Vir Singh

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11/04/2026

कबीर जाति ना पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान।
मोल करो तलवार की, पड़ी रहने दो म्यान।।

SA News Rajasthan (@SANewsRajasthan) on X 12/03/2026

गैस सिलेंडर की किल्लत हो गया है।

SA News Rajasthan (@SANewsRajasthan) on X

12/03/2026

कबीरा, तेरी जगत में, ऐसीं देखीं रीत।
पापी मिलकर राज करें, साधु मांगें भीख।।

11/03/2026

कबीर,राम नाम कड़वा लागे मीठे लागे दाम।
दुविधा में दोनों गये, माया मिली ना राम। #राम_रंग_होरी_हो

11/03/2026

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डगर है मुश्किल कठिन सफर है लम्बे समय चल रहें एक दिन पाना जरूर हैं।

05/03/2026

कलयुग में सतयुग की शुरुआत।
रोटी, कपड़ा, शिक्षा चिकित्सा और मकान, हर गरीब को देगा कबीर भगवान।। #राम_रंग_होरी_हो #निमंत्रणसंसारको_सम्मानकेसाथ

05/03/2026

संत रामपाल जी भगवान की जय हो #राम_रंग_होरी_हो #निमंत्रणसंसारको_सम्मानकेसाथ

05/03/2026

डगर है मुश्किल कठिन सफर है लम्बे समय चल रहें एक दिन पाना जरूर हैं।
🙏सतलोक धाम 🙏

04/03/2026

शब्द स्वरूपी राम सतगुरु रामपाल जी महाराज आकाश मार्ग से आए प्रभु सतलोक है धाम।

#राम_रंग_होरी_हो

गुरु देव भगवान मेरे 🙏🏻🙏🏻🙏🏻😭😭😭🙏🏻🙏🏻🙏🏻कबीर, मधुर वचन है औषधि, कटुक बचन तीर।
ज्ञानी मारे ज्ञान से, भेदै सकल शरीर।।

04/03/2026

मूर्खों के देश अलग नहीं बसते, एक लेडिस मुरख 🤪🤪🤪 पाए जाते हैं भारत में।

कृपा पाठक पढ़े निम्न अमृतवाणी परमेश्वर कबीर साहेब जी द्वारा उच्चारित:-
धर्मदास यह जग बौराना। कोई न जाने पद निरवाना।।1।।
यहि कारन मैं कथा पसारा। जगसे कहियो राम नियारा।।
यही ज्ञान जग जीव सुनाओ। सब जीवों का भरम नशाओ।।2।।
भरम गये जग वेद पुराना। आदि राम का का भेद न जाना।।3।।
राम राम सब जगत बखाने। आदि राम कोई बिरला जाने।।4।।
ज्ञानी सुने सो हिरदै लगाई। मूर्ख सुने सो गम्य ना पाई।।5।।
अब मैं तुमसे कहूँ चिताई। त्रिदेवन की उत्पत्ति भाई।।6।।
कुछ संक्षेप कहूँ गौहराई। सब संशय तुम्हरे मिट जाई।।7।।
माँ अष्टंगी पिता निरंजन। वे जम दारुण वंशन अंजन।।8।।
पहिले कीन्ह निरंजन राई। पीछे से माया उपजाई।।9।।
माया रूप देख अति शोभा। देव निरंजन तन मन लोभा।।10।।
कामदेव धर्मराय सत्ताये। देवी को तुरतही धर खाये।।11।।
पेट से देवी करी पुकारा। साहब मेरा करो उबारा।।12।।
टेर सुनी तब हम तहाँ आये। अष्टंगी को बंद छुड़ाये।।13।।
सतलोक में कीन्हा दुराचारि, काल निरंजन दिन्हा निकारि।।14।।
माया समेत दिया भगाई, सोलह संख कोस दूरी पर आई।।15।।
अष्टंगी और काल अब दोई, मंद कर्म से गए बिगोई।।16।।
धर्मराय को हिकमत कीन्हा। नख रेखा से भगकर लीन्हा।।17।।
धर्मराय किन्हाँ भोग विलासा। माया को रही तब आसा।।18।।
तीन पुत्र अष्टंगी जाये। ब्रह्मा विष्णु शिव नाम धराये।।19।।
तीन देव विस्त्तार चलाये। इनमें यह जग धोखा खाये।।20।।
पुरुष गम्य कैसे को पावै। काल निरंजन जग भरमावै।।21।।
तीन लोक अपने सुत दीन्हा। सुन्न निरंजन बासा लीन्हा।।22।।
अलख निरंजन सुन्न ठिकाना। ब्रह्मा विष्णु शिव भेद न जाना।।23।।
तीन देव सो उनको धावें। निरंजन का वे पार ना पावें।।24।।
अलख निरंजन बड़ा बटपारा। तीन लोक जिव कीन्ह अहारा।।25।।
ब्रह्मा विष्णु शिव नहीं बचाये। सकल खाय पुन धूर उड़ाये।।26।।
तिनके सुत हैं तीनों देवा। आंधर जीव करत हैं सेवा।।27।।
अकाल पुरुष काहू नहीं चीन्हां। काल पाय सबही गह लीन्हां।।28।।
ब्रह्म काल सकल जग जाने। आदि ब्रह्म को ना पहिचाने।।29।।
तीनों देव और औतारा। ताको भजे सकल संसारा।।30।।
तीनों गुण का यह विस्त्तारा। धर्मदास मैं कहों पुकारा।।31।।
गुण तीनों की भक्ति में, भूल परो संसार।।32।।
कहै कबीर निज नाम बिन, कैसे उतरैं पार।।33।।


#राम_रंग_होरी_हो

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