Awara PD
Hatha yoga instructor by profession and Awara by soul..
plz improve your stuff. Otherwise sell it only for non sitting… not for serious practitioners
09/11/2023
Letter To Myself
डर तो बहुत था। काम जैसे शुरू किया था, वैसा कुछ नहीं बचा था, जिनके साथ था, वो साथ नहीं थे। सब नौटंकी। लेकिन मायने ये नहीं रखता... मायने रखते हो ‘तुम’ खुद। क्योंकि जवाबदेही खुद से है। प्रो. आनंद प्रधान की मुझे एक बात याद थी और रहेगी… कि ‘मीडिया में गिर तो हर कोई रहा है पर जो गिरने के पैमाने तय कर लेगा… थोड़ा बचेगा।’, कुछ ऐसा उन्होंने एक क्लास में कहा था।
हमेशा की तरह से तुम्हारा ही रंग तुम पर तारी रहना चाहिए। ‘अबे नौ साल की नौकरी क्यों छोड़ रहा है। इतना टाइम दिया, काम पसंद नहीं है, तो काम बदल खुद को क्यों बदल रहा है?’ ऐसे सवाल मैं खुद से रोज पूछता था। देख रहा था कि क्या समझकर शुरू किया, क्या हो गया। रोज घर जाकर रात-रात भर सोचना, कब तक... और क्यों? क्या ‘अजगर का लोमड़ी को निगलना ज्यादा जरूरी खबर थी, या फिर दिल्ली के पेड़ों का कटना ज्यादा बड़ी खबर है।‘ जवाब मिलता था, पर मैं डरता था। डरपोक...
सैलरी आ तो रही है। जी तो रहा है। घर चल तो रहा है। बुलट में पेट्रोल पड़ तो रहा है। क्या चाहिए... किसको पड़ी है कि तेरे को क्या दिखता है, सिवाए तेरे। लेकिन भूल तो खुद को ही रहा था। प्रॉब्लम ये थी। रूमी कहता है सबसे पहले वो जो अपनी जड़ों से जुदा होते हैं उनका हाल बुरा होता है।
कितना मिलेगा, कैसे करेगा, पैसे कैसे आएंगे, खायेगा क्या, घरवाले, फ्लैट, महंगा आईफोन, अबे वुडलैंड के जूते, कुछ नहीं होगा। खत्म... पार्टी ओवर।
09/11/2023
Letter To Myself
डर तो बहुत था। काम जैसे शुरू किया था, वैसा कुछ नहीं बचा था, जिनके साथ था, वो साथ नहीं थे। सब नौटंकी। लेकिन मायने ये नहीं रखता, मायने रखते हो ‘तुम’ खुद। क्योंकि जवाबदेही खुद से है। प्रो. आनंद प्रधान की मुझे एक बात याद थी और रहेगी.कि ‘मीडिया में गिर तो हर कोई रहा है पर जो गिरने के पैमाने तय कर लेगा थोड़ा बचेगा।’, कुछ ऐसा उन्होंने एक क्लास में कहा था। हमेशा की तरह से तुम्हारा ही रंग तुम पर तारी रहना चाहिए। ‘अबे नौ साल की नौकरी क्यों छोड़ रहा है। इतना टाइम दिया, काम पसंद नहीं है, तो काम बदल खुद को क्यों बदल रहा है?’ ऐसे सवाल मैं खुद से रोज पूछता था। देख रहा था कि क्या समझकर शुरू किया, क्या हो गया हूं। रोज घर जाकर रात-रात भर सोचना, कब तक, और क्यों? क्या ‘अजगर का लोमड़ी को निगलना ज्यादा जरूरी खबर थी, या फिर दिल्ली के पेड़ों का कटना ज्यादा बड़ी खबर है।‘ जवाब मिलता था, पर मैं डरता था। सैलरी आ तो रही है। जी तो रहा है। घर चल तो रहा। बुलट में पेट्रोल पड़ तो रहा। क्या चाहिए, किसको पड़ी है कि तेरे को क्या दिखता है, सिवाए तेरे। लेकिन भूल तो खुद ही रहा था। प्रॉब्लम ये थी।कितना मिलेगा, कैसे करेगा, पैसे-कैसे, खायेगा क्या, घरवाले, महंगा आईफोन, अबे वुडलैंड के जूते, कुछ नहीं होगा। खत्म, पार्टी ओवर।
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