Dharmmarg
‼️सालासर बालाजी डेली दर्शन 👏धार्मिक, सामाजिक, पारिवारिक आलेख और तस्वीर‼️
10/12/2025
🌷💐 गरुड़ पुराण का दिव्य संदेश: "क्या पुत्र के बिना मुक्ति नहीं मिलती?" 💐🌷
एक दिन, पक्षीराज गरुड़ ने वैकुंठ धाम में भगवान श्री हरि विष्णु से एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न पूछा, जो आज भी समाज में एक बड़ी चिंता का विषय है।
गरुड़ का प्रश्न:
"हे प्रभु! शास्त्र कहते हैं कि 'पुत्' नामक नरक से जो त्राण (रक्षा) करे, वही 'पुत्र' है। इसलिए पुत्र ही पिंडदान करके पिता को स्वर्ग भेजता है। किंतु, संसार में ऐसे कई धार्मिक लोग हैं जिनके कोई पुत्र नहीं है, केवल कन्याएँ हैं। क्या मृत्यु के बाद ऐसे माता-पिता नरक में जाएंगे? क्या उनकी मुक्ति का कोई मार्ग नहीं है?"
श्री हरि विष्णु का उत्तर (कन्या का महत्व):
भगवान विष्णु ने मुस्कुराते हुए कहा, "हे गरुड़! इस भ्रांति का त्याग करो। मेरी सृष्टि में पुत्र और पुत्री में कोई भेद नहीं है। यदि किसी व्यक्ति के पुत्र नहीं है, तो उसकी कन्या या दौहित्र (बेटी का बेटा) श्राद्ध कर्म करने के पूर्ण अधिकारी हैं।"
प्रभु ने गरुड़ पुराण और मनुस्मृति के श्लोकों का सार सुनाते हुए कहा:
📜 “यथैव आत्मा तथा पुत्रः पुत्रेण दुहिता समा...”
(जैसे पिता की आत्मा ही पुत्र है, वैसे ही पुत्री भी पुत्र के समान ही है।)
इसलिए, जो पिता अपनी कन्या के रूप में इस संसार में विद्यमान है, उसका पिंडदान करने का अधिकार कन्या को ही है।
📜 “दौहित्रोऽपि ह्यमुत्रैनं संतारयति पौत्रवत्...”
(बेटी का बेटा (दौहित्र) भी पोते (पौत्र) की भांति ही अपने नाना-नानी का तर्पण करके उन्हें उत्तम लोकों में पहुँचाता है।)
धर्मदत्त और उसकी कन्या सुमति की कथा:
भगवान ने एक उदाहरण दिया: एक गांव में धर्मदत्त नाम के एक परम धार्मिक ब्राह्मण थे। उनका कोई पुत्र नहीं था, केवल सुमति नाम की एक गुणवान कन्या थी। मरते समय धर्मदत्त रोने लगे कि "मेरा पिंडदान कौन करेगा? मेरी मुक्ति कैसे होगी?"
उनकी मृत्यु के बाद, समाज की बातों की परवाह न करते हुए, सुमति ने साहसपूर्वक पिता की अंत्येष्टि की। समय आने पर, सुमति के पुत्र ने गयाजी जाकर अपने नाना धर्मदत्त का पिंडदान किया।
परिणाम:
उसी रात धर्मदत्त ने दिव्य रूप में कन्या के सपने में आकर कहा: "बेटी! तेरे पुत्र के दिए पिंडदान से मैं तृप्त हो गया हूँ और सम्मानपूर्वक स्वर्ग जा रहा हूँ। आज मैंने समझा कि बेटा और बेटी में कोई अंतर नहीं है। तू ही मेरी सच्ची संतान है।"
गरुड़ पुराण के अनुसार श्राद्ध का अधिकार क्रम:
गरुड़ पुराण में स्पष्ट है कि पुत्र के न होने पर श्राद्ध का अधिकार किसे है:
पुत्र (ज्येष्ठ/कनिष्ठ)
पौत्र (पोता)
प्रपौत्र (पड़पोता)
पत्नी
कन्या (बेटी)
दौहित्र (नाती)
निष्कर्ष:
भगवान विष्णु ने कहा, "हे खगेश्वर! जो पुत्र न होने पर शोक करते हैं, वे माया के वश में हैं। यदि कन्या भक्तिभाव से माता-पिता की सेवा और श्राद्ध करती है या करवाती है, तो वे माता-पिता अवश्य मोक्ष प्राप्त करते हैं। श्रद्धा और भक्ति ही मुख्य है, लिंग-भेद केवल शरीर का है, आत्मा का नहीं।"
इसलिए, जिनके पुत्र नहीं है, उन्हें चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है। कन्या या उसका पुत्र (नाति) द्वारा किया गया पिंडदान शत-प्रतिशत मान्य है और उससे आत्मा को शांति मिलती है।
🙏 जय श्री हरि 🙏
05/12/2025
पनीर फ्राई करने का टिप्स
जब भी आप पनीर को तलें, गैस का फ्लेम हमेशा मीडियम रखें। पास में ठंडे पानी का एक बड़ा बर्तन ज़रूर रखें।
1. पनीर के टुकड़े कढ़ाई में डालकर हल्का ब्राउन होने तक तल लीजिए।
2. जैसे ही रंग बदल जाए, तुरंत उसे निकालकर ठंडे पानी में डाल दीजिए।
3. पनीर को पानी में लगभग 5 से 10 मिनट रहने दीजिए।
क्यों ज़रूरी है?
तला हुआ पनीर अंदर से सख्त और रबर जैसा हो जाता है। जब आप उसे ठंडे पानी में डालते हैं तो उसका टेम्परेचर अचानक गिरता है, जिससे पनीर की सारी नमी वापस आ जाती है। यही वजह है कि जब आप बाद में कोई भी पनीर की सब्ज़ी बनाएंगे, तो उसके टुकड़े नर्म, मुलायम और मुँह में घुलने जैसे लगेंगे – बिलकुल रेस्टोरेंट-स्टाइल
अगली बार जब भी पनीर की सब्ज़ी बनाएँ, ये ट्रिक ज़रूर आज़माएँ। यकीन मानिए, खाने वाले आपकी तारीफ करते नहीं थकेंगे👈
26/11/2025
सनातन धार्मिक एवं आध्यात्मिक बातें #मिश्राजी खुद जानकारी लें और बच्चों को भी बताएं
शून्य : अन्नत, आकाश
एक : ईश्वर
दो लिंग : नर और नारी ।
दो पक्ष : शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष।
दो पूजा : वैदिकी और तांत्रिकी
दो अयन : उत्तरायन और दक्षिणायन।
तीन देव : ब्रह्मा, विष्णु, शंकर।
तीन देवियाँ : महा सरस्वती, महा लक्ष्मी, महा गौरी।
तीन लोक : पृथ्वी, आकाश, पाताल।
तीन गुण : सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण।
तीन स्थिति : ठोस, द्रव, वायु।
तीन स्तर : प्रारंभ, मध्य, अंत।
तीन पड़ाव : बचपन, जवानी, बुढ़ापा।
तीन रचनाएँ : देव, दानव, मानव।
तीन अवस्था : जागृत, मृत, बेहोशी।
तीन काल : भूत, भविष्य, वर्तमान।
तीन नाड़ी : इडा, पिंगला, सुषुम्ना।
तीन संध्या : प्रात:, मध्याह्न, सायं।
तीन शक्ति : इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति, क्रियाशक्ति।
चार धाम : बद्रीनाथ, जगन्नाथ पुरी, रामेश्वरम्, द्वारका।
चार मुनि : सनत, सनातन, सनंद, सनत कुमार।
चार वर्ण : ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र।
चार निति : साम, दाम, दंड, भेद।
चार वेद : सामवेद, ॠग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद।
चार स्त्री : माता, पत्नी, बहन, पुत्री।
चार युग : सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर युग, कलयुग।
चार समय : सुबह, शाम, दिन, रात।
चार अप्सरा : उर्वशी, रंभा, मेनका, तिलोत्तमा।
चार गुरु : माता, पिता, शिक्षक, आध्यात्मिक गुरु।
चार प्राणी : जलचर, थलचर, नभचर, उभयचर।
चार जीव : अण्डज, पिंडज, स्वेदज, उद्भिज।
चार वाणी : ओम्कार्, अकार्, उकार, मकार्।
चार आश्रम : ब्रह्मचर्य, ग्राहस्थ, वानप्रस्थ, सन्यास।
चार भोज्य : खाद्य, पेय, लेह्य, चोष्य।
चार पुरुषार्थ : धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष।
चार वाद्य : तत्, सुषिर, अवनद्व, घन।
पाँच तत्व : पृथ्वी, आकाश, अग्नि, जल, वायु।
पाँच देवता : गणेश, दुर्गा, विष्णु, शंकर, सुर्य।
पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ : आँख, नाक, कान, जीभ, त्वचा।
पाँच कर्म : रस, रुप, गंध, स्पर्श, ध्वनि।
पाँच उंगलियां : अँगूठा, तर्जनी, मध्यमा, अनामिका, कनिष्ठा।
पाँच पूजा उपचार : गंध, पुष्प, धुप, दीप, नैवेद्य।
पाँच अमृत : दूध, दही, घी, शहद, शक्कर।
पाँच प्रेत : भूत, पिशाच, वैताल, कुष्मांड, ब्रह्मराक्षस।
पाँच स्वाद : मीठा, चर्खा, खट्टा, खारा, कड़वा।
पाँच वायु : प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान।
पाँच इन्द्रियाँ : आँख, नाक, कान, जीभ, त्वचा, मन।
पाँच वटवृक्ष : सिद्धवट (उज्जैन), अक्षयवट (Prayagraj), बोधिवट (बोधगया), वंशीवट (वृंदावन), साक्षीवट (गया)।
पाँच पत्ते : आम, पीपल, बरगद, गुलर, अशोक।
पाँच कन्या : अहिल्या, तारा, मंदोदरी, कुंती, द्रौपदी।
छ: ॠतु : शीत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, बसंत, शिशिर।
छ: ज्ञान के अंग : शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष।
छ: कर्म : देवपूजा, गुरु उपासना, स्वाध्याय, संयम, तप, दान।
छ: दोष : काम, क्रोध, मद (घमंड), लोभ (लालच), मोह, आलस्य।
सात छंद : गायत्री, उष्णिक, अनुष्टुप, वृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप, जगती।
सात स्वर : सा, रे, ग, म, प, ध, नि।
सात सुर : षडज्, ॠषभ्, गांधार, मध्यम, पंचम, धैवत, निषाद।
सात चक्र : सहस्त्रार, आज्ञा, विशुद्ध, अनाहत, मणिपुर, स्वाधिष्ठान, मुलाधार।
सात वार : रवि, सोम, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि।
सात मिट्टी : गौशाला, घुड़साल, हाथीसाल, राजद्वार, बाम्बी की मिट्टी, नदी संगम, तालाब।
सात महाद्वीप : जम्बुद्वीप (एशिया), प्लक्षद्वीप, शाल्मलीद्वीप, कुशद्वीप, क्रौंचद्वीप, शाकद्वीप, पुष्करद्वीप।
सात ॠषि : वशिष्ठ, विश्वामित्र, कण्व, भारद्वाज, अत्रि, वामदेव, शौनक।
सात ॠषि : वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र, भारद्वाज।
सात धातु (शारीरिक) : रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, वीर्य।
सात रंग : बैंगनी, जामुनी, नीला, हरा, पीला, नारंगी, लाल।
सात पाताल : अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल, पाताल।
सात पुरी : मथुरा, हरिद्वार, काशी, अयोध्या, उज्जैन, द्वारका, काञ्ची।
सात धान्य : उड़द, गेहूँ, चना, चांवल, जौ, मूँग, बाजरा।
आठ मातृका : ब्राह्मी, वैष्णवी, माहेश्वरी, कौमारी, ऐन्द्री, वाराही, नारसिंही, चामुंडा।
आठ लक्ष्मी : आदिलक्ष्मी, धनलक्ष्मी, धान्यलक्ष्मी, गजलक्ष्मी, संतानलक्ष्मी, वीरलक्ष्मी, विजयलक्ष्मी, विद्यालक्ष्मी।
आठ वसु : अप (अह:/अयज), ध्रुव, सोम, धर, अनिल, अनल, प्रत्युष, प्रभास।
आठ सिद्धि : अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व।
आठ धातु : सोना, चांदी, ताम्बा, सीसा जस्ता, टिन, लोहा, पारा।
नवदुर्गा : शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघंटा, कुष्मांडा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री।
नवग्रह : सुर्य, चन्द्रमा, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु, केतु।
नवरत्न : हीरा, पन्ना, मोती, माणिक, मूंगा, पुखराज, नीलम, गोमेद, लहसुनिया।
नवनिधि : पद्मनिधि, महापद्मनिधि, नीलनिधि, मुकुंदनिधि, नंदनिधि, मकरनिधि, कच्छपनिधि, शंखनिधि, खर्व/मिश्र निधि।
दस महाविद्या : काली, तारा, षोडशी, भुवनेश्वरी, भैरवी, छिन्नमस्तिका, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी, कमला।
दस दिशाएँ : पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, आग्नेय, नैॠत्य, वायव्य, ईशान, ऊपर, नीचे।
दस दिक्पाल : इन्द्र, अग्नि, यमराज, नैॠिति, वरुण, वायुदेव, कुबेर, ईशान, ब्रह्मा, अनंत।
दस अवतार (विष्णुजी) : मत्स्य, कच्छप, वाराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध, कल्कि।
दस सति : सावित्री, अनुसुइया, मंदोदरी, तुलसी, द्रौपदी, गांधारी, सीता, दमयन्ती, सुलक्षणा, अरुंधती।
21/09/2025
10/01/2025
चैते चना , बैशाखे बेल ;
जेठे शयन , आसाढे खेल ।
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सावन हरे , भादौ तीत ;
क्वार में करो , गुङ से प्रीत ।
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कार्तिक मूली , अगहन तेल ;
पूष में करो , दुध से मेल ।
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माघ मास घी खिचङी खाय ;
फागुन उठकर नित्य नहाय।
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यह बारह जो सेवन करे ;
रोग दोष दुख तन कर हरे ।।
○○○○○○○राजेश मिश्रा○○○○○○○○○○
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1️⃣ चैत्र के महीने में चने का सेवन जरूर करना चाहिए। नया चना प्रकृति नव परिवर्तन के साथ पथ्य बन जाता है । जो फाल्गुन में अपनी नमी के चलते वात प्रधान था। वह चैत्र में औषध जैसा बन जाता है।
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2️⃣ वैशाख के महीने में बेल फल का सेवन जरूर करना चाहिए। पूरे वैशाख मास के अंदर फलों में हमेशा बेल फल को भोजन का हिस्सा जरूर बनायें ।
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3️⃣ ज्येष्ठ के महीने में जब दिन में बाहर भयंकर गर्मी पड़ती है तो दिन के समय शयन कर, जरूर आराम करना चाहिए। वैसे आयुर्वेद में दिन में सोना वर्जित होता है, लेकिन सिर्फ ज्येष्ठ के महीने में ही सोने को अनुकूल माना गया है। ○○●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●○○
4️⃣ आषाढ़ के महीने में खेल यानि विभिन्न प्रकार के खेल , योग , कसरत , एक्सरसाइज करनी चाहिए। आषाढ के महीने का मौसम अनुकूल होता है और शरीर को भी आने वाले मौसम के लिए तैयार रखना जरूरी हैं।
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5️⃣ सावन के महीने में छोटी हरङ का एक डंठल हर रोज एक दिन में एक बार मुंह में सुपारी की भांति रखकर के जरूर खाना चाहिए। हरङ त्रिफलों में एक महत्वपूर्ण औषधि है।
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6️⃣ भाद्रपद महीने में तीत यानी किरायचा जरूर खाएं। किरायचा छोटे छोटे कवक जीवाणु आदि को शरीर से बाहर निकालता हैं, जो नुकसानदायक होते हैं।
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7️⃣ आसोज के महीने में गुड़ जरूर खाना चाहिए । रात को सोते समय एक गुड़ की छोटी सी डली खाकर के कुल्ला करके सो जाएं। पूरा शरीर डिटॉक्स हो जाएगा।
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8️⃣ कार्तिक के महीने में मूली जरूर खाएं । कार्तिक मास की सुबह में अगर आपने मूली खाई तो वह औषध के समान शरीर को गुण देती है।
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9️⃣ मिक्सर महीने में तेल का सेवन जरूर करें , क्योंकि बाहर के सर्द मौसम से चमड़ी शुष्क हो जाती है। और हमारी चमड़ी को भी वसा की जरूरत होती है । मिक्सर में तेल खाना भी चाहिए और तेल से शरीर पर मसाज भी करना चाहिए।
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🔟 पौष के महीने में दूध का सेवन जरूर करें । रात को सोते समय गाय का दूध अच्छी तरह से गर्म करने के पश्चात सोते समय पीकर सोयें।
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1️⃣1️⃣ माघ के महीने में घी और खीचड़ी का भोजन जरूर करें। इस महीने में भगवान को भी खींचङे का ही भोग इसीलिए लगाते है।
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1️⃣2️⃣ फाल्गुन के महीने में सुबह जल्दी उठकर जरूर अच्छी तरह से नहाना चाहिए , क्योंकि बाहर का मौसम इस महीने में उल्टा सीधा चलता रहता है। सुबह-सुबह सूर्योदय के साथ स्नान करके अपने शरीर के तापमान को संतुलित करना परम आवश्यक है।○○●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●○○
हमारे पूर्वजों के द्वारा बताई गई ये समस्त बातें उनके वर्षों का अनुभव हैं। इसलिए ये सिर्फ किंवदंतियां नहीं सांईटीफिक भी पूर्ण निरापद बातें हैं।
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ऐसा हर पदार्थ मौसम व समय के अनुसार खाया जाए तो ओषध जैसा होता हैं तो असमय सेवन से विष समान बन जाता हैं।
राजेश मिश्रा द्वारा संकलित
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19/10/2024
🙏🌹 जय श्री बजरंगबली 🌹🙏
🌹 जय श्री बड़े हनुमान जी 🌹
1️⃣9️⃣▪️1️⃣0️⃣▪️2️⃣0️⃣2️⃣4️⃣
🌹 संध्या आरती दर्शन 🌹
🌹 त्रिवेणी धाम, संगम तट 🌹
🌹 प्रयागराज उत्तर प्रदेश 🌹
🌹🌹 जय श्री राम 🌹🌹
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