Shwetabh Pathak

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Spiritual Preacher आध्यात्मिक दिग्दर्शक
A Poet, A Writer , A Philosopher , Free Thinker, A Lyricist , Highly Enthusiastic MBA professional wit h balancing ideas of Spirituality
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भगवद्मार्ग से प्रेम है तो यहाँ जुड़िये -

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23/06/2026

स्त्रियों को शंख इस कारण नहीं बजाना चाहिए... जानिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण.. प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज जी द्वारा
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आँसू एक सहज प्रार्थना है.........!

तुम्हें अगर भगवान का नाम सुनकर आँसू आते हैं, अगर तुम्हें उनके नाम को लेकर आँसू आते हैं तो जिन्दगी के यही पल सार्थक हैं, मंगलदायी हैं । ये पल बिहारी जू की कृपा हैं, ये पल उनकी करुणा का प्रसाद हैं ।

आँसुओं को रोकना मत, उनको बहने देना, उन आँसुओं में बहुत कुछ कूडा़ कर्कट तुम्हारा बह जाएगा । तुम पीछे तरोताजा अनुभव करोगे । जैसे कि कोई स्नान हो गया हो ।

आँखों से कंजूसी मत करना, बहने दो इन आँसुओं को, ये आँसू भीतर उठती किसी रसधार की खबर हैं । बस, इतना ख्याल रहे कि इन आँसुओं को अपनी मस्ती जरुर बना लेना ।

इन आँसुओं को अपना रस, अपना आनन्द बनाना है । उन बिहारी जू के लिए यही तुम्हारी सरल, सहज और निर्मल प्रार्थना है ।

अगर तुम खुलकर हृदय से उनके लिए रोना सीख लेते हो तो समझो इससे आगे कुछ और नहीं चाहिए, उनको रिझाने के लिए ।

क्योंकि रोते-रोते ही हँसना आ जाता है । उनके लिए रोना ही सबसे सरल और सबसे सहज साधन है, इसलिए उनको रिझाने के लिए रोओ ।

दरअसल आँसुओं से बड़ी और कोई प्रार्थना नहीं है । इसलिए हृदय पूर्वक रोओ ।

आँसू निखारेंगे तुम्हें, बुहारेंगे तुम्हें, जो व्यर्थ है वह बाहर निकल जाएगा ।

जो सार्थक है, निर्मल है, वह स्फटिक मणि की भांति स्वच्छ होकर भीतर जगमगाने लगेगा ।

रे मन ! अब तू भी कृष्ण नाम में डूब जा........

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22/06/2026

सभी को राधे राधे 🙏🙏💐
प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज जी के सानिध्य में हमारे अगले वर्ष तक के आगामी कार्यक्रम।
शरद पूर्णिमा पंच दिवसीय श्वेत प्रेम रस महोत्सव वृंदावन में 24 अक्टूबर से 28 अक्टूबर,2026 आयोजित किया जाएगा।
सभी अपना रजिस्ट्रेशन शीघ्र करवा लीजिए ।
कुछ स्थान ही बचे हैं।
वरना बाद में सभी को अपने आवास निवास की व्यवस्था स्वयं देखनी होगी क्योंकि वृंदावन में तुरंत में निवास मिलना अति दुष्कर है।
साथ ही साथ बड़ा महंगा भी होता है।
पांच दिवसीय समागम, शुल्क 5500 रुपये।(आवास, तीन समय भोजन प्रसादी)
गूगल लिंक पर जाकर फॉर्म भरिए और रजिस्ट्रेशन कीजिए। रजिस्ट्रेशन शुल्क 1,000rs.

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गूगल फॉर्म👆👆
Shwetabh Pathak

22/06/2026

नारीस्तनभरनाभीदेशम्, दृष्ट्वा मागा मोहावेशम् ।
एतन्मान्सवसादिविकारम्, मनसि विचिन्तय वारं वारम् ।।

भजगोविन्दं भजगोविन्दं, गोविन्दं भजमूढमते ।
नामस्मरणादन्यमुपायं, नहि पश्यामो भवतरणे ।।

स्त्री शरीर पर मोहित होकर आसक्त मत हो। अपने मन में निरंतर स्मरण करो कि ये मांस-वसा आदि के विकार के अतिरिक्त कुछ और नहीं हैं ।।

गोविंद को भजो, गोविन्द का नाम लो, गोविन्द से प्रेम करो क्योंकि भगवान के नाम जप के अतिरिक्त इस भव-सागर से पार जाने का अन्य कोई मार्ग नहीं है ।
Shwet Prem Ras

22/06/2026

मोहिं पिय बिनु कछु न सुहाये री !
पिहु पिहु टेरत जबहिं पपीहा , पिय पिय नाम सुनाये री !
कुहूँ कुहूँ कूक कोयलिया बोलत , हूक करेजे उठाये री !
चारु चन्द्र की चाँदनी शीतल , तन और मन सुलगाये री !
जल बरसत जब सावन भादों , विरहा अगनि लगाये री !
कुसुमित जबहिं वसंत वाटिका , मन प्रदेश कुम्हलाये री !
वारि पूर्ण घनश्याम मेघ लखि , श्वेत मेघ बन जाये री !
अब तो “श्वेत” मन जहँहि लखहु तहँ , कण कण कृष्ण लखाये री !

- Shwetabh Pathak ( श्वेताभ पाठक )
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भावार्थ :: एक श्याम प्रेम विरह से व्याकुल होकर विरहिणी अपनी सखी से कहती है कि अब मुझे बिना श्यामसुंदर के कुछ भी अच्छा नहीं लगता !
जब पपीहा पिहू पिहू बोलता है तो ऐसा लगता है मानो वह भी विरह से व्याकुल होकर पिय पिय की आवाज लगाकर बुला रहा हो !
कोयल की कूक भी अब मुझे अच्छी नहीं लगती बिना श्यामसुंदर के , उसकी कूक ऐसी लगती है मानो ह्रदय को कोई बेंध रहा हो !
ये चन्द्रमा की शीतल चाँदनी भी मेरे तन और मन को और सुलगा देती है !
जब वर्षा ऋतु में सावन और भादों का जल बरसता है तो वह और विरह की ज्वाला को प्रज्वलित कर देती है !
वसंत में जब वाटिका में फूल खिलते हैं तो श्यामसुंदर के वियोग और विरह में मेरा मन और ह्रदय कुम्हला जाता है !
जल से भरे काले काले बादल भी मुझे सफ़ेद बादल के समान प्रतीत होते हैं जिनमें जल का अभाव होता है !
अब तो श्यामसुंदर के वियोग में यह स्थिति आ गयी है कि जहां भी देखती हूँ , मुझे कण कण में बस कृष्ण कृष्ण ही नज़र आते हैं !

Moral :: प्रियतम के अभाव में संसार की समस्त आनंद देने वाली वस्तुएं भी दुखदाई सी लगती हैं ! मन जब तक प्रसन्न है तब तक यह संसार प्रसन्न दीखता है , मन उदास है तो सम्पूर्ण संसार सारहीन लगता है !
"चित्तमेव ही संसारः "
सब कुछ मन ही है ! सम्पूर्ण संसार मन पर आश्रित है !

" मिलन में प्रियतम एक ही जगह दिखाई पड़ता है परन्तु विरह में प्रियतम सर्वत्र दिखाई पड़ता है , इसीलिए विरह मिलन से श्रेष्ठ माना गया है ! "

Shwet Prem Ras

22/06/2026

दुर्लभा: पुरुषा लोके भगवद्भक्ति मानसा: !
तेषां संगो भवेद्यस्य तस्य शांतिर्हि शाश्वती !!

- नारदपुराण

इस संसार में भगवद्भक्ति से युक्त मन वाले लोग दुर्लभ हैं अत्यंत दुर्लभ हैं , उनका संग जिसे प्राप्त होता है , उसे शाश्वत शांति प्राप्त होती है ।
उनका क्षणिक संग भी सामान्य व्यक्तियों में भगवद्भक्ति के बीज रोपण में सहायक है ।

क्योंकि :-

किं भयमूलमदृष्टम किं शरणं श्री हरेर्भक्त: !
किं प्रार्थय तद्भक्तिः किं सौख्यम् तत्परप्रेम !!

भय का हेतु क्या है ??? पूर्व जन्मों में किये हुए शुभाशुभ कर्म ।
परम आश्रय कौन है ? भगवान का भक्त
माँगने योग्य वस्तु क्या है ?? भगवान की भक्ति
सुख क्या है ? भगवान की भक्ति और उनका अनन्य प्रेम ।

इसलिए संसार में शरीर से सब कर्म करते हुए मन बुद्धि में यह लक्ष्य सदा पुष्ट रहे कि :-

भज गोविंदं भज गोविंदं गोविंदं भज मूढ़मते ।

और इस भाव की पुष्टि केवल और केवल भगवद्भक्तों के निरंतर संग से ही पुष्ट होगी अतः उनका संग सर्वस्व न्योछावर कर के भी मिले तब भी कम है ।

- Shwetabh Pathak ( श्वेताभ पाठक )
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21/06/2026

भगवान के प्रति कैसे भगवद भाव बनाएं??
प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज द्वारा रहस्य उद्घाटन।
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î

21/06/2026

बेल के शरबत से मोक्ष प्राप्ति😱
प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज जी द्वारा रहस्य उद्घाटन
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21/06/2026

१. योगा योगा सब करें , करे न कोई योग !
सही योग जो भी करे , मिटे मानसिक रोग !!

2. योगों का सम्बन्ध है , मन से इक तू मान !
तन तो केवल हेतु है , बने सहायक जान !!

3. जग से मन हटने लगे , बढ़े ईश से प्रीति !
यही योग का लक्ष्य है , यही योग की रीति !!

४. केवल तन का मोड़ना , नहीं योग यह जान !
भोगों से मन मोड़ना , यही योग का ज्ञान !!

5. तन को केवल मोड़ना , नहीं योग से न्याय !
मन को प्रभु से जोड़ना , यही एक अभिप्राय !!

६. मन बुद्धि अरु चित्त का , कर तू नित संधान !
तभी सफल तू जान यह , यौगिक अनुसंधान !!

७. कर्म ज्ञान अरु भक्ति हैं , यौगिक तीन प्रकार !
योग क्रिया वह है सफल , जो इनके अनुसार !!

८. चित्त की सारी वृत्ति का , जिसने किया निरोध !
मन के नित उत्कर्ष के , मिटे सभी अवरोध !!

९. योगी कहलाये वही , ली जिसने है जोड़ !
स्वयं को ईश से अरु लिया , भोगों से मन मोड़ !!

10. 'स्वयं' औ 'उसको' जानना , योग क्रिया अनुसार !
'स्वयं' को 'उससे' जोड़ना , यही योग का सार !!

११. मन ही हेतुहिं कर्म है , मन ही हेतुहिं धर्म !
मन ही हेतुहिं भक्ति है , यही योग का मर्म !!

१२. प्रेय मार्ग को छोड़कर , गहो मार्ग इक श्रेय !
यही योग का लक्ष्य है , यही योग का ध्येय !!

- Shwetabh Pathak ( श्वेताभ पाठक )
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