Kapil
my self Imotinal
मुर्ख वृद्ध के पहाड़ हटाने की कहानी
अतीत में एक वृद्ध लोग रहता था , नाम था य्यु-गङ , अर्थात मुर्ख दादा , वे नब्बे साल के हो चुके थे । उस के घर के सामने दो ऊंचे ऊंचे पहाड़ खड़े थे , एक का नाम थाईहान और दूसरे का नाम वांगवु , दोनों पहाड़ों के कारण वहां का यातायात बहुत दुगम था ।
एक दिन , य्यु-गङ ने परिवार के तमाम लोगों को एक साथ बुला कर कहा कि सामने खड़े ये दो पहाड़ हमारे बाहर जाने के रास्ते को रोक देते हैं , बाहर जाने के लिए हमें लम्बे समय तक घूमा चक्कर लगाना पड़ता है । बेहतर है कि हम मिल कर इन दो पहाड़ों को हटा दें और रास्ता सुगम बनाएं , तुम लोगों का क्या ख्याल है?
य्यु-गङ के पुत्र और पोते मुर्ख दादा के सुझाव के समर्थन में हां भरते हुए बोले , हां , दादा जी , आप ने सही कहा है , हम कल से ही शुरू करेंगे । लेकिन य्यु-गङ की पत्नी को लगता था कि इन दो बड़े बड़े पहड़ों को हटाने का काम असाधारण कठिन है , इसलिए उस ने विरोध में कहा कि हम यहां पीढ़ियों से रहते हैं , इसी तरह आगे भी रह सकेंगे , ये दो पहाड़ इतने बड़े हैं , आहिस्ता आहिस्ता उसे हटाया जा सके , तो भी इतना ज्यादा मिट्टी पत्थर कहां रखे जाए ?
य्यु-गङ की पत्नी की आशंका पर घर वालों में खूब बहस हुई , अंत में यह तय किया गया कि पहाड़ के पत्थर दूर समुद्र में ले जाया जाए और अतह समुद्र में डाले जाए ।
दूसरे ही दिन , य्यु-गङ के नेतृत्व में घर वालों ने पहाड़ हटाने का महान और कठोर काम आरंभ किया । पड़ोस की एक विधवा थी , उस का बेटा अभी सात आठ साल का था , वह भी पहाड़ हटाने में हाथ बटाने आया । पहाड़ हटाने के लिए औजार बहुत सरल थे , फावड़े और बांस के थैला मात्र थे , और तो और पहाड़ और समुद्र के बीच फासला भी बहुत दूर था , एक लोग एक दिन महज दो दफे आ जा सकता था । इस तरह एक महीना गुजरा , किन्तु वे दोनों पहाड़ पहले की ही तरह जरा भी कम हुआ नहीं दिखता था ।
पड़ोस में ची-स्यो नाम का एक दूसरा वृद्ध रहता था , ची-स्यो का अर्थ था बुद्धिमान बुजुर्ग । उसे य्यु-गङ की इस कोशिश पर बड़ी परिहास आया , वह य्यु-गङ को बड़ा मुर्ख समझता था । तो एक दिन उस ने य्यु-गङ से कहा, तुम तिकने बड़ी उम्र के हो , चलने फिरने में भी मुश्किल हुए दिखते हो , तुम इन बड़े बड़े पहाड़ों को कैसे हटा सकोगे ।
य्यु-गङ ने जवाब में कहा कि तुम्हारा नाम ची-स्यो है , यानी बुद्धिमान बुजुर्ग हो , लेकिन मेरे विचार में तुम बच्चे से भी ज्यादा अक्लमंद नहीं होते हो । मैं इस दुनिया से जा बसने वाला हूं , पर मेरे पुत्र हो , पोते हो , परपोते हो , इस प्रकार वंश जारी रहते हुए मेरी संतानों का अंत नहीं होगा , किन्तु , इस पहाड़ का जितना हटाया गया , उतना कम हो जाएगा और फिर बढ़ नहीं सकेगा । अगर महीने पर महीने और साल पर साल उसे हटाया जाएगा , तो अखिर में एक दिन वह जरूर खत्म होगा । य्यु-गङ के पक्के संकल्प पर ची-स्यो को शर्म आया , उस ने फिर जबान नहीं खोली ।
य्यु-गङ के सारे परिवार दिन रात पक्के संकल्प के साथ पहाड़ हटाने का काम करते रहे , वे न तो तपती गर्मियों और कड़ाके की सर्दियों से डरते थे , न ही कठोर परिश्रम से । वे जी जान से काम में जुटे रहे । उन की भावना से भगवान प्रभाविक हुए , उस ने य्यु-गङ को मदद देने के लिए दो देवता भेजे , जिन्हों ने दिव्य शक्ति से इन दो पहाड़ों को य्यु-गङ के घर के सामने से दूर दराज जगह हटाया ।
मुर्ख दादा की यह कहानी सदियों से चीनी लोगों में लोकप्रिय हो रही है , चीनी लोग उस के अदम्य मनोबल से सीखते हुए कठिन से कठिन काम पूरा करने की कोशिश करते हैं ।
बढ़ई की जोरू
किसी नगर में वीरवर नाम का एक बढ़ई रहता था। उसकी घरवाली का नाम कामिनी था। वह बहुत चलता-पुर्जा और बदनाम थी। जब सबकी जबान पर एक ही बात हो तो भला बढ़ई के कान में इसकी भनक क्यों न पड़ती। बढ़ई ने सोचा, मुझे पहले इस बात की जाँच करनी चाहिए। पुरुष होने के नाते बढ़ई यह तो जानता ही था कि स्त्रियाँ स्वभाव से बदचलन होती हैं। जैसे आग का शीतल होना या चन्द्रमा का गर्म होना या दुष्टों का परोपकारी होना असम्भव है उसी तरह स्त्री का सती होना भी असम्भव है। फिर उसकी जोरू को तो सारी दुनिया कुलटा कह रही थी।
ताड़नेवाले तो पत्थर की नजर रखते ही हैं। वे उसे भी जान लेते हैं जो न वेद में लिखी हो न शास्त्र में। कोई लाख परदे में कोई अच्छा-बुरा काम करे, वह लोगों से छिपा नहीं रह पाता है।
ऐसा सोचकर उसने अपनी जोरू से कहा, ‘‘प्यारी, मैं कल सुबह ही किसी दूसरे गाँव जाने वाला हूँ। मुझे वहाँ पूरा दिन लग जाएगा। तुम इसी समय मेरे खाने के लिए कुछ सामान बनाकर रख दो।’’
उसकी जोरू को और क्या चाहिए था! उसकी तो मन की मुराद पूरी हो गयी। सारा काम-धाम छोड़कर पकवान बनाने में जुट गयी।
दूसरे दिन सोकर उठते ही बढ़ई घर से बाहर निकला। अब पति का डर तो था नहीं। उसकी जोरू सारे दिन सजती-सँवरती रही। किसी तरह शाम हुई। अब वह पहुँची अपने यार के घर और बोली, ‘‘मेरा मुँहजला खसम आज किसी दूसरे गाँव को गया हुआ है। लोगों की आँख लगते ही चुपचाप मेरे यहाँ आ जाना।’’
उधर बढ़ई ने जैसे-तैसे दिन काटा और शाम का झुटपुटा होते ही चुपचाप पीछे की खिड़की से घर में घुसा और चारपाई के नीचे छिप गया। उसकी जोरू का यार देवदत्त आकर उस चारपाई पर बैठ गया। बढ़ई को अपना गुस्सा रोकते न बनता था। उसके मन में आता वह अभी चारपाई के नीचे से निकले और उसकी जान ले ले। पर उसने अक्ल से काम लिया। सोचा, जब ये दोनों सो जाएँगे उसी समय इनका गला दबा दूँगा। पहले यह तो देख लूँ कि यह इसके साथ करती क्या है। दोनों की बातें भी तो सुनूँ। क्या करना है, क्या नहीं, इसका फैसला बाद में करूँगा।
अभी बढ़ई इस उधेड़बुन में पड़ा हुआ था कि इसी समय उसकी जोरू भी आकर अपने यार के पास बैठ गयी। चारपाई पर बैठते समय उसका पैर बढ़ई के शरीर को छू गया। उसे ताड़ते देर न लगी कि चारपाई के नीचे कोई दुबका हुआ है। अब यह बात तो उसकी समझ में आ ही गयी कि हो न हो यह उसका पति ही है, जो उसको परखने की कोशिश कर रहा है। उसने सोचा, अब मैं भी इसे दिखा ही दूँ कि मैंने भी कच्ची गोलियाँ नहीं खेली हैं।
अभी वह कोई जुगत सोच ही रही थी कि उसके यार ने उसे अपनी बाँहों में भरने के लिए अपने हाथ बढ़ाये। उसे अपनी ओर हाथ बढ़ाते देखकर बढ़ई की जोरू बोली, ‘‘देखो, मुझे हाथ लगाया तो तुम्हारी खैर नहीं है। तुम नहीं जानते मैं कितनी सती-साध्वी स्त्री हूँ। यदि तुमने कुछ भी ऐसा-वैसा किया तो मैं तुम्हें शाप देकर भस्म कर दूँगी।’’
देवदत्त को तो कुछ मालूम नहीं था। उसने कहा, ‘‘ऐसा था तो तूने मुझे बुलाया क्यों?’’
बढ़ई की जोरू ने कहा, ‘‘कारण जानना ही चाहते हो तो सुनो। आज सुबह मैं चण्डी देवी के दर्शन करने गयी थी। मेरे वहाँ पहुँचते ही एकाएक आकाशवाणी हुई, ‘बेटी, तू मेरी सच्ची भक्त है इसलिए कहते हुए दुख तो होता है पर इस बात को छिपा जाना और भी दुखद है। जी कड़ा करके सुन। दुर्भाग्य से आज से छह महीने के भीतर तू विधवा हो जाएगी।’
आकाशवाणी सुनकर मैंने पूछा, ‘माँ भगवती, आप यदि यह जानती हैं कि मेरे ऊपर कौन-सी विपदा आनेवाली है तो यह भी जानती ही होंगी कि इससे बचने का उपाय क्या है। क्या ऐसा कोई उपाय नहीं जिससे मेरे पति सौ वर्ष तक जीवित रहें।’
देवी माँ ने कहा, ‘उपाय तो तेरे वश का है, पर क्या तू उसे कर भी पाएगी?’
मैंने कहा, ‘माँ आप बताएँ तो सही। अपने पति के लिए तो मैं अपने प्राण भी दे सकती हूँ। आप बिना किसी आशंका के मुझे वह उपाय बता भर दें।’
मेरी प्रार्थना सुनकर देवी ने कहा, ‘यदि तू किसी पर-पुरुष के साथ शयन करके उसका आलिंगन करे तो तेरे पति की अकाल मृत्यु का प्रवेश उस पुरुष में हो जाएगा। इससे तुम्हारा पति तो सौ साल तक जीवित रहेगा, पर उसकी आयु घट जाएगी। मैंने आपको इसीलिए बुलाया है। आप मेरे साथ जो चाहे सो करें, पर एक बात जान लें कि देवी के मुँह से निकली बात अकारथ नहीं जाएगी।’
बढ़ई की बहू की बात सुनकर उसका यार मन ही मन उसकी चतुराई पर मुस्कराने लगा और जिस काम के लिए आया था उस काम पर जुट गया।
वह मूर्ख बढ़ई तो अपनी जोरू की बातें सुनकर पुलकित हो गया। उसके आनन्द का कोई ठिकाना न था। वह चारपाई के नीचे से निकलकर बाहर आ गया और बोला, ‘‘धन्य है! मेरी पतिव्रता पत्नी, तू धन्य है। मैंने नाहक चुगलखोरों के कहने में आकर तेरे ऊपर सन्देह किया। मैं तो तुम्हें परखने के लिए ही दूसरे गाँव जाने का बहाना बनाकर निकला था। अब मेरा मन साफ हो गया। आओ, मेरे हृदय से लग जाओ। तुम पतिव्रता नारियों की सिरमौर हो। पर-पुरुष के साथ रहकर भी तुमने इतने संयम से काम लिया। तुमने मेरी अकाल मृत्यु को दूर करने और मुझे दीर्घायु बनाने के लिए जो कुछ किया उसे मैं अच्छी तरह समझ गया हूँ।’’ यह कहकर उसने अपनी पत्नी को बाँहों में भर लिया।
उसने अपनी जोरू को अपने कन्धे पर चढ़ा लिया और देवदत्त से बोला, ‘‘महानुभाव, यह मेरे पिछले जन्म का पुण्य है जो आप ने यहाँ आने का कष्ट किया। आपकी कृपा से ही मुझे सौ वर्ष की आयु मिली है इसलिए आप भी मेरे गले लग जाएँ और कन्धे पर चढ़ जाएँ।’’
देवदत्त आना-कानी करता रहा पर उसने उसकी एक न सुनी। हारकर उसे भी उसके कन्धे पर सवार होना ही पड़ा। अब वह खुशी से नाचते हुए कहने लगा, ‘‘आप लोगों ने मेरा इतना बड़ा उपकार किया है, आप दोनों धन्य हैं।’’
वह उन दोनों को लेकर अपने सगे-सम्बन्धियों के यहाँ जाता और सभी को यह कहानी सुनाता और उन दोनों की तारीफ के पुल बाँधने लगता।
कहानी पूरी करके रक्ताक्ष बोला, ‘‘मैं इसीलिए कह रहा था कि अपनी आँखों से किसी को पाप करते देखकर भी मूर्ख आदमी झूठे बहानों से ही सन्तुष्ट हो जाता है।’’
अब वह मन्त्रियों की ओर मुड़ा और बोला, ‘‘आप लोगों ने तो अपनी ही जड़ खोद डाली है। अब हमें तबाह होने से कौन रोक सकता है? सयानों ने कुछ गलत तो कहा नहीं है कि जो मित्र बनकर भी भलाई की जगह बुराई की सलाह देते हैं उन्हें समझदार लोग अपना दुश्मन समझते हैं। कौन नहीं जानता कि जिस मन्त्री को यह मालूम ही नहीं कि किस देश में और किस मौके पर क्या करना चाहिए, उसे मन्त्री बनानेवाला राजा उसी तरह मिट जाता है जैसे सूरज के निकलने पर अँधेरा मिट जाता है।’’
पर वहाँ कौन था जो रक्ताक्ष की बात पर कान देता। अब वे उल्लू स्थिरजीवी को उठाकर अपने दुर्ग में ले जाने लगे। जब वे स्थिरजीवी को इस तरह ले जा रहे थे तो उसने कहा, ‘‘मैं अब किसी काम का तो रहा नहीं। मेरे लिए आप लोग इतना कष्ट क्यों उठा रहे हैं? मुझे तो आप लोग थोड़ी-सी आग दे दें, मैं उसी में जल मरूँ। इसी में मेरा कल्याण है।’’
उसकी बात सुनकर राजनीति कुशल रक्ताक्ष बोला, ‘‘जनाब, आप काफी घुटे हुए हैं और बातें गढ़ने में तो आपका कोई जवाब नहीं। आप अगले जन्म में उल्लू योनि में पैदा हों तो भी आप को कौओं से ही लगाव रहेगा। कहते हैं जाति का मोह आसानी से नहीं छूटता। चुहिया को ब्याहने के लिए सूर्य, मेघ, पवन और पर्वत सभी तैयार थे, फिर भी उसने अपने पति के रूप में यदि चुना तो एक चूहे को चुना।’’
मन्त्रियों में से किसी को इस चुहिया के बारे में कुछ मालूम न था। उनके आग्रह करने पर रक्ताक्ष ने जो कहानी सुनायी वह इस प्रकार थी।
13/04/2013
कभी दो दिलों के बीच
कब, कैसे और क्यों
पता ही नहीं चलता
रिश्तों की गरमाहट
सर्द रात की तरह
ठंडी पड़ जाती है
जिसमें संवेदनाएं जम जाती हैं
नजदीक होकर भी कितने दूर होते हैं
रिश्ते मौसम की तरह होते हैं।
जेठ की दुपहरी की तरह
रिश्ते भी अंगार बरसाते हैं
इतनी तपिश होती है कि
तन-मप दोनों ही झुलस जाते हैं
जल जाते हैं रिश्ते के सब पहलू
एक पल में अपने पराए होते हैं
रिश्ते मौसम की तरह होते हैं।
कभी सुख में, कभी दुख में
तो कभी बस यूं ही
रिश्ते आंखों में सावन ले आते हैं
बरसते ही प्यार खिल जाता है
बहुत कुछ भीतर ही भीतर धुल जाता है
मन के कितने कोने तर होते हैं
रिश्ते मौसम की तरह होते हैं।
09/04/2013
चलो आज कुछ अचछा सुनाते हैं,
चलो इस मायूसी को दूर भगाते हैं,
बहुत देर हुई नकली मुस्कान ओढ़े,
चलो आज आईने को हँसाते हैं,
शायद कोई दुकान हो तारों-सितारों की,
चलो इन आखों के लिए चमक लातें हैं,
बहुत वक्त से आया नहीं कोई मिलने,
चलो सबको अपनी याद दिलाते हैं,
नफरतें अकेला कर देती हैं सबको,
चलो इस नफरत को अकेला छोड़ जाते हैं,
कड़वी दवाओं की खुराक है हर रोज़,
चलो सबका मुंह मीठा कराते हैं,
क्यों नहीं लिखता खुशी की गज़लें कोई,
चलो खुशी के दो शेर कह आते हैं,
ख्वाहिशों के चलते ज़िंदगी पीछे रह गयी,
इस फासले को चलो धीरे धीरे घटाते हैं,
सोने चांदी का क्या करेगा कोई,
चलो सबकी खुशी की दुआ कर आते हैं,
किताब की सफ़ेद जिल्द चुभती है आखों में,
चलो फूलों से कह के इसमें कुछ रंग भर आते हैं,
बैठ के सोचने से क्या होगा हासिल 'मित्र'
जो सोचा है चलो आज कर के दिखाते हैं...
थी मुस्कुराती ज़िन्दगी मेरी रुला के चल दिए,
फेका मैय्यत पे फूल और मुस्कुरा के चल दिए..
देखा है प्यार हमने बेशुमार उनका,
झुकी नजरों से इकरार उनका,
आज करके इनकार चल दिए..
फेका मैय्यत पे फूल और मुस्कुरा के चल दिए..
मेरी तन्हाइयों को महफ़िल बनाया,
हर मुश्किल में गले लगाया,
करके बेसहारा आज चल चल दिए..
फेका मैय्यत पे फूल और मुस्कुरा के चल दिए..
जब अपनों ने छोड़ा तूने अपनाया,
हर जख्म पर तूने मरहम लगाया,
आज सीने पर खंजर मार के चल दिए..
थी मुस्कुराती ज़िन्दगी मेरी रुला के चल दिए,
फेका मैय्यत पे फूल और मुस्कुरा के चल दिए..
21/03/2013
होली का हुडदंग है यारो , खूब मचाओ शोर
आँगन आँगन नाच रहे है , ता ता थैया मोर
तन भी भीगा भीगा है मन भी सरोबोर
होली का हुडदंग है यारो खूब मचाओ शोर
गले मिलो अबीर लगाओ ,बांधो प्यार की डोर
होली का हुडदंग ………..
गुजिया पापड और ठंडाई ,जिया में उठत हिलोर
होली का हुडदंग ……..………..
बैर भाव का मिटे अँधेरा जागे जब होली की भोर
होली का हुडदंग ……..……………….
31/01/2013
शादी की वजह
सवाल टेढ़ा है कि लोग शादी क्यो करते है? औरत और मर्द को प्रकृत्या एक-दूसरे की जरूरत होती है लेकिन मौजूदा हालत मे आम तौर पर शादी की यह सच्ची वजह नही होती बल्कि शादी सभ्य जीवन की एक रस्म-सी हो गई है। बहरलहाल, मैने अक्सर शादीशुदा लोगो से इस बारे मे पूछा तो लोगो ने इतनी तरह के जवाब दिए कि मै दंग रह गया। उन जवाबो को पाठको के मनोरंजन के लिए नीचे लिखा जाता है—
एक साहब का तो बयान है कि मेरी शादी बिल्कुल कमसिनी मे हुई और उसकी जिम्मेदारी पूरी तरह मेरे मां-बाप पर है। दूसरे साहब को अपनी खूबसूरती पर बड़ा नाज है। उनका ख्याल है कि उनकी शादी उनके सुन्दर रूप की बदौलत हुई। तीसरे साहब फरमाते है कि मेरे पड़ोस मे एक मुशी साहब रहते थे जिनके एक ही लड़की थी। मैने सहानूभूतिवश खुद ही बातचीत करके शादी कर ली। एक साहब को अपने उत्तराधिकारी के रूप मे एक लड़के के जरूरत थी। चुनांचे आपने इसी धुन मे शादी कर ली। मगर बदकिस्मती से अब तक उनकी सात लड़कियां हो चुकी है और लड़के का कही पता नही। आप कहते है कि मेरा ख्यालहै कि यह शरारत मेरी बीवी की हैजो मुझे इस तरह कुढाना चाहती है। एक साहब पड़े पैसे वाले है और उनको अपनी दौलत खर्च करने का कोई तरीका ही मालूम न था इसलिए उन्होने अपनी शादी कर ली। एक और साहब कहते है कि मेरे आत्मीय और स्वजन हर वक्त मुझे घेरे रहा करते थे इसलिए मैने शादी कर ली। और इसका नतीजा यह हुआ कि अब मुझे शान्ति है। अब मेरे यहां कोई नही आता। एक साहब तमाम उम्र दूसरों की शादी-ब्याह पर व्यवहार और भेट देते-देते परेशान हो गए तो आपने उनकी वापसी की गरज से आखिरकार खुद अपनी शादी कर ली।
और साहबो से जो मैनेदर्याफ्त किया तो उन्होने निम्नलिखित कारण बतलाये। यह जवाब उन्ही के शब्दों मे नम्बरवार नीचे दर्ज किए जाते है—
१—मेरे ससुर एक दौलत मन्द आदमी थे और उनकी यह इकलौती बेटी थी इसलिए मेरे पिता ने शादी की।
२—मेरे बाप-दादा सभी शादी करते चले आए है इसलिए मुझे भी शादी करनी पड़ी।
३—मै हमेशा से खामोश और कम बोलने वाला रहा हूं, इनकार न कर सका।
४—मेरे ससुर ने शुरू मे अपने धन-दौलत का बहुत प्रदर्शन किया इसलिए मेरे मां-बाप ने फौरन मेरी शादी मंजूर कर ली।
५—नौकर अच्छेनही मिलते थे ओर अगर मिलते भी थे तो ठहरते नही थे। खास तौर पर खाना पकानेवाला अच्छा नही मिलता। शादी के बाद इस मुसीबत से छुटकारा मिल गय।
६—मै अपना जीवन-बीमा कराना चाहता था और खानापूरी के वास्ते विधवा का नाम लिखना जरूरी था।
७—मेरी शादी जिद मे हुई। मेरे ससुर शादी के लिए रजामन्द न होते थे मगर मेरे पिता को जिद हो गई। इसलिए मेरी शादी हुई। आखिरकार मेरे ससुर को मेरी शादी करनी ही पड़ी।
८—मेरे ससुरालवाले बड़े ऊंचे खानदान के है इसलिए मेरे माता-पिता ने कोशिश करके मेरी शादी की।
९—मेरी शिक्षा की कोई उचित व्यवस्था न थी इसलिए मुझे शादी करनी पड़ी।
१०—मेरे और मेरी बीवी के जनम के पहले ही हम दोनो के मां-बाप शादी की बातचीत पक्की हो गई थी।
११—लोगो के आग्रह से पिता ने शादी कर दी।
१२—नस्ल और खानदान चलाने के लिए शादी की।
१३—मेरी मां को देहान्त हो गया था और कोई घर को देखनेवाला न था इसलिए मजबूरन शादी करनी पड़ी।
१४—मेरी बहने अकेली थी, इस वास्ते शादी कर ली।
१५—मै अकेला था, दफ्तर जाते वक्त मकान मे ताला लगाना पड़ता था इसलिए शादी कर ली।
१६—मेरी मां ने कसम दिलाई थी इसलिए शादी की।
१७—मेरी पहली बीवी की औलाद को परवरिश की जरूरत थी, इसलिए शादी की।
१८—मेरी मां का ख्याल था कि वह जल्द मरने वाली है और मेरी शादी अपने ही सामने कर देना चाहती थी, इसलिए मेरी शादी हो गई। लेकिन शादीको दस साल हो रहे है भगवान की दया से मां के आशीष की छाया अभी तक कायम है।
१९—तलाक देने को जी चाहता था इसलिए शादी की।
२०—मै मरीज रहता हूं और कोई तीमारदार नही है इसलिए मैने शादी कर ली।
२१—केवल संयाग स मेरा विवाह हो गया।
२२—जिस साल मेरी शादी हुई उस साल बहुत बड़ी सहालग थी। सबकी शादी होती थी, मेरी भी हो गई।
२३—बिला शादी के कोई अपना हाल पूछने वाला न था।
२४—मैने शादी नही की है, एक आफत मोल ले ली है।
२५—पैसे वाले चचा की अवज्ञा न कर सका।
२६—मै बुडढा होने लगा था, अगर अब न करता तो कब करता।
२७—लोक हित के ख्याल से शादी की।
२८—पड़ोसी बुरा समझते थे इसलिए निकाह कर लिया।
२९—डाक्टरो ने शादी केलिए मजबूर किया।
३०—मेरी कविताओं को कोई दाद न देता था।
३१—मेरी दांत गिरने लगे थे और बाल सफेद हो गए थे इसलिए शादी कर ली।
३२—फौज मे शादीशुदा लोगों को तनख्वाह ज्यादा मिलतीथी इसलिए मैने भी शादी कर ली।
३३—कोई मेरा गुस्सा बर्दाश्त न करता था इसलिए मैने शादी कर ली।
३४—बीवी से ज्यादा कोई अपना समर्थक नही होता इसलिए मैने शादी कर ली।
३५—मै खुद हैरान हूं कि शादी क्यों की।
३६—शादी भाग्य मे लिखीथी इसलिए कर ली।
इसी तरह जितने मुंह उतनी बातें सुनने मे आयी।
31/12/2012
31/12/2012
happy new year
क्रिसमस
छुटि्टयों का मौसम है
त्योहार की तैयारी है
रौशन हैं इमारतें
जैसे जन्नत पधारी है
कड़ाके की ठंड है
और बादल भी भारी है
बावजूद इसके लोगों में जोश है
और बच्चे मार रहे किलकारी हैं
यहाँ तक कि पतझड़ की पत्तियाँ भी
लग रही सबको प्यारी हैं
दे रहे हैं वो भी दान
जो धन के पुजारी हैं।
खुश हैं ख़रीदार
और व्यस्त व्यापारी हैं
खुशहाल हैं दोनों
जबकि दोनों ही उधारी हैं
भूल गई यीशु का जनम
ये दुनिया संसारी है
भाग रही है उसके पीछे
जिसे हो हो हो की बीमारी है
लाल सूट और सफ़ेद दाढ़ी
क्या शान से सँवारी है
मिलता है वो मॉल में
पक्का बाज़ारी है
बच्चे हैं उसके दीवाने
जैसे जादू की पिटारी है
झूम रहे हैं जम्हूरे वैसे
जैसे झूमता मदारी हैं
24/12/2012
merry christmas to all my dear fan's
Is Ganvar Ko Ye Baat Samajh Ata Nhi
हो भूख से बेजार बढ़ाकर जब कोई हाथ
उतारता स्वर्ण मुद्रिका जल रही चिता के हाथ
तो इस गँवार को भी यह बात समझ आती है ।
लेकिन रहने वाले ऊँची अट्टालिकाओं में
सेकते हैं रोटियाँ जब जल रही चिताओं में
तो इस गँवार को भी यह बात गवारा नहीं है ।
भरसक मेहनत के बाद जब एक श्रमिक के हाथ
जुटा पाते न रोटी दो वक्त की एक साथ
चुराना एक रोटी का मुझे समझ आता है ।
माँ, पत्नी की लाश पर कर रहे हैं जो नग्न नृत्य
जमीन जायदाद खातिर कर रहे जो भर्त्स कृत्य
यह बात इस गँवार को नागवार गुजरती है ।
गाँवों में साधन नहीं, कमाई का ठौर नही
शहरों में भाग आते चार पैसे मिलें कहीं
बदहाल सा जीना उनका समझ आता है ।
लेकिन शहरों से जा खेतों पर कब्जा करना
एक साथ सैकड़ों किसानों की जमीन छिनना
मुझे क्या किसी भी गँवार को समझ आता नहीं ।
कलेजे पर रख पत्थर भेज विदेश बच्चों को
स्वर्णिम भविष्य देने की चाहत लाडलों को
बुढ़ापे में खुद को ढोना समझ आता है ।
लेकिन उन लाडलों का क्या जो छीन कर सब कुछ
बेघर कर देते बूढ़े माँ बाप को समझ तुच्छ
गँवार को लगता खूब सयाने वो लाडले हैं ।
पिता का हाथ बँटाता बचपन खेत खलिहान में
माँ का हाथ बँटाता बचपन घरों के काम में
गँवार को क्या समझदार को भी समझ आता है ।
लेकिन बचपन खुद को कांधों पर धर जीता है
होटलों, दुकानों, सड़कों, फैक्ट्रियों में पलता है
लगता गँवार को हुई बेमानी जिंदगी है ।
कायर बन जो जीते हैं, शांति शांति जपते हैं
कातर बोल रखते हैं, अपमान भी सहते हैं
दमन इन जातियों का एक दिन समझ आता है ।
किंतु ब्याघ्र बन जो छोटे राष्ट्र निगल जाते हैं
दूसरे देशों की भी बागडोर चलाते हैं
इस गँवार के पल्ले तो कुछ भी नही पड़ता है ।
नेता बनने से पहले वह खाना खाते हैं
राजनीति में जमने पर बस पैसा खाते हैं
नेताओं का करोड़पति बनना समझ आता है ।
लेकिन आम जनता त्रस्त, अपमान सहती रहे
भूख, गरीबी, जुल्म, भ्रष्टाचार से भिड़ती रहे
देश को बेचें नेता, गँवार समझ पाता नहीं ।
अरे समझदारों ! इस गँवार को भी समझा दो
ऊट पटांग हरकतों को भेजे में घुसवा दो
गर नहीं तो इस गँवार को मूर्ख ही बतला दो ।
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