DeepakDwivedi

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वैदिक अनुष्ठान :-
समस्त प्रकार के पूजन कार्य ,श्रीमद्भागवत कथा , श्री राम कथा , कुंडली निर्माण ।

15/01/2026

आप सभी सादर आमंत्रित है ।

14/01/2026

आप सभी सादर आमंत्रित हैं 🙏🚩

12/06/2024

ईश्वर की सत्ता ही सर्वोच्च सत्ता है 🙏🚩

11/03/2023
14/03/2022

🌞: *पंडिताई का हरवा-हथियार।*
*क्रम से:*
*स्रुवा, प्रोक्षणी, प्रणीता, सलाका, स्रुची।*
[🌞: *यज्ञ-अनुष्ठानादि में हवनीय कार्य में प्रयोग लाये जाने वाले पात्र की जानकारी भुदेवो के लिए।*
*१. स्रुवा*:- ये एक विशेष लकड़ी की बनी हुई कलछी है। इसके सहारे हम हवनादि में घी की आहुति देते हैं।

*२. प्रोक्षणी*:- इस पात्र के माध्यम से हवन कुण्ड को जलप्रसेचित करते हैं। सामान्य अर्थ में समझें तो इस पात्र में जल लेकर हवन वेदी के बाहर निर्देशित मन्त्रों से चारों दिशाओं में जल डालते हैं। जल प्रसेचित करते समय भावना यह रहती है कि अग्नि के चारों ओर शीतलता का घेरा बना रहे, जो हम सबके लिए शान्तिदायी हो।
मन्त्र है:-
पूर्व में प्रसेचन का: ॐ अदितेऽनुमन्यस्व॥
पश्चिम में प्रसेचन मन्त्र: ॐ अनुमतेऽनुमन्यस्व॥
उत्तर में प्रसेचन मन्त्र: - ॐ सरस्वत्यनुमन्यस्व॥
चारों दिशाओं में प्रसेचन का मन्त्र: ॐ देव सवित: प्रसुव यज्ञं, प्रसुव यज्ञपतिं भगाय। दिव्यो गन्धर्व: केतपू:, केतं न: पुनातु, वाचस्पति: वाचं न: स्वदतु॥

*३. प्रणीता*: इसमें जल भरकर रखा जाता है। इस प्रणीता पात्र के जल में घी की आहुति देने के उपरान्त बचे हुए घी को “इदं न मम” कहकर टपकाया जाता है। बाद में इस पात्र का घृतयुक्त होठों एवं मुख से लगाया है जिसे 'संसव प्राशन' कहते हैं।

*४. वज्र-यज्ञ में अशुद्ध शक्तियों से संरक्षण करने के लिये उपय मनुकश के बाद यजमान के वाम हस्त में धारण करने के लिये उपयोग में लाया जाता है।

*५. स्रुची*: इसके माध्यम से यज्ञ अथवा हवन में मिष्ठान की पूर्णाहुति दी जाती है। मिष्ठान की इस आहुति को स्विष्टकृत होम कहते हैं। यह क्रिया यज्ञ अथवा हवन में न्यूनता को पूर्ण करने के लिए की जाती है।

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