Subhash Neerad
A place of emotions and love
23/06/2026
कुछ भी बाक़ी कहाँ अब पहले जैसा
न तुम हो, ना तुम्हारी यादें ही जगाऐ हैं।
ना ख़्वाब ही तुम्हारे नींदें उचाटते हैं
ना घनेरी ज़ुल्फों की खश्बूऐं ही आऐं हैं ।
जंगल उग आऐ हैं मुंडेरों,खिड़कियों में
चमगादड़ों की वहशियाना आवाजें डराऐ हैं ।
जहाँ कभी सजती थीं महफिलें मौसिक़ी की
वहाँ अब कूछ गै़वी साऐ सरसराऐ हैं ।
तुम होतीं तो हम भी रहते हंसते खिलखिलाते
उजड़े दयार हैं अब जो रहे कभी रौनके सरमाऐ हैं ।
@नीरद
23/06/2026
तन्हाईयों में गूंजता है तेरा ही नाम
अब तो इश़्क की रंगत बदलने लगी हैं ।
चीख़ती हैं ख़ामुशियाँ पूरे घर में
उदासियों भी सुर बदलने लगी हैं।
बुझने लगे हैं अब तो ड्योढ़ी के चराग़
सियाह रातें, रौशन सुबह में ढलने लगी हैं ।
@नीरद
23/06/2026
रात भर नींद मुस्कुराई ख्वाब में
गुफ़्तगू सीने से लिपट कर हमने की रात भर
अंधेरे पसरे हुऐ थे चार सूं
जुगनुओं नें रौशन हयात की रात भर
वो लेटे रहे पहलू में हमारे खुद में सिमटे हुऐ
उनके बालों में उंगललियाँ फिराईं रात भर
ज़ख्म अठखेलियाँ करते रहे यादों के साथ
गज़ल की गोद भरते रहे हम रात भर।
नीरद
जिसके लिए बसाई थी हमने इश़्क़ की बस्तियां
वो मेरा दिलबर, मेरे दिल की बस्ती वीरान कर गया।
@नीरद
23/06/2026
दर्द की दौलत कमाई उम्र भर
आख़री वक़्त ,मरहम लगाया किस लिए।
बंद आँखों में पलते रहे सपने सलोने
आँख क्यूँ खोली ,हमको जगाया किस लिए
दिल में बसाया था इक घरौंदा तेरे नाम का
तोड़ कर ख्वाबों की बस्तियां, मरघट बनाया किस लिए।
@ नीरद
मिट्टी का है यह जिस्म
किसलिए इतनी मुहब्बत इस से
इतना लगाव, इतनी देखभाल, किस लिए
छूटी सांस, छुड़ा हाथ, मिल जाओगे मिट्टी में
जिस मिट्टी में खेले बड़े हुऐ
गिरे, संभले, उठे, उठ कर चले
उड़ाई धूल, धूसर हुऐ, धूसर किया जिन्हें
छोड़ संग, छुड़ा हाथ, मिल जाओगे मिट्टी में
दरकार थी जब मिले तो पूछते हाल हमारा
तुम तो गये वक़्त की ताबीर साथ लिये आऐ।
@नीरद
ब्रामहणों का कोई नहीं इस सरकार में
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