Vedic Dharm
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ओ३म्
ईश्वर को पाना हमारी जीवन का परम लक्ष्य या मुख्य होनी चाहिए, क्योंकि वही आपकी समस्त दुखों को नाश कर सकते है, अन्य किसी में वो सामर्थ नहीं, उनका मुख्य नाम ओ३म् है, जिसका जप से आप अपने मन को शुद्ध, शान्त और एकाग्र कर सकते हो, इसकेलिए आपको किसी एकांत निर्जन पवित्र जगह पर घंटों बैठ कर नित्य सुबह शाम उसकी स्तुति, प्रार्थना और उपासना करनी चाहिए जिससे आप अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सको
Ratish Mishra
#ईशावास्योपनिषद्
असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसाSवृता:।
तांस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जना:।।३||
आत्मा का हत्या/हनन करनेवाले लोग मनोपरांत घने अन्धकार से युक्त असुर लोक को प्राप्त होते हैं।
आत्मा का हनन जिन कारणों से होता है वो ये हैं:_
हिंसा (मन और कर्म से दूसरे जीव का हानि करना व सोचना), असत्य (झूठ बोलना), स्तेय (दूसरों की संपत्ति को अन्यायपूर्ण तरीके से लेना), अब्रह्मचर्य (कामुक इच्छाओं से युक्त)
परिग्रह (लालची और संपत्ति के प्रति आसक्ति)।
"एक ईश्वर, एक उपासना पद्धति, एक ही मानव धर्म, एक ही मानवजाति, एक धर्म ग्रंथ वेद, मानव का आहार-शाकाहार।
हरिश्चंद्र गुरुजी
आंख, नाक, कान, जिह्वा, मन आदि इन्द्रियों को पशुत्व के मार्ग से हटाकर अध्यात्म के मार्ग पर चलाना `प्रत्याहार` कहलाता है|
ये आष्टांग योग का 5वी अंग है |
योग दर्शन में महर्षि पतंजलि ईश्वर की परिभाषा इस तरह लिखते हैं -
'क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुष विशेष ईश्वरः।
अर्थात- क्लेश, कर्म, विपाक और आशय- इन चारों से अपरामष्ट- जो संबंधित नहीं है वही पुरुष विशेष ईश्वर है। कहने का आशय यह है कि जो बंधन में है और जो मुक्त हो गया है वह पुरुष ईश्वर नहीं है, बल्कि ईश्वर न कभी बंधन में था, न है और न रहेगा।
लेकिन ईश्वर को हम लोग क्यों जाने, क्यों माने, क्यों देखें? इससे हमें क्या मिलेगा? क्योंकि मनुष्य कोई भी काम बिना लाभ का नहीं करता, इससे हमें क्या लाभ हैं यदि हम नहीं जानते तो ईश्वर की स्तुति, प्राथना, उपासना हम नहीं कर सकते
यजुर्वेद के 31वें अध्याय में लिखा है
वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात्।
तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय।। ―(यजु० ३१/१८)
अर्थात्― मैं उस प्रभु को जानूँ जो सबसे महान् है, जो करोड़ों सूर्यों के समान देदीप्यमान है, जिसमें अविद्या और अन्धकार का लेश भी नहीं है। उसी परमात्मा को जानकर मनुष्य दुःखों से, संसाररुपी मृत्यु-सागर से पार उतरता है, मोक्ष-प्राप्ति का और कोई उपाय नहीं है।
तो जिसे जानने से आपका सारा दुःख दूर हो जाए तो क्या हम उस अभिनाशी परमेश्वर को न जाने
फिर प्रश्न उठता है उसे कौन जान और देख सकता है
यजुर्वेद के 31वें अध्याय में लिखा है
तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन् पुरुषं जातम् अग्रतः । तेन देवा ऽ अयजन्त साध्या ऽ ऋषयश् च ये ॥यजुर्वेदः- ३१/९
अर्थात: उस ईश्वर को जो अन्नत काल से जिसे सभी लोग पूजते हे सदा ही, उसे देवता, साधक और ऋषि ही जान सकते हैं देख सकते है|
फिर प्रश्न उठता है देवता आदि हम बने कैसे
इसका उतर है आष्टांग योग से यम, नियम आदि
यह एक तरीका है उसे जानने का उस निराकार, सर्वशक्तिमान, अजन्मा, अनंत, निर्विकार, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक सत्यचितानन्द, नित्य, पवित्र, अनादि, अनुपम, दयालु, और सृष्टिकर्ता को जानने कि
साधक/नवीन ऋषि
डॉ. रतीश चंद्र मिश्र 🙏
ओ३म्
त्वं हि नः पिता वसो त्वं माता शतक्रतो बभूविथ ।
अधा ते सुम्नमीमहे ।।-(अथर्व० २०/१०८/२)
अर्थ:-हे सबको बसाने वाले ! हे सबमें बसने वाले ! सैंकड़ों प्रज्ञाओं और बलों से युक्त ! तू ही हमारा पिता,पालक और उत्पादक है।तू ही माता के समान स्नेही और शिक्षक है,अतः हम तुझसे सुख की याचना करते हैं।
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