Rishi Rudra Patel
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चार दिन की ज़िंदगी बताई गई थी… लेकिन लोग वही EMI, वही नौकरी, वही “कल से जिम शुरू” वाला वादा करते-करते 30 साल निकाल दे रहे हैं।
कभी-कभी तो शक होता है कि कहीं हम गलती से अमर तो नहीं हो गए? 🤔
सुबह उठो – वही चाय, वही ट्रैफिक, वही बॉस का ज्ञान।
शाम को आओ – वही मोबाइल, वही रील, वही “बस पाँच मिनट और”…
लगता है भगवान ने ऊपर से कहा होगा –
“चार दिन” का मतलब था चार फेज —
बचपन में शरारत,
जवानी में मोहब्बत,
शादी में जिम्मेदारी,
और बुढ़ापे में दवाई!
लेकिन हम तो हर फेज में टेंशन को ही मेन कैरेक्टर बना बैठे हैं।
ज़िंदगी चार दिन की है या चालीस साल की —
कन्फ्यूजन तो बना हुआ है,
पर इतना तय है कि अगर ऐसे ही चलता रहा
तो ऊपर वाले को भी लगेगा —
“अरे ये लोग तो ट्रायल वर्ज़न में ही पूरी लाइफ निकाल दे रहे हैं!” 😆
इसलिए भाई, थोड़ा हँसो, थोड़ा जीयो…
वरना कहीं सच में अमर हो गए तो
इतनी बोरिंग लाइफ कौन झेलेगा? 😂
पहले लोग कहते थे कि भूत-प्रेत, चुड़ैल वगैरह सब मन का भ्रम है।
समय बदला, विज्ञान आगे बढ़ा… और अब रिसर्च में एक नया निष्कर्ष जुड़ गया है — “अच्छी बीवी” भी मन की कल्पना हो सकती है! 😄
पहले दादी कहती थीं, “बेटा रात को देर से मत निकलना, चुड़ैल पकड़ लेगी।”
आज माँ कहती हैं, “बेटा शादी कर लो, अच्छी बीवी मिल जाएगी।”
और दोनों बातों में एक ही समानता है — किसी ने आज तक देखा नहीं, बस सुना ही है!
दोस्तों की मीटिंग में भी यही हाल है।
कुंवारे दोस्त कहते हैं — “भाई मेरी होने वाली बीवी बहुत समझदार होगी।”
शादीशुदा दोस्त धीरे से मुस्कुरा कर कहते हैं — “हाँ… हम भी कभी यही सोचते थे।”
पहले लोग तांत्रिक के पास जाकर पूछते थे, “भूत है क्या?”
आज लोग पंडित के पास जाकर पूछते हैं, “अच्छी पत्नी मिलेगी क्या?”
और जवाब दोनों जगह लगभग एक जैसा होता है — “उपाय करते रहो, विश्वास बनाए रखो!” 😂
निष्कर्ष यही है कि ज़िंदगी में दो चीज़ें सबसे रहस्यमयी हैं —
एक जंगल में भटकती चुड़ैल, और दूसरी दोस्तों के सपनों में रहने वाली “परफेक्ट पत्नी”! 😄
कहते हैं ना—कोई भी जाति नीच नहीं होती… लेकिन हर जाति में एक ऐसा स्पेशल पीस जरूर होता है, जो पूरी जाति की इज्जत का Wi-Fi पासवर्ड गलत डाल देता है 😄
गाँव में अगर कोई अजीब हरकत कर दे, तो लोग तुरंत बोलते हैं—“देखो जी, पूरी बिरादरी का नाम डुबो दिया!”
अब बेचारे बाकी लोग सोचते रह जाते हैं—“हम तो चुपचाप दाल-रोटी खा रहे थे, ये भाईसाहब कब से बिरादरी के ब्रांड एम्बेसडर बन गए?”
असल में हर समाज में एक ऐसा बंदा जरूर होता है जो शादी में प्लेट भरकर खाना लेकर आधा छोड़ देता है, लाइन तोड़कर आगे घुस जाता है, और फिर ज्ञान ऐसे देता है जैसे यूनिवर्सिटी उसी के नाम से चलती हो।
और मजेदार बात ये है कि वही सबसे पहले बोलता है—“हमारी जाति बहुत महान है!”
सच्चाई तो ये है कि इंसान अच्छा या बुरा होता है, जाति नहीं।
जाति तो बस WhatsApp ग्रुप की तरह है—कुछ लोग शांत रहते हैं, कुछ अच्छे मैसेज भेजते हैं… और एक-दो ऐसे होते हैं जो सुबह 5 बजे “सुप्रभात” के साथ 25 फूलों वाली फोटो भेजकर सबका दिन खराब कर देते हैं 😂
इसलिए फैसला सीधा है—जाति नहीं, करतूत देखो… क्योंकि हर जगह एक “नीच इंसान” फ्री में पैक होकर जरूर आता है! 😄
#हंसी_मजाक #सच्चीबात #समाज #इंसानियत
लोग हर बात पर कह देते हैं – “ये इज्जत का सवाल है!” 😄
अब हमारी समझ में आज तक नहीं आया कि ये इज्जत आखिर है कहाँ और इसका सवाल कौन पूछ रहा है!
कभी पड़ोसी कहेंगे – “बारात में नहीं आए तो इज्जत का सवाल है।”
कभी रिश्तेदार बोलेंगे – “लड्डू कम दिए तो इज्जत का सवाल है।”
और घर वाले तो हर काम में लगा देते हैं – “पढ़ लो बेटा, इज्जत का सवाल है।”
अब सोचने वाली बात ये है कि अगर सच में ये सवाल है… तो इसका जवाब क्या है भाई? 🤔
क्या ऑप्शन आते हैं?
A) आ जाओ
B) लड्डू बढ़ा दो
C) पढ़ लो
D) उपर के सभी 😂
लगता है इज्जत कोई चीज नहीं, बल्कि एक इमरजेंसी बटन है…
जहाँ तर्क खत्म हो जाए, वहाँ दबा दो – “इज्जत का सवाल है!”
सच बताऊँ… जिस दिन किसी ने पूछ लिया – “अच्छा बताओ इज्जत कहाँ रहती है?”
उस दिन से ये सवाल हमेशा के लिए अनुत्तरित प्रश्न बन जाएगा 😆
16/02/2026
Hello friends 👋🤗
काजू-बादाम और फल-फ्रूट का असली सच ये है कि इनसे जितनी ताकत मिलती है, उससे ज़्यादा ताकत तो इन्हें खरीदने में लग जाती है 😄
आजकल ड्राई फ्रूट्स खरीदने जाओ तो दुकानदार ऐसे रेट बताता है जैसे सोना बेच रहा हो। आदमी पहले कीमत सुनकर ही आधा कमजोर हो जाता है, फिर खुद को समझाता है—“इतने महंगे बदाम खा रहा हूँ, अब तो शरीर बॉडीबिल्डर जैसा बन ही जाएगा!”
घर आकर 4 काजू और 3 बादाम खाकर आईने में बाइसेप्स चेक करता है… लेकिन वहां सिर्फ बैंक बैलेंस का दर्द दिखाई देता है 😂
सच तो ये है कि ड्राई फ्रूट्स खाने से कम, उन्हें खरीदने के लिए जो ओवरटाइम करना पड़ता है ना… असली ताकत वहीं से आती है 💪😆
😄
11/02/2026
Shout out to my newest followers! Excited to have you onboard! Divya Sharma, Vishnu Sahu, Arvind Singh, Vikrant Jha
सच तो ये है भाई…
जो पास वाले मंदिर में नहीं जाता और दूर वाले मंदिर में घूमने जाता है, वो भक्त कम और टूरिस्ट ज्यादा होता है 😄
😄
आजकल स्कूल के बच्चों का बैग इतना भारी हो गया है कि लगता है स्कूल नहीं, जिम की ब्रांच खुल गई है 🎒💪
सुबह-सुबह बच्चा घर से निकलता है तो ऐसा लगता है जैसे एवरेस्ट फतह करने जा रहा हो।
पहले माँ पूछती थी – “टिफिन रखा?”
अब पूछती है – “बेटा कमर ठीक है ना?” 😄
बैग देखकर साफ समझ आ रहा है कि अगर बच्चा पढ़-लिख गया तो डॉक्टर-इंजीनियर बनेगा…
और अगर नहीं पढ़ पाया तो कम से कम बोझ ढोने की प्रैक्टिस तो पूरी चल रही है! 😂
सच में, आज का बच्चा किताबों से ज्यादा अपना बैग उठाने में एक्सपर्ट हो रहा है।
05/02/2026
Shout out to my newest followers! Excited to have you onboard! Ansar Khan, Ram Lakhan, Munedra Munedra Uchhariya, Sandeep Kumar, Kamni Kumari, Kavya Khamari, Bavita Kumari, Godwin Kshatriya, Rahul Kumar Rahul Kumar
04/02/2026
Good morning 🌞🌄
हमारे समाज में ऊँच-नीच इतनी गहरी है कि यहाँ एक ही काम के अलग-अलग नाम होते हैं, वो भी आदमी की कुर्सी देखकर।
सरकारी बाबू अगर शाम को बोतल खोल ले तो लोग कहते हैं –
“अरे छोड़िए, ड्रिंक कर रहे हैं, टेंशन बहुत होती है सरकार में।” 🍷
वही काम कोई प्राइवेट कर्मचारी कर ले तो फैसला बदल जाता है –
“हम्म… शराब पी रहा है, कंपनी का प्रेशर होगा।”
और अगर बेचारा बेरोज़गार दो घूँट लगा ले तो समाज का फैसला फाइनल –
“अरे देखो, बोवटा है, काम-धंधा छोड़कर नशे में डूबा है!” 😒
यानी बोतल वही, दारू वही, ग्लास वही…
बस इज्ज़त का लेबल बदल जाता है आदमी की नौकरी के साथ।
इसलिए कहते हैं –
हमारे समाज में नशा शराब का नहीं,
पद और पैकेज का है! 😄
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