Gaurav Raj Vines

Gaurav Raj Vines

Share

Entertainment Video Creater Who Define The Real Meaning of Fun. This is the official YouTube channel

30/05/2026

सबसे ताकतवर प्रवासी मज़दूर को अचानक सुपरपावर मिल जाती है!
Sabse takatvar pravasi mazdoor ko achanak superpower mil jaati hai...........
゙ン

The strongest migrant worker suddenly gains superpowers

21/05/2026

I got over 100 reactions on one of my posts last week! Thanks everyone for your support! 🎉

17/05/2026

70 साल में तबाह होकर भी तबाही नहीं दिखती,
ये चमचागिरी है जनाब इसकी दवाई नहीं बिकती,
👁❗👁

17/05/2026

बिहार में जमीन मामलों के निपटारे को लेकर अभियान होगा शुरू, 30 जून तक 48 हजार लंबित ई-मापी मामलों को किया जाएगा खत्म, 31 मई तक लंबित आवेदनों को ऑनलाइन अपलोड करने का आदेश, राजस्व मंत्री दिलीप जायसवाल ने अधिकारियों को दिए निर्देश

Dilip Jaiswal

14/05/2026

आज शाम 07 बजे से 07:15 बजे तक हवाई हमला से बचाव हेतु ब्लैकआउट का पूर्वाभ्यास किया जाएगा।

11/05/2026

बंगाल की नई BJP सरकार ने
सत्ता संभालते ही
सीमा सुरक्षा पर बड़ा कदम उठाया है। 🇮🇳

मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने घोषणा की है कि
भारत-बांग्लादेश सीमा पर फेंसिंग के लिए
BSF को जमीन हस्तांतरण की प्रक्रिया
तेजी से पूरी की जाएगी।

उन्होंने कहा कि
अगले 45 दिनों के भीतर
पूरा भूमि हस्तांतरण पूरा कर लिया जाएगा,
ताकि सीमा पर बाड़बंदी का काम
रफ्तार पकड़ सके।

BJP ने इसे
अपने प्रमुख चुनावी वादों में शामिल किया था
और अब सरकार बनने के साथ ही
उस पर अमल शुरू हो गया है।

सुवेंदु अधिकारी के मुताबिक,
“जमीन उपलब्ध होते ही
BSF तेजी से फेंसिंग का कार्य पूरा करेगी
और अवैध घुसपैठ पर
कम समय में प्रभावी नियंत्रण संभव होगा।”

बंगाल चुनाव में
अवैध घुसपैठ और सीमा सुरक्षा
सबसे बड़े राजनीतिक मुद्दों में रहे।
BJP लगातार आरोप लगाती रही कि
सीमा पर फेंसिंग का काम
पिछली सरकार के दौरान
राजनीतिक कारणों से धीमा पड़ा।

बांग्लादेश से लगने वाली
बंगाल की लंबी सीमा का
एक बड़ा हिस्सा अब भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं है।

नई सरकार अब
सीमा सुरक्षा को
अपनी शीर्ष प्राथमिकताओं में दिखा रही है।

संकेत साफ हैं —
बंगाल में अब
घुसपैठ और बॉर्डर सिक्योरिटी पर
कड़ा रुख देखने को मिल सकता है। 🔥

11/05/2026

आज बात बिहार की उस महिला नेता की… जिसकी शादी 1990 में महज़ 16 वर्ष की उम्र में हुई… और साल 2000 में 26 वर्ष की उम्र में वह विधवा हो गई।

यह कहानी है पूर्णिया की… यह कहानी है संघर्ष, भय, राजनीति, बाहुबल, हत्या और एक महिला के टूटकर भी न टूटने की।

यह कहानी है Leshi Singh की!

जिस उम्र में लड़कियाँ स्कूल, कॉलेज, सपनों और सहेलियों की दुनिया में खोई रहती हैं, उस उम्र में उनकी शादी कर दी गई उस दौर में आज की स्थिति नहीं थी शादी कब होगी किधर होगी और किससे होगी यह पूछने का अधिकार समाज ने परिवार ने अपनी बहन बेटी को नहीं दिया था।

वह पूर्णिया के उस दौर में बहू बनकर आईं, जहाँ राजनीति सिर्फ चुनाव नहीं थी… वर्चस्व की लड़ाई थी। गोलियों की आवाज़ थी… बाहुबल था… दुश्मनी थी… और हर दिन मौत का साया था।

लेशी सिंह का जन्म 1974 में एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ, जो मूल रूप से कटिहार का था, लेकिन रोज़गार और जीविकोपार्जन के लिए पूर्णिया आकर बस गया था।

1990 में महज़ 16 वर्ष की आयु में उनका विवाह मधुसूदन उर्फ बूटन सिंह से हुआ। उस दौर में बूटन सिंह पूर्णिया के बड़े बाहुबली नामों में गिने जाते थे लेकिन विवाह के बाद बूटन सिंह ने बाहुबल से राजनीति की ओर रुख किया।

1995 में उन्होंने धमदाहा विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा, लेकिन RJD के दिलीप यादव से हार गए।
हार के बाद उन्होंने नीतीश कुमार की समता पार्टी का दामन थाम लिया और पूर्णिया के जिलाध्यक्ष बने। धीरे-धीरे वे राजनीति में पूरी तरह सक्रिय हो गए। क्षेत्र में उनका प्रभाव लगातार बढ़ रहा था। इसी बढ़ते प्रभाव को देखकर षड्यंत्रपूर्वक उन्हें पुराने मामलों में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।

समय बीतता गया। साल 2000 आया और बिहार विधानसभा चुनाव की घोषणा हुई। बूटन सिंह जेल में थे। ऐसे में उन्होंने अपनी पत्नी लेशी सिंह को चुनाव लड़ाने का फैसला किया।

अब लेशी सिंह को राजनीति की कोई विशेष समझ नहीं थी। घर-परिवार की जिम्मेदारियों से ही फुर्सत नहीं मिलती थी। उम्र भी महज़ 26 वर्ष थी लेकिन पति के कहने पर वे समता पार्टी से चुनाव मैदान में उतरीं।

और जब नतीजे आए… तो सब चौंक गए।

लेशी सिंह चुनाव जीत चुकी थीं।

यह सिर्फ एक जीत नहीं थी, बल्कि यह संदेश था कि बूटन सिंह का प्रभाव जेल की सलाखों के पीछे भी कायम था। क्षेत्र में उनकी चर्चा होने लगी। विरोधी खेमे में बेचैनी थी। बूटन सिंह का बढ़ता राजनीतिक वर्चस्व विरोधियों को खटकने लगा था।

लेकिन नियति ने अभी एक और बड़ा वार बाकी रखा था।
19 अप्रैल 2000 को बूटन सिंह को पेशी के लिए पूर्णिया कोर्ट लाया गया वहीं पहले से घात लगाए अपराधियों ने गोलियों से भूनकर उनकी हत्या कर दी।

इस घटना ने पूरे बिहार की राजनीति को हिला दिया था।
राबड़ी सरकार पर सवाल उठने लगे। नीतीश कुमार पूर्णिया पहुँच चुके थे। सार्वजनिक मंच से उन्होंने राबड़ी देवी से इस्तीफे की माँग की। वहीं नेता प्रतिपक्ष सुशील मोदी ने राज्यपाल से सरकार बर्खास्त करने की माँग कर दी।

राजनीति अपने रास्ते चल रही थी… लेकिन इन सबके बीच सबसे ज्यादा टूटी थी लेशी सिंह।

जिस महिला ने अभी राजनीति समझना शुरू ही किया था… उसके सिर से पति का साया उठ चुका था।एक तरफ गोलियों से छलनी पति की लाश… दूसरी तरफ छोटे बच्चे के सिर से पिता का साया छिन जाने का दर्द… और उसके साथ पति के सपनों, धमदाहा की राजनीति और राजनीतिक विरासत को बचाने की जिम्मेदारी आगे दुश्मनों से भरी राजनीति खड़ी थी।

विरोधियों को लगा अब यह महिला खत्म हो जाएगी।
लेकिन शायद उन्होंने एक माँ, एक पत्नी और एक जिद्दी महिला की ताकत को कम समझ लिया था।

साल 2005 आया इस साल बिहार में दो बार विधानसभा चुनाव हुए फरवरी 2005 के चुनाव में लेशी सिंह जीत गईं, लेकिन अक्टूबर 2005 के चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा।

विरोधियों में खुशी की लहर थी उन्हें लगा कि बूटन सिंह की हत्या के बाद उठी सहानुभूति लहर में लेशी सिंह फरवरी का चुनाव जीत गई थीं और अब उनकी राजनीति खत्म हो चुकी है।

लेकिन असली कहानी यहीं से शुरू होती है।

यह उस महिला की कहानी है… जिसे राजनीति विरासत में नहीं मिली थी, बल्कि परिस्थितियों ने राजनीति में धकेल दिया था। यह हार निश्चित रूप से उनके लिए बड़ा झटका थी लेकिन तब तक नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री बन चुके थे उन्होंने लेशी सिंह को बिहार राज्य महिला आयोग का अध्यक्ष बनाया लेशी सिंह ने हार के बाद खुद को टूटने नहीं दिया उन्होंने लोगों से सहानुभूति की भीख नहीं माँगी भावनात्मक राजनीति नहीं की वे लगातार क्षेत्र में सक्रिय रहीं। लोगों के सुख-दुख में खड़ी रहीं मेहनत करती रहीं। जनता के बीच रहती रहीं एक महिला होने को उन्होंने कभी अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया धीरे-धीरे उन्होंने खुद को फिर से खड़ा किया और 2010 में ऐसी वापसी की कि फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा।

आज वही महिला छह बार विधायक बन चुकी हैं। 2014 से लगातार मंत्री पद संभाल रही हैं। सीमांचल की राजनीति में उन्हें लोग “Iron Lady” तक कहते हैं।

आज जब बड़े-बड़े बाहुबली और प्रभावशाली नेता भी चुनाव लड़ने के लिए ऐसी सीट खोजते हैं, जहाँ उनकी जाति का एकमुश्त वोट आसानी से जीत दिला दे, वहाँ लेशी सिंह की राजनीति अलग दिखाई देती है राजनीतिक कद बढ़ने, मंत्री बनने और लंबे अनुभव के बावजूद उन्होंने कभी अपने लिए “सुरक्षित सीट” नहीं खोजी
वह उसी धमदाहा विधानसभा में डटी रहीं, जिसकी कल्पना कभी बूटन सिंह ने की थी।

उस क्षेत्र में उनके स्वजातीय वोटर मात्र पाँच से सात हजार के आसपास माने जाते हैं, लेकिन सेवा, संघर्ष, समर्पण और लगातार जनता के बीच रहने की राजनीति ने उन्हें हर जाति और हर वर्ग में ऐसी स्वीकार्यता दी कि वे हर परिस्थिति में जीत दर्ज करती रहीं।

आज जब राजनीति लगातार जातीय गणित में सिमटती जा रही है, तब लेशी सिंह ने यह साबित करता है कि जनता का भरोसा किसी भी जातीय समीकरण से बड़ा होता है।

बिहार की राजनीति में संघर्ष, सेवा और समर्पण की ऐसी मिसालें बहुत कम देखने को मिलती हैं।

राजपूत समाज में उन महिलाओं को, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में संघर्ष कर अपनी पहचान बनाई हो, वीरांगना कहा जाता है।

लेशी सिंह निस्संदेह इस उपाधि की प्रबल दावेदार हैं।

✍️अभिषेक कुमार सिंह

10/05/2026

सुवेन्दु अधिकारी बने पश्चिम बंगाल के 9वें एवं पहले बीजेपी मुख्यमंत्री

09/05/2026

सुरक्षित बंगाल, सशक्त भारत! 🇮🇳
सुवेंदु अधिकारी के मुख्यमंत्री बनने के बाद का पहला संकल्प: बंगाल की सीमाओं को सुरक्षित करना। 600 एकड़ जमीन BSF को सौंपने और तत्काल बाड़ लगाने की फाइल पर हस्ताक्षर के साथ एक नए युग की शुरुआत। गृह मंत्री अमित शाह जी ने भी इस ऐतिहासिक कदम की पुष्टि की है।

09/05/2026

जिसकी प्रतीक्षा करोड़ो बगालिया का वर्षा से थी, अब वो जा के पूर्ण हुआ है। माननीय प्रधानमंत्री श्री Narendra Modi जी का वह स्नेहपूर्ण आशीर्वाद और उनके नेतृत्व में माननीय मुख्यमंत्री श्री Suvendu Adhikari जी का अटूट संकल्प यह दृश्य केवल राजनीति नहीं, बल्कि बंगाल की जनता के संघर्ष की जीत को दर्शाता है

Website