The Ravi Motivation
हम सब सकल सुकृत कै राशी
भए जग जन्मी जनकपुरबासी।। (रामायण)
The Ravi Motivation
👍 फलो जरूर करे।
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“मैं Ravi Kumar Sah, वो व्यक्ति हूँ जिसने अपनी जिंदगी में सबसे ज्यादा गलतियाँ कीं… और उन्हीं गलतियों ने मुझे सिखाया कि असली जीत वहीं से शुरू होती है जहाँ हम खुद को बदलने का फैसला करते हैं।
आज मैं युवाओं को यह सिखाता हूँ कि गलतियाँ आपको टूटने नहीं—सुधरने का अवसर देती हैं। आत्मविश्वास, सफलता और प्रेरणा… ये सब आपकी सोच से शुरू होते हैं।” जीवन को बदलना है तो आज से ही फलों करे और आप YouTube पर भी सुन सकते है लिंक Bio मे है। #theraviofficial1
19/06/2026
एक मक्खी अगर सब्जी तौलते वक्त तराजू पर बैठ जाए तो कोई फर्क नहीं पड़ता वही मक्खी अगर सोना तौलते वक्त तराजू पर बैठ जाए तो लगभग १०००० मुल्य बढ़ जाएगा।
इसीलिए👇
19/06/2026
19/06/2026
क्यों कि भला को उल्टा करो तो लाभ होता है। #प्रेम
17/06/2026
"कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है" — लेकिन क्या हर सौदा समझदारी का होता है?
समाज में अक्सर एक #कहावत सुनने को मिलती है— "कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है।" यह बात कई परिस्थितियों में सही भी है। सफलता पाने के लिए आराम छोड़ना पड़ता है, ज्ञान पाने के लिए समय देना पड़ता है, और सम्मान पाने के लिए अहंकार त्यागना पड़ता है। लेकिन इस कथन का अर्थ यह कभी नहीं है कि हम किसी मूल्यवान वस्तु को छोड़कर किसी कम मूल्य की वस्तु को प्राप्त कर लें।
यदि कोई कहे कि लोहे को पाने के लिए हीरा खो देना चाहिए, तो यह बुद्धिमानी नहीं बल्कि मूर्खता कहलाएगी। क्योंकि हर त्याग का मूल्यांकन उसके परिणाम से किया जाता है। जो वस्तु अधिक दुर्लभ, अधिक मूल्यवान और अधिक स्थायी है, उसे किसी साधारण और क्षणिक वस्तु के लिए खो देना समझदारी नहीं हो सकती।
यही बात आज के समय में अनेक युवाओं और किशोरों के जीवन में देखने को मिलती है। कुछ बच्चे अपनी छोटी-छोटी जिदों, क्षणिक इच्छाओं या तथाकथित प्रेम के कारण अपने माता-पिता से दूरी बना लेते हैं। वे यह समझ बैठते हैं कि अपनी इच्छा पूरी करने के लिए परिवार का विरोध करना या उन्हें छोड़ देना एक साहसिक कदम है। जबकि वास्तव में वे हीरे को छोड़कर लोहे के पीछे भाग रहे होते हैं।
माता-पिता का #प्रेम निस्वार्थ होता है। वे बच्चे के जन्म से लेकर उसके बड़े होने तक अनगिनत त्याग करते हैं। रातों की नींद, अपनी इच्छाएं, अपनी खुशियां और कई बार अपने सपने भी बच्चों के भविष्य के लिए समर्पित कर देते हैं। उनके प्रेम में कोई स्वार्थ नहीं होता, कोई शर्त नहीं होती। दूसरी ओर, कम उम्र में होने वाला आकर्षण अक्सर भावनाओं, शारीरिक आकर्षण, जिज्ञासा या अकेलेपन का परिणाम होता है। इसे प्रेम का नाम दे दिया जाता है, जबकि अधिकांश मामलों में वह समय के साथ बदल जाने वाली भावना होती है।
सच्चा प्रेम व्यक्ति को अपने कर्तव्यों से विमुख नहीं करता, बल्कि उन्हें और बेहतर ढंग से निभाना सिखाता है। यदि किसी संबंध के कारण कोई युवक या युवती अपने माता-पिता का अपमान करने लगे, उनसे नाता तोड़ने लगे या उनके त्याग को भूल जाए, तो यह प्रेम नहीं, बल्कि भावनात्मक अपरिपक्वता है। प्रेम जोड़ता है, तोड़ता नहीं। प्रेम सम्मान सिखाता है, विद्रोह नहीं।
एक पेड़ को देखिए। उसकी शाखाएं चाहे जितनी ऊंची क्यों न चली जाएं, उनकी शक्ति जड़ों से ही आती है। यदि शाखाएं यह सोच लें कि उन्हें स्वतंत्र होने के लिए जड़ों को छोड़ देना चाहिए, तो उनका हरा-भरा रहना असंभव हो जाएगा। माता-पिता भी जीवन की वही जड़ें हैं, जिनसे व्यक्ति को संस्कार, सुरक्षा और पहचान मिलती है। जड़ों को काटकर ऊंचाई नहीं पाई जा सकती।
आज सोशल मीडिया, फिल्मों और तात्कालिक भावनाओं के प्रभाव में कई युवा यह मान बैठते हैं कि दुनिया में सबसे बड़ा सत्य उनका वर्तमान आकर्षण है। लेकिन जीवन का अनुभव बताता है कि आकर्षण बदलता है, इच्छाएं बदलती हैं, परिस्थितियां बदलती हैं; जबकि माता-पिता का स्नेह और उनके त्याग का मूल्य समय के साथ और अधिक स्पष्ट होता जाता है।
इसका अर्थ यह नहीं कि युवाओं को अपनी पसंद, अपने निर्णय या अपने संबंधों का अधिकार नहीं है। अधिकार अवश्य है, लेकिन हर निर्णय विवेक, कृतज्ञता और जिम्मेदारी के साथ होना चाहिए। अपने जीवनसाथी का चयन करना एक बात है, और उस चयन के लिए अपने माता-पिता को अपमानित या त्याग देना बिल्कुल दूसरी बात। समझदारी इसी में है कि जीवन में नए संबंध जोड़ें, पुराने और अमूल्य संबंधों को तोड़ें नहीं।
अंततः, "कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है" का सही अर्थ यह है कि हमें तुच्छ चीजों को छोड़कर मूल्यवान चीजें प्राप्त करनी चाहिए, न कि मूल्यवान चीजों को छोड़कर तुच्छ चीजों के पीछे भागना चाहिए। संघर्ष के लिए आलस्य छोड़ना उचित है, सफलता के लिए समय देना उचित है, लेकिन क्षणिक आकर्षण के लिए माता-पिता का प्रेम खो देना वैसा ही है जैसे लोहे के लिए हीरा गंवा देना।
जो व्यक्ति हीरे और लोहे का अंतर समझ लेता है, वही जीवन में सही निर्णय ले पाता है। माता-पिता का प्रेम हीरा है; क्षणिक आकर्षण अक्सर लोहा। इसलिए पाने और खोने से पहले यह अवश्य सोच लेना चाहिए कि हम सौदा किस चीज़ का कर रहे हैं।
-लेखक रवि
17/06/2026
सफलता
16/06/2026
सुप्रभात 🙏🌅
16/06/2026
आज की पीढ़ी और माता-पिता की सीख
(एक विचारात्मक लेख)
आज का समय तेजी से बदल रहा है। विज्ञान, तकनीक और आधुनिक सोच ने बच्चों को पहले की तुलना में अधिक स्वतंत्र बना दिया है। वे अपने निर्णय स्वयं लेना चाहते हैं, अपनी पसंद से जीवन जीना चाहते हैं और कई बार माता-पिता तथा बुजुर्गों की सलाह को पुराना या अनावश्यक समझकर अनदेखा कर देते हैं। परिणामस्वरूप परिवारों में मतभेद, दूरियां और मनमुटाव बढ़ने लगे हैं।
माता-पिता अपने बच्चों को जीवन के अनुभवों के आधार पर समझाते हैं। वे चाहते हैं कि उनकी संतान उन गलतियों से बचे, जिनका सामना उन्होंने स्वयं किया है। लेकिन आज के कई बच्चे यह सोचते हैं कि उनकी जिंदगी उनकी अपनी है और उन्हें किसी की सलाह की आवश्यकता नहीं है। वे अपने मन की करते हैं और कई बार जल्दबाजी में ऐसे निर्णय ले लेते हैं जिनका नुकसान बाद में उन्हें ही उठाना पड़ता है।
ऐसी स्थिति में माता-पिता, भाई-बहन या परिवार के अन्य सदस्य क्रोध, डांट-फटकार या जबरदस्ती का सहारा न लें। समझाने का सबसे अच्छा तरीका प्रेम, धैर्य और संवाद है। बच्चों को यह महसूस कराना चाहिए कि परिवार उनकी स्वतंत्रता का विरोध नहीं कर रहा, बल्कि उनके उज्ज्वल भविष्य की चिंता कर रहा है। जब समझाने के साथ सम्मान और विश्वास जुड़ जाता है, तब बच्चों पर उसका प्रभाव अधिक पड़ता है।
बच्चों को यह भी समझाना चाहिए कि जीवन केवल अपनी इच्छाओं के अनुसार चलने का नाम नहीं है। अनुभव और संस्कार भी जीवन की अमूल्य पूंजी हैं। जो व्यक्ति अपने बुजुर्गों की बातों को सुनता है, वह उनके अनुभवों का लाभ प्राप्त करता है और कई कठिनाइयों से बच जाता है। वहीं जो हर सलाह को नजरअंदाज कर देता है, उसे अक्सर समय स्वयं सबक सिखाता है।
इस संदर्भ में एक बात कही जा सकती है—
"जो न माने अपनों की सीख और बात,
समय सिखाएगा उसे जीवन की हर हालात।"
अंततः माता-पिता और बच्चों दोनों को एक-दूसरे के दृष्टिकोण को समझने का प्रयास करना चाहिए। जहां बच्चों को अपने बुजुर्गों के अनुभवों का सम्मान करना चाहिए, वहीं माता-पिता को भी नई पीढ़ी की भावनाओं और सपनों को समझना चाहिए। संवाद, सम्मान और प्रेम ही वह सेतु है जो पीढ़ियों के बीच बढ़ती दूरी को कम कर सकता है।
— लेखक रवि
#जीवन
16/06/2026
कुछ लोगों का ऐसा सोचना है कि पुरानो में क्या है ?केवल कथाएं कहानी है और #भागवत_महापुराण में भी कथाएं ही है। इन कथाओं से जीवन में क्या लाभ होगा ?
ऐसा सोचने वाले व्यक्तियों से तो यही कहना है कि हमारा #जीवन हमारे पूर्वजों का जीवन कहानी ही तो है । कहानी के अलावा है क्या? पूरा इतिहास भी कहानी है पर फिर भी दुनिया में इतिहास का अपना महत्व है । देश का इतिहास उस राष्ट्र की संस्कृति, सभ्यता ,सोच, चिंतन, चरित्र की झांकी है। इतिहास से हर राष्ट्र की पीढ़ी बहुत शिक्षा लेती है । उसी के आधार पर राष्ट्र की वर्तमान एक भावी नीतियां बनती है ।प्रगति की दिशा निश्चित होती है।
वेदव्यास जैसे महामनीषी कथाएं कह रहे हैं तो उनके पीछे उनका कोई विशेष प्रयोजन , कोई विशेष मनतव्य होगा । यह हमें गंभीरता से सोचना समझना चाहिए ।
महापुरुषों की गाथाएं उनके जीवन वृत्त पढ़कर हम उन जैसे बनने की प्रेरणा प्राप्त करते हैं। उनके महान कार्यों का अनुकरण कर हम उन पथ पर चलने को अग्रसर होते हैं । जीवन की यात्रा में जब कोई कठिनाई परेशानी हताशा, निराशा, विषाद हमें अवसाद ग्रस्त बना देता है तो ऐसे समय में इन महान आत्माओं के जीवन चरित्र हमे नई ऊर्जा एवं स्फुर्ती प्रदानकर आगे की राह दिखाते हैं ।
जीवन जीने की कला, व्यवहार- कला, राजनीति, धर्म -नीति, आचार-नीति सभी कुछ हमें कथाओं से सीखने को मिलती है। तत्वज्ञान ,भक्ति, कर्म, वैराग्य जैसे विषयों के सिद्धांतों को दृष्टांतो द्वारा आसानी से समझाया जा सकता है।
श्रीमद्भागवत में भगवान के भक्तों की कथाएं हैं। उन साधकों की कथाएं हैं जो भगवान के होकर जीये । इन भागवत भक्तों ने भक्ति का रसपान किया , आत्मज्ञान प्राप्त किया एवं सांसारिक कर्तव्यों का निर्वाह करते हुए मोक्ष प्राप्त किया। इन सभी आख्यानों के पठन, मनन श्रवणसे पाठको, श्रोताओं का ऐसा मन करता है कि हम भी ऐसा ही सफल जीवन जीए। ऐसी ही भक्ति करें और मुक्ति प्राप्त करें ।
यही इस भागवत ग्रंथ की विशेषता है इसीलिए यह एक श्रेष्ठ व्यवहार कल शास्त्र एवं मोक्ष शास्त्र है। कथा से जीवन में अद्भुत परिवर्तन आते हैं ।चिंतन एवं चरित्र उत्कृष्ट बनता है।
लेकिन यह कैसे विडंबना है कि आज के युवा किसी नेता, अभिनेता, खिलाड़ी को तो अपना आदर्श बनाते हैं परंतु पुराणों में वर्णित महापुरुषों या आत्माओं, भक्त, एवं प्रजावत्सल राजाओं को अपना आदर्श बनाना उचित नहीं समझते ।
भागवत हमें जीवन पर चिंतन करने हेतु प्रेरित करता है। यह महान ग्रंथ जीवन की सार्थकता से परिचित कराता है इसीलिए श्रीमद् भागवत एक आदर्श जीवन शास्त्र है।
और हमें पढ़ना चाहिए।
#अध्यात्म #जीवन
16/06/2026
#भागवत मनुष्य को मृत्युसे निर्भय बनाता है। इसके पठन,श्रवण, और मनन करनेवाले व्यक्ति को कालरूपी सर्प का भय नहीं सताता। मनुष्यको जीनके प्रति ऐसा मोह हो गया है कि वह प्रतिपल, प्रतिक्षण मृत्युकी कल्पना मात्र से घबराता रहता है, भयभीत रहता है। मौत कब #जीवन को लील जाय कोई भरोसा नहीं। इसीलिए संसार मे सबसे अधिक भय मौत का है। इसके भय से मनुष्य ना तो निश्चिंतता से जी पाता है और ना ही जीवनकी वास्तविक आनंद ले पाता है। मानव के इस #मृत्यु भय के मनोविज्ञान को हमारे ऋषि मुनियों ने भलीभांति समझा है और इसीलिए इस महाभय के निराकरण हेतु शास्त्रों की रचना की है। भागवत शास्त्र जीवनके रहस्यको समझाकर मृत्यु को मंगलमय बनाता है।
#अध्यात्म
16/06/2026
स्वार्थी मनुष्य।
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