Ak.chhonkar
ओज कवयित्री अंशु छौंकर "अवनी" (आगरा)
कवि सम्मेलन, मंच संचालन, संयोजन,लेखिका इत्यादि
07/13/2025
हम पर्वत की पुकार हैं,
वे घाटी के वासी हैं;
वन में ही वे गृही और
गृह में भी हम संन्यासी हैं।
वे कर लेते बन्द खिड़कियाँ
डर कर तेज हवाओं से;
झंझाओं में पंख खोल
उड़ने के हम अभ्यासी हैं।।
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
वन्देमातरम 🙏🇮🇳🙏
#चौ, अंशु छौंकर 'अवनी'
06/07/2025
#अहिंसा_परमो_धर्मः
भरे हिंसा जो नस्लों में उसे व्यवहार मत मानो,
खून से हाथ रंग कर दे उसे उपहार मत मानो।
काट बकरे की गर्दन को ईद का करते हैं सजदा
पशु हत्या कर खाते हों उसे त्यौहार मत मानो।।
जो हिंसा को बढ़ावा दे वह कभी त्यौहार नहीं हो सकता
किसी को भोजन करवाकर जो आत्मा की तृप्ति मिलती है उसी पुण्य का नाम त्यौहार है किसकी हत्या करने का नहीं।
यह सब बंद होना चाहिए..., हम किसी को जीवन दे नहीं सकते, तो किसी का भी जीवन लेने का अधिकार किसी इंसान को कैसै हो सकता है__
इस फोटो में मासूम से जानवर बच्चे को देख कर
आप भी इस बात पर विचार करियेगा.. (प्रेम सर्वश्रेष्ठ)
आपकी लाडली अंशु छौंकर 'अवनी' '
्री_राम🙏🚩🙏
06/04/2025
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#सैनिक_के_परिवार_का_बलिदान*
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सुमिर रहे हैं! हम अपनी भारत माता के फर्जों को,
याद रखेंगे हर पल ही वीरों की कोख के कर्जों को।
प्रेम रोग के घावों पर तो मरहम नहीं कर सकती मैं,
देशद्रोह गद्दारों को कभी नमन नहीं कर सकती मैं!...
1. रात अमावस की काली
सरहद पर द्वीप जलाते हैं,
हिमगिरि की शाखाओं पर
नाखूनों से चढ़ जाते हैं।
बचपन में गाई माता की
लोरी सुन सो जाते हैं,
कभी नूर-हूर की मीठी-मीठी
यादों में खो जाते हैं।
वीर शिवाजी, भगत सिंह,
और राणा के यह बेटे हैं,
कफन बांध केसरिया सिर
पर मौत के मुंँह में लेटे हैं।
इस मातृभूमि की रक्षा में अपना सर्वस्व लुटाएंगे,
भारत मांँ के लाल हैं ये सीने पर गोली खाएंगे।
वीरों की जान की आहुति से हवन नहीं कर सकती मैं,
देशद्रोह गद्दारों को कभी नमन नहीं कर सकती मैं!!....
2. देख सजन के पार्थिव रूप
वो जीते -जी मर जाती है,
अग्नि के पावन फेरों को
मन ही मन विसराती है।
छम-छम कर के आंँगन में
पायल के स्वर बोले होंगे,
इन महावर वाले पैरों से
कैसे बिछुआ खोले होंगे।
इस माथे की बिंदिया पर
चुंंबन हर बार किया होगा,
नलिनी जैसे अधरों का भी
तो रसपान किया होगा।
हाथों का चूड़ा-टूटा तो
सूरज भी रोया होगा,
वज्र कलेजा करके किसने
मांँग सिंदूर धोया होगा।
कोख में पलते कुल दीपक से पित्र नमन करवाती है;
अर्थी को कांधा देकर के धरती का बोझ सह जाती है।
ऐसे सतित्व की कुर्बानी को दफन नहीं कर सकती मैं,
देशद्रोह गद्दारों को कभी नमन नहीं कर सकती मैं!....
3. माता तो पथराई आंखों
से कैसे रोई होगी,
सूखे में सुला कर बेटे को
जो गीले में सोई होगी।
गंगा जैसी धार का तब
सूखा आंचल उमड़ा होगा,
पिता की आंखों का तारा
जब झंडे में लिबड़ा होगा।
बिन मौसम बादल बरसे और
घर बिजली पर टूट गई,
थी एक बुढ़ापे की लाठी
बाबुल के हाथ से छूट गई।
खोल बहन की राखी को
सब बंधन तोड़ दिए होंगे।
पर्वत और पठारों ने भी
रस्ता छोड़ दिए होंगे।
सीने पर पत्थर रख कर हर दर्द को मैं सह जाती हूँ,
इन शब्दो के जरिए से मैं अंगारों को कह जाती हूँ।
वीरों की गाथाएंँ लिखना बंद नहीं कर सकती मैं,
देशद्रोह गद्दारों को कभी नहीं नमन नहीं कर सकती मैं।।
हांँ नमन नहीं कर सकती मैं....!
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✍️ अंशु छौंकर 'अवनी' 🇮🇳🙏
#वंदे_मातरम िंद ारत
01/03/2025
भयंकर सर्दी_
Radhe radhe🙏
10/31/2024
"समस्त भारतवासियों को दिवाली की हार्दिक🙏🏻
🪔🌹🚩 शुभकामनाएं एवं बहुत-बहुत बधाई"🚩🌹🪔
पलकें भी झुक जाती है ये सूरज के दीदार में,
कोई तो भक्ति में झुकते कोई झुकते प्यार में।
हर घर आशा के दिए जलें खुशियों की हो दिवाली...
त्योहारों की खातिर ईश्वर बिक जाते बाजार में।।
आपकी लाडली अंशु छौंकर 'अवनी' आगरा🙏
🚩🙏🏻जय श्री सिया राम🙏🏻🚩
09/14/2024
मात भारती के मांथे चमके जो बिंदी।
एक मात्र भाषा ही नहीं वो "माँ " है हिंदी....!!
(गर्व से कहिए ...कि हम हिंद वासी हैं और हिंदी भाषी है)
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