Two Line Shayari

Two Line Shayari

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Two-Line Shayari... . DeepVardan Two line Shayari By Deep Ramrai

Bijli Samadhan 25/04/2026

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23/03/2026

भगत सिंह को सिर्फ पगड़ी, फोटो और नारे तक सीमित कर दिया गया है, लेकिन उनके असली विचार आज भी जानबूझकर छुपाए जाते हैं।

उन्होंने साफ कहा था कि देश सिर्फ अंग्रेज़ों से आज़ाद होने से नहीं बदलेगा, जब तक समाज में जाति, ऊँच-नीच और अमीर-गरीब का भेद खत्म नहीं होगा।

भगत सिंह ने धर्म के नाम पर लड़ने वालों को सबसे बड़ा दुश्मन बताया था, क्योंकि जो लोग धर्म के नाम पर जनता को बाँटते हैं, वही असली आज़ादी को कमजोर करते हैं।
उनका सपना ऐसा भारत था जहाँ इंसान की पहचान उसकी जाति या धर्म नहीं, बल्कि उसकी मेहनत और इंसानियत हो।

लेकिन आज क्या हो रहा है?
जाति के नाम पर नफरत, धर्म के नाम पर राजनीति, और गरीब को गरीब ही बनाए रखने वाली व्यवस्था — यही सच्चाई है।

अगर सच में भगत सिंह को मानते हो तो सिर्फ फोटो पर फूल चढ़ाना बंद करो और उनके विचारों पर चलना शुरू करो।
समानता, एकता और न्याय — यही असली देशभक्ति है। 🇮🇳🔥
🔥🇮🇳

13/03/2026

शहर बसा कर गांव ढूंढ़ते है....
हाथ मे कुल्हाड़ी लेकर पागल छाव ढूंढ़ते हैँ...

09/03/2026

क्रिकेट अब खेल नहीं,
अरबों का बिज़नेस बन चुका है।
Board of Control for Cricket in India अरबों में खेल रहा है,
बाज़ार मालामाल है,
खिलाड़ी करोड़ों कमा कर अपनी सात पीढ़ियों का इंतज़ाम कर चुके हैं…
और देश का बेरोज़गार युवा?
वह टीवी के सामने बैठकर तालियाँ पीट रहा है।
आपने अपने जीवन के हज़ारों घंटे उनके मैच देखने में लगा दिए,
उनकी जीत पर जश्न मनाया,
हार पर सोशल मीडिया में बहस की,
कीबोर्ड घिस डाले…
लेकिन क्या कभी किसी खिलाड़ी ने
आपके रोज़गार, आपके भविष्य या आपके संघर्ष के लिए
दो ट्वीट भी किए?
नहीं।
क्योंकि उनका हर ट्वीट करोड़ों की ब्रांड वैल्यू रखता है…
और आप?
आप सिर्फ उनकी TRP और कमाई बढ़ाने वाले दर्शक हैं।
सोचिए…
जिस खेल से कुछ लोगों की ज़िंदगी बन रही है,
उसी खेल को देखकर लाखों युवाओं का समय और ऊर्जा खर्च हो रही है।
कभी अपने समय की कीमत भी समझिए। 🙂



#सोचिए

07/03/2026

इतिहास एक सख़्त सच सिखाता है—
सिर्फ़ बम गिराने से कोई जंग नहीं जीतता।
Soviet Union ने Afghanistan पर लगभग 20 लाख बम गिराए, फिर भी उसे पीछे हटना पड़ा।
United States ने Vietnam पर 75 लाख से अधिक बम बरसाए—इतिहास की सबसे बड़ी बमबारी—लेकिन अंत में उसे भी हार माननी पड़ी।
फिर वही अमेरिका अफगानिस्तान में उतरा।
20 साल जंग चली, लाखों करोड़ डॉलर खर्च हुए, हजारों सैनिक मारे गए।
लेकिन अंत में उसे भी देश छोड़कर जाना पड़ा।
इतिहास का निष्कर्ष साफ़ है—
जंग हथियारों से नहीं, बल्कि धैर्य, आत्मनिर्भरता और राष्ट्रीय इच्छाशक्ति से जीती जाती है।
आज जंग की प्रकृति बदल चुकी है।
अब लड़ाई सिर्फ़ सीमाओं पर नहीं होती,
बल्कि तेल, तकनीक, बाजार, संसाधनों और अर्थव्यवस्था पर भी होती है।
और यहीं भारत के सामने सबसे बड़ा सवाल खड़ा है।
आज हमारा विकास तेज़ है—
सड़कें, मॉल, हाईवे, डिजिटल अर्थव्यवस्था, बड़ी कंपनियाँ।
लेकिन इस चमक के पीछे एक सच्चाई भी है—
हमारा तेल बाहर से आता है।
हमारी कई अहम तकनीकें बाहर से आती हैं।
हमारा बहुत-सा इलेक्ट्रॉनिक सामान बाहर से आता है।
कच्चा माल और कई औद्योगिक उपकरण भी बाहर से आते हैं।
यानी हमारी अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा
दूसरे देशों की सप्लाई और नीतियों पर निर्भर है।
अगर किसी दिन वैश्विक राजनीति बदल जाए,
या सप्लाई रुक जाए,
तो सबसे बड़ा झटका उसी देश को लगता है
जो आत्मनिर्भर नहीं होता।
सवाल यह नहीं है कि विकास गलत है।
सवाल यह है कि—
क्या हमारा विकास हमें मजबूत बना रहा है,
या हमें और ज्यादा निर्भर बना रहा है?
किसी भी राष्ट्र की असली ताकत सिर्फ़ उसकी GDP नहीं होती।
उसकी असली ताकत होती है—
ऊर्जा में आत्मनिर्भरता
तकनीक में स्वतंत्रता
उत्पादन क्षमता
और जनता का साहस
अगर ये चार चीजें कमजोर पड़ जाएं,
तो सबसे चमकदार विकास भी
लंबे समय तक टिक नहीं पाता।
इतिहास का नियम बहुत कठोर है—
जो राष्ट्र अपनी आर्थिक और वैज्ञानिक ताकत खुद नहीं बनाते,
वे धीरे-धीरे दूसरों के फैसलों पर निर्भर हो जाते हैं।
और तब विकास का पूरा ढांचा
रेत के उस किले जैसा बन जाता है—
जो देखने में भव्य होता है,
लेकिन कुछ बूंदों से ढह सकता है।

#आत्मनिर्भरभारत
#आर्थिकस्वतंत्रता
#राष्ट्रीयस्वाभिमान
ी_बात
#निर्भरता_की_सच्चाई
#देश_और_विकास
#सोचो_भारत
#भारत_का_भविष्य
#आर्थिक_गुलामी
#सवाल_पूछो

06/03/2026

“युद्ध कभी सही नहीं था, न है और न ही कभी होगा। युद्ध में कोई सचमुच जीतता नहीं है, क्योंकि जीतने वाला भी इंसानियत ही हारता है। गोलियां केवल सैनिकों को नहीं मारतीं, वे बच्चों के भविष्य, माँओं की उम्मीदों और पूरे समाज की शांति को भी खत्म कर देती हैं। जो लोग युद्ध का समर्थन करते हैं, वे शायद उसकी आग से दूर बैठे होते हैं, लेकिन जो लोग उस आग में जलते हैं वे आम इंसान होते हैं — किसान, मजदूर, बच्चे और बेगुनाह परिवार।
इसलिए समझदारी युद्ध में नहीं, शांति में है; बहादुरी हथियार उठाने में नहीं, बल्कि संवाद और इंसानियत को बचाने में है। युद्ध का रास्ता हमेशा विनाश की ओर जाता है, जबकि शांति ही मानव सभ्यता को आगे बढ़ाती है।”
एक और छोटा लेकिन बहुत तीखा विचार:
“युद्ध की जीत भी हार ही होती है, क्योंकि जब इंसान इंसान को मारने लगे तो असली हार मानवता की होती है।”... DeepSingh
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04/03/2026

रंगों से किसे बैर हो सकता है?
रंग तो जीवन का उत्सव हैं, प्रकृति का संगीत हैं, भावनाओं की अभिव्यक्ति हैं। जो रंगों से दूरी रखे, वह शायद जीवन की सहजता से भी दूर हो जाए। यह दुनिया स्वयं रंग–बिरंगी है, फिर हम रंगों से क्यों डरें?
लेकिन प्रश्न केवल रंगों का नहीं है। प्रश्न उस व्यवहार का है जो रंगों के नाम पर सामने आता है। आनंद, उमंग और उल्लास के बीच यदि हुड़दंग, अराजकता और असभ्यता भी घुल जाए तो उत्सव का स्वरूप बिगड़ जाता है। गली–मोहल्लों में ऐसी भीड़ निकलती है कि परिवार के साथ बाहर निकलना कठिन हो जाए, घर में बैठकर भी शोर सहना पड़े। फिर भी लोग चुप रहते हैं — कहीं कोई “धर्मद्रोही” न कह दे, कहीं अनावश्यक विवाद न खड़ा हो जाए। क्या यही धर्म है? क्या यही उत्सव की आत्मा है?
हर पर्व पर नैतिकता की दुहाई देने वाले लोग भी दिखाई देते हैं — कोई मांस की दुकानों को बंद करवाना चाहता है, कोई शराब पर रोक लगाना चाहता है। लेकिन वही समाज होली के दिन सब कुछ खुला रहने देता है। ईद पर जितना मांस नहीं बिकता, नववर्ष पर जितनी शराब नहीं बहती, शिवरात्रि पर जितनी भांग नहीं चढ़ती — उससे अधिक होली पर दिखाई देता है। यदि यह इस पर्व की पहचान है तो भी हमें यह समझना होगा कि पहचान और अराजकता में अंतर होता है।
धर्मग्रंथों और शास्त्रों का हवाला देने वाले अक्सर चुनिंदा बातों को ही दोहराते हैं। उदाहरण के लिए, पांडुरंग वामन काणे ने अपनी प्रसिद्ध कृति धर्मशास्त्र का इतिहास में प्राचीन सामाजिक व्यवस्थाओं और त्यौहारों के संदर्भों का विस्तार से उल्लेख किया है। इतिहास यह भी बताता है कि अलग-अलग कालखंडों में पर्वों को विभिन्न वर्गों से जोड़ा गया। पुराणों और स्मृतियों में वर्ण–व्यवस्था और आचार–विचार की कई व्याख्याएँ मिलती हैं, जिनमें “स्वपच” जैसे शब्द भी आते हैं। प्रश्न यह नहीं कि लिखा क्या गया; प्रश्न यह है कि आज हम उसे किस दृष्टि से समझते हैं।
यदि किसी ग्रंथ में एक ओर भेदभाव की रेखाएँ खींची जाएँ और दूसरी ओर उसी दिन स्पर्श से “पुण्य” मिलने की बात कही जाए, तो यह स्पष्ट करता है कि इतिहास जटिल रहा है। परंतु वर्तमान का समाज उन जटिलताओं को जस का तस ढोने के लिए बाध्य नहीं है।
इसीलिए मैं मानता हूँ — होलिका दहन करूँ या न करूँ, यह व्यक्तिगत आस्था का विषय है; पर रंगों का आनंद लेना जीवन का उत्सव है। रंग किसी एक वर्ग, एक विचार या एक पहचान के नहीं होते। आज समस्या रंगों से नहीं, उनके प्रतीकात्मक बंटवारे से है — भगवा, हरा, नीला, सफेद, लाल, पीला… हम हर रंग को किसी खांचे में बाँट देते हैं।
क्यों न एक दिन सब रंगों को एक ही बाल्टी में घोल दें? सब पर एक साथ उछाल दें — बिना भेद, बिना द्वेष, बिना भय। शायद तभी हम समझ पाएँगे कि उत्सव क्या होता है।
त्योहार कभी–कभी औपचारिक हो जाते हैं, पर उत्सव वह है जो वर्तमान क्षण में जीया जाए — बिना किसी की हार–जीत के भाव के।
जीवन का असली अर्थ भी यही है — साथ जियो, खुलकर जियो, और रंगों की तरह एक–दूसरे में घुल जाओ।

02/03/2026

सभी के असली चेहरे मत दिखा ऐ ज़िन्दगी...
कुछ लोगों की मे इज्जत करता हूँ.. 🙊

02/03/2026

चैक होनी चाहिए नागरिकता तुम्हारी भी... तुम भी इस जमीं की नहीं लगती

02/03/2026

कुत्ते का नाम शेर ऱख देने से
वो जंगल का राजा नहीं बन जाता...

06/02/2026

देश को नफरत नहीं, रोज़गार चाहिए।
देश को शोर नहीं, समाधान चाहिए।
संसद में मंदिर-मस्जिद, बयानबाज़ी और भावनात्मक ड्रामे पर घंटों बहस होती है,
लेकिन बेरोज़गार युवाओं, महंगाई से पिसते परिवारों, कर्ज़ में डूबे किसानों पर चुप्पी क्यों?
आज देश के असली सवाल ये हैं👇
▪ युवा कब तक बेरोज़गार रहेंगे?
▪ महंगाई कब काबू में आएगी?
▪ किसान को MSP की कानूनी गारंटी कब मिलेगी?
▪ शिक्षा और स्वास्थ्य आम आदमी के लिए कब सुलभ होंगे?
▪ लोकतांत्रिक संस्थाएँ डर के बिना कब काम करेंगी?
धर्म से वोट मिल सकते हैं,
लेकिन रोज़गार से देश चलता है।
अगर संसद इन मुद्दों पर नहीं बोलेगी,
तो इतिहास माफ़ नहीं करेगा।
👉 देश पहले, राजनीति बाद में।
👉 संविधान बचेगा तभी भारत बचेगा।
#देशहित #संसद_जवाब_दे #रोजगार_महंगाई #किसान_युवा #संविधान_पहले

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