https://youtube.com/

https://youtube.com/

Share

FAIZANE E HUZUR FATAHE KASHMIR
OFFICIAL YouTube CHANNEL

18/04/2024

हुज़ूर बाज़ी साहिबा मनकबत ✨

अतए उम्मे ओलिया हुज़ूर बाज़ी साहिबा
बहारें इश्के मुस्तफ़ा ,हुज़ूर बाज़ी साहिबा

लुटारही हे फ़ातमी चमन से सदका ए अली
खुला हे बाब जुद का , हुज़ूर बाज़ी साहिबा

हूसेन ए पाक पर निसार वो अपनी जाने पाक की
हसन इमाम पर फ़िदा , हुज़ूर बाज़ी साहिबा

याज़िदो बिन जियाद से शकीलईन शीम्र से
निभाई दुश्मनी सदा , हुज़ूर बाज़ी साहिबा

हमेशा सा ग़म में मूबतिला रही वो अहले बेत के
फ़ना मकाँ का मर हला , हुज़ूर बाज़ी साहिबा

तुम्हारी जात तैयबा मिसालें पाक मर्यमी
निगार सुबरा फ़ातिमा , हुज़ूर बाज़ी साहिबा

इबादतों में राबिया वो आप अपने दोर की
नफ़ी सा ताहिरा शफा , हुज़ूर बाज़ी साहिबा

भँवर डुबोना पाएगा सफ़ीना ए नसीब को
करम कनिज़े ग़ौस का , हुज़ूर बाज़ी साहिबा

फ़ना जो जाते पाक की बका हुई हयात की
वो आप साबरी ज़जा , हुज़ूर बाज़ी साहिबा

वो अम्मा जान वो बाबा जान की निगाहे ख़ास से
बनी हे दर्द की दवा , हुज़ूर बाज़ी साहिबा

वो अहले हक़ की मोहोसिना बराए शेरे हिंद हे
रज़ा ए मज़हर रज़ा ,हुज़ूर बाज़ी साहिबा

किया जो हक़ का हक़ अदा हुज़ूर शेरे हिंद ने
मिली हे तोफे में अता ,हुज़ूर बाज़ी साहिबा

तुम्हारी याद आतेही हुए अश्क़ बार वो ,
हमारे आका रहनुमा , हुज़ूर बाज़ी साहिबा

नगर नगर गली गली अली अली अली अली
लगेगा नारा हर जगा , हुज़ूर बाज़ी साहिबा

तुम्हारे दर से बाँ ख़ुदा सजी हुई हे महफ़िल
तुम्हारे दर से दरस का , हुज़ूर बाज़ी साहिबा

तुम्हारा जा निसार हूँ फ़सा हुआ हूँ केद में
रिहाई कीजिए अता , हुज़ूर बाज़ी साहिबा

तुम्हारी भिक चाहिए अता तुम्हारी चाहिए
खजिना इश्क़ इल्म का ,हुज़ूर बाज़ी साहिबा

सताया हो जमाने ने रुलाया हो जो अपनो ने
सुकून मिलेगा दर पे जा , हुज़ूर बाज़ी साहिबा

जो दिल में हो वो माँग ले मगर के दिल से माँग ना
करेगी तूजको सब अता , हुज़ूर बाज़ी साहिबा

14/04/2024

रहे हम हिंद में तेरे सहारे या मेरे ख्वाजा
तेरे टुकड़ों पे दिन हम है गुजारे या मेरे ख्वाजा

1) ये रुतबा बख्सा अल्लाह ने नबी के उस घराने से
बनाया हिंद में सब ओलिया का पेशवा ख्वाजा

2) मुखालिफ था जहां तब भी हजारों मुश्किलें आई
पढ़ाया सैकड़ों काफिर को कलमा हिंद में ख्वाजा

3) हुकूमत हो किसी की भी कोई भी राज करता हो
हमे ना फिक्र है कोई हमारे है मेरे ख्वाजा

4) बैठाया तूने ऊटो को उठा पाया नही कोई
हमे क्या खाक उठाएगा बसाए है मेरे ख्वाजा

5) ये कुत्ते लाख भोकेंगे मगर इनसे ना घबराना
इशारा हो गया अदना मिटा देंगे मेरे ख्वाजा

6) ये मुशाहिद उनकी निस्बत है उन्ही का फैज़ है हम पर
गिराता है जहां लेकिन उठाते है मेरे ख्वाजा।.

7 ) दरे गोसूलवारा की आज़माते महसूस करना हों
चाले जाये अजमेर में अरबाज़ मोज़ुद हे मेरे ख़्वाजा

12/04/2024

मज़हरे शेरे सुन्नत मुशाहिद रज़ा
याने वो इब्ने हशमत मुशाहिद रज़ा

कर दिए मुल्क के खित्ते खित्ते में आम
मसलके आला हज़रत मुशाहिद रज़ा

नजदियत पारा पारा किया आप ने
ऐसी रखते थे हिम्मत मुशाहिद रज़ा

नदवा देवबंद के सारे बुत गिर गए
देख कर तेरी सुरत मुशाहिद रज़ा

सुल्हे कुल्ली से रिश्ता न रख्खा कभी
उनसे करते थे नफरत मुशाहिद रज़ा

ज़िन्दगि भर हैं दिलकश बनाते रहें
नजदीयों की हजामत मुशाहिद रज़ा

11/04/2024

*2 Shawwalul Mukarram Urse Mubaraka.!!! A'alamul Ulama, Afqahul Fuqha, Sanadul Asfiya, Zubdatul Atqiya, Gaizul Munafiqeen, Imamul Munazreen, Shehzada E Mazhare Aalahazrat, Janasheene Shere Sunnat, Jalalut Ilm Abul Muzaffar Muhammad Mushahid Raza Khaañ Radi Allahu Ta'ala Anhu Al-Maroof Sarkar Mushahide millat Ka Urse Muqaddasa Mubarak Ho.!! Is Mauqe Par Manqabate Huzur Mushahide Millat Mulahiza Farmayeñ.!!*

है ह़शमत की ह़शमत मुशाहिद रज़ा ख़ां
अ़ली की ईनायत मुशाहिद रज़ा ख़ां

नबीﷺ की मुह़ब्बत का दरिया बहाया
सिखाई शरीअ़त मुशाहिद रज़ा ख़ां

अ़ली शाहे मरदां के मर्दे क़लंदर
ऐ शेरे विलायत मुशाहिद रज़ा ख़ां

अ़ली नुक़्ताए बाए बिस्मिल्लाह से तुम
हो नुकताए ह़िक्मत मुशाहिद रज़ा ख़ां

वो इल्मे अ़ली ही से पाई है तुम ने
ये इल्मी जलालत मुशाहिद रज़ा ख़ां

यक़ीनन ह़ुसैन ओ ह़सन से है ह़ासिल
तुम्हें इस्तिक़ामत मुशाहिद रज़ा ख़ां

सदा ग़ौस ओ ख़्वाजा ही करते रहे हैं
तुम्हारी ह़िमायत मुशाहिद रज़ा ख़ां

हों मख़दूम ओ मसऊद ओ साबिर या वारिस
हैं सब की अमानत मुशाहिद रज़ा ख़ां

तुम्हें क़ादरी चिश्ती रज़वी ख़िलाफ़त
पे दर पे इजाज़त मुशाहिद रज़ा ख़ां

शहे शेरे सुन्नत रज़ा के हैं मज़हर
हो तुम शेरे सुन्नत मुशाहिद रज़ा ख़ां

कहा तुमने इदरीसे मिल्लत का ख़ुत्बा
है मेरी ख़िताबत मुशाहिद रज़ा ख़ां

वो इदरीसे मिल्लत को तुम ने बनाया
शहा अच्छे ह़ज़रत मुशाहिद रज़ा ख़ां

सनाबिल मुशाहिद, मुशाहिद सनाबिल
वो जलवत हैं ख़लवत मुशाहिद रज़ा ख़ां

पढ़ाया है तुम ने उन्हें दीन ओ मसलक
पिलाई विलायत मुशाहिद रज़ा ख़ां

जला डाले ख़ेमे वहाबी के तुम ने
अभी तक है हैबत मुशाहिद रज़ा ख़ां

हो ऐह़रारी या ख़ाकसारी या लीगी
सभी पर क़यामत मुशाहिद रज़ा ख़ां

मुह़ब्बत है तुम से सभी सुन्नियों को
सुलैहकुल पे आफ़त मुशाहिद रज़ा ख़ां

सलामी ऐ शेरे रज़ा के दुलारे
हमारी ज़मानत मुशाहिद रज़ा ख़ां

किया ऐड जिसने मदरसा बला है
बताई ह़क़ीक़त मुशाहिद रज़ा ख़ां

मदारिस को इलह़ाक़ से तुम बचाना
अ़यां की थी ह़ुरमत मुशाहिद रज़ा ख़ां

ह़ुकूमत से इनकम था मुल्ला का जीवन
पड़ी उस पे आफ़त मुशाहिद रज़ा ख़ां

वो था पेट का सौदा अब है ये ज़िल्लत
थी तुम से बग़ावत मुशाहिद रज़ा ख़ां

जो माना था फ़तवा बचा है बचेगा
है तुम से हिफ़ाज़त मुशाहिद रज़ा ख़ां

गुलिस्तां जो सींचा था तुम ने लहू से
उजाड़े सियासत मुशाहिद रज़ा ख़ां

सियासत पे डाले क़ुराबत का पर्दा
ज़रा देखो जुर्अ़त मुशाहिद रज़ा ख़ां

तेरा उर्स चर्चा करे ग़ैर का जो.!!
पड़े उस पे आफ़त मुशाहिद रज़ा ख़ां

गुलिस्तां तबाह हो तमन्ना है गुल की
दो गुल को ह़िदायत मुशाहिद रज़ा ख़ां

ना की एक तौबा, हज़ारों ख़ता की
अना खा गई मत मुशाहिद रज़ा ख़ां

जो बागी गुलिस्तां की बरबादी चाहे
हो उन सब पे लाअ़नत मुशाहिद रज़ा ख़ां

करूं अर्ज़ क्या मैं तुम्हें सब ख़बर है
दफ़ा हो नह़ूसत मुशाहिद रज़ा ख़ां

"ला ह़व्ला वला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाह"
अ़ताए जलालत मुशाहिद रज़ा ख़ां

करामत जनाज़े में ये सब ने देखी
लुटाए ह़िदायत मुशाहिद रज़ा ख़ां

हुए तीन दिन बादे रेह़लत करामत
हां ज़िंदा है ह़ज़रत मुशाहिद रज़ा ख़ां

वो रौज़े की रौनक चमकता है झूमर
महकती है तुरबत मुशाहिद रज़ा ख़ां

थी दिल में ये आई ज़ुबां पर समर के
हो मक़बूल मिदह़त मुशाहिद रज़ा ख़ां

तड़पता है दीदार को दिल समर का
करो दूर फ़ुरक़त मुशाहिद रज़ा ख़ां
✍️ अज़ मोह़ताजे मुर्शिदे पाक सैय्यद इरफ़ान समर बुरहानपुरी

09/04/2024
09/04/2024

ईद की नमाज़ का तरीक़ा

31/03/2024

*"सलामी जिस के दर का हर वली है"*
*"अ़ली है हां अ़ली है वोह अ़ली है"*

रज़ा का ये लिखा बरक़े जली है
के हसदह मनक़बत उस पे सजी है
जो उम्मत में किसी को ना मिली है
ना कोई मिन जमीअ़ उस से क़वी है
सलामी जिस के दर का हर वली है
अ़ली है हां अ़ली है वोह अ़ली है

वोह मह़बूबे ख़ुदा मत़लूबे अह़मदﷺ
वोह जो साक़ी ए कौसर शाह मुफ़रद
क़सीमे दोज़ख़ ओ जन्नत है मुर्शद
अमीरिल मोमिनीं आ़ला है बे-ह़द
सलामी जिस के दर का हर वली है
अ़ली है हां अ़ली है वोह अ़ली है

वो अन्ता मिन्नी का सेहरा है सर पर
बनी है फ़ातिमा दुल्हन वोह शोहर
हैं जिसके बेटे भी साह़िबे कौसर
इमामों का है वोह जद्दे मत़ह्हर
सलामी जिस के दर का हर वली है
अ़ली है हां अ़ली है वोह अ़ली है

वोह शाहे मरदां है वोह ला फ़ता है
वोह फ़ातेह़ ख़ैबर ओ दस्ते ख़ुदा है
वोह जो शाख़े मुह़म्मद मुस्तफ़ाﷺ है
वोह आले मुस्तफ़ाﷺ की जड़ बना है
सलामी जिस के दर का हर वली है
अ़ली है हां अ़ली है वोह अ़ली है

नबीﷺ फ़रमाते हैं मन-कुंतो-मौला
मैं मौला जिस का उसका वोह भी मौला
ईलाही दोस्त रख हो जो इश्क़ वाला
जले दोज़ख़ में उस से जलने वाला
सलामी जिस के दर का हर वली है
अ़ली है हां अ़ली है वोह अ़ली है

वोह बाज़ू ए ह़बीबे किबरिया है
बा-मंज़िल मूसा के हारूं बना है
ख़लीफ़ा याअ़नी के अमजद हुआ है
वोह सरदारे अ़रब ओ आले ईबा है
सलामी जिस के दर का हर वली है
अ़ली है हां अ़ली है वोह अ़ली है

वोह जो फ़सले क़ज़ा में है मुअ़क्कद
वोह जो रफ़ऐ ख़ुसुमत में मुमज्जद
यहां तक के उमर कहते हैं अज़-ह़द
वोह ना होते ह़लाकत की थी आमद
सलामी जिस के दर का हर वली है
अ़ली है हां अ़ली है वोह अ़ली है

अदब से हाथ बांधे सब खड़े हैं
अ़दालत के दफ़ातिर सब पड़े हैं
वोह आए यूं उमर कह कर अड़े हैं
वोह बाबुल इ़ल्म हैं फ़ैसल बड़े हैं
सलामी जिस के दर का हर वली है
अ़ली है हां अ़ली है वोह अ़ली है

वोह सक़फ़े काबा से हर बुत गिराकर
यूं कहता आसमां छू लूं मैं बढ़ कर
वोह जिसने मंज़िलें पाईं हैं बरतर
वोह जो ज़ाते नबीﷺ का ऐन मज़हर
सलामी जिस के दर का हर वली है
अ़ली है हां अ़ली है वोह अ़ली है

वोह ग़ाज़ी क़ातिलुल कुफ़्फ़र ठहरा
अख़ी ए अह़मदे मुख़्तार ठहरा
बनी हाशिम का शाहा कार ठहरा
वही जो ह़ैदरे कर्रार ठहरा
सलामी जिस के दर का हर वली है
अ़ली है हां अ़ली है वोह अ़ली है

वोह ह़िरज़े दीन, ज़ैग़म और ग़ज़न्फ़र
असदुल्लाहा ज़िरग़ामे पयम्बरﷺ
वोह त़ाहिर भी वोह अत़हर और आ़अ़त़र
वोह हादी ए करीमो आ़ली ओ अकबर
सलामी जिस के दर का हर वली है
अ़ली है हां अ़ली है वोह अ़ली है

वोह जो मुश्किल कुशा शेरे जली है
वोह जो ह़ाजत रवा लुतफ़े दिली है
वोह जिसकी दोनों आ़लम में चली है
फ़लक से ऊंची वोह जिसकी गली है
सलामी जिस के दर का हर वली है
अ़ली है हां अ़ली है वोह अ़ली है

वोह जिसके शर्फ़े इमज़ा सब हुआ हो
मनअ़ हो अ़ज़्ल हो नस्ब ओ अ़ता हो
वही जो कुन मकुन भी खोलता हो
जिसे जो कुछ मिला उस से मिला हो
सलामी जिस के दर का हर वली है
अ़ली है हां अ़ली है वोह अ़ली है

बे-उसके वस्ले ह़क़ ह़ासिल ना-नादां
के जिसका सूफ़ियों के दिल पे एह़सां
हैं क़ुत्बो ग़ौस भी मोह़ताजे दामां
हां मैराजे जबीं हो पेशे दालां
सलामी जिस के दर का हर वली है
अ़ली है हां अ़ली है वोह अ़ली है

शुजाअ़त में वोह जो तैग़े नियम है
सख़ावत में वोह जो अब्रे करम है
विलायत में वोह जो तन्हा सनम है
ह़क़ीक़त में वोह जो शाहो ह़क़म है
सलामी जिस के दर का हर वली है
अ़ली है हां अ़ली है वोह अ़ली है

गुज़र का इज़्न दे तब तो बक़ा हो
वगरना पुल वोह क़हर ओ नार हो
बा रोज़े ह़श्र वोह दाफ़े बला हो
लिवा ए ह़म्द भी उस को अ़ता हो
सलामी जिस के दर का हर वली है
अ़ली है हां अ़ली है वोह अ़ली है

शजर वोह औलिया उसकी लड़ी है
वोह जिस की सरवरों पर सरवरी है
वोह जिसकी अफ़सरों पर अफ़सरी है
ईनायत जिस के हाथों हो रही है
सलामी जिस के दर का हर वली है
अ़ली है हां अ़ली है वोह अ़ली है

वोह जो अच्छों में अच्छा है अ़ली है
वोह जो ऊंचों में ऊंचा है अ़ली है
वोह जो सच्चों में सच्चा है अ़ली है
वोह जो प्यारों में प्यारा है अ़ली है
सलामी जिस के दर का हर वली है
अ़ली है हां अ़ली है वोह अ़ली है

अ़ली से मैं हूं और मुझ से अ़ली है
नबी के बाद उम्म्त का वली है
लिखा जितना फ़क़त ये इक कड़ी है
जो छोड़ा उस से वोह और भी क़वी है
सलामी जिस के दर का हर वली है
अ़ली है हां अ़ली है वोह अ़ली है

नमक ये मतलाऊलक़मरैन का भी
बयां जो फ़ज़्ल वां शैख़ैन का भी
मगर जलवा अबुल ह़सनैन का भी
क़सीदा मौलल कौनैन का भी
सलामी जिस के दर का हर वली है
अ़ली है हां अ़ली है वोह अ़ली है

ख़लिश रखता है उनसे नासबी है
वोह दामाने निगाह में ख़ारजी है
समर रद्द करना उस का वाजबी है
वोह जो मफ़ज़ूल कहता है शक़ी है
सलामी जिस के दर का हर वली है
अ़ली है हां अ़ली है वोह अ़ली है
✍️ अज़ मोह़ताजे मुर्शिदे पाक सैय्यद इरफ़ान समर बुरहानपरी

کرم اللہ وجہہ الکریم و رضوان اللہ علیہم اجمعین

30/03/2024

*वो गुस्ताख़ों को मिम्बर से लथेड़े तन्हा ही आकर, दिखाए ह़शमती तेवर ख़लीफ़ा अच्छे ह़ज़रत का।*
*वहाबी, देवबंदी, राफ़्ज़ी ओ नासबी कुत्ते, सभी पर हैं क़हर आवर ख़लीफ़ा अच्छे ह़ज़रत का।*

नक़ीबे अहले सुन्नत और ख़लीफ़ा अच्छे ह़ज़रत का।
वज़ीरों में बहुत बेहतर ख़लीफ़ा अच्छे ह़ज़रत का।

वो है सिद्दीक़े अकबर के घराने से जहां वालों,
फ़िदा हैं आले ह़ैदर पर ख़लीफ़ा अच्छे ह़ज़रत का।

अ़ताए आ़ला-ह़ज़रत कहते हैं हक़ वाले सब जिनको,
वो है शेरे ज़फ़र पैकर ख़लीफ़ा अच्छे ह़ज़रत का।

वो मुफ़्ती हैं शरीअ़त के वो सूफ़ी हैं तरीक़त के,
वो हैं मक़बूल मिल्लत भर ख़लीफ़ा अच्छे ह़ज़रत का।

वो आ़लिम ऐसे हैं आ़माल से किरदार से ग़ाज़ी,
चले मैदां लिए ख़ंजर ख़लीफ़ा अच्छे ह़ज़रत का।

मुदर्रिस वो के दरसे गाहों में असलाफ़ का नाईब,
किए रौशन कई गोहर ख़लीफ़ा अच्छे ह़ज़रत का।

मुसन्निफ़ वो क़लम में बर्क़ बारी की चमक देखी,
अ़दु को कर दिया बदतर ख़लीफ़ा अच्छे ह़ज़रत का।

वो ह़ाफ़िज़ जो के हैं क़ुरआ़न की तफ़सीर में माहिर,
क़िरत से दिल करे अनवर ख़लीफ़ा अच्छे ह़ज़रत का।

वो जो नाशिर हैं अस्लाफ़ ओ अकाबीर की किताबों का,
वही हैं सुन्नियों रहबर ख़लीफ़ा अच्छे ह़ज़रत का।

मुक़र्रिर वो के तक़रीरों में शेरे हिंद का जलवा,
जलाले मुर्शिदी मंज़र ख़लीफ़ा अच्छे ह़ज़रत का।

वो गुस्ताख़ों को मिम्बर से लथेड़े तन्हा ही आकर,
दिखाए ह़शमती तेवर ख़लीफ़ा अच्छे ह़ज़रत का।

वहाबी, देवबंदी, राफ़्ज़ी ओ नासबी कुत्ते,
सभी पर हैं क़हर आवर ख़लीफ़ा अच्छे ह़ज़रत का।

सुलैह़कुल वालों के सीनों पे जिस ने मार मारी हैं,
वो शेरे हिंद का पैकर ख़लीफ़ा अच्छे हज़रत का।

जले हैं नासबी मुल्लाने जिनकी देख के अ़ज़मत,
मुह़िब्बे शाह सनाबिल और ख़लीफ़ा अच्छे ह़ज़रत का।

भरोसा हैं वो मुर्शिद का क़ुबूले ख़ानक़ाह हैं वो,
ह़ुकूमत जिसकी हैं दिल पर ख़लीफ़ा अच्छे ह़ज़रत का।

नज़र आती हैं मुर्शिद की अदाएं ख़ास कर उन में,
ख़ुलूस-ओ-अ़द्ल का साग़र ख़लीफ़ा अच्छे ह़ज़रत का।

यही मेयार रखते हैं फ़िदा हो जाओ मुर्शिद पर,
रहे ह़शमत नगर आकर ख़लीफ़ा अच्छे ह़ज़रत का।

निभाया हैं हमेशा कोई भी गर बात अजाए,
शफ़क़्क़त करता है हम पर ख़लीफ़ा अच्छे ह़ज़रत का।

बनाया मुझ को हैं मोह़तात़ मसलक में मह़ब्बत में,
सिखाया हैं अदब चल कर ख़लीफ़ा अच्छे ह़ज़रत का।

में अपने शहर में इस बात पर शाहिद हूं के सैय्यद,
कहा लोगो ने हैं हक़ पर ख़लीफ़ा अच्छे ह़ज़रत का।

लक़ब फ़ातेह़ का उनको ज़ैब देता हैं समर वल्लाह,
वो तन्हा था हज़ारों पर ख़लीफ़ा अच्छे ह़ज़रत का।
✍️ अज़ मोह़ताजे मुर्शिदे पाक सैय्यद इरफ़ान समर अ़ली ह़शमती बुरहानपुरी

28/03/2024

*बद्र की दफए ज़ुलमत पे लाखों सलाम*

2 हिजरी है, 17 रमज़ानुल मुबारक की तारीख़ है, इस्लाम की पहली जंग है, एक तरफ़ काफ़िरो का एक हज़ारा लश्कर दूसरी तरफ़ सिर्फ़ 313 निहत्ते मुसलमान ।

*हाए ये कैसा मुकाबला है*

निहत्तों के मुकाबले में दो गुना भी नहीं बल्कि तीन गुना से ज़ाईद असलेहा से लैस लश्कर ए जर्रार। एक तरफ़ मुजहिदीन पा पियादा हैं दूसरी तरफ़ का लश्कर तरह तरह के सवारों पर सवार एक तरफ मुजाहिदीन के हाथ ज़रूरी सामाने जंग से ख़ाली दूसरी तरफ़ के लश्कर के पास तमाम तर सामाने जंग और हथियार। एक तरफ़ मुज़ाहिदीन फाका कश हैं दूसरी तरफ़ का लश्कर शिकम सेर व ताज़ा दम और तय्यार।
*ऐसे आलम मैं* दुआ के लिए वो हाथ उठता है जिसे یَدُاللّٰہِ فَوقَ اَیدِیہِم फ़रमाया गया, वो ज़बान खुलती है जिस को सब कुन की कुंजी कहा गया और पतली पतली गुले क़ुद्स की पत्तियां हिलती हैं मफ़हुमे दुआ कुछ यूं है इलाही ! ये तेरे बन्दे हैं ज़ाहिरी साज़ो सामान के बगैर मुसल्लह लश्कर के मुकाबले में आये हुए हैं इनकी ग़ैब से ताईद फ़रमा।
*इजाबत ने झुक कर गले से लगाया*
*बढी नाज़ से जब दुआए मुह़म्मद ﷺ*
*इजाबत का सेहरा इनायत का जोड़ा*
*दुल्हन बनके निकली दुआए मुह़म्मद ﷺ*
(अज़ क़लम - सरकारे आ़ला ह़ज़रत इमामे अहले सुन्नत फ़ाज़िले बरेलवी रज़ियल्लाहु तआला अन्हु)

राविये हदीस फ़रमाते हैं फ़तह के बाद हममें से कोई ऐसा ना रहा जिसके पास सवारी, कपड़े और नक़दो जीन्स की फ़रावानी ना हो। فللّٰہ الحمد

बज़ाहिर उनके पास हथियार नही था मगर उनका सबसे बड़ा हथियार इशको मुहब्बते रसूल था और ज़माने को पैग़ाम दे रहे थे कि हिम्मत हारना राहे उल्फ़त के मुसाफ़िर का शेवा नहीं, बज़ाहिर उनके पास सवारियां नही थीं मगर उनका भरोसा सवारियों पर नही बल्कि सवारियों के ख़ालिक़ मुह़म्मदूर रसूललुल्लाह ﷺ के ख़ुदा पर था, बज़ाहिर वो भूके प्यासे थे मगर उनकी ताक़त जिस्मानी ग़िज़ा नही थी बल्कि रूह़ानी ग़िज़ा थी यानी उनकी त़ाक़त उस नबी की दुआ थी जिससे ख़ुदा का वादा है "وَلَسَوْفَ یُعْطِیْکَ رَبُّکَ فَتَرْضیٰ" (और हम क़रीब तुम्हें तुम्हारा रब इतना देगा कि तुम राज़ी हो जाओगे ) अरे वो तादाद व अफ़राद देखने वाले लोग नही थे वो तो रज़ाए महबूब के तालिब थे कि
*काम वो ले लीजिए तुम को जो राज़ी करे*
जब ही तो इन हज़रात ने जंग के सिलसिले में मशवरा के दौरान अर्ज़ किया था या रसूलअल्लाह हम वो ना कहेंगे जो बनी इस्राइल ने मूसा
अलैहीसलातोवस्सलाम से कहा था
فَاذْھَبْ اَنْتَ وَرَبُّکَ فَقَاتِلَا اِنَّا ھٰھُنَا قٰعِدُونَ
यानी जा तू और तेरा रब लड़ें हम तो यहीं बैठे रहेंगे । या रसूलाल्लाह बल्कि हम तो यह अर्ज़ करते हैं कि हम आपके साथ दाएं लड़ेंगे , बाएं लड़ेंगे , हर तरफ़ लड़ेंगे ।

*जां निसाराने बद्रो उहुद पर दुरूद*
*हक़ गुज़ाराने बैअ़त पे लाखों सलाम*

अल्लाहो अकबर कैसा नक़्श ए जंग है कि किसी का बेटा मुक़ाबले में आया हुआ है , किसी का भाई मद्दे मुक़ाबिल नज़र आ रहा है , किसी का चचा मुख़ालिफ़ पार्टी में दिखाई दे रहा है , किसी का कोई कराबतदार है तो किसी का कोई रिश्तेदार है । मगर कोई उज़्र लेकर नहीं आ रहा है कि बेटा मुक़ाबले में है तलवार कैसे चलेगी , भाई सामने है नेज़ा कैसे उठाउंगा , चचा रुबरू है तीर कैसे चलाऊंगा , कराबतदार से आमना सामना है बर्छियां कैसे चलेंगी । नहीं नहीं बल्कि वो आज एक तारीख़ रक़म करने उतरे थे और उम्मते मुस्लिमा को दर्स देने आए थे कि आशिकाने ख़ैरुलअनाम ख़ानदान नहीं देखते ईमान देखते हैं , खूनी रिश्ता नही इमानी रिश्ता देखते हैं , वफ़ादारों में है तो رُحَمَاءُ بَیْنَھُمْ और गद्दारों के लिये اَشِدَّاءُ عَلَی الْکُفَّارِ ।

ऐ मुसलमान कहलाने वालो ! ज़रा ज़रा सी मुश्किल पर सुलह सुलह की रट लगाने वालो , थोड़ी थोड़ी सी परेशानी में मसलेहत मसलेहत की दुहाई देने वालो, गद्दारों से मेलजोल की राहें निकलने वालो, नंगे दीन व नंगे वतन वहाबिया व दयाबना व तब्लीग़ी जमाअत कि हिमायत में आवाज़े एहतेजाज बुलंद करने वालो ज़रा सहाबा व अहलेबैत की तारीख़ पढ़ो वो सुल्ह व मसलेहत की राग अलापने वाले ना थे बल्कि गुलशने इस्लाम को सींचने की ख़ातिर कभी मैदाने बद्र में खून दे रहे हैं, कभी उहूद की वादी में खूनों का नज़राना पेश कर रहे हैं, गुलशने इस्लाम की आबियारी की ख़ातिर कभी यरमुक में हैं तो कभी तबूक में, कभी ख़ंदक़ की जंग मैं हैं तो कभी हुनैन की जंग में, कभी ख़ैबर की वादी में नबर्द आज़मा हैं तो कभी कर्बला की वादी में ।

मज़हरे आ़ला ह़ज़रत शेरे बेशए अहले सुन्नत। (रदि अल्लाहो तआला अन्हो) फ़रमाते हैं
*वही गुलशन सहाबा जिसे ने ख़ूनों से सींचा था*
*उजाड़ा जा रहा है अब तो ए अबरे सख़ा उठिये*

इसी जंग मैं जब सरकारे दो जहाँ सल्लल्लाहो तआला अलैहि व अला अलिही व सल्लम ने काफ़िरों का कर्रोफ़र देखा तो बारगाहे ख़ुदावंदी में दुआ करते-करते अपनी शाने मेहबूबी का इज़हार करते हुए यहां तक अर्ज़ कर दिया कि *"अगर कुफ़्फ़ार ग़ालिब आगये तो तेरी इबादत बिकुल ख़तम हो जाएगी "*
दुनिया ने देखा कि शमए रिसालत के जांबाज़ परवानों ने फ़लक पैमा हिम्मत का ऐसा सुबूत दिया कि बड़े-बड़े सूरमाओं का कलेजा पानी होता नज़र आया बशूमुले उतबा, शैबा, वलीद, अबु जेहल व उमैया बिन ख़लफ़ 70 सरदाराने कुफ़्फ़ार फ़ना के घाट उतार दिए गए और 70 सरदार क़ैदी बना दिए गए। जब अक़ीदा व इश्क़ सच्चा होता है, जब ईमान बिल्लाह व ईमान बिर्रसूल पुख़्ता होता है तो ख़ुदा वन्दे कुद्दुस हिफ़ाज़तो ताईद के लिए फ़िरिश्तों को भेज देता है चुनांचे मैदाने बद्र में पाँच हज़ार फ़िरिशतों का क़ाफिला नुज़ूल पज़ीर हुआ था। जिस कौम में ऐसी फ़लक पैमा हिम्मत रखने वाले मुज़ाहिदीन हों उसका परचम सरनिगुं (नीचे) नही हो सकता। क़ुर्बान जाईये अक़ीदाए इश्क़ की हैरतगरी के की बज़ाहिर इतनी खुली हुई बेसरो सामानी के बावजूद ताज़ा दम लश्करे जर्रार पर फतह पाने का अज़्म ज़रा भी मुताज़ल्ज़ल नहीं हो रहा था। इस फतहो कामरानी और सुतुवते इस्लाम की हैबत से धरती का सीना दहल उठा " کَم مِّنْ فِئَۃ قَلِیلَۃ غَلَبَت فِئَۃً کَثِیْرَۃً بِاِذْنِ اللّٰہِ" (बरहा कम जमाअत ग़ालिब आई है ज़्यादा गिरोह पर) की क्या खूब जलवागरी थी "وَاِنْ یَّکُنْ مِّنْکُمْ مِّائَۃ صابِرَۃ یَّغْلِبُوْا اَلْفاً مِّنَ الَّذِینَ کَفَرُوا بِاَنَّھُمْ قَوْم لَّایَفْقَھُونَ" (और अगर तुममें के सौ हों तो काफ़िरों के हज़ार पर ग़ालिब आएंगे इसलिए कि वो समाझ नही रखते ) का हैरत अंगेज़ मंज़र नज़रों के सामने था।

आलिमे मकाना व मायकून मुत्तला अलल गुयूब सल्लल्लाहो तआला अलिहि व अला अलिही व सल्लम ने जंग से पहले ही जगह की निशानदही करते हुए इरशाद फ़रमाया था *ھٰذا مَصْرَعُ فُلان, ھٰذمَصْرَعُ فلان* ये फुलां काफ़िर की जाए कत्ल है, यहां फुलां काफ़िर मारा जाएगा। ह़ज़रते उमर रदि अल्लाहो तआला अन्हो फ़रमाते हैं कसम है नबी के ख़ुदा की किसी ने उनमे से एक बालिश्त भी तजावुज़ नहीं किया (यानी थोड़ा भी ईधर-उधर ना हुआ)

ज़रा अक़्ले ना हनजार कि फ़ितना सामानी देखिये की जिस अक़ीदे को कसम खा कर सरकारे फ़ारुक़े आज़म (रदि अल्लाहो तआला अन्हो) बायान फ़रमा रहे हैं, जिस अक़ीदे को क़ुबूल करके सरकार सिद्दिक़े अकबर (रदि अल्लाहो तआला अन्हो) मुशर्रफ़ बा इस्लाम हो रहे हैं वही अक़ीदा आज के एक बद अंदेश तबका के नज़दीक हलकए इस्लाम से ख़ारिज करने का ज़रिया बन गया और सिर्फ़ एक हज़रते सिद्दिक़े अकबर ही नहीं तारीख़ के सफ़हात पर बेशुमार हस्तियां मिलेंगी जिनके इस्लाम लाने का ज़रिया सिर्फ़ रसूल ए पाक सल्लल्लाहो तआला अलैहि व अला आलिही व सल्लम की ग़ैबदानी है। अबु जहल जैसे सरकश और कट्टर मुख़ालीफे इस्लाम के मुताअल्लिक ये वाक़िया अवामो ख़वास में मशहूर है कि मनसबे रिसालत की आज़माइश के लिए वो चंद कंकरियां मुट्टी में छुपाए हुए हाज़िर हुआ और कहा कि अगर आप वाकई रसूल हैं और आसमानो ज़मीन के असरार की ख़बर रखते हैं तो बताइए कि मेरी मुट्टी में क्या है ? अबु जहल जैसे शक़ी व मुनकिर को भी ये एतेराफ़ था कि रसूल के लिए ग़ैबदानी लाज़िम है जो रसूल होगा उसे ज़मीनो आसमान के असरार की यक़ीनन ख़बर होगी लेकिन ये आज के कलमा पढ़ने वाले वहाबी देवबंदी नाम निहाद तब्लीगी जामाअत व जमाअते इस्लामी वाले हैं जो रसूले पाक सल्लल्लाहो तआला अलैहि व अला आलिही व सल्लम की ग़ैबदानी का इनकार करते हुए अबु जहल से भी नहीं शरमाते।

*ज़िक्र रोके फ़ज़्ल काटे नक़्स का जूयाँ रहे*
*फिर कहे मर्दक कि हूं उम्मत रसूलुल्लाह की*

*तुझसे और जन्नत से क्या मतलब वहाबी दूर हो*
*हम रसूलुल्लाह के जन्नत रसूलुल्लाह की*

इन अज़ीम कुर्बानियों ने जंगे बद्र में शामिल सहाब ए किराम को दूसरे सहाब ए किराम से अफ़ज़ल बना दिया। (रदि अल्लाहो तआला अन्हुम अजमइन)
सह़ी बुख़ारी मैं है कि ह़ज़रते जिब्राइल अलैहिस सलाम ने रसूले रहमत सल्लल्लाहो तआला अलैहि व अला अलिही व सल्लम से बयान किया कि जिस तरह आपके सहाबा में अहले बद्र आ़ली मर्तबा हैं इसी तरह वो फ़रिशते जो बद्र में हाज़िर हुए और फ़िरिशतों से अशरफो आ़ला हैं

*हुस्ने युसूफ़ पे कटीं मिश्र में अंगुश्ते ज़नाँ*
*सर कटाते हैं तेरे नाम पे मर्दाने अ़रब*

अल्लाह अल्लाह क्या मर्तबा है अहले बद्र का, कैसी अज़ीम बिशारत का मुज़्दा उन्हें उनका रब अता फ़रमा रहा है कि जब-जब इमान वाला इस मुज़्दए जॉफ़िज़ा को पढेगा या सुनेगा रश्क़ किए बग़ैर न रह सकेगा इरशाद होता है اِعْمَلُوا مَاشِئْتُم فَقَدْ غَفَرتُ لَکُم यअनी जो चाहो करो मैं तुम्हे बख्श चुका।

*अजीज़ाना गुज़ारिश*

तमाम सुन्नी सही हुल अक़ीदा मुसलमानों से गुज़ारिश है कि अपने अपने घरों में असहाबे बद्र रदि अल्लाहो तआला अन्हुम की याद मनाएं, नज़रो नियाज़ का एहतेमाम करें क्योंकि मुहसीनों का एहसान मंद होना और उनका शुक्र गुज़ार होना अहले ईमान का शेवा व दस्तूर है हदीस में है مَن لَمْ یَشْکُرِ النَّاسَ لَم یَشکُرِ اللّٰہَ यअनी जो बंदों का शुक्र अदा नहीं करता वो ख़ुदा का भी शुक्र गुज़ार नहीं होता। साथ ही साथ तैयिबा ताहिरा उम्मुल मोमिनीन ह़ज़रते आयशा सिद्दिका रदि अल्लाहु तआला अन्हा की भी नज़र दिलाएं की 17 रमज़ानुल मुबारक आप की भी तारीख़े विसाल है

*बिन्ते सिद्दीक़ आरामे जाने नबी*
*उस ह़रीमे बराअ्त पे लाखों सलाम*

*यानी है सूरए नूर जिन की गवाह*
*उनकी पुरनूर सूरत पे लाखों सलाम*

फ़क़त तालिबे दुआ व गदाए कूचए मज़हरे आ़ला ह़ज़रत उबैदे इदरीस मुह़म्मद नक़ीबुर्रहमान ह़शमती ख़ादिम दारुल उलूम हशमतुरर्ज़ा कर्नेलगंज कानपुर

26/03/2024

*जानशीने इमामुल अम्बिया, हमशबीहे मुस्तफ़ाﷺ, मज़हरे ज़ाते मुर्तज़ा, परतवे ह़ैदरे कर्रार, नूरे ऐने फ़ातिमा ज़ेहरा, लख़्ते जिगरे पाके सय्यदा, जाने मौला ह़ुसैन, शाने शोहदाए करबला, ख़लीफ़ा ए पंजुम, इमामुल अईम्मा, सरवरे औलिया, साह़िबे कौसर, बादशाहे जन्नत, दस्तगीरे हर दो आ़लम, शजरे सादाते ह़सनी, सरकार, आक़ा, दाता, मौला सैय्यदना इमाम ह़सने मुज्तबा علیہ السلام का यौमे पैदाइश मुबारक हो.!!*

सरकार ﷺ के दो नैन हैं ह़सनैन करीमैन
और सय्यदा के चैन हैं ह़सनैन करीमैन

ये आप का मोलूद हैं सरकारﷺ भी ख़ुश है
ये जश्न तो ईदैन हैं ह़सनैन करीमैन

आक़ाﷺ शहे सक़लैन हैं जानाने जहां हैं
जाने शहे सक़लैनﷺ हैं ह़सनैन करीमैन

हां रेह़मते आ़लम के मुशाबाह हुई ज़ेहरा
और उन के नज़ीरैन हैं ह़सनैन करीमैन

हम शक्ले प्यम्बरﷺ हैं ये सरदारे जिनां हैं
किस दर्जा कमालैन हैं ह़सनैन करीमैन

सब उनकी रियासत है ये सब उनकी ह़ुकूमत
हां मालिके कोनैन हैं ह़सनैन करीमैन

तफ़वीजे़ इमामत के अ़ली पाक गवाह हैं
ऐसे ये इमामैन हैं ह़सनैन करीमैन

ये फ़ातह़े ख़ैबर की शुजाअ़त के अमीं है
ह़ैदर के जलालैन हैं ह़सनैन करीमैन

वारिस हुए जो इल्मे नबीﷺ के वो अ़ली हैं
और उन के शबीहैन हैं ह़सनैन करीमैन

लेते थे सह़ाबा सभी तजवीज़ अ़ली से
और उन के मुशीरैन हैं ह़सनैन करीमैन

शैख़ेन ए करीमैन, वज़ीरैन ए नबी है
ह़ैदर के वज़ीरैन हैं ह़सनैन करीमैन

शैख़ेन हैं सरकार के इसनैन-ओ-रफ़ीक़ैन
और उनके रफ़ीक़ैन हैं ह़सनैन करीमैन

सिद्दीक़ यूं फ़रमाते हैं मिम्बर से उतर कर
हां मालिके ह़रमैन हैं ह़सनैन करीमैन

फ़ारूक़ कहे आप के नानाﷺ की अ़ता हैं
ह़ासिल जो ये दारैन हैं ह़सनैन करीमैन

सारे ही सह़ाबा को थे औलाद से बढ़ कर
सरकारﷺ के नूरैन हैं ह़सनैन करीमैन

जो उन को मिला प्यारा वो पाया ना किसी ने
सादैन-ओ-सईदैन हैं ह़सनैन करीमैन

हां अ़ब्दे मतालिब थे वो काबे के मुह़ाफ़िज़
और उन के नबीरैन हैं ह़सनैन करीमैन

आक़ा की शहादत किसी सूरत नहीं मुमकिन
हां शक्ले शहीदैन हैं ह़सनैन करीमैन

ग़म इनका ना हो गर तो है ईमान अधूरा
इस्लाम के क़ुत्बैन हैं ह़सनैन करीमैन

हर आन में क़ुरआ़न को थामे हुए रहना
फिर साथ सफ़ीनैन हैं ह़सनैन करीमैन

वो राहे ख़ुदा में जो ह़िदायत के निशां हैं
वो आप के क़दमैन हैं ह़सनैन करीमैन

हैं आप तक़ीयैन-ओ-नक़ीयैन-ओ-जलीलैन
और आप जमालैन हैं ह़सनैन करीमैन

दोनों ही जहां में नहीं है कोई मिसाली
ऐसे दो फ़रीक़ैन हैं ह़सनैन करीमैन

जो ह़सनी ह़ुसैनी हुए इस रुए ज़मीं पर
बस आप से तरफ़ैन हैं ह़सनैन करीमैन

हैं आप से रौशन वो इमामों की इमामत
और वलीयों के क़मरैन हैं ह़सनैन करीमैन

काफ़ूर करो कोहे मिह़न शाहों के शाहों
दिल जां बड़े बे चैन हैं ह़सनैन करीमैन

बर्बादी में बेड़ा है ज़रा पार लगा दो
बस आप सख़ीयैन हैं ह़सनैन करीमैन

वो वक़्ते अजल आएंगे इमदाद को मेरी
रेह़मत के जो बेह़रैन हैं ह़सनैन करीमैन

कर दूंगा शिकायत में ये बे ख़ोफ़ लेह़द में
आए ये नकीरैन हैं ह़सनैन करीमैन

फिर कहने लगूं पूछिए जो पूछना चाहो
ह़ामी तो करीमैन हैं ह़सनैन करीमैन

क्या ख़ोफ़ सरे ह़श्र भी आ़माल का होंगा
गर ताज वो नाअ़लैन हैं ह़सनैन करीमैन

मुर्शिद का करम कश्ती मिली आले नबी की
याअ़नी के हफ़ीज़ैन हैं ह़सनैन करीमैन

सादात के अजदाद के दर का हूं भिकारी
सब मुझ पे समर दैन हैं ह़सनैन करीमैन

एह़सान-ओ-समर करते रहे दीन की ख़िदमत
ख़ादिम हैं असीरैन हैं ह़सनैन करीमैन
✍️ अज़ मोह़ताजे मुर्शिदे पाक सैय्यद इरफ़ान समर अ़ली ह़शमती बुरहानपुरी
۔
۔
۔
۔
علیہم السلام و رضوان اللہ علیہم اجمعین

Want your public figure to be the top-listed Public Figure in Allahabad?
Click here to claim your Sponsored Listing.

Category

Website

Address


Allahabad