Waterman Rajendra Singh
A social activist working for water and river issues in India. He is commonly referred to as "Waterman of India".
Rajendra Singh is a highly respected social activist working with water and river issues in India. In 2015, Rajendra Singh has won the Stockholm Water Prize, also known as "the Nobel Prize for Water". In its citation, the judges say: "Today's water problems cannot be solved by science or technology alone. They are human problems of governance, policy, leadership, and social resilience.” … "Rajendr
14/06/2026
तरुण पुस्तकालय, भीकमपुरा, अलवर राजस्थान
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तरुण पुस्तकालय, भीकमपुरा वैश्विक जल संरक्षण, जल साहित्य, जल दर्शन, जल संस्कृति और प्रकृति के संबंधों से संबंधित विषयों पर पूरी दुनिया की संस्कृति और प्रकृति की जानकारी देने वाली पत्र-पत्रिकाओं एवं पुस्तकों का समृद्ध संग्रह है। यह पुस्तकालय गांव में एक छोटे से स्थान पर, दूर-दराज के गांव भीकमपुरा में सहजता से उपलब्ध है।
तरुण भारत संघ की स्थापना के दूसरे दशक के प्रारंभ में ही इस पुस्तकालय की शुरुआत हुई। वर्ष 1986 में भीकमपुरा में इसका आरंभ हुआ। तब से लेकर आज तक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रकृति, संस्कृति, विरासत, जल, जमीन, जंगल और जंगलवासियों के जीवन से जुड़े प्रश्नों तथा विषयों पर आधारित पुस्तकें यहां संग्रहित की जाती रही हैं।
तरुण भारत संघ ने इस पुस्तकालय के लिए कभी अलग से कोई बजट नहीं बनाया। यह एक प्रकार का “बिना बजट का पुस्तकालय” है। जो भी पुस्तकें हमें आवश्यक लगीं, उन्हें हमने मांगा और लोगों ने उन्हें निःशुल्क उपलब्ध कराया। अनेक प्रकाशकों, संस्थाओं, विश्वविद्यालयों और अन्य संगठनों ने पुस्तकें प्रदान कीं। इस प्रकार पुस्तकों का संग्रह निरंतर बढ़ता गया और आज यहां लगभग 30,000 पुस्तकों का विशाल भंडार उपलब्ध है।
इसके अतिरिक्त यहां लगभग डेढ़ सौ पत्र-पत्रिकाओं का भी संग्रह रहा है। वर्तमान में उनकी संख्या कुछ कम हुई है, किंतु पहले विश्वभर की लगभग 150 पत्र-पत्रिकाएं नियमित रूप से यहां आती थीं। गांव के बच्चे, तरुण भारत संघ के कार्यकर्ता तथा विशेष रूप से पानी के क्षेत्र में कार्य करने वाले देश-विदेश के लोग संदर्भ सामग्री की खोज में इस पुस्तकालय तक पहुंचते हैं।
यह एक सक्रिय और जीवंत पुस्तकालय है। प्रतिदिन सुबह पुस्तकालय खुलता है और लोग अपनी आवश्यकता के अनुसार पुस्तकें देखकर पढ़ते हैं। यहां का वातावरण अत्यंत सहज और खुला है। तरुण भारत संघ के सभी प्रकाशन इस पुस्तकालय के माध्यम से लोगों को निःशुल्क उपलब्ध कराए जाते हैं। इच्छुक व्यक्ति संदर्भ दर्ज कराते हैं और पुस्तकालय से संबंधित कार्यकर्ता उन्हें तरुण भारत संघ की प्रकाशित पुस्तकें निःशुल्क उपलब्ध करा देते हैं।
तरुण भारत संघ ने इस पुस्तकालय को निःशुल्क इसलिए रखा है क्योंकि इसके निर्माण में संस्था का कोई आर्थिक व्यय नहीं हुआ। यह लोगों के सहयोग से विकसित हुआ है। इसलिए नैतिक रूप से यह निर्णय लिया गया कि इस पुस्तकालय से संस्था कोई आय अर्जित नहीं करेगी।
तरुण पुस्तकालय, भीकमपुरा एक प्रकार से लोक पुस्तकालय हैकृलोगों का पुस्तकालय। यहां पाठकों को अपनी आवश्यकता के अनुसार पुस्तकें बिना किसी अनावश्यक रोक-टोक के उपलब्ध हो जाती हैं। हालांकि कुछ दुर्लभ और संदर्भ पुस्तकें, जो तरुण भारत संघ को विशेष रूप से कहीं से प्राप्त हुई हैं, केवल पुस्तकालय में अध्ययन हेतु उपलब्ध रहती हैं। उन्हें बाहर नहीं दिया जाता, किंतु पाठक उन्हें पढ़ सकते हैं, उनकी फोटोकॉपी कर सकते हैं अथवा स्कैन कर सकते हैं।
विषय-विशेष से संबंधित तरुण भारत संघ की प्रकाशित पुस्तकें सभी को निःशुल्क उपलब्ध कराई जाती हैं।
इस पुस्तकालय में संयुक्त राष्ट्र संघ, एफएओ, यूएनडीपी, वर्ल्ड बैंक आदि संस्थाओं की महत्वपूर्ण पुस्तकें उपलब्ध हैं। साथ ही महात्मा गांधी, स्वामी विवेकानंद, विनोबा भावे, ग्राम स्वराज, ग्राम स्वावलंबन, जल, जंगल और जमीन की समृद्धि जैसे विषयों पर भी व्यापक साहित्य संग्रहित है।
पानी के प्रबंधन से लेकर मिट्टी, हवा और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण एवं प्रबंधन से संबंधित अनेक पुस्तकें यहां उपलब्ध हैं। खेती, खाद, बीज और मिट्टी जैसे विषयों पर भी समृद्ध सामग्री मौजूद है। भारत की आत्माकृखेती, किसानी, जवानी और पानीकृसे संबंधित ज्ञान का यह महत्वपूर्ण केंद्र है।
युवाओं के समक्ष उपस्थित समकालीन प्रश्नों को समझने और उनके समाधान प्रस्तुत करने वाली पुस्तकें यहां उपलब्ध हैं। साथ ही खेती को समृद्ध और आत्मनिर्भर बनाने वाले व्यावहारिक अनुभवों तथा स्वावलंबन के प्रत्यक्ष दर्शन से संबंधित साहित्य भी यहां संग्रहित है।
यह पुस्तकालय केवल पुस्तकों का संग्रह नहीं, बल्कि व्यवहार और संस्कार का भी केंद्र है। जीवन के लिए आवश्यक ज्ञान, प्रेरणा और मार्गदर्शन देने वाली पुस्तकें यहां सहजता से उपलब्ध हो जाती हैं। इसी कारण इसे “तरुण लोक पुस्तकालय” कहा जाता है।
आप भी आइए, इस पुस्तकालय को देखिए, पढ़िए और अनुभव कीजिए। निश्चित रूप से यहां का वातावरण और ज्ञान-संपदा आपको आकर्षित करेगी।
13/06/2026
**तरुण भारत संघ: सेंद्रिय खाद**
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जलपुरुष राजेंद्र सिंह
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जब हमने काम शुरू किया, उसी समय तरुण भारत संघ ने जल-संरक्षण के साथ-साथ सेंद्रिय कंपोस्ट खाद और स्थानीय बीजों पर भी काम शुरू किया। उस समय हमारा नारा था—
**“हर घर रखे अपना बीज, हर घर बनाए गोबर की खाद।”**
साथ ही हम यह भी कहते थे—
**“गाँव का पानी गाँव में, खेत का पानी खेत में। हम करें मिट्टी और पानी को बचाने का इंतज़ाम।”**
इस नारे को कई रूपों में बोला जाता था। जैसे—
**“गाँव का पानी गाँव में, खेत का पानी खेत में। गाँव सभा करे फैसला—मिट्टी, पानी, हवा और हौसला ही हमारे गाँव का घोंसला हैं।”**
इन बातों पर हम कार्यकर्ता आपस में चर्चा किया करते थे। उस समय कंपोस्ट खाद बनाना कोई नई बात नहीं थी; यह एक पुरानी परंपरा थी। लेकिन धीरे-धीरे लोग इसे भूलते जा रहे थे। जब लोग तरुण भारत संघ के पास आने लगे, तो उन्होंने इस विषय में पूछताछ भी शुरू की।
तरुण भारत संघ के कार्यकर्ता जब गाँवों में रहते थे, तो जिन परिवारों या पड़ोसियों ने जल-संरक्षण कार्यों को स्वीकार किया था, उनके साथ बातचीत करते-करते गोबर की खाद बनाना भी शुरू किया गया। तरुण भारत संघ के पास शुरू से ही गायें थीं। इसलिए गोबर की उपलब्धता बनी रही और खाद बनाना आसान था।
गोबर से सेंद्रिय खाद बनाने की प्रक्रिया बहुत सरल है। इसके लिए एक गड्ढा खोदा जाता है। उसमें खेतों और घरों से निकला जैविक कचरा इकट्ठा करके भरा जाता है। खाद बनाने के लिए परत-दर-परत सामग्री डाली जाती है। सबसे नीचे मोटी लकड़ियाँ, हरे मोटे पत्ते और डालियाँ रखी जाती हैं। इसके ऊपर मिट्टी की एक पतली परत डाली जाती है। फिर पत्ते, फसलों के अवशेष और अन्य जैविक कचरा डाला जाता है। इसके बाद गोबर का घोल छिड़का जाता है और ऊपर से मिट्टी की एक और परत बिछा दी जाती है। इसी प्रकार परतों का क्रम चलता रहता है।
लगभग तीन महीने बाद खाद को नीचे तक खोदकर पलट दिया जाता है। वर्ष भर में इसे तीन बार पलटा जाता है। इस प्रक्रिया के दौरान मोटे पत्ते और लकड़ियाँ सड़-गलकर कार्बनयुक्त खाद में बदल जाती हैं। यह एक सरल, सहज और प्रभावी प्रक्रिया है।
पिछले वर्ष तरुण भारत संघ ने इसी पद्धति से सौ ट्रॉली से अधिक सेंद्रिय खाद तैयार की थी और उसे अपने खेतों में उपयोग किया था। इस वर्ष हमारा लक्ष्य डेढ़ सौ ट्रॉली खाद तैयार करने का था, और संभावना है कि यह लक्ष्य भी पार हो जाएगा। इसके लिए हमने तीन बड़े गड्ढे और बनाए हैं। फसलों के ऐसे अवशेष, जो चारे या अन्य उपयोग में नहीं आते थे, उन्हें खाद निर्माण में प्रयोग किया गया। हमारे पास उनका अच्छा संग्रह था। बड़े उत्पादन करने जेसीबी और ट्रैक्टर का प्रयोग किया जाता है। छोटे किसान अपने हाथों से भी तैयार कर सकते है।
वर्तमान में हमारे पास लगभग सत्ताईस गायें हैं। इसके अतिरिक्त चार सांड भी हैं। इन पशुओं के गोबर और मूत्र का उपयोग खाद निर्माण में किया जाता है। इसी कारण हमें यूरिया या अन्य रासायनिक उर्वरक खरीदने की आवश्यकता नहीं पड़ती। वास्तव में, हमने आज तक ऐसे उर्वरक खरीदे ही नहीं हैं। यह ही ग्राम स्वराज और ग्राम स्वाबलंबन की राह है।
तरुण भारत संघ हमेशा से प्राकृतिक और सजीव खेती को अपने देसी तरीकों से अपनाता रहा है। यह देसी तरीका आज भी उतना ही खरा और सफल सिद्ध हो रहा है, क्योंकि इसमें अनावश्यक भाग-दौड़ नहीं होती। इसे सहजता, सरलता और स्थानीय संसाधनों के आधार पर आसानी से किया जा सकता है।
12/06/2026
जलवायु परिवर्तन अनुकूलन, उन्मूलन अध्ययन प्रयोगशाला।
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तरुण आश्रम, भीकमपुरा, अलवर में तरुण ताल की दीवारों पर अपने कार्यों तथा पिछले पाँच दशकों के कार्यों का, दुनिया के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए अध्ययन के आधार पर चित्रण प्रस्तुत किया गया है। यह चित्रण बहुत ही सरल और आसानी से समझ में आने वाला है। अध्ययन के परिणामों पर आधारित ये चित्र पूरी कहानी बताते हैं कि जब तरुण भारत संघ ने यहाँ काम शुरू किया था, तब इस क्षेत्र में व्यापक खनन हो रहा था। खनन के कारण धरती नंगी हो गई थी और नंगी धरती पर सूर्य की तीव्र गर्मी सीधे पड़ती थी। इस गर्मी के कारण स्थिति ऐसी हो गई थी कि बादल ऊपर ही ऊपर निकल जाते थे और बिना बरसे आगे बढ़ जाते थे। उस समय पानी के क्षेत्र में काम करना बहुत चुनौतीपूर्ण था, क्योंकि लोग कहते थे कि जब बारिश ही नहीं होती, तो पानी के काम का क्या प्रभाव होगा।
इसके बावजूद तरुण भारत संघ ने पूरे विश्वास के साथ यह कार्य शुरू किया। गोपालपुरा में काम शुरू होने के लगभग तीन वर्ष बाद अच्छी वर्षा होने लगी और फिर लोगों का जल संरक्षण कार्यों की ओर रुझान बढ़ गया। इसी अनुभव को तरुण भारत संघ ने दीवारों पर चित्रों के माध्यम से प्रस्तुत किया है। पहली स्लाइड में दिखाया गया है कि जब सूर्य की गर्मी नंगी धरती पर पड़ती है, तो तापक्रम बढ़ जाता है और वर्षा अच्छी नहीं होती, बादल आगे निकल जाते हैं। दूसरी स्लाइड में दर्शाया गया है कि सूर्य की गर्मी से समुद्र से वाष्पीकरण होता है, जिससे बादल बनते हैं। ये बादल हरियाली वाले क्षेत्रों की ओर जाते हैं और वहाँ वर्षा करते हैं। नियम यह है कि बादलों की गर्मी जंगलों की गर्मी की ओर आकर्षित होती है और दोनों मिलकर वर्षा को संभव बनाते हैं।
हरियाली से उत्पन्न होने वाली नमी और ऊष्मा को अंग्रेज़ी में ट्रांस-इवैपोरेशन (Trans-evaporation) तथा जलाशयों और समुद्रों से होने वाले वाष्पीकरण को इवैपोरेशन (Evaporation) कहा जाता है। जब ट्रांस-इवैपोरेशन और इवैपोरेशन दोनों मिलते हैं, तब अच्छी वर्षा होती है। इसके बाद जल संरचनाओं में पानी एकत्रित होने लगता है और वह धरती का पेट भरता है। यदि धरती में सीधी दरारें हों, तो पानी उन दरारों के माध्यम से धरती के भीतर चला जाता है। एक बार पानी धरती के भीतर पहुँच जाए, तो सूर्य उसे आसानी से नहीं चुरा सकता। यही पानी धीरे-धीरे नदियों, पेड़ों की जड़ों और कुओं तक पहुँचने लगता है।
समय के साथ भूजल स्तर ऊपर आने लगता है और सूखे हुए जल स्रोत फिर से बहने लगते हैं। इस प्रक्रिया में पंद्रह से बीस वर्ष तक का समय लग सकता है, क्योंकि यह भूगोल में परिवर्तन का कार्य है और ऐसे परिवर्तन होने में अपेक्षाकृत अधिक समय लगता है। यही अनुभव तरुण भारत संघ को अपने कार्यक्षेत्र में प्राप्त हुए। इसके बाद तालाब पानी से भरने लगे, कुएँ भरने लगे और खेती फिर से शुरू हो गई। जो युवा रोजगार की तलाश में गाँव छोड़कर शहर चले गए थे, वे वापस गाँव लौटने लगे और अच्छी खेती करने लगे। गाँवों की लाचारी, बेकारी और बीमारी कम होने लगी तथा हरियाली, संतोष और समृद्धि का वातावरण दिखाई देने लगा।
गाँव की इस समृद्धि ने आगे और अधिक वाष्पीकरण को जन्म दिया। इस वाष्पीकरण से छोटे-छोटे बादल बने, जिन्हें माइक्रो क्लाउड्स कहा जा सकता है, और इसी प्रक्रिया ने एक प्रकार का माइक्रो क्लाइमेट तैयार किया। इन माइक्रो क्लाउड्स ने अन्य बादलों को भी अपनी ओर आकर्षित किया और मिलकर बेहतर वर्षा करने लगे। परिणामस्वरूप क्षेत्र में नियमित और अच्छी वर्षा होने लगी। अब यहाँ नियमित वर्षा होती है तथा दो से तीन फसलें ली जाती हैं। शहरों से गाँवों की ओर लोगों की वापसी ने भी एक बड़ा सामाजिक परिवर्तन पैदा किया।
इस परिवर्तन को देखकर तरुण भारत संघ के अध्यक्ष ने वर्ष 2009 में यह कहना शुरू किया था कि “जल ही जलवायु है और जलवायु परिवर्तन जल से ही होता है।” ये प्रभाव अध्ययन चित्र भी बताते हैं कि इस प्रकार के प्रभावकारी कार्य न केवल स्थानीय स्तर पर परिवर्तन लाते हैं, बल्कि दुनिया की नीतियों को प्रभावित करने की क्षमता भी रखते हैं।
वर्ष 2015 में आयोजित कोप-21 (COP-21) सम्मेलन, जिसमें दुनिया भर के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति पर्यावरण संबंधी निर्णय लेने के लिए एकत्रित होते हैं, पेरिस में आयोजित हुआ था। यह संयुक्त राष्ट्र का सम्मेलन था, जिसमें हमें भी आमंत्रित किया गया था। हम सामान्यतः ऐसे सम्मेलनों में भाग लेते रहे हैं, लेकिन इस बार विशेष रूप से “Water is Climate and Climate is Water” विषय पर आमंत्रित किया गया था।
पेरिस सम्मेलन में तरुण भारत संघ की ओर से संगठन के निदेशक मोलिक सिसोदिया और अध्यक्ष दोनों शामिल हुए। उन्होंने इस विषय को अत्यंत जिम्मेदारी और स्पष्टता के साथ प्रस्तुत किया। सम्मेलन से लगभग एक माह पहले ही इस विचार का प्रभाव पूरे पेरिस और आसपास के देशों में विभिन्न स्थानों पर दिखाई देने लगा था। जब यह बात पर्याप्त रूप से सिद्ध हो गई, तब इसे वैश्विक स्तर पर स्वीकार कराने के लिए दुनिया भर से हजारों लोग एकत्रित हुए। “Water is Climate, Climate is Water” के नारों के साथ यह कहा गया कि यदि इस विचार को स्वीकार नहीं किया गया, तो वे इस निर्णय को स्वीकार नहीं करेंगे। इसका व्यापक प्रभाव पड़ा और अंततः यह विचार नीति का हिस्सा बन गया।
इन चित्रों में यह समझा जा सकता है कि किस प्रकार तापक्रम में परिवर्तन आया, किस प्रकार हरियाली बढ़ी और उस हरियाली ने वातावरण से कार्बन को सोख लिया। कार्बन को सोखने के साथ-साथ ऑक्सीजन का स्तर भी बढ़ा। कार्बन का अवशोषण और ऑक्सीजन की वृद्धि, जलवायु अनुकूलन और जलवायु परिवर्तन के संकटों के स्वाभाविक उन्मूलन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम सिद्ध हुए।
गाँव के लोग इसे सरल शब्दों में समझाते हैं कि पहले बारिश नहीं होती थी, लेकिन अब नियमित रूप से होती है। वर्षा का यह नियमित होना किसानों के मन में इस बात को स्थापित करता है कि जल संरक्षण और हरियाली का सीधा संबंध जलवायु परिवर्तन से है। यह अनुभव यह भी सिद्ध करता है कि लोग जलवायु परिवर्तन को किस प्रकार देखते और समझते हैं, तथा लोकविद्या के माध्यम से जलवायु परिवर्तन की व्याख्या कैसे की जा सकती है।
इस प्रभाव का दुनिया के कई वैज्ञानिकों, किसानों और पर्यावरण के कार्यकर्ताओं ने अध्ययन किया था। भारत की संस्थानों , संयुक्त राष्ट्र संघ की यूएनडीपी व वर्ल्ड बैंक, के ने यह अध्ययन करवाया था। स्वीडन डेवलपमेंट कॉरपोरेशन ने भी इस अध्ययन करके फिलो नाम की पुस्तक निकाली थी। संयुक्त राष्ट्र संघ ने बेस्ट प्रॉक्टिक्स के नाम से इस अध्ययन की पुस्तक निकाली थी। भारत सरकार के कपार्ट ने भी कई पुस्तके प्रकाशित की। इस प्रभाव का 51 वर्षों में बहुत ही प्रभावशाली अध्ययन हुआ।
तरुण भारत ने सभी प्रभावों का अध्ययन एकत्रित करके यह भित्ती चित्र बनाया है। इस चित्र में 10 स्लाइड है, जो पूरे 51 वर्ष के प्रभाव की कहानी बता देती है।
तरुण भारत संघ ने अपने कार्यक्षेत्र में इस लोकशिक्षा को सफलतापूर्वक स्थापित किया है। इसलिए ये चित्र जलवायु परिवर्तन अनुकूलन और उन्मूलन से जुड़े एक समय-सिद्ध, अनुभव-आधारित और शोध-सत्य को प्रस्तुत करते हैं।
10/06/2026
विश्व जल तीर्थ: जल प्रयोगशाला___
तरुण भारत संघ ने जब जल संरक्षण का काम शुरू किया था, उसी काल में तरुण भारत संघ परिसर में गायों को पानी पिलाने के लिए एक छोटा सा तालाब बनाया था। उस तालाब को गहरा करते-करते बहुत सारी आश्चर्यचकित करने वाली भू-बनावटों और भू-संरचनाओं का दर्शन हुआ। तरुण भारत संघ भी अपने जल प्रशिक्षण से जुड़े विद्यार्थियों को प्रशिक्षण देने के लिए धीरे-धीरे इस प्रयोगशाला में नए-नए खोज और नए-नए तरीके के काम करता रहा।
अब परिणाम यह है कि तरुण आश्रम, भीकमपुरा में तरुण भारत संघ के मित्रों, साथियों और शुभचिंतकों द्वारा तैयार की गई इस जल संरचना में भू-आकृति और भू-बनावट को समझने का बहुत ही सुंदर, परिमार्जित और प्राकृतिक स्वरूप दिखाई देता है। जहाँ कहीं अधिक पढ़े-लिखे लोग इन चीजों में विचलित हो जाते हैं कि कोई प्राकृतिक प्रयोगशाला कैसे हो सकती है, क्योंकि उनकी प्रयोगशालाएँ तो कृत्रिम ही होती हैं; लेकिन यह भूजल संरक्षण के लिए विश्व स्तर की अद्भुत प्रयोगशाला बन गई है, जहाँ दुनिया भर के राजनेता, अधिकारी और व्यापारी आकर प्रत्यक्ष दर्शन करते हैं।
तरुण भारत संघ की यह प्रयोगशाला अभी तक दुनिया के मंत्रियों, अधिकारियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और पर्यावरणविदों सभी को यह सिखाने में सफल हुई है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता से होने वाले काम प्रकृति से इंसान को दूर ले जाते हैं, लेकिन लोकभाव विद्या और लोक-बुद्धिमत्ता से होने वाले काम इंसान को प्रकृति के साथ जोड़कर रखते हैं। जब इंसान प्रकृति के साथ जुड़कर अपने आप को देखता है, तब वह प्रकृति से सीखने के लिए रास्ते भी खोज लेता है।
यह प्रयोगशाला मेरे जीवन में 80 के दशक में काम की सीख के लिए शुरू हुई और मुझे धरती के अंदर की बनावट तथा धरती के ऊपर की प्राकृतिक वनस्पतियों से सीखने और सीख देने में सफल सिद्ध हुई। इस प्रयोगशाला में जब हम पूर्व दिशा की ओर मुँह करके खड़े होते हैं, तो बाईं तरफ उत्तर दिशा में केवल काँटेदार पेड़ दिखाई देते हैं, क्योंकि उस तरफ धरती में जो दरारें हैं, वे समतल दरारें हैं। दक्षिण दिशा में धरती के अंदर सीधी जाने वाली दरारें हैं। इसलिए जहाँ धरती के अंदर जाने वाली दरारें हैं, उस तरफ हरे-भरे, लंबे और पत्तियों वाले पेड़ हैं।
चालीस वर्षों में यह अनुभव और गहरा होता गया, क्योंकि हमारी आँखों के सामने ही इस प्रयोगशाला की प्राकृतिक निर्माण प्रक्रिया विकसित हुई। हमने देखा कि जिस तरफ पत्थर में दरारें नहीं हैं, या नीचे की तरफ जाने वाली दरारें नहीं हैं, उस तरफ कोई पेड़ नहीं होते। यदि होते भी हैं, तो काँटेदार होते हैं, पत्तियों वाले नहीं। और जिस तरफ धरती में दरारें नीचे तक जाती हैं, उस तरफ पत्तियों वाले, लंबे और हरे-भरे पेड़ होते हैं। यह अंतर दिन-ब-दिन और स्पष्ट होता गया तथा अनुभव बनकर अनूभूति को मजबूत करने वाला सिद्ध हुआ।
प्रकृति सबसे बड़ी गुरु है। प्रकृति से मिलने वाली विद्या जीवन को विखंडित नहीं करती, बल्कि जोड़ती है। जीवन को जोड़ने वाली यह विद्या प्राकृतिक लोकभाव विद्या में विद्यमान है। यह बात इस प्रयोगशाला की निर्माण प्रक्रिया में सिद्ध हुई।
इस प्रयोगशाला में सीखने के लिए आज भी कई युवा विदेशों से आते हैं, जिनमें से एक नाम डॉ. नितिन है। ऐसे ही प्रतिदिन लोग इस प्रयोगशाला में भ्रमण करते हैं। इस प्रयोगशाला में सीखने के लिए किसी प्रशिक्षक की आवश्यकता नहीं होती। जो स्वयं प्रकृति के साथ जुड़कर देखना और सीखना चाहते हैं, वे इस प्रयोगशाला में भ्रमण करके जल संरक्षण, भूजल पुनर्भरण, वर्षा जल के वाष्पीकरण को रोकने तथा वर्षा जल से जल उपयोग दक्षता बढ़ाने की सहज सीख प्राप्त कर लेते हैं।
यह प्रयोगशाला एक ही स्थान पर दुनिया की विविध प्रकार की भू-आकृतियों और भू-संस्कृतियों को सिखाने में सक्षम है। इसमें विविध प्रकार की चट्टानें, मिट्टियाँ तथा चट्टानों के बीच की दरारों का दर्शन होता है। भूजल संरक्षण की आकृति, जिसे अंग्रेज़ी में *Aquifer* कहते हैं, वह भी इसमें स्वतः ही दिखाई दे जाती है।
इस प्रयोगशाला में एक साथ 500 व्यक्ति विभिन्न कोनों पर खड़े होकर सीख सकते हैं, देख सकते हैं, और एक व्यक्ति भी इसे स्वतंत्र रूप से देख-समझ सकता है। यह प्रयोग करके सीखने की सहज जगह है।
किस प्रकार की मिट्टी में कितना घनत्व होता है, किस मिट्टी में कितना जल सोखने की शक्ति होती हैयहाँ विभिन्न प्रकार की मिट्टियों पर प्रयोग करके देखा और सिद्ध किया गया है। नए लोग भी यहाँ प्रयोग करके इसे देख और सिद्ध कर सकते हैं।
कौन-सी मिट्टी की कितनी क्षमता होती है? किस मिट्टी की जल-धारण क्षमता कितनी है? यह सब यहाँ अलग-अलग प्रकार की मिट्टियों में देखा और समझा जा सकता है।
इस प्रयोगशाला को हमने प्रारंभ में प्रयोगशाला की तरह नहीं, बल्कि प्रकृति की व्यवस्था से सीखने के लिए बनाया था। फिर यह धीरे-धीरे एक व्यापक वैश्विक प्रयोगशाला बनती गई।
तरुण भारत संघ का सदैव यह प्रयास रहा है कि वह जो भी काम करे, लोगों से सीखकर और लोगों के लिए जो उत्तम हो सकता है, वही विधि अपनाए। तरुण भारत संघ ने अरावली को बचाने और उसे पुनर्जीवित करने का जो भी कार्य किया, उसके पीछे इस वैश्विक जल प्रयोगशाला की सीख है। क्योंकि इस प्रयोगशाला में अरावली क्षेत्र की भू-आकृतियाँ, भू-बनावट और भू-संरचना को देखने और समझने का अवसर मिलता है।
इस प्रयोगशाला में राष्टपति भवन से लेकर, ठेठ गांव की ढ़ाडियों में रहने वाले लोगों को प्रशिक्षित किया है। राष्टपति के.एन. नारायण ने प्रयोगशाला में तैयार हुए काम को देखा था; इसलिए इस प्रयोगशाला की सीखने वालों में इरान, इथोपिया, अफ्रीका, सोमालिया, केन्या आदि देशों में जल संरक्षण के काम किए है। यह प्रयोगशाला सैंकडों देशों के लोगों को समय-समय पर प्रशिक्षित करती रही है, फिर उन लोगों ने अपने देश में पहुंचकर काम किया है।
इसलिए यह प्रयोगशाला अनुभवों की अनुभूति के आधार पर निर्मित हुई है। अनुभवों की अनुभूति से यह समझ विकसित हुई कि जल का रक्षण और संरक्षण करके, मिट्टी में नमी बढ़ाकर, हरियाली बढ़ाकर तथा हरियाली के माध्यम से वातावरण में O₂ का स्तर बढ़ाने के क्या परिणाम होते हैं। यह सब यहाँ सीखने और करने का एक अच्छा अवसर रहा है।
09/06/2026
**तरुण वैश्विक चित्र दीर्घा, भीकमपुरा**
तरुण भारत संघ ने अपने तरुण आश्रम में विश्व उत्पत्ति, ब्रह्मांड सृष्टि के सृजन, दशावतार तथा भारत की समस्त सांस्कृतिक विरासत को पत्थरों पर चित्रों के माध्यम से उकेरने का कार्य किया है। साथ ही, विश्व के प्रमुख वैज्ञानिकों, भारत के सभी राष्ट्रपतियों, प्रधानमंत्रियों तथा सांस्कृतिक और सामाजिक नेतृत्व प्रदान करने वाले व्यक्तियों के चित्र भी तरुण आश्रम की वैश्विक चित्र दीर्घा में स्थापित हैं।
इस चित्र दीर्घा में विशेष रूप से उन सामाजिक कार्यकर्ताओं के चित्र भी मौजूद हैं जिन्होंने समाज में संस्कृति और प्रकृति के समन्वय से कार्य किया है। देशभर के अनेक सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ-साथ प्रकृति एवं संस्कृति के संरक्षण हेतु कार्य करने वाले पर्यावरण प्रेमियों तथा विश्व के विभिन्न तीर्थों को बचाने और प्राकृतिक धरोहरों के संरक्षण में योगदान देने वाले व्यक्तियों के चित्र भी पत्थरों पर उकेरे गए हैं।
यह वैश्विक चित्र दीर्घा तरुण भारत संघ ने अपने खेतों से निकले बड़े-बड़े पत्थरों पर बनाई है। यदि इन पत्थरों को निकालकर कहीं एक स्थान पर एकत्रित किया जाता, तो काफी भूमि अनुपयोगी हो जाती। इसलिए उपयुक्त समय पर इन पत्थरों को तरुण ताल के चारों ओर सात पंक्तियों में व्यवस्थित रूप से स्थापित किया गया। सबसे ऊपरी पंक्ति से लेकर नीचे की क्रमिक पंक्तियों तक इन चित्रों को उकेरा गया है। ये चित्र सामाजिक कार्यकर्ताओं को समाज सेवा की प्रेरणा देते हैं तथा पर्यावरणीय कार्यकर्ताओं को प्रकृति संरक्षण के लिए कार्य करने हेतु उत्साहित करते हैं।
तरुण भारत संघ के परिसर में इन चित्रों को उकेरने का उद्देश्य यह भी है कि संस्था ने अपने पिछले 51 वर्षों के कार्यकाल में संस्कृति और प्रकृति के समन्वय से प्राकृतिक पुनर्जन्म का कार्य किया है। तरुण भारत संघ के प्रयासों ने विशेष रूप से अरावली पर्वतमाला के पुनर्जीवन का एक वैश्विक उदाहरण प्रस्तुत किया है। एक ओर संस्था ने भारत के उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर कर अरावली के संरक्षण का मार्ग प्रशस्त किया, जिसके परिणामस्वरूप 7 मई 1992 को महत्वपूर्ण संरक्षणात्मक निर्णय सामने आया। दूसरी ओर, अवैध खनन को रोकने के लिए जमीनी स्तर पर चेतना यात्राओं और जनजागरण अभियानों के माध्यम से संरक्षण का कार्य किया गया।
चित्र दीर्घा की पृष्ठभूमि में प्रकृति की ध्वनियाँ, विशेषकर हवा की आवाज़, प्रकृति और संस्कृति के योग एवं संयोग का संदेश देती हैं। जल से मिट्टी बनी, मिट्टी से जीव-जंतु उत्पन्न हुए, फिर पेड़-पौधे और वनस्पतियाँ विकसित हुईं। इनके जीवन संचालन के लिए वायु, सूर्य की ऊर्जा और आकाश जैसे पंचमहाभूत आवश्यक बने। भारतीय परंपरा में इन पंचमहाभूतों के समन्वय को ही ईश्वर का स्वरूप माना गया है। इसी शक्ति ने मानव को जीवन जीने की कला प्रदान की, जिसे इन चित्रों में विविध रूपों में देखा और समझा जा सकता है। पंचमहाभूतों से निर्मित समस्त प्रकृति, मानव जीवन, भारतीय ज्ञान परंपरा, कालचक्र और देशकाल की अवधारणाओं को भी इस चित्र दीर्घा में अभिव्यक्त करने का प्रयास किया गया है।
चित्र दीर्घा को देखने के लिए प्रतिदिन स्कूली बच्चे, शिक्षक, सामाजिक कार्यकर्ता, पर्यावरणविद् तथा विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े लोग आते हैं। यहाँ आकर वे समझते हैं कि प्रकृति का संरक्षण करने वाले लोगों और उसका शोषण करने वाले लोगों में कितना अंतर है। प्रकृति का पोषण करने वाले व्यक्तियों के चित्र इस दीर्घा में बड़ी संख्या में दिखाई देते हैं, जबकि प्रकृति का शोषण करने वाले लोगों के चित्र इसमें नहीं बनाए गए हैं। यद्यपि ऐसे लोगों के चित्र बनाने पर विचार किया गया है, परंतु अभी तक उन्हें शामिल नहीं किया गया है।
प्रकृति सबका सृजन करती है, जबकि उसका विनाश करने वाला व्यक्ति अपनी स्वार्थपूर्ण गतिविधियों से प्रकृति को क्षति पहुँचाकर अधिक लाभ अर्जित करने का प्रयास करता है। इसलिए इस चित्र दीर्घा में लाभ कमाने वालों के नहीं, बल्कि लोककल्याण और शुभ कार्यों में योगदान देने वाले लोगों के चित्र स्थापित किए गए हैं। इसके अतिरिक्त, धरती पर विद्यमान विभिन्न धर्मों में जल के महत्व को दर्शाने वाले विचार भी भूमि से निकले पत्थरों पर अंकित किए गए हैं।
इस दीर्घा के सभी चित्र तरुण भारत संघ की भूमि से प्राप्त बड़े और छोटे पत्थरों पर ही उकेरे गए हैं। पिछले 51 वर्षों में जिन ग्रामीण महिलाओं, पुरुषों और कार्यकर्ताओं ने तरुण भारत संघ के साथ मिलकर जल संरक्षण और जल प्रबंधन के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किए, उनके चित्र भी यहाँ स्थापित हैं। संस्था के प्रारंभिक दौर के कार्यकर्ताओं को भी इस दीर्घा में सम्मानपूर्वक स्थान दिया गया है।
इस प्रकार यह चित्र दीर्घा वास्तव में वैश्विक स्वरूप ग्रहण कर चुकी है, क्योंकि इसमें उन्हीं व्यक्तियों के चित्र हैं जिन्होंने प्रकृति के पोषण, संरक्षण और संवर्धन में योगदान दिया है। इसलिए यह प्रकृति और संस्कृति की पोषक एक वैश्विक चित्र दीर्घा है। इस चित्र दीर्घा में सभी धर्मों में जल के बारे जो व्याख्या की गई,उसे भी दर्शाया गया है। जो इस प्रकार है - हिन्दू धर्म- ‘‘आपोः देवताः। जल जीवन है। यही जीविका और अध्यात्म है। सभी को सब कुछ देने वाला यही नारायण है। यही सृष्टि का सर्जन और संहार करने वाली षक्ति है।‘‘
इस्लाम धर्म-‘‘जल खुदा का रहमोकरम है। यह पाक-पवित्र है। यही मानवीय षरीर को पाक रखता है।’’
सिक्ख धर्म-‘‘पाणी पिता, धरती माता, वायु गुरु है।‘‘
ईसाई धर्म-‘‘जल सभी को भरता है। जैसे कि भक्ति में लीन भक्तों को परमात्मा भरता है।’’ जल हमारी षारीरिक जरूरतों के लिए महत्त्वपूर्ण है, उसी प्रकार परमात्मा हमारी आध्यात्मिक आवष्यकता है।’’
बहाई धर्म-‘‘जल का इस्तेमाल भगवान की मर्जी के खिलाफ होगा तो मनुष्य ऐसी प्यास का षिकार हो जाएगा,...जिसे समुद्र भी नहीं बुझा सकता।‘‘
बौद्ध धर्म-‘‘परलोक में जाने वाले प्राणी को जल से पूर्ण तृप्ति प्राप्त होती है।‘‘
यहूदी धर्म-‘‘पानी खुदा का ऐसा षस्त्र है, जो किसी के लिए वरदान और किसी के लिए श्राप बन सकता है।’’
षिन्टो धर्म-‘‘ प्राकृतिक, प्रत्येक अंग पूजनीय है। जल प्रकृति के निर्माण का सबसे महत्त्वपूर्ण अंग है।’’
पारसी धर्म-‘‘जल, अग्नि और धरती पवित्र हैं। इनकी पवित्रता बचाना ही धर्म है।’’
इस लेख को पढ़ने वाले सभी मित्रों और साथियों से आग्रह है कि वे इस वैश्विक चित्र दीर्घा को देखने अवश्य आएँ। यह चित्र दीर्घा तरुण आश्रम, भीकमपुरा,थानागाजी अलवर राजस्थान में है। इन दिनों गर्मी थोड़ी अधिक है, ऐसे में 15 अगस्त से लेकर 15मार्च तक का समय सबसे उत्तम है। आपको जब अनुकूल लगे; जरूर आएं।
08/06/2026
**तरुण तुलसी बाग, भीकमपुरा**
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कोविड काल में Tarun Bharat Sangh ने तुलसी के करोड़ों पौधे तैयार किए। इन पौधों को तरुण आश्रम परिसर के सभी मार्गों के किनारे लगाया गया तथा अनेक छोटे-छोटे तुलसी बाग विकसित किए गए। उसी समय यहां बड़े पैमाने पर तुलसी के बीज तैयार करके आसपास के गांवों और क्षेत्रों में वितरित किए गए। इसका परिणाम यह हुआ कि पूरे क्षेत्र में, विशेषकर मेवात में, बड़ी संख्या में लोगों के घरों में तुलसी के पौधे लगाए गए। यहां तक कि मुस्लिम परिवारों के घरों में भी तुलसी के पौधे दिखाई देने लगे। यह सब तरुण भारत संघ के व्यापक जनसंपर्क और प्रकृति संरक्षण के कार्यों का परिणाम था।
तरुण भारत संघ ने अपने परिसर में जहां-जहां भी थोड़ी सी जगह उपलब्ध हुई, वहां तुलसी का रोपण किया। इसका प्रभाव यह रहा कि तरुण आश्रम का वातावरण अत्यंत स्वास्थ्यवर्धक और स्वच्छ बना रहा। कोविड महामारी के कठिन समय में भी आश्रम परिसर में किसी को कोविड संक्रमण नहीं हुआ। इसके साथ ही तरुण भारत संघ ने महामारी के दौरान अनेक स्थानों पर दवाइयों, ऑक्सीजन सिलेंडरों, चिकित्सा उपकरणों और आवश्यक संसाधनों की उपलब्धता में भी महत्वपूर्ण सहयोग प्रदान किया।
कोविड काल समाप्त होने के बाद भी तुलसी बाग का यह अभियान निरंतर जारी रहा। वर्तमान में भी तरुण भारत संघ परिसर में छोटे-बड़े मिलाकर 11 तुलसी बाग विकसित हैं। इनमें विभिन्न प्रजातियों की तुलसी जैसे श्यामा तुलसी, रामा तुलसी तथा अन्य देशी किस्मों के अलग-अलग बाग शामिल हैं। जून की प्रचंड गर्मी में भी ये तुलसी बाग उतने ही हरे-भरे दिखाई देते हैं, जैसे वर्षा ऋतु में दिखाई देते हैं।
आश्रम में तुलसी के पत्तों से चाय और काढ़ा तैयार किया जाता है तथा उनका उपयोग स्वास्थ्य संवर्धन के लिए किया जाता है। किंतु इनका व्यावसायिक उपयोग नहीं किया जाता। तुलसी के पत्तों को एकत्र कर बाजार में बेचने का प्रयास नहीं किया गया, क्योंकि इसके लिए श्रम की लागत अधिक है और उचित बाजार भी उपलब्ध नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हम तुलसी को “माई” मानते हैं, इसलिए उससे कमाई करना नहीं चाहते। इसी कारण हमने तुलसी का **बाजार नहीं, बाग** बनाया है।
भारतीय परंपरा में भगवान श्रीकृष्ण तुलसी के बाग को **वृंदावन** कहते हैं। तरुण भारत संघ परिसर में ऐसे अनेक वृंदावन विकसित किए गए हैं। इनका उद्देश्य समाज में सुख, शांति और स्वास्थ्य का संवर्धन करना है, न कि व्यापार करना। तुलसी के ये बाग जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन में सहायक हैं, वातावरण को शुद्ध करते हैं और प्राणवायु की मात्रा बढ़ाने में योगदान देते हैं। यही कारण है कि तरुण भारत संघ ने तुलसी के बागों के विकास को अपने महत्वपूर्ण पर्यावरणीय कार्यों में शामिल किया है।
इन तुलसी बागों को पूरी तरह प्राकृतिक तरीके से विकसित किया जा रहा है। इनमें अत्यधिक मजदूरी या कृत्रिम प्रबंधन की आवश्यकता नहीं पड़ती। अधिकांश कार्य श्रमदान के माध्यम से संचालित होते हैं। यही कारण है कि आज जब जून माह में चारों ओर भीषण गर्मी पड़ रही है, तब भी तरुण आश्रम का तापमान आसपास के क्षेत्रों की तुलना में लगभग चार डिग्री सेल्सियस कम अनुभव होता है। यह हरियाली, जल संरक्षण और तुलसी बागों के संयुक्त प्रभाव का परिणाम है।
तरुण भारत संघ सभी प्रकृति प्रेमियों, पर्यावरण कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों को आमंत्रित करता है कि वे तरुण आश्रम, भीकमपुरा आएं, इन तुलसी बागों का भ्रमण करें और इनके महत्व को समझें। जो लोग अपने गांव, मोहल्ले, विद्यालय, संस्थान या घर में तुलसी का बाग विकसित करना चाहते हैं, वे यहां से तुलसी के पौधे और बीज प्राप्त कर सकते हैं।
तरुण भारत संघ तुलसी से किसी प्रकार का आर्थिक लाभ कमाना नहीं चाहता। इसलिए तुलसी बाग लगाने के इच्छुक लोगों को पौधे और बीज **निःशुल्क** उपलब्ध कराए जाते हैं। आइए, तरुण आश्रम भीकमपुरा पहुंचिए, तुलसी के पौधे और बीज प्राप्त करिए तथा अपने क्षेत्र में भी एक नया वृंदावन विकसित करने का संकल्प लीजिए।
07/06/2026
’’तरुण गौ सेवा, भीकमपुरा’’
तरुण भारत संघ ने तरुण आश्रम, भीकमपुरा, अलवर राजस्थान में वर्ष 1986 में गौशाला स्थापित की थी। अब यह गौशाला केवल देसी गायों की विविध नस्लों की गोसेवा का केंद्र है। इस गोसेवा में हरियाणवी, थारपारकर तथा अन्य देसी नस्ल की गायें हैं।
तरुण आश्रम के परिसर में गर्मियों में जो फसलें उगाई जाती हैं, उनमें अधिकांश चारा गायों के लिए ही उगाया जाता है। फरवरी या मार्च में रबी की फसल कटते ही बाजरा, ज्वार, मक्का एवं ढैंचा बो दिया जाता है। अप्रैल, मई, जून और जुलाई के चार महीनों तक इन चारा फसलों को अलग-अलग खंडों में चराई के लिए खोला जाता है। गायें इसी हरे चारे पर चरती हैं। इस चराई से दूध की गुणवत्ता भी अच्छी रहती है और गायें स्वस्थ रहती हैं।
आज 7 जून के दिन भी गायें हरे चारे में मन भरकर चर रही हैं। वर्तमान में इस गौशाला में कुल 15 गायें, 9 छोटी बछिया-बछड़ियाँ तथा 4 सांड हैं। जो बछड़े होते हैं, उन्हें सांड के रूप में विकसित किया जाता है और जो बछिया होती हैं, वे आगे चलकर गाय बनती हैं। इस प्रकार तरुण गोसेवा का कार्य निरंतर और समृद्ध रूप से संचालित हो रहा है।
इस तरुण गौ सेवा में भीकमपुरा के लाला मीना तथा बामनवास के संदीप पांचाल नित्य रूप से गायों की सेवा करते हैं। वैसे तो तरुण भारत संघ के अध्यक्ष से लेकर सभी कार्यकर्ता गोसेवा को अपना कार्य मानते हैं। इसलिए ये गायें एक प्रकार से तरुण परिवार का ही हिस्सा हैं और परिवार के सदस्य की तरह रहती हैं।
तरुण गौ सेवा में आज तक कभी दूध बेचा नहीं गया। जो दूध प्राप्त होता है, उसका उपयोग आश्रमवासी स्वयं करते हैं। उससे घी और छाछ भी बनाई जाती है। इस प्रकार यह गौशाला स्वावलंबी गौशाला है।
गायों के गोबर तथा आश्रम में उत्पन्न पत्तों और फसलों के बचे हुए चारे को खड्डों में डाला जाता है। उसमें गोबर का घोल अथवा गोबर गैस संयंत्र से निकलने वाला अवशेष डाला जाता है और फिर उसके ऊपर मिट्टी की परत बिछा दी जाती है। यह प्रक्रिया लगातार चलती रहती है। खड्डा भर जाने पर उसे पलट दिया जाता है। आजकल यह कार्य मशीन (जेसीबी) से किया जाता है, जबकि पहले इसे हाथों से पलटा जाता था। अब अधिकांश कार्य मशीनों की सहायता से किया जाता है। इसके साथ ही तरुण भारत संघ के समस्त कार्यकर्ता श्रमदान करके, प्रकृति को समृद्ध बनाने का कार्य करते रहते है।
06/06/2026
*प्रकृतिमय सदाचार ही विश्व पर्यावरण दिवस का लक्ष्य है*
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विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर जलपुरुष राजेंद्र सिंह जी ने दिल्ली शिक्षक विश्वविद्यालय के शिक्षकों एवं विद्यार्थियों को ऑनलाइन संवाद को संबोधित करते हुए कहा कि, पर्यावरण दिवस हमे संकल्प लेना चाहिए कि हमारी जीवन पद्धति में प्राकृतिक प्रेम का रिश्ता शुरू हो और हम प्रकृतिमय बने। तभी विश्व पर्यावरण दिवस मानने की सार्थकता कर सकेंगे। हमारे जीवनीय व्यवहार को गहरा बनाकर प्रकृति में अतिक्रमण, शोषण और प्रदूषण ना करें।
वर्ष 1970 के दशक में जब विश्व पर्यावरण दिवस की शुरुआत हुई थी, तब इसका उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण, संवर्धन और प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने के प्रति वैश्विक चेतना जगाना था। लेकिन दुर्भाग्यवश, तब से अब तक पर्यावरण की स्थिति लगातार बिगड़ती ही गई है। आज ऐसा प्रतीत होता है मानो संयुक्त राष्ट्र संघ और अन्य वैश्विक संस्थाएँ विभिन्न संकटों के समाधान के लिए केवल विश्व दिवस मनाकर अपने दायित्व की औपचारिक पूर्ति कर लेती हैं, जबकि वास्तविक आवश्यकता धरातल पर ठोस कार्य करने की है।
विश्व पर्यावरण दिवस शिक्षकों और विद्यार्थियों के लिए केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि संकल्प और प्रेरणा का दिवस मनाना चाहिए। शिक्षकों को अपने विद्यार्थियों को इस दिशा में प्रेरित करना चाहिए कि वे धरती की हरियाली बढ़ाने और वातावरण में बढ़ती कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) को कम करने के लिए सक्रिय भूमिका निभाएँ। आज हमारे जीवन में जो अधिकांश गतिविधियाँ ऐसी हैं जो वातावरण में कार्बन की मात्रा बढ़ा रही हैं, जिससे पर्यावरण लगातार जहरीला होता जा रहा है। इसलिए आवश्यक है कि हम प्रकृति से जितना लेते हैं, उतना ही उसे लौटाने का प्रयास भी करें।
जलपुरुष ने आगे कहा कि प्रकृति की ऊर्जा केवल विचारों से नहीं, बल्कि शारीरिक श्रम और समर्पण से बढ़ती है। धरती की उर्वरता, उसकी उत्पादकता और उसकी जीवनदायिनी क्षमता को बढ़ाने के लिए हमें अपने श्रम, पसीने और परिश्रम का निवेश करना होगा। हरियाली बढ़ानी होगी, जल और मिट्टी का संरक्षण करना होगा तथा उन सभी प्राकृतिक तत्वों और संसाधनों को सुरक्षित रखना होगा जो वातावरण में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ाने और जीवन को स्वस्थ बनाने में सहायक हैं।
वर्तमान समय में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है। यह अनेक सुविधाएँ प्रदान करती है, लेकिन इसके साथ यह भी आवश्यक है कि हम अपनी भावनात्मक बुद्धिमत्ता (Emotional Intelligence) को और अधिक विकसित करें। जो प्रकृति के साथ हमारे रिश्तों को जोड़ती है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता हमें तकनीकी रूप से सक्षम बनाती है, जबकि भावनात्मक बुद्धिमत्ता हमें प्रकृति, समाज और मानवता से जोड़ती है। जब हमारी भावनात्मक बुद्धिमत्ता बढ़ेगी, तब हम अपने भीतर और समाज में मौजूद दोषों को कम करने तथा प्रकृति के साथ संतुलित संबंध स्थापित करने में सफल होंगे। इससे मनुष्य और प्रकृति दोनों स्वस्थ एवं समृद्ध रहेंगे।
अपने अनुभव साझा करते हुए उन्होंने बताया कि जब मेरे क्षेत्र के गाँव पानी के अभाव में उजड़ने लगे थे, तब लोग बीमारी, बेरोजगारी और पलायन की समस्याओं से जूझ रहे थे। उस समय भारत सरकार की नौकरी छोड़कर लोगों के बीच गए और उनके साथ मेहनत से स्वास्थ्य संबंधी कार्यों में लगे। लेकिन ग्रामीणों ने उनसे कहा कि उन्हें दवाइयों नहीं; पानी की आवश्यकता है, क्योंकि यदि पानी होगा तो बीमारियाँ अपने आप कम हो जाएँगी। भगवान बीमारियां अपने आप कम कर देगा। इसने जल संरक्षण के कार्य की ओर प्रेरित किया। मेरी पानी की पढ़ाई किसी विश्वविद्यालय से प्राप्त नहीं हुई, बल्कि ग्रामीणों और अनपढ़ लोगों के अनुभवों से सिखाई गई विद्या से मिली है। उसी लोकज्ञान के आधार पर जल संरक्षण के कार्य किए, जिससे धरती और प्रकृति दोनों समृद्ध होने लगीं।
यदि हम वास्तव में विश्व पर्यावरण दिवस मनाना चाहते हैं, तो केवल संकल्प लेने से काम नहीं चलेगा। हमें अपने संकल्पों को धरातल पर उतारना होगा। जब विचार कर्म में बदलेंगे, तभी प्रकृति, धरती और मानव जीवन समृद्ध होंगे आज सरकारें मुख्यतः आर्थिक विकास और आर्थिक ढाँचे के विस्तार की बात करती हैं, लेकिन यह भूल जाती हैं कि प्रकृति और धरती ही हमारे जीवन का मूल आधार हैं। यदि यह आधार स्वस्थ नहीं रहेगा, तो आर्थिक समृद्धि भी स्थायी नहीं रह सकती। इसलिए हमें प्रकृति के साथ अपने लेने-देने के रिश्तों को ठीक करके संतुलित और संवेदनशील बनाना होगा।
यह बातें कहने का आत्मविश्वास इसलिए है क्योंकि अपने जीवन में जल संरक्षण के माध्यम से 23 सूखी और मृतप्राय नदियों को पुनर्जीवित करने का कार्य किया है। लाखों लोगों के जीवन में पानी का काम किया जो पानी के अभाव में अपनी भूमि छोड़कर शहरों की ओर पलायन कर रहे थे। जल संरक्षण के कार्यों ने उन्हें पुनः खेती और ग्रामीण आजीविका से जोड़ा। जिन क्षेत्रों में पानी की कमी के कारण लोग हिंसा और लूटपाट की ओर बढ़ रहे थे, उन्हें पानी के काम में लगाकर वहाँ जल कार्यों ने शांति, रोजगार और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त किया। हमारी प्रकृति की धरोहरें ही मानव जीवन को सबसे अधिक स्थिरता, समृद्धि और सुरक्षा प्रदान करती हैं।
इसी क्रम में शाम 6 बजे लखनऊ के एक कॉलेज के विद्यार्थियों, शिक्षकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ ऑनलाइन संवाद के दौरान भी प्रकृति और मानव जीवन के संबंधों पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि प्रकृति का प्रेम ही मनुष्य के भीतर विश्वास पैदा करता है और यही विश्वास उसे शांति, संतोष और समृद्धि के मार्ग पर आगे बढ़ाता है। इसके विपरीत जब मनुष्य लालच में पड़ जाता है, तो वह प्रकृति की भूमिका और उसके महत्व को भूलने लगता है। हमारे पूर्वजों ने प्रकृति को ही ईश्वर का स्वरूप माना। पंचमहाभूतों—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—के समन्वय को ही जीवन और सृष्टि का आधार माना गया। इसलिए प्रकृति के प्रति सम्मान, संवेदना और संरक्षण की भावना को पुनः स्थापित करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। उन्होंने आह्वान किया कि हम सभी मिलकर प्रकृति के साथ अपने संबंधों को पुनर्स्थापित करें, उसे समृद्ध बनाने के लिए कार्य करें और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक स्वस्थ, सुरक्षित और संतुलित पर्यावरण का निर्माण करें। तभी विश्व पर्यावरण दिवस की सार्थकता सिद्ध होगी और मानव समाज वास्तविक समृद्धि की दिशा में आगे बढ़ सकेगा।
पर्यावरण दिवस के अवसर पर तरुण भारत संघ द्वारा अपने अपने कार्य क्षेत्र जैसलमेर, करौली, धौलपुर , नूह मेवात, अलवर, जयपुर में जल ,जंगल, जमीन संरक्षण हेतु विभिन्न बैठकें की और वृक्षारोपण किया गया।
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