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एक ऐसी कहानी जो आपके दिलों छू लेगी।
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रात का सन्नाटा हो या दोपहर की तपती धूप… उसके दरवाज़े पर टंगी बूढ़ी आँखें हर आहट पर काँप जाती थीं।
“शायद मेरे बेटे लौट आए हों…”
उम्मीद का यह एक ही वाक्य उसकी साँसों का सहारा था।
गाँव का रामू और श्यामू—दो भाई। सपनों की गठरी बाँधकर परदेस क्या गए… घर की खुशियाँ, हँसी, रौनक सब जैसे उनके साथ चली गईं। गए थे कमाने… पर कमाई से पहले किस्मत ने उनका सब कुछ छीन लिया।
परदेस में धोखे, कर्ज़, भूख, बेइज़्ज़ती और थकावट ने उन्हें ऐसा जकड़ा कि वे लौटने का रास्ता ही खो बैठे। उधर गाँव में उनका बूढ़ा बाप—बुखार, गरीबी और अकेलेपन से लड़ता रहा।
रात को खाट पर लेटा वो अक्सर खिड़की के पार आसमान देखता और बुदबुदाता —
“हे राम… एक बार मेरे बेटों को भेज दे… बस एक बार!”
लेकिन भगवान भी शायद उस बूढ़े का इम्तिहान लेने पर ही आमादा था…
चूल्हा ठंडा, घर वीरान, दवाई ख़त्म, और शरीर टूट चुका था… पर इंतज़ार ज़िंदा था।
साल बीतते गए… परदेस ने बेटों के हाथ रस्सियों, मशीनों और आँसुओं में बाँध दिए… और इसी इंतज़ार ने बूढ़े बाप की साँसें।
एक सुबह, आँगन में उसकी खामोशी ने चीख़ मारकर कहा —
“अब कोई इंतज़ार नहीं होगा…”
बूढ़ा बाप चला गया…
आँखें खुली छोड़कर… जैसे अभी भी दरवाज़े पर खड़े अपने बेटों को देखना चाहता हो।
कहते हैं —
परदेस रोटी तो दे देता है, पर अक्सर अपनों को लूट लेता है।
कमाया सब जा सकता है… पर खोया हुआ “समय” और “माँ-बाप का इंतज़ार” कभी वापस नहीं आता।
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