Yatra55

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Photos from Yatra55's post 16/02/2026

गोवा का नाम सुनते ही ज्यादातर लोगों के दिमाग में बस एक ही तस्वीर उभरती है —
बीच, पार्टी, फ्रॉक्स, कोल्ड ड्रिंक्स, लाउड म्यूजिक और समंदर के किनारे नाच-गाना।

पर इन चमचमाते लाइट्स, डीजे बीट्स और टूरिस्ट भीड़ के ठीक बीच में,
सदियों से चुपचाप खड़ा है एक ऐसा स्थान,
जहाँ सनातन की गहरी साँस चल रही है।

वो स्थान है — महादेव मंदिर, तांबड़ी सुरला।
गोवा का सबसे प्राचीन जीवित हिंदू मंदिर,
जो 12वीं शताब्दी का है।

पुर्तगाली आगमन के बाद गोवा में सैकड़ों भव्य मंदिरों को
तोड़ दिया गया, जलाया गया, मस्जिद-चर्च में बदल दिया गया।

लेकिन यह छोटा-सा शिवालय अपनी प्राचीन गरिमा के साथ
आज भी अडिग खड़ा है — जैसे कह रहा हो:
“मैं टूटा नहीं, मैं झुका नहीं, मैं रहा हूँ और रहूँगा।”

कदंब राजवंश के समय निर्मित यह मंदिर
कर्नाटक की प्राचीन शिल्पकला का अनुपम उदाहरण है।

बादामी-ऐहोल शैली से मिलता-जुलता शिल्प,
बेहतरीन बेसाल्ट पत्थरों से तराशा हुआ।

छोटा मंडप, ब्रह्मा-विष्णु-महेश की सूक्ष्म नक्काशी,
नंदी की शांत मुद्रा और कदंबों का प्रतीक — हाथी का चित्रण।

गुंबद अधूरा-सा लगता है,
मानो समय ने इसे पूरा होने से पहले ही छोड़ दिया हो।

यह गोवा का एकमात्र ऐसा मंदिर है जो
न तो विदेशी आक्रमणों में ढहा,
न पुर्तगालियों की तोपों और आग में जल सका।

यह कदंब काल की आखिरी जीवित निशानी है
जो आज भी साँस ले रही है।

मंदिर के ठीक पास बहती है सुरला नदी —
शांत, निर्मल, जैसे महादेव के चरणों में सिर झुकाए बैठी हो।

साल भर यहाँ शांति रहती है, पर्यटक कम आते हैं।

लेकिन महाशिवरात्रि की रात
जब बेल-पत्र, धतूरा और भांग की महक हवा में फैलती है,
तो पूरा इलाका जाग उठता है।

मेला लगता है, भजन गूंजते हैं
और वो सनातन चेतना फिर से जीवंत हो उठती है।

तो अगली बार जब गोवा जाने का प्लान बने,
तो सिर्फ बीच और पार्टी ही नहीं —

थोड़ा समय निकालकर तांबड़ी सुरला भी जाना।

जहाँ समंदर की लहरों से ज्यादा गहरी आवाज गूंजती है
हर हर महादेव 🔱
#गोवा #महादेवमंदिर #तांबडी़सुरला #भारत

Photos from Yatra55's post 15/02/2026

एक शिवलिंग ऐसा है…
जिसके सामने खड़े होते ही साँस थम जाती है।
नज़रें हटाना नामुमकिन हो जाता है।
और बिना सोचे समझे सिर झुक जाता है।
क्योंकि वो सिर्फ़ पत्थर नहीं लगता…
वो तुम्हें देख रहा होता है।

गर्भगृह में कदम रखते ही समय रुक जाता है।
ऊपर गोल गुम्बद जैसी प्राचीन छत, चारों तरफ़ पत्थरों से निकलती गहरी गूंज,
और ठीक सामने — वो चमकता, फूलों-चंदन-बेलपत्र-दूध से लिपटा हुआ लिंग…
जैसे कोई साक्षात् भगवान खड़ा हो और आपकी तरफ़ देख रहा हो।

यह मंदिर नागर शैली का अनमोल नमूना है।
बिना स्टील, बिना सीमेंट के 1000 साल से खड़ा है।
पत्थरों को इतनी बारीकी से जोड़ा गया है कि भूकंप भी इसे हिला नहीं पाता।
गर्भगृह की गोलाकार छत मंत्रों और घंटी की आवाज़ को इस तरह गूंजाती है कि हर शब्द कई गुना गहरा हो जाता है – यह प्राचीन एकॉस्टिक इंजीनियरिंग का चमत्कार है।
सूरज की रोशनी और हवा का प्रवाह भी इतनी समझदारी से डिज़ाइन किया गया कि गर्मी में भी यहाँ ठंडक और शांति बनी रहती है।
और सबसे खास बात – यहाँ बैठकर ध्यान करने पर मन बहुत जल्दी गहरी शांति में चला जाता है, जैसे मस्तिष्क की तरंगें खुद-ब-खुद अल्फा और थीटा स्टेट में उतर आती हैं।

हमारे पूर्वज सिर्फ़ भक्त नहीं थे – वे महान वैज्ञानिक और इंजीनियर भी थे।

खजुराहो के मुख्य मंदिर समूह के ठीक बगल में, लेकिन दीवार के बाहर स्थित यह मंदिर आज भी जीवंत है।
यहाँ रोज़ सुबह-शाम आरती होती है, भक्तों की कतार लगी रहती है।

अगर कभी खजुराहो जाओ तो सबसे पहले यहीं आना।
बाकी सब मंदिर बाद में देख लेना।
क्योंकि जहाँ सबसे बड़ा और सबसे जीवंत शिवलिंग है,
वहीँ से सच्ची यात्रा की शुरुआत होती है।
📍मातंगेश्वर मंदिर ,खजुराहो ,मध्य प्रदेश

हर हर महादेव 🔱
#मातेश्वर # #मंदिर #खजुराहो #मध्यप्रदेश #भारत

Photos from Yatra55's post 01/01/2026

2025 बहुत कुछ जीवन में उथल-पुथल लेकर आया, लेकिन मेरी ज़िंदगी का सबसे बड़ा नुकसान मेरी प्यारी माँ को खोना था, जो मेरे जीवन का सबसे कीमती हिस्सा थीं!

वह इस नवम्बर हमें छोड़कर चली गईं, फिर भी ऐसा लगता है कि वह हमारे आस-पास हैं — हमारी यादों में, उनकी प्यारी मुस्कान और उस प्यार में जो वह हमेशा देती थीं!

मुझे उनकी हर छोटी-छोटी बातें याद आती है — उनके कॉल, उनकी आवाज़, उनकी प्यार, और जिस तरह से वह हमेशा मेरे लिए समय निकालती थीं! कुछ लोग आपके दिल पर हमेशा के लिए अपनी छाप छोड़ जाते हैं... वह मेरी माँ थी!

सबसे मुश्किल काम है जाने देना, लेकिन मुझे लगता है कि वह हमेशा मेरे आस-पास रहती है ! वह हमेशा मेरे दिल में, मेरी यादों में, और मेरे हर काम में ज़िंदा रहेंगी!

मुझे आपकी याद आती है... हर एक दिन!🙏❤️

16/12/2025

एक रूह की कहानी😕

मेरा नाम अलेक्स क्लेटमैन था। जब आप ये कहानी पढ़ रहे हैं, तब मेरी उम्र सत्तासी वर्ष की है—और मैं इस संसार से विदा ले चुका हूँ। दो दिन हो गए हैं। आज मेरी देह नहीं, केवल मेरी रूह आपके सामने खड़ी है। रूह इसलिए नहीं कि कोई बदला माँगूँ, बल्कि इसलिए कि मेरी कहानी अधूरी न रह जाए!

मैं मज़हब से यहूदी था, पर बचपन से ही मैंने सीख लिया था कि मज़हब कभी-कभी पहचान नहीं, सज़ा बन जाता है। जब जर्मनी में द्वितीय विश्व युद्ध की आग भड़की और एक तानाशाह ने यहूदियों की नस्ल मिटाने का इरादा कर लिया, तब मैं एक अबोध बालक था। मुझे खेलना चाहिए था, पर मैं मौत की कतारों में खड़ा होना सीख रहा था। माँ की उँगली थामे, पिता की आँखों में डर पढ़ते हुए, मैं उन शिविरों में था जहाँ रोज़ इंसानों को गिना नहीं जाता था—बस ख़त्म किया जाता था!

कभी जहरीली गैस से, कभी फाँसी से, कभी बंदूकों की नली के सामने खड़ा कर के। वहाँ रोना भी अपराध था और जीना भी। फिर भी, न जाने कैसी दया थी कि मैं, मेरी माँ और मेरा बड़ा भाई उस नर्क से भाग निकले। बाक़ी सब—मेरे पिता, मेरे भाई-बहन—वहीं रह गए। उनकी कोई क़ब्र नहीं, कोई आख़िरी शब्द नहीं। बस धुआँ!

हम साइबेरिया पहुँचे। लोग कहते हैं वहाँ की ठंड जान ले लेती है, पर सच ये है कि उस बर्फ़ीली हवा में भी इंसानियत थी। हवा शरीर चीरती थी, पर नफ़रत नहीं बोती थी। कई महीनों तक ठंड से जूझते हुए, भूख और थकान से लड़ते हुए, हम आखिरकार अपने पूर्वजों की धरती पहुँचे—मूसा की भूमि। वहीं मैंने फिर से जीवन शुरू किया!

मैं जवान हुआ। मैंने लारिसा से विवाह किया। उसकी मुस्कान में मुझे वो दुनिया दिखती थी जो शिविरों में छिन गई थी। हमारे बच्चे हुए। रोज़ी-रोटी के लिए हम यूक्रेन गए। बच्चे बड़े हुए, पर इतिहास नहीं बदला। रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू हो गया। मैंने सोचा था, इतने क़त्लों के बाद दुनिया थक जाएगी—पर दुनिया कभी नहीं थकती, वो बस नए मैदान चुनती है!

उम्र मुझ पर हावी होने लगी। बच्चों ने तय किया कि अब हमें ऑस्ट्रेलिया ले चलें। वहाँ हम एक यहूदी ओल्ड एज होम में रहने लगे। मैं सत्तासी का था, लारिसा कुछ साल छोटी। हमने इतनी विभीषिकाएँ देखी थीं कि बुढ़ापा हमें स्वर्ग जैसा लगता था—शांत, धीमा, सुरक्षित!

दो दिन पहले हनुक्का था। दीयों का पर्व। हम बोंदी बीच गए—समुद्र देखने, रोशनी मनाने। लहरें शांत थीं, आसमान खुला था, और मैंने लारिसा का हाथ थामा हुआ था। इतने युद्धों के बाद उस पल मुझे लगा—शायद अब इतिहास ने हमें छोड़ दिया है!

तभी अचानक गोलियों की आवाज़ गूँजी। नारे चीखे। अफ़रा-तफ़री मच गई। दस साल की मासूम बच्ची मटिल्डा गिर पड़ी। एक रब्बी ज़मीन पर ढह गया। जिन चेहरों पर अभी धूप थी, उन पर अचानक अँधेरा छा गया। लारिसा को भी गोलियाँ लगती किंतु मैंने कुछ नहीं सोचा। न डर, न यादें। बस उसके सामने खड़ा हो गया। वो बच गई और मैं यहोवा की शरण में जा पहुँचा!

गोलियाँ मेरे शरीर में उतरीं और मैं वहीं गिर गया!

होलोकॉस्ट मुझे नहीं मार पाया। साइबेरिया की ठंड मुझे नहीं तोड़ पाई। युद्ध मुझे नहीं खा सका। बुढ़ापा मुझे नहीं हरा सका। लेकिन दो ऐसे लोग—जिन्हें मैं जानता भी नहीं था, जिन्होंने मेरा नाम भी नहीं सुना था—उन्होंने मुझे मार दिया!

मेरा क़त्ल सिर्फ़ उन्हीं दो का गुनाह नहीं है। मेरा क़त्ल हर उस इंसान के ज़िम्मे है जो इस हिंसा को जायज़ ठहराएगा, जो किसी मासूम की मौत पर “लेकिन” लगाएगा, जो नफ़रत को तर्क पहनाएगा!

मैं मर चुका हूँ। अब मुझे इंसाफ़ नहीं चाहिए। बस इतना चाहता हूँ कि अगली बार जब कोई बूढ़ा आदमी अपनी पत्नी का हाथ पकड़कर समुद्र देख रहा हो—तो इतिहास फिर से ट्रिगर न दबाए!

अब मेरी कहानी ख़त्म हुई!
और मैं…
ख़ामोश हूँ!

Photos from Yatra55's post 12/12/2025

पूर्वी चीन के शेडोंग प्रांत में स्थित रोंगचेंग शहर को "चीन की केल्प राजधानी" या "समुद्री शैवाल राजधानी" के रूप में जाना जाता है, जो देश के कुल केल्प उत्पादन का लगभग 40-50% हिस्सा उत्पादित करता है! यहाँ समुद्री खेती एक प्रमुख उद्योग है!
अगस्त से मध्य नवंबर तक का समय नर्सरी का मुख्य मौसम होता है, इस दौरान छोटे पौधों को कार्यशाला के टैंकों से खुले पानी में ले जाने के लिए तैयार किया जाता है! समुद्री शैवाल की खेती स्थायी जलीय कृषि का एक रूप है जिसे ताजे पानी, कीटनाशकों या उर्वरकों की आवश्यकता नहीं होती है!
केल्प स्थानीय मत्स्य पालन अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, जिसमें लगभग 90,000 लोग खेती में शामिल हैं!

04/12/2025

ये नियति का खेल है! इस तस्वीर में परेशान,बेहाल और अनमना सा दिखने वाला ये हिन्दुस्तानी लड़का एक मशहूर अदाकारा के साथ जर्मनी की एक मेट्रो में बैठा है जिसे वह नहीं जानता! देखते देखते ये तस्वीर तेज़ी से पूरे जर्मनी में वायरल हो जाती है!

मशहूर जर्मन मैगज़ीन “डेर स्पीगल” ने तस्वीर में दिख रहे भारतीय युवक को जर्मनी में ढूंढना शुरू किया! आखिरकार यह तलाश म्यूनिख में खत्म हुई, जहाँ पता चला कि वह भारतीय युवक गैर-कानूनी तरीके से जर्मनी में रह रहा है!

पत्रकार ने उससे पूछा: “क्या तुम्हें पता है कि तुम्हारे बगल में बैठी गोरी लड़की ‘मेसी विलियम्स’ थी-मशहूर सीरीज़ गेम ऑफ़ थ्रोन्स की हीरोइन? दुनिया भर में उसके लाखों फ़ैन हैं जो सिर्फ़ उसके साथ सेल्फ़ी लेने का सपना देखते हैं, लेकिन तुमने बिल्कुल भी रिएक्ट नहीं किया! क्यों?”

युवक ने शांति से जवाब दिया:“जब तुम्हारे पास रहने का परमिट नहीं है, तुम्हारी जेब में एक भी यूरो नहीं है, और तुम हर दिन ट्रेन में ‘गैर-कानूनी’ तरीके से सफ़र करते हो, तो तुम्हें फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम्हारे बगल में कौन बैठा है!”

उसकी ईमानदारी और हालत से इम्प्रेस होकर, मैगज़ीन ने उसे 800 यूरो महीने की सैलरी पर पोस्टमैन की नौकरी ऑफ़र की! इस जॉब कॉन्ट्रैक्ट की वजह से, उसे तुरंत बिना किसी मुश्किल के रेगुलर रहने का परमिट मिल गया!

यह कहानी हमें बताती है कि नियति कैसे काम करती है! हर अगली घटना, पिछली घटना से जुड़ी है और हर मौजूदा घटना भविष्य की किसी घटना से! सबकुछ पूर्व नियोजित है! जैसे एक स्क्रिप्ट लिखी हुई है जिस पर जिंदगी की पिक्चर चल रही है! किसकी किस्मत में आगे क्या लिखा है ये किसी को नहीं मालूम!

#नियति_का_खेल #जर्मनी #भारतीय #भारत

Photos from Yatra55's post 29/11/2025

#ईश्वर माँ की आत्मा को अपने चरणों की छाया में अनंत शांति प्रदान करें🙏

Photos from Yatra55's post 25/11/2025

राम रामेति रामेति, रमे रामे मनोरमे!
सहस्रनाम तत्तुल्यं, रामनाम वरानने!!

यह मंत्र कहता है कि "राम, राम, राम" का जाप करने से मन को शांति मिलती है और यह जाप "विष्णु सहस्त्रनाम" (विष्णु के 1000 नामों) के जाप के बराबर है। यह मंत्र भगवान शिव और पार्वती के बीच संवाद के रूप में भी जाना जाता है, जहां शिव कहते हैं कि वह राम नाम का जाप इसलिए करते हैं क्योंकि यह मन को प्रसन्न करता है और भगवान के हजारों नामों के समान शक्तिशाली है!

"राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे": इसका अर्थ है कि मैं "राम, राम, राम" का जाप करता हूँ, और यह मंत्र मेरे मन को आनंद देता है और उसे भगवान की भक्ति में रमण कराता है!

"सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने": इसका अर्थ है, हे "वरानने" (सुंदर मुख वाली देवी), यह "राम नाम" विष्णु के हजार नामों के बराबर है!

25/11/2025
Photos from Yatra55's post 13/11/2025

सुखी रहने में ज्यादा खर्च नहीं होता...! लेकिन हम कितने सुखी हैं ये लोगों को दिखाने में बहुत खर्च होता है फिर भी अंदर से लोग दुखी होते हैं!!💐🌺💫

Photos from Yatra55's post 24/10/2025

छठ पर्व एक प्राचीन हिंदू त्योहार है जो सूर्य देव और छठी मैया (षष्ठी देवी) को समर्पित है! यह पर्व मुख्य रूप से भारत के बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश राज्यों में धूमधाम से मनाया जाता है, लेकिन अब यह भारत के अन्य हिस्सों और विदेशों में भी लोकप्रिय हो गया है! यह चार दिनों का व्रत है, जिसे अत्यधिक शुद्धता, त्याग और भक्ति के साथ मनाया जाता है! छठ पर्व के चार दिनों में से खरना दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण दिन होता है! खरना का अर्थ है शुद्धिकरण, और यह दिन शरीर और मन की पूरी तरह से शुद्धि के लिए समर्पित है! इस दिन के बाद ही 36 घंटे का कठिन निर्जला व्रत शुरू होता है!

👀 छठ पर्व की शुरुआत से जुड़ी कई पौराणिक मान्यताएँ हैं:--

महाभारत काल:- एक मान्यता के अनुसार, पांडवों के जुए में अपना राज-पाट खोने के बाद द्रौपदी ने यह व्रत रखा था, जिसके प्रभाव से उन्हें सबकुछ वापस मिल गया!

सूर्यपुत्र कर्ण:- एक अन्य मान्यता के अनुसार, सूर्यपुत्र कर्ण प्रतिदिन गंगा तट पर खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते थे!

माता सीता:- रामायण काल में, भगवान राम के अयोध्या लौटने के बाद, माता सीता ने ऋषि मुद्गल की विधि के आधार पर सूर्य देव की उपासना करके छठ पूजा की थी!

👀 चार दिवसीय छठ पूजा:--

नहाय-खाय:- पर्व के पहले दिन, व्रती गंगा या किसी पवित्र नदी में स्नान करते हैं और सात्विक भोजन करते हैं, जिसमें कद्दू-भात और चना दाल प्रमुख हैं!

खरना:- दूसरे दिन, व्रती पूरे दिन निर्जला उपवास रखते हैं।! शाम को गुड़ की खीर और रोटी का प्रसाद बनाकर सूर्य देव को भोग लगाते हैं, और फिर यह प्रसाद ग्रहण करते हैं!

संध्या अर्घ्य:- तीसरे दिन, व्रती और उनके परिवार के सदस्य नदी या तालाब के घाट पर इकट्ठा होते हैं! यहाँ, वे बांस की टोकरी में विभिन्न प्रसाद (ठेकुआ, फल आदि) लेकर डूबते सूर्य को अर्घ्य देते हैं!

उषा अर्घ्य:- चौथे और अंतिम दिन, सूर्योदय से पहले घाट पर पहुँचकर उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है! इसके बाद, व्रती प्रसाद ग्रहण करके अपना 36 घंटे का निर्जला व्रत तोड़ते हैं!

👀 छठ पूजा में कुछ खास प्रसाद और सामग्री का प्रयोग होता है:--

ठेकुआ:- यह गेहूं के आटे और गुड़ या चीनी से बनाया जाने वाला एक पारंपरिक प्रसाद है!

कसार:- यह चावल के आटे और गुड़ से बना लड्डू होता है!
बाँस की टोकरी (सूप) प्रसाद को बाँस की टोकरी में सजाकर अर्घ्य दिया जाता है!

गीत:- पर्व के दौरान महिलाएं पारंपरिक छठ गीत गाती हैं, जिससे भक्तिमय माहौल बनता है!

👀 पर्व का महत्व:--

संतान सुख और समृद्धि:- यह व्रत संतान के स्वास्थ्य, दीर्घायु और सुख-समृद्धि की कामना के लिए रखा जाता है!

वैज्ञानिक महत्व- वैज्ञानिक दृष्टि से भी इसका विशेष महत्व है! यह व्रत सूर्य की पराबैंगनी किरणों के हानिकारक प्रभावों से बचाने में सहायक होता है!

प्रकृति की पूजा:- यह पर्व प्रकृति, जल और सूर्य की उपासना से जुड़ा है, जो जीवन में ऊर्जा और सकारात्मकता के महत्व को दर्शाता है!

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