वासन दिया गया है—भले ही सरकारी न हो। बेटे की पढ़ाई की जिम्मेदारी उठाने का वादा भी हो चुका है, पर सवाल यही है — क्या यह न्याय है ?
और न्याय नहीं है भीड़ भी हमे मानना ही पड़ेगा।

आज एक और सच्चाई हमारे सामने आई है हमारी राजनीतिक हैसियत की
अगर कोई अगड़ी जाति से है तो मुआवज़ा 50 लाख।
और अगर कोई अनुसूचित जाति से है तो मुश्किल से 5 लाख!
वो भी तब, जब समाज का युवा सड़क पर उतरकर अपनी जान, अपना समय, अपना भविष्य दांव पर लगाता है।
कितनी विडंबना है कि
हमें न्याय भी सड़क पर उतरकर, नारे लगाकर, तेज धूप में खुद को तपा कर, और भरी बारिश में भींगा कर मिलता है।
और जिन्होंने सत्ता में बैठकर हमारी सुरक्षा का वादा किया था, वोटों के लिए हमारे दरवाज़े पर झुके थे, वही समाज में किसी की लाश गिरते वक्त चुप क्यों हो जाते हैं?
यह घटना सिर्फ प्रताप बर्मन की नहीं है, यह हमारी स्थिति का आईना है।
हम बार-बार समझते हैं कि संविधान हमें बराबरी देता है, मगर जमीन पर खड़ा होकर देखिए हमारी जान, हमारा खून, और हमारा श्रम अब भी सस्ता है।
हमारे आँसू अब भी राजनीतिक सौदों में तौले जाते हैं।

आज सवाल सत्ता से नहीं, खुद से है—
हम कितनी बार सड़क पर उतरेंगे?
कितनी बार बारिश और धूप में डंडे झेलेंगे?
और कब तक हमारी चीख़ें सत्ता के कानों तक पहुँचने के लिए भीड़ की ज़रूरत महसूस करेंगी?

प्रताप बर्मन को मुआवज़ा मिला, लेकिन क्या समाज को न्याय मिला?
या फिर यह वही पुराना खेल है—
“राशि बाँट दो, आवाज़ दबा दो, और जाति के हिसाब से कीमत तय कर दो।” सवाल बहुत है, लेकिन जवाब.....

03/09/2025

आखिरकार प्रताप भाई को न्याय मिल।

31/08/2025

उ.प्र. का सांसद तो पीड़ितों से कम से कम मोबाइल से बात तो किया, लेकिन यहां छ.ग. के आरक्षित पावर हाऊस का तो लगता है ब्रेक डाउन हो गया है।

31/08/2025

विडंबना

23/05/2025

मनुवादी के मुंह पर तमाचा।

23/05/2025

काले कोट के जातिवादीयो, नीले गमछे धारी आ गए हैं। बाबा साहब को ना मानते, आंबेडकर का करते रोज़ तिरस्कार। भीमआर्मी ने डंडों पर नाम लिखे, जनता ने दिया ललकार।।

हाईकोर्ट ग्वालियर में बाबा साहब आंबेडकर की प्रतिमा का विरोध करने वालों को आज जवाब मिला।
भीम आर्मी ने उन वकीलों के नाम डंडों पर लिखकर विरोध किया, जो न्याय और संविधान की आवाज़ को दबाना चाहते थे। ये संघर्ष बाबा साहब के सम्मान और जनता के हक़ की लड़ाई है।

20/04/2025

क्या यही है इंसानियत का हाल?

राजस्थान से काम की तलाश में छत्तीसगढ़ पहुंचे दो युवक—न पैसे मिले, न इज़्ज़त। उल्टा उन्हें बंधक बना कर पीटा गया, बिजली के करंट दिए गए, और प्लायर से उनके पैर के नाखून तक खींच लिए गए। ये कोई फिल्मी सीन नहीं, बल्कि कोरबा की सच्चाई है!

हमारे देश में दलितो के साथ हो रहे इस अमानवीय व्यवहार पर कब सख्त कानून और संवेदनशील प्रशासन खड़ा होगा?

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