Point View

Point View

Share

Contact information, map and directions, contact form, opening hours, services, ratings, photos, videos and announcements from Point View, Digital creator, Sitapur.

हमारा उद्देश्य आम नागरिक तक निशुल्क कानूनी जानकारी /सहायता पहुँचाना है! इस पेज पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय, माननीय उच्च न्यायालय, राष्ट्रीय हरित अभिकरण,उपभोक्ता आयोग, बाल अधिकार समिति से सम्बंधित आदेश उपलब्ध रहेंगे!धन्यवाद 🖋️

27/07/2026

गुरु दर्शन को जाइये तज के सब अभिमान!
ज्यों ज्यों पग आगे धरय कोटिन यज्ञ समान!!
गुरु पूर्णिमा पर्व की आप सभी को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनायें!साहिब बंदगी 🙏❤️
#साहिबबंदगी #सत्यसाहिब #सत्यवचन #मधुपरमहंस #साहिबजी #रांजड़ीवाले #जम्मू

24/07/2026

CJI सूर्यकांत ने कोर्ट में बिना याचिका दाखिल किए कोर्ट आने वाले वकीलों की आलोचना की-

CJI ने सम्पूर्ण जानकारी के बिना खबर चलाने पर मीडिया की भी आलोचना की-

CJI ने छात्रों के प्रदर्शन मामले पर कहा -

हमारे सामने एक पन्ने की भी याचिका नहीं थी , मिश्रा नाम के वकील अचानक खड़े हो गए , हमने मना किया तो मीडिया ने खबर चलाई SC सुनना नहीं चाहता !!

24/07/2026

फर्जी जाति प्रमाणपत्र के आधार पर मिली आरक्षित नौकरी शुरू से ही अवैध, बर्खास्तगी से पहले विभागीय जांच जरूरी नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट! इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि यदि किसी व्यक्ति ने फर्जी और जाली जाति प्रमाणपत्र के आधार पर आरक्षित श्रेणी की सरकारी नौकरी हासिल की है, तो उसकी नियुक्ति शुरू से ही (Void Ab Initio) अवैध मानी जाएगी। ऐसी स्थिति में कर्मचारी को सेवा से हटाने से पहले विभागीय अनुशासनात्मक जांच (Departmental Inquiry) या आरोपपत्र (Charge-sheet) जारी करना आवश्यक नहीं है। केवल कारण बताओ नोटिस (Show Cause Notice) देना पर्याप्त होगा। जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस विवेक सरन की खंडपीठ ने कहा कि "धोखाधड़ी सभी वैधानिक कार्यों को निष्प्रभावी कर देती है। फर्जी जाति प्रमाणपत्र के आधार पर प्राप्त नियुक्ति संविधान के प्रावधानों के विपरीत होने के कारण शुरू से ही अवैध और अस्तित्वहीन (Non-est) होती है।" क्या था मामला? उत्तर प्रदेश जेल विभाग में एक व्यक्ति को वर्ष 1992 में अनुसूचित जनजाति (ST) श्रेणी के तहत बंदी रक्षक (Bandi Rakshak) नियुक्त किया गया था। नियुक्ति के लिए उसने खुद को 'लोध' जाति का बताते हुए जाति प्रमाणपत्र प्रस्तुत किया। वर्ष 2007 में दस्तावेजों के सत्यापन के दौरान जिला मजिस्ट्रेट, लखनऊ ने बताया कि ऐसा कोई जाति प्रमाणपत्र कभी जारी ही नहीं किया गया था। वहीं, उसके पैतृक गांव में जांच में पता चला कि वह 'लोध' नहीं बल्कि 'लोधी' जाति का है और प्रस्तुत प्रमाणपत्र पूरी तरह फर्जी एवं जाली था। इसके बाद विभाग ने उसे कारण बताओ नोटिस जारी किया। हालांकि, वह व्यक्तिगत सुनवाई में भी उपस्थित नहीं हुआ। अंततः 28 नवंबर 2007 को उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। एकल न्यायाधीश ने पहले बर्खास्तगी रद्द कर कर्मचारी को राहत दी थी। लेकिन राज्य सरकार की अपील पर खंडपीठ ने उस फैसले को पलट दिया। खंडपीठ ने कहा कि जब नियुक्ति ही धोखाधड़ी और फर्जी दस्तावेजों के आधार पर प्राप्त की गई हो, तो वह शुरू से ही शून्य (Void Ab Initio) होती है। ऐसे मामले में अनुच्छेद 311 के तहत मिलने वाली सुरक्षा या पूर्ण विभागीय जांच का अधिकार लागू नहीं होता। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के R. Vishwanatha Pillai v. State of Kerala फैसले का हवाला देते हुए कहा कि फर्जी जाति प्रमाणपत्र के आधार पर नौकरी पाने वाला व्यक्ति वैध रूप से उस पद पर नियुक्त माना ही नहीं जा सकता।देरी का लाभ नहीं मिलेगा कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि धोखाधड़ी के मामलों में देरी (Delay) कार्रवाई को अवैध नहीं बनाती। यदि वर्षों बाद भी फर्जीवाड़ा सामने आता है, तो सरकार कार्रवाई कर सकती है क्योंकि Fraud vitiates everything और ऐसे मामलों में समय-सीमा (Limitation) लागू नहीं होती। इन्हीं टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की अपील स्वीकार करते हुए एकल न्यायाधीश का फैसला रद्द कर दिया और कर्मचारी की बर्खास्तगी को बरकरार रखा। हालांकि, अदालत ने कहा कि अपील लंबित रहने के दौरान कर्मचारी को जो वेतन और अन्य लाभ मिल चुके हैं, उनकी वसूली नहीं की जाएगी।

23/07/2026

🤣🤣 मैं क्या सब समझ चुके हैं!अब आप कुछ भी कर लीजिये लेकिन जो साख आपकी सवर्णो ने बनाई थी!वह अब कभी नहीं बन पायेगी!क्योंकि शिला से पत्थर अलग होकर नीचे की ओर लुढ़क चुका है! 🤣🤣

21/07/2026

"ध्यान ही वेद शास्त्र कहत हैं ध्यान संत बखाना!"हाँ! वेदों एवं उपनिषदों में ध्यान के महातम की ओर इशारा किया गया है! ध्यान को ही संतो ने भी बताया है!वास्तव में ध्यान कोई मामूली सी वस्तु या चीज नहीं है!उदाहरण स्वरुप आप देखते हैं तो पाते हैं कि किसी से बात करते समय उसका ध्यान आपकी ओर नहीं था तो आप कहते नहीं कि कहाँ हो तुम्हारा ध्यान कहाँ है?ठीक वैसे ही अभी आपका ध्यान इन्द्रियों के वशीभूत होकर दुनियाबी चीजों में फैला हुआ!आप के न चाहते हुये भी! फिर क्या करें? ध्यान कैसे करें?एकाग्रता बड़ी चीज है! आज आप लोग ध्यान करिए और फिर बताइए कमेंट बॉक्स में कि आपने क्या देखा? कैसा प्रतीत हुआ? आप कितनी देर ध्यान कर सके? 🧿🧘‍♂️

21/07/2026

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिछले हफ़्ते उत्तर प्रदेश सरकार पर ₹1,00,000 का जुर्माना लगाया। यह जुर्माना कुछ पुलिस अधिकारियों की लापरवाही के कारण लगाया गया, जिससे ज़मानत अर्ज़ी पर फ़ैसला होने में देरी हुई और एक व्यक्ति को 15 दिन ज़्यादा जेल में रहना पड़ा। जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की बेंच ने आदेश दिया कि यह जुर्माना राशि ज़मानत मांगने वाले व्यक्ति को दी जाए। हालाँकि, राज्य सरकार को यह छूट दी गई कि वह जाँच के बाद दोषी अधिकारियों से यह राशि वसूल सकती है।कोर्ट ने यह आदेश अमित नाम के व्यक्ति को ज़मानत देते हुए दिया। अमित को BNS और POCSO Act के तहत रेप और अपहरण के मामले में 20 मार्च, 2026 से जेल में रखा गया। इस मामले की सुनवाई 8 जुलाई, 2026 को हुई थी। उस दिन AGA ने निर्देश लेने के लिए और समय माँगा, क्योंकि हाईकोर्ट के जॉइंट डायरेक्टर ऑफ़ प्रॉसिक्यूशन के ऑफ़िस से बार-बार याद दिलाने के बावजूद निर्देश नहीं मिले थे। गोरखपुर से जुड़े कई मामलों में निर्देशों में लगातार देरी होने का गंभीरता से संज्ञान लेते हुए हाईकोर्ट ने गोरखपुर के सीनियर सुपरिटेंडेंट ऑफ़ पुलिस (SSP) को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का निर्देश दिया था।कोर्ट के सामने पेश होकर SSP डॉ. कौस्तुभ ने एक व्यक्तिगत हलफ़नामा दायर किया। इसमें बताया गया कि निर्देशों के लिए सूचना तुरंत संबंधित पुलिस स्टेशन को भेज दी गई। देरी की आंतरिक जाँच के बाद बांसगाँव पुलिस स्टेशन के SHO पंकज कुमार सिंह, सब-इंस्पेक्टर सर्वेश कुमार और कॉन्स्टेबल रमेश यादव को लापरवाह पाया गया और बाद में उन्हें पुलिस लाइन्स भेज दिया गया। SSP ने कोर्ट से बिना शर्त माफ़ी माँगी और बताया कि गोरखपुर के सभी सर्कल ऑफ़िसरों और स्टेशन हाउस ऑफ़िसरों (SHOs) को नए निर्देश जारी किए गए। इन निर्देशों में ज़मानत के मामलों में समय पर जानकारी/निर्देश देने के DGP के सर्कुलर का सख्ती से पालन सुनिश्चित करने को कहा गया।SSP की बात मानते हुए कोर्ट ने कहा: "...यह साफ़ है कि गोरखपुर के सीनियर सुपरिटेंडेंट ऑफ़ पुलिस के पर्सनल हलफ़नामे में बताए गए कुछ पुलिस अफ़सरों की लापरवाही की वजह से यह ज़मानत अर्ज़ी 01.07.2026 को निपटाई नहीं जा सकी, और इसे आज ही अर्ज़ी देने वाले को ज़मानत पर रिहा करके निपटाया जा सका।" बेंच ने कहा, "इसलिए यह साफ़ है कि कुछ पुलिस अफ़सरों की लापरवाही की वजह से... अर्ज़ी देने वाला 15 दिनों से ज़्यादा समय तक जेल में रहा।बेंच ने राज्य सरकार पर 1,00,000 रुपये का जुर्माना लगाया, जो अर्ज़ी देने वाले को दिया जाना है। केस के तथ्यों पर गौर करते हुए बेंच ने पाया कि हालांकि शिकायतकर्ता की बेटी को बहला-फुसलाकर ले जाने का आरोप था, लेकिन पीड़िता ने BNSS की धारा 180 और 183 के तहत दर्ज अपने बयान में साफ़ तौर पर कहा कि वह खुद घर से निकली थी, क्योंकि वह अर्ज़ी देने वाले के साथ रिश्ते में थी। बेंच को यह भी बताया गया कि अर्ज़ी देने वाले ने पीड़िता के साथ कुछ भी गलत नहीं किया था और उसका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है। आखिर में, यह बताया गया कि इस मामले में चार्जशीट दाखिल की जा चुकी है। इसलिए अर्ज़ी देने वाले से कस्टडी में पूछताछ की कोई ज़रूरत नहीं है, जो 20 मार्च, 2026 से जेल में है। इन हालात को देखते हुए कोर्ट ने उसे ज़मानत दी।

20/07/2026

स्थिति कुछ ठीक नहीं चल रही है सोशल मीडिया से जानकारी में आया कि मेरठ में एक स्कूल संचालक की पत्नी ने वैन चालक के साथ मिलकर नींद की गोलियां दी फिर सपेरा से मिलकर सांप से अपने पति को डसवा दिया! पुलिस ने शक्ति से पूछा तो मामला कबूल लिया गया! सिर्फ 20 लाख रुपए के लिए पत्नी ने अपने पति की हत्या कर दी! सुनने में आया है कि अब वह कह रही है मर गया तो अच्छा हुआ! अभी इससे पहले भी आप लोगों ने सोशल मीडिया के माध्यम से सुना होगा की नीले ड्रम में अपने पति को हत्या करके भरवा दिया था! पूर्वोत्तर में भी पहाड़ी से धक्का देकर एक पत्नी द्वारा अपने पति की हत्या करवा दी गई! न्यूज़ चैनल एवं सोशल मीडिया के माध्यम से इस तरीके के मामले जानकारी में आते हैं तो पता चलता है कि बहुत खराब स्थिति चल रही है! अभी लखनऊ में आप लोगों ने सोशल मीडिया के माध्यम से खबर सुनी होगी कि एक वैन चालक ने अनैतिक कार्य को अंजाम दिया! बिसवां नगर में आज एक मित्र से मुलाकात हुई जो कि अध्यापक है! मैंने उनसे पूछा क्या हाल-चाल चल रहा है यहां कैसे खड़े हो किसी का इंतजार कर रहे हो लखनऊ से कोई आ रहा है! तो उन्होंने अपना समझ के बताया कि उनके स्कूल की कक्षा 7 की एक लड़की भाग गई है जो कि अभी नाबालिक है और जिसके साथ भागी है वह लड़का भी नाबालिक है! इस लड़की का टी सी प्रमाण पत्र लेने दरोगा जी लखनऊ से आ रहे हैं उन्हीं को देने के लिए यहां खड़े हैं! लड़की बाल निकेतन में है और लड़का दुर्भाग्यवश जेल में है! जबकि लड़का भी अभी नाबालिक है! खैर यह बातें तो आम मनुष्यों की हो गई! अब बात करते हैं ऋषि मुनियों की जहां तक मेरी जानकारी है की काम की वेदना से ऋषि मुनि भी नहीं बच सके! श्रँगी ऋषि जिन्होंने निश्चय किया था कि शरीर को लकड़ी बना दूंगा किंतु कामवासना को नहीं आने दूंगा! श्रँगी ऋषि तप किया करते थे कंधराओं में अन्न जल को त्याग कर मात्र वायु को ही ग्रहण करते थे! काफी समय तप किया शरीर से रक्त और मांस नष्ट हो गया सिर्फ हड्डियां ही बची थी! वायु के सहारे हुए तप करते जा रहे थे! गुफा से सिर्फ एक टाइम ही निकलते थे वायु ग्रहण करने के लिए,वायु ग्रहण करके फिर गुफा में चले जाते थे! बहुत विस्तृत दृष्टांत है वहां नहीं जाऊंगा! एक वेश्या थी उसने ऋषि जी का तपोबल छीड करने का निश्चय किया! गुफा के बाहर रोज आती और पेड़ के तने में चावल का माड लगाकर चली जाती!ऋषि भी रोज रोज वायु को ग्रहण करने के लिए गुफा से बाहर निकलते और वायु को ग्रहण करने के उपरांत फिर गुफा में चले जाते! एक दिन उन्हें पेड़ का तना कुछ चमकदार दिखाई दिया तो उन्होंने उसका रस लेने की ठानी फिर क्या था उन्होंने उसे चाट लिया! अब वह रोज उस तने को चाटने लगे जिससे धीरे-धीरे उनके शरीर को अन्न मिलने लगा शरीर में जल की अधिकता हुई और वीर्य भी बनने लगा! फिर क्या था शरीर पुष्ट हो गया! एक दिन शाम को वह तने को चाटने हेतु आए तो वह वेश्या भी खूब सज धज कर आई हुई थी! वह उस वेश्या पर मोहित हो गए! वेश्या ने अपनी शर्ते रखी! काम के वशी भूत होकर ऋषि ने हुए सभी शर्तें मान ली! मिलन हुआ संताने उत्पन्न हुई! तब तक ऋषि का तपोबल जा चुका था मोह भंग हुआ! लज्जित हुये भाग कर फिर कंधराओं में रहकर तप करने लगे!
कहने का तात्पर्य यह है कि जब ऐसे महान तपस्वियों को भी काम ने नहीं छोड़ा तो आम जनमानस की बात क्या!
काम प्रबल अति भयंकर महा दारुण दुख दार नाग किन्नर देवता ऋषि मुनि सबहि कीन्ह बेहाल!
बचीहौ एक उपाय सरनाम को पायकर!
स्वयं के विचार हैं!

20/07/2026

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अश्लील तस्वीरों के जरिए एक युवती को कथित रूप से ब्लैकमेल करने के आरोपी की जमानत याचिका खारिज करते हुए उसकी मानसिक जांच कराने का निर्देश दिया। कोर्ट ने आरोपी द्वारा भेजे गए आपत्तिजनक मैसेज और सोशल मीडिया पर की गई पोस्ट का अवलोकन करने के बाद कहा कि प्रथम दृष्टया वह स्वस्थ मस्तिष्क का व्यक्ति प्रतीत नहीं होता। जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकलपीठ ने मुख्य चिकित्सा अधिकारी, कौशांबी को आरोपी की मानसिक जांच कराकर उसकी रिपोर्ट संबंधित जिला अदालत के समक्ष प्रस्तुत करने का निर्देश दिया!कोर्ट ने कहा, "आरोपी द्वारा भेजे गए मैसेज और सोशल मीडिया पोस्ट का अवलोकन करने पर यह न्यायालय पाता है कि वह स्वस्थ मस्तिष्क का व्यक्ति प्रतीत नहीं होता। इसलिए मुख्य चिकित्सा अधिकारी, कौशांबी उसकी मानसिक जांच कराकर रिपोर्ट संबंधित जिला अदालत के अभिलेख पर प्रस्तुत करें।" मामला भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 64(1), 74, 351(2), 352 और 333, लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम (POCSO Act) की धारा 3 और 4 तथा सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (IT Act) की धारा 66ई के तहत दर्ज है। अभियोजन के अनुसार पीड़िता ने आरोप लगाया कि आरोपी ने किसी तरह उसका मोबाइल हैक कर उसकी अश्लील तस्वीरें हासिल कीं। इसके बाद वह उन तस्वीरों के आधार पर उसे लगातार ब्लैकमेल करने लगा और सोशल मीडिया के माध्यम से धमकियां भी देता रहा। इस मामले में आरोपी को गिरफ्तार किया गया, लेकिन जमानत पर रिहा होने के बाद उसने फिर से पीड़िता को धमकाना शुरू कर दिया। पीड़िता ने अपने बयान में कहा कि पहले दोनों के बीच संबंध थे लेकिन बाद में आरोपी ने उसकी अश्लील तस्वीरों और वीडियो का इस्तेमाल कर उसे ब्लैकमेल किया। उसने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर मैसेज भेजकर और प्राइवेट मैसेज के माध्यम से उससे पांच लाख रुपये की मांग की। जमानत की सुनवाई के दौरान आरोपी की ओर से कहा गया कि उसका पीड़िता के साथ प्रेम संबंध था और विवाह से इनकार करने पर उसे झूठे मामले में फंसाया गया। वहीं, राज्य सरकार और शिकायतकर्ता की ओर से अदालत में आरोपी द्वारा पीड़िता और उसके परिजनों को भेजे गए मैसेज तथा सोशल मीडिया पर साझा की गई तस्वीरें प्रस्तुत की गईं। रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि आरोपी अश्लील तस्वीरों और वीडियो के आधार पर पीड़िता को ब्लैकमेल कर रहा था। उसने न केवल पीड़िता को अत्यंत अश्लील और अभद्र मैसेज भेजे, बल्कि सोशल मीडिया पर उसकी कई तस्वीरें और वीडियो भी साझा किए। इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि संदेशों की भाषा, उनकी प्रकृति तथा सोशल मीडिया पर साझा की गई सामग्री को ध्यान में रखते हुए आरोपी को जमानत देने का कोई आधार नहीं बनता। इसके साथ ही कोर्ट ने उसकी जमानत याचिका खारिज कर मानसिक जांच कराने का आदेश दिया। ゚

19/07/2026

पहले पत्नियां अपने-अपने पतियों को कितना प्यार करती थी! पहले मांये अपने-अपने बेटे-बेटियों को कितना प्यार करती थी!पहले बेटे अपने-अपने पिता को कितना प्यार करते थे!
क्या आप जानते हैं? इसका क्या कारण था? स्कूलों में नैतिक शिक्षा पढ़ाई जाती थी और साथ ही टीवी पर धार्मिक/पारिवारिक दृश्य देखने समझने को मिला करते थे! और साथ ही अध्यात्मिक पुस्तके भी पढ़ने को मिल जाया करती थी पहले लोग बुद्धि जीवियों की इज्जत भी किया करते थे!लेकिन आज अगर आप बुद्धि जीवी हैं तो किसी के ठेंगे से होंगे उन्हें फर्क नहीं पड़ता क्योंकि आप के पास गाड़ी,पैसा और फिजूल दिखावा नहीं है! लोगों की नजर में आज बुद्धिजीवियों की डेफिनेशन (परिभाषा )ही बदल गयी है!
स्वयं!🖋️

19/07/2026

न्याय विभाग,कानून एवं न्याय मंत्रालय भारत सरकार द्वारा न्याय बंधु के रूप में शपथ गृहण किया!आभार!🧘‍♂️

Want your business to be the top-listed Media Company in Sitapur?
Click here to claim your Sponsored Listing.

Category

Telephone

Website

Address

Sitapur