GODISHALLAH

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14/01/2026

हज़रत हिज़्क़ील अलैहिस्सलाम की वाकया (कहानी)
कुरान में इस घटनाक्रम (कहानी) का संदर्भ:
अल्लाह ताला ने सूरह अल-बकराह (आयत 243) में फ़रमाया है:
> "क्या आपने उन लोगों को नहीं देखा जो मौत के डर से अपने घरों से निकल भागे थे, जबकि वे हज़ारों की तादाद में थे? फिर अल्लाह ने उनसे कहा: 'मर जाओ', फिर उन्हें ज़िंदा कर दिया। बेशक अल्लाह लोगों पर बड़ा फ़ज़्ल (अनुग्रह) करने वाला है, लेकिन अक्सर लोग शुक्र नहीं करते।"
>
घटनाक्रम(कहानी) का विवरण:
इतिहासकारों और मुफ़स्सिरों (जैसे इब्न इशाक और वहाब बिन मुनब्बिह) के अनुसार, हज़रत मूसा के उत्तराधिकारी युशा बिन नून के बाद हज़रत हिज़्क़ील (जिन्हें 'इब्नुल अज्यूज़' भी कहा जाता है) बनी इसराइल के नबी बने।
घटना का सारांश:
* मौत से भागना: एक बस्ती (जिसका नाम 'दावरदान' बताया जाता है) में ताऊन (प्लेग) की बीमारी फैल गई। वहाँ के हज़ारों लोग मौत के डर से अपनी बस्ती छोड़कर भाग निकले और एक खुले मैदान या घाटी में शरण ली।
* अल्लाह का हुक्म: उन्होंने सोचा कि वे सुरक्षित हैं, लेकिन अल्लाह ने उन्हें हुक्म दिया "मर जाओ", और वे सब के सब एक साथ मर गए। उनके चारों ओर बाड़ लगा दी गई ताकि दरिंदे उन्हें न खाएं, और लंबे समय तक वे वहीं पड़े रहे।
* हज़रत हिज़्क़ील का गुजरना: सदियों बाद हज़रत हिज़्क़ील अलैहिस्सलाम वहां से गुजरे। उन बिखरी हुई हड्डियों को देखकर वे अल्लाह की शक्ति पर विचार करने लगे।
* मोजिज़ा (चमत्कार): अल्लाह ने उनसे पूछा कि क्या वे इन्हें जीवित देखना चाहते हैं? उन्होंने कहा "हाँ"। तब अल्लाह के हुक्म से उन्होंने उन हड्डियों को पुकारा। हड्डियाँ एक-दूसरे से जुड़ने लगीं, उन पर मांस चढ़ा, नसें बनीं और फिर उनमें रूह (आत्मा) फूँक दी गई। वे सब "सुब्हानअल्लाह" कहते हुए खड़े हो गए।
* नतीजा: वे लोग अपनी बस्तियों में वापस लौटे, लेकिन उनके चेहरों पर मौत की पीलापन बाकी था और वे जब तक जीवित रहे, उनके कपड़ों से कफ़न जैसी महक आती थी।
प्रमुख सीख और हदीस का संदर्भ:
इस कहानी का सबसे बड़ा सबक यह है कि इंसान अपनी सावधानी से अल्लाह की तक़दीर (भाग्य) को नहीं टाल सकता।
लेख में हज़रत उमर रज़ियल्लाहु अन्हु का एक प्रसिद्ध वाकया भी शामिल है:
जब हज़रत उमर शाम (Syria) जा रहे थे और उन्हें पता चला कि वहां महामारी (ताऊन) फैली है, तो वे वापस लौट आए। उन्होंने अब्दुल रहमान बिन औफ़ से पैगंबर मोहम्मद (सल्ल.) की हदीस सुनी थी:
> "अगर तुम सुनो कि किसी ज़मीन पर वबा (महामारी) फैली है, तो वहां मत जाओ। और अगर तुम उस ज़मीन पर मौजूद हो जहाँ वबा फैल जाए, तो वहाँ से भागने के लिए बाहर मत निकलो।"
>
सारांश:
यह कहानी हमें सिखाती है कि:
* ज़िंदगी और मौत केवल अल्लाह के हाथ में है।
* बीमारी से भागना इंसान को मौत से नहीं बचा सकता अगर उसका वक्त आ गया हो।
* अल्लाह हर चीज़ को दोबारा ज़िंदा करने की पूरी ताक़त रखता है (पुनर्जन्म/क़यामत पर विश्वास)।

02/01/2026

हजरत इस्माइल (अ.स.) और 'जमजम' के प्रकट होने की वाक़या धैर्य, विश्वास और अल्लाह की रहमत की एक अद्भुत मिसाल है। सहीह बुखारी (हदीस संख्या: 3364) में इसका बहुत ही भावुक और विस्तृत वर्णन मिलता है।
🏜️ रेगिस्तान में हिजरत और अल्लाह पर भरोसा
अल्लाह के हुक्म से हजरत इब्राहिम (अ.स.) अपनी पत्नी हजरत हाजरा और अपने छोटे बेटे हजरत इस्माइल को लेकर मक्का की उस घाटी में पहुँचे, जहाँ उस समय न तो कोई इंसान था, न पानी और न ही कोई हरियाली।
जब इब्राहिम (अ.स.) उन्हें वहाँ छोड़कर वापस पलटने लगे, तो हजरत हाजरा उनके पीछे आईं और पूछा:
> "ऐ इब्राहिम! क्या आप हमें ऐसी घाटी में छोड़कर जा रहे हैं जहाँ न कोई साथी है और न ही खाने-पीने का सामान?"
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हजरत इब्राहिम (अ.स.) खामोश रहे। तब हजरत हाजरा ने एक ऐतिहासिक सवाल पूछा:
> "क्या अल्लाह ने आपको इसका हुक्म दिया है?"
> हजरत इब्राहिम (अ.स.) ने कहा: "हाँ।"
> हजरत हाजरा का जवाब एक मोमिन के विश्वास की पराकाष्ठा था: "तब अल्लाह हमें बर्बाद नहीं करेगा।"
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🏃‍♀️ सफा और मरवा के बीच दौड़
कुछ समय बाद पानी और खजूर खत्म हो गए। भूख और प्यास से मासूम इस्माइल (अ.स.) तड़पने लगे। ममता से व्याकुल होकर हजरत हाजरा पानी की तलाश में पास की पहाड़ी 'सफा' पर चढ़ गईं, लेकिन कुछ न मिला। फिर वह नीचे उतरीं और दौड़ते हुए दूसरी पहाड़ी 'मरवा' पर चढ़ गईं।
इसी तरह उन्होंने 7 चक्कर लगाए। (इसी की याद में आज भी हज और उमराह करने वाले 'सई' करते हैं, यानी सफा और मरवा के बीच सात बार दौड़ते हैं)।
💧 'जमजम' का निकलना
जब वह सातवीं बार मरवा पहाड़ी पर थीं, तो उन्हें एक आवाज सुनाई दी। उन्होंने देखा कि जहाँ बच्चा (इस्माइल अ.स.) लेटा हुआ था, वहाँ एक फरिश्ता (हजरत जिब्रील अ.स.) मौजूद है। फरिश्ते ने अपनी एड़ी जमीन पर मारी (या अपने पंख से जमीन को कुरेदा), और अचानक वहां से पानी का सोता फूट पड़ा।
हजरत हाजरा ने पानी को बहते देखा तो उसके चारों तरफ मिट्टी की बाड़ (घेरा) बनाने लगीं और कहने लगीं:
> "ज़म ज़म" (ठहर जा, ठहर जा)।
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नबी करीम ﷺ ने फरमाया: "अल्लाह इस्माइल की माँ पर रहम करे, अगर वह पानी को न रोकतीं, तो आज जमजम एक बहती हुई नदी होता।"
🏙️ मक्का शहर की आबादी
पानी निकलने के बाद वहाँ परिंदे आने लगे। परिंदों को देखकर 'जुरहुम' कबीले के लोग वहाँ पहुँचे। उन्होंने हजरत हाजरा से वहाँ बसने की इजाजत मांगी। हजरत हाजरा ने इस शर्त पर इजाजत दी कि पानी पर हक उनका रहेगा। इस तरह उस वीरान रेगिस्तान में मक्का शहर आबाद हुआ।
🌟 इस घटना से सीख:
* विश्वास (Tawakkul): जब अल्लाह पर भरोसा पक्का हो, तो वह रेगिस्तान में भी रास्ते खोल देता है।
* कोशिश (Struggle): हजरत हाजरा ने सिर्फ दुआ नहीं की, बल्कि पानी के लिए पहाड़ों के बीच दौड़ लगाई। अल्लाह को उनकी यह 'कोशिश' इतनी पसंद आई कि उसे इबादत का हिस्सा बना दिया।
* धैर्य का फल: मुश्किल के बाद आसानी जरूर आती है।

22/01/2024

*जान की नहीं, ईमान की फिक्र कीजिए*

22 जनवरी के दिन को आरएसएस और भाजपा द्वारा फिक्री इरतेदाद के जश्न में बदल दिया गया है, जो अब तक ढके छिपे मुनाफिक़ थे, उन्होंने खुल कर राम भक्ति का एलान करना शुरू कर दिया है। राम के लिए अपनी मुहब्बत के इजहार का कोई मौका वो हाथ से जाने नहीं देना चाहते। ब्लकि उनके बीच इस मुहब्बत के दिखावे का एक compitition सा शुरू हो गया है । अयोध्या के रहने वाले नूर आलम ने 22 जनवरी को अपनी एक बड़ी जमीन पर एक बड़े लंगर के आयोजन का एलान किया है, ताकि इस महान इतिहास का जश्न मनाया जा सके और इस दिन कोई भी राम भक्त भूखा न रहे , मुरादाबाद के शोएब साहब पीतल का कारोबार करते हैं , वह आजकल पीतल से राम मंदिर का एक मॉडल बनाने में व्यस्त हैं, इसमें एक तरफ मोदी जी की तस्वीर भी लगी हुई है। उनका कहना है कि इस मॉडल की अभी बहुत मांग है,और कहते हैं कि यह हमारे लिए गर्व की बात है कि हमें राम जी की सेवा करने का मौका मिला है, कानपुर के रहने वाले फैयाज राठौड़ सिक्कों का कारोबार करते हैं, इन दिनों वह ऐसे सिक्के बना रहे हैं, जिसमें एक तरफ राम मंदिर की तस्वीर है तो दूसरी तरफ खुद रामजी विराजमान हैं, फातिमा शेख महाराष्ट्र से राम की भक्ति में पैदल ही अयोध्या के लिए निकल खड़ी हुई हैं, देश के अलग-अलग हिस्सों से ऎसी खबरें आ रही हैं कि 22 जनवरी को मुस्लिम अपनी बस्तियों में जश्न मनाने के लिए बढ़-चढ़कर दान कर रहे हैं और दीये बनाकर इस दिन को यादगार बनाने की कोशिश रहे हैं।

आगरा में बीजेपी अल्पसंख्यक मोर्चा के (मुस्लिम) अध्यक्ष ने बुर्का पहनी महिलाओं के बीच मोमबत्ती के पैकेट बांटे। ताकि यह पैकेट 22 जनवरी को जलाए जाएं और जश्न मनाया जाए।

ये सिर्फ कुछ मिसालें हैं जिनसे हालात के रुख़ का अंदाजा लगाया जा सकता है, ये इस बात का सुबूत है कि अब मुसलमान खुलेआम इरतेदाद यानी धर्मत्याग का ऐलान कर रहे हैं, 22 जनवरी से बने हालात को वो अपने लिए ग़नीमत समझ रहे हैं, यही आरएसएस और बीजेपी का मकसद है, वे दुनिया को यह विश्वास दिलाना चाहते हैं कि अब हिंदु राष्ट्र का सपना पूरा होने जा रहा है।

22 जनवरी का जश्न आरएसएस के दृष्टिकोण का शुरुआती बिंदु होगा। आएसएस के प्रमुख नेता इंद्रेश कुमार ने एक अपील जारी की है 22 जनवरी को सभी मस्जिदों, स्कूलों, मदरसों और धार्मिक संस्थानों में राम के गीत गाएं जाएं।ये इस बात का खुला सुबूत है के जो बात पहले इशारों इशारों में कही जाती थी , अब खुलेआम उसके एलान होने लगे हैं और मुसलमानों को खुलेआम इरतेदाद (धर्मत्याग) के लिए आमंत्रित किया जा रहा है, और उनसे ऐसा करने का मुतालबा किया जा रहा है कि वो अपने मजहब और ईमान को खैराबाद कहें और राम के रंग में रंग जाएं।

मुसलमानों की नई नस्ल पहले से ही फिक्री इरतेदाद (बौद्धिक धर्मत्याग) की राह पर चल पडी है, अब नए परिवार और खानदान भी इसमें शामिल हो रहे हैं, ये लोग हकीकत में सम्मान इज़्ज़त और शोहरत के भूखे हैं,सस्ती पब्लिसिटी के इस चक्कर वे किसी भी हद तक जा सकते हैं, ये लोग बहुत ही नादान और मूर्ख हैं , वे ये नहीं जानते कि शिर्क की आड़ में कभी भी इज़्ज़त और सम्मान को हासिल नहीं किया जा सकता।
क़ुरआन ए करीम में, अल्लाह ने एलान किया है कि जो लोग सम्मान के लिए ईमान वालों को छोड़ कर काफ़िरों को दोस्त बनाते हैं, उन्हें यह जान लेना चाहिए कि सभी इज़्ज़तें अल्लाह ही के लिए है।

(सूरह निसा:139)

तजुर्बा और मुशाहदा यही बताता है कि ऐसे लोगों की कुछ दिनों तक वाह वाही होती है, फिर ऐसे लोग न घर के रहते हैं, न घाट के,और ऐसी मिसालें सैकड़ों की संख्या में हैं। इज़्ज़त और ज़िल्लत अल्लाह के हाथ में हैं,असल इज़्ज़त अल्लाह की बन्दगी और फरमांबरदारी में है, जो इससे हट कर इज़्ज़त तलाश करने की कोशिश करेगा, वह दोनों जहां में जलील ओ ख़्वार होगा।

यह आजमाइशों और फितनों का दौर है, लोग अपने मामूली से फायदे के लिए अपने दीन और ईमान का सौदा कर रहे हैं,

यह उलेमाओं , इमामों, नेताओं और बुद्धिजीवियों की जिम्मेदारी है कि वे अपने भाइयों के दीन और ईमान को बचाने के फिक्र करें।जुमे के बयानों में खुल कर तौहीद यानी एकेश्वरवाद का महत्व बताएं और शिर्क जैसे गुनाह से लोगों को आगाह करें , इस संबंध में किसी के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है, वक्त के अबू जहल और अबुलहब के सामने बिना किसी लाग लपेट के हक़ का एलान किया जाना चाहिए। यही वक्त का तकाज़ा और ईमान का मुतालबा है , अल्लाह हमें अमल की तौफीक दे।आमीन l

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