Deepak Kumar
Positive +Positive = Positive Digital Marketer, Entrepreneur, Motivator, Youtuber
न त्रेता में सती प्रथा का प्रमाण मिलता है न द्वापर में।
दोनों काल के युद्ध में असंख्य लोग मारे गए किसी की पत्नी के सती होने का उल्लेख नहीं है।
उसके पश्चात भी चंद्रगुप्त मौर्य, शुंग या गुप्त काल में भी ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिलता है।
(इस्लामिक आक्रांताओं के समय आत्मदाह (जौहर) के अनेक प्रमाण हैं।
क्योंकि वे आक्रांता युद्ध नहीं करते थे बर्बरता करते थे।
हारे हुए राज्य की स्त्रियों को यौन दासी बनाकर उनपर अत्याचार करते थे, यहां से ले जाकर तुर्क और अरब की मंडियों में नीलाम करते थे।)
सवाल है कि आखिर राजाराम मोहन राय फिर किस सती-प्रथा का उन्मूलन करते हैं? जिसके लिए दशकों तक अंग्रेज से लेकर कांग्रेसी शिक्षा व्यवस्था में उनके नाम का ढिंढोरा पीटा गया।
दरअसल उन्होने किसी प्रथा का उन्मूलन किया हो चाहे नहीं, अपने अंग्रेज मालिकों के इशारे पर भारतीयों के मन से "स्वाभिमान" का उन्मूलन जरूर किया, ताकि हम अपनी परंपराओ के प्रति हीनभाव में आ जाएं।
इतिहास के नाम पर हमारे आंख में धूल नहीं मिर्च झोंकी गई।
अंग्रेजों को इसाईयत फैलानी थी इसलिए शिक्षा का अंग्रेजीकरण किया और उसके बाद देश के प्रथम शिक्षा मंत्री मौलाना आजाद को मदरसों का विस्तार करना था, इसलिए औपचारिक शिक्षा में जितना कचरा डाला जा सकता था डाला गया।
पूरी तरह से भारतीय संस्कृति को ध्वस्त करने का प्रयास निरंतर 11वीं सदी से हुआ है।
झूठ पढ़ाया गया, झूठ बताया गया और झूठ दिखाया गया ताकि
भारतीय अपनी परंपराओं के प्रति हीनभावना से ग्रस्त हो जाएं। 🧐
13/08/2024
I've just reached 500 followers! Thank you for continuing support. I could never have made it without each and every one of you. 🙏🤗🎉
06/05/2024
झारखंड के सिमडेगा की बेटी पूरे देश का बढ़ाई मान
सलीमा टेटे बनी भारतीय महिला हॉकी टीम की कप्तान.... बहुत-बहुत शुभकामनाएं
20/01/2024
इस पेड़🌴 को ध्यान से देखिए !!
क्या इसकी परिस्थितियां फल देने वाली थी ?
उसके बावजूद भी इसने समाज को बेस्ट देने का प्रयास किया।
समस्याएं सबके पास हैं उनसे लड़ना पड़ता है जूझना पड़ता है।
मैं भी कर सकता हूं आप भी कर सकते हैं
इस दुनिया में कुछ भी असंभव नहीं है .
06/12/2023
गांवों में अमीरी तो नहीं थी, किंतु यह सही है कि आज से तीस वर्ष पूर्व ‘बेरोजगारी’ शब्द का नाम तो मैंने भी नहीं सुना था।
यह पोस्ट पठनीय है।
सैकड़ों वर्ष पुरानी बात है।
अनपढ़ों का एक गाँव था। सभी के पास कोई न कोई स्वरोजगार था, खेती थी, बाग थे, बगीचे थे। उनके घर कच्ची मिट्टी के बने थे परन्तु सभी के पास अपने घर थे।
ब्राह्मण पूजा-पाठ कराते और क्षत्रिय जमींदार थे। वैश्य व्यापार करते, लोहार लोहे का धन्धा, स्वर्णकार सोने के गहने का काम, कुम्हार मिट्टी के बर्तन बनाते, बढ़ई लकड़ी का काम करते, कहार मछली पकड़ने का काम करते, बारी पत्तल बनाते, भड़भूँजे अनाज भूनते, हरिजन चमड़े का कार्य करते, तंबोली पान की भीठ का कार्य करते, माली फूलमालाएं बनाते, वाल्मीकि समाज सफाई का काम करते थे।
इस प्रकार सभी के पास कोई न कोई रोजगार था।
पूरा गाँव बड़े आराम से जीवन यापन करता था। पूरा गाँव
धन-धान्य से समृद्ध था और उस गाँव में कोई भी गरीब नहीं था।
एक दिन उस गाँव में एक पढ़ा लिखा व्यक्ति रहने आया। वह सारे दिन कुछ ना कुछ पढ़ता और लिखता दिखाई देता था।
लोगों की समझ में नहीं आता था कि वह करता क्या है ?
लेकिन फिर भी लोग उसका बहुत सम्मान करते थे क्योंकि वह विलायत से बहुत महँगी डिग्री लेकर आया था।
एक दिन उसने गाँव के सभी लोगों को बुलाया और बोला कि तुम लोग भी पढ़ना-लिखना सीख लो।
फिर तुम्हें भी खेती,मज़दूरी करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।
गाँव वाले सहर्ष सहमत हो गए और कुछ ही दिनों में सभी पढ़े-लिखे हो गए।
अब सभी दिन भर बैठकर कुछ ना कुछ पढ़ते-लिखते रहते थे।
दिन भर बैठे-बैठे कोई न कोई कुछ न कुछ लिखता रहता और फिर दूसरे को पढ़ाता।
फिर दूसरा व्यक्ति अपना लिखा उसे पढ़ने के लिए देता।
सभी लोग अपने-2 काम धंधे छोड़कर सारे दिन कुछ ना कुछ पढ़ते लिखते रहते थे।
इस प्रकार शीघ्र ही उस गाँव के सारे कामधंधे बंद हो गये और कुछ ही दिनों में वह गाँव पढ़े लिखे बेरोजगारों के गाँव के नाम से प्रसिद्ध हो गया।
अंततः, गरीबी, भुखमरी, प्रायोजित महामारी और प्रायोजित सुरक्षा कवच की चपेट में आकर कुछ ही वर्षों में ये सभी पढ़ेलिखे बेरोजगार जीवन-मरण के चक्र से भी मुक्ति पा गए।
आज भी जब पढ़े-लिखों को बेरोजगार भटकते देखता हूँ। बिकते हुए नेता, अभिनेता, पत्रकार, डॉक्टर, इंजीनियर, साइंटिस्ट्स और सरकारें देखता हूँ,उजड़ते हुए खेत, खलिहान, बाग और बगीचे देखता हूँ,कटते हुए वृक्ष और फैलते हुए कंक्रीट के जंगल देखता हूँ, तो याद आ जाता है मुझे वह प्राचीन लुप्त हो चुका पढ़े-लिखे बेरोजगारों का गाँव।
दशहरा बीत चुका था, दीपावली समीप थी, तभी एक दिन कुछ युवक-युवतियों की NGO टाइप टोली एक कॉलेज में आई!
उन्होंने छात्रों से कुछ प्रश्न पूछे; किन्तु एक प्रश्न पर कॉलेज में सन्नाटा छा गया! उन्होंने पूछा, "जब दीपावली भगवान राम के १४ वर्षो के वनवास से अयोध्या लौटने के उतसाह में मनाई जाती है, तो दीपावली पर "लक्ष्मी पूजन" क्यों होता है ? श्री राम की पूजा क्यों नही?"
प्रश्न पर सन्नाटा छा गया, क्यों कि उस समय कोई सोशियल मीडिया तो था नहीं, स्मार्ट फोन भी नहीं थे! किसी को कुछ नहीं पता! तब, सन्नाटा चीरते हुए, एक हाथ, प्रश्न का उत्तर देने हेतु ऊपर उठा!
उसने बताया कि "दीपावली उत्सव दो युग "सतयुग" और "त्रेता युग" से जुड़ा हुआ है!" "सतयुग में समुद्र मंथन से माता लक्ष्मी उस दिन प्रगट हुई थी! इसलिए "लक्ष्मी पूजन" होता है!
भगवान श्री राम भी त्रेता युग मे इसी दिन अयोध्या लौटे थे! तो अयोध्या वासियों ने दीप जलाकर उनका स्वागत किया था! इसलिए इसका नाम दीपावली है! इसलिए इस पर्व के दो नाम हैं, "लक्ष्मी पूजन" जो सतयुग से जुड़ा है, और दूजा "दीपावली" जो त्रेता युग, प्रभु श्री राम और दीपो से जुड़ा है!
हमारे उत्तर के बाद थोड़ी देर तक सन्नाटा छाया रहा, क्यों कि किसी को भी उत्तर नहीं पता था! यहां तक कि प्रश्न पूछ रही टोली को भी नहीं! खैर कुछ देर बीद। सभी ने खूब तालियां बजाई! उसके बाद, एक समाचारपत्र ने उस उत्तर देने वाले विद्यार्थी का साक्षात्कार (इंटरव्यू) भी किया!
उस समय समाचारपत्र का साक्षात्कार होना बहुत बड़ी बात हुआ करती थी! एक और प्रश्न भी था, कि लक्ष्मी और। श्री गणेश का आपस में क्या रिश्ता है? और दीपावली पर इन दोनों की पूजा क्यों होती है?
सही उत्तर है
लक्ष्मी जी जब सागर मन्थन में मिलीं, और भगवान विष्णु से विवाह किया, तो उन्हें सृष्टि की धन और ऐश्वर्य की देवी बनाया गया! तो उन्होंने धन को बाँटने के लिए मैनेजर कुबेर को बनाया!
कुबेर कुछ कंजूस वृति के थे! वे धन बाँटते नहीं थे, सवयं धन के भंडारी बन कर बैठ गए! माता लक्ष्मी परेशान हो गई! उनकी सन्तान को कृपा नहीं मिल रही थी!
उन्होंने अपनी व्यथा भगवान विष्णु को बताई! भगवान विष्णु ने उन्हें कहा, कि "तुम मैनेजर बदल लो!" माँ लक्ष्मी बोली, "यक्षों के राजा कुबेर मेरे परम भक्त हैं! उन्हें बुरा लगेगा!"
तब भगवान विष्णु ने उन्हें श्री गणेश जी की दीर्घ और विशाल बुद्धि को प्रयोग करने की सलाह दी! माँ लक्ष्मी ने श्री गणेश जी को "धन का डिस्ट्रीब्यूटर" बनने को कहा! श्री गणेश जी ठहरे महा बुद्धिमान! वे बोले, "माँ, मैं जिसका भी नाम बताऊंगा, उस पर आप कृपा कर देना! कोई किंतु, परन्तु नहीं! माँ लक्ष्मी ने हाँ कर दी! अब श्री गणेश जी लोगों के सौभाग्य के विघ्न/रुकावट को दूर कर उनके लिए धनागमन के द्वार खोलने लगे! कुबेर भंडारी ही बनकर रह गए! श्री गणेश जी पैसा सैंक्शन करवाने वाले बन गए!
गणेश जी की दरियादिली देख, माँ लक्ष्मी ने अपने मानस पुत्र श्री गणेश को आशीर्वाद दिया, कि जहाँ वे अपने पति नारायण के सँग ना हों, वहाँ उनका पुत्रवत गणेश उनके साथ रहें!
दीपावली आती है कार्तिक अमावस्या को! भगवान विष्णु उस समय योगनिद्रा में होते हैं! वे जागते हैं ग्यारह दिन बाद, देव उठावनी एकादशी को!माँ लक्ष्मी को पृथ्वी भ्रमण करने आना होता है शरद पूर्णिमा से दीवाली के बीच के पन्द्रह दिनों में, तो वे सँग ले आती हैं श्री गणेश जी को! इसलिए दीपावली को लक्ष्मी-गणेश की पूजा होती है!
यह कैसी विडंबना है, कि देश और सबसे बड़े त्यौहार का पाठ्यक्रम में कोई विस्तृत वर्णन नहीं है? औऱ जो वर्णन है, वह अधूरा है!
इस लेख को पढ़ कर स्वयं भी लाभान्वित हों, अपनी अगली पीढी को बतायें और दूसरों के साथ साझा करना ना भूलें !
साभार🙏
यार देखो भारत बदल तो रहा है ...एक चंद्रयान 2 चाँद पर पहुँचने से ठीक पहले फेल होता है तो पूरा देश एक साथ रोता है...फिर वही चंद्रयान 3 जब चाँद पर तिरंगा गाढ़ता है तो पूरा देश एक साथ आँखों में ख़ुशी के आंसू लिए गर्वित होता है ..हरियाणा के सोनीपत के एक छोटे से गाँव से एक अंकित बैयांपुरिया इंस्टाग्राम पर उठता है पूरा देश उसके साथ खड़ा हो जाता है उसके 75 हार्ड चैलेंज को अपनी जिंदगी का हिस्सा बना लेता है...और 75 दिन में ही देश उसे इतना प्यार देता है कि देश का प्रधानसेवक भी उसकी पीठ थपथपाने उसे बुला लेता है.... Asian games में हम 100 पार जा चुके हैं...इस बात की जितनी ख़ुशी है उस से ज्यादा इस बात की ख़ुशी है कि ये मैडल चुनिंदा प्रतिस्पर्धाओं में नहीं बल्कि बहुत ही डायवर्स स्पोर्ट्स में आये हैं...जो साफ़ बताता है कि सही मौका और सही सिस्टम मिले तो भारत की ये युवा पीढ़ी कॉन्फिडेंस से भरी हुई है।।।
कनाडा खालिस्तान मुद्दे पर हीरो बनने की कोशिश करता है तो डिप्लोमसी से ऐसा जवाब मिलता है कि मन बस मुस्कुरा कर रह जाता है...रूस और अमेरिका के बीच में भारत का अपने हित को चुनना अपने आप में वैश्विक पटल पर आत्मनिर्भर भारत की दस्तक है....Covid में देशवासियों को बचाने से लेकर पूरे विश्व में वैक्सीन मैत्री से भारत ग्लोबल साउथ में अपनी धाक जमा ही चुका है.
यही वो बदलाव हैं जिन्हें देखने में कई पीढ़ियां लगती हैं, लेकिन एक सौभाग्यशाली पीढ़ी को ही ये बदलाव देखना नसीब होता है , सांस्कृतिक वैभव धीरे धीरे स्थापित हो ही रहा है, जो जो खोया था वो वो वापस धीरे धीरे पा ही रहे हैं, भगवान् करे बस नज़र न लगे , 1000 साल की वेदना है, इस बार ऐसे उठ खड़े होंगे कि सारी कसर ही निकाल लेंगे.. ❤️
....
हाँ मम्मी टिकट कंफर्म हो गयी थी, शीट पर ही बैठ कर आया हूँ। पहुँच गया हूँ।
आपने जो खाना पेक करके दिया था वही खाये हैं बाहर का कुछ नहीं खाया। बाहर का तीखा खाना भी नहीं खाया है। रात को भी सादा खाना ही खाऊंगा। हाँ इस बार पिछली बार की तरह बस स्टैंड की बेंच पर नहीं सोया हूँ। होटल में कमरा लिया है,500 में मिल गया है। ज्यादा महंगा नहीं है।
ठीक है मम्मी अब में सो रहा हूँ, सुबह पेपर है।
ऐसा बोल कर एक 23 - 24 सालिया लड़का 5 रुपये के बिस्कुट खा के पानी गटक कर बैग को सिरहाने रख कर कल रात को पार्क की बेंच पर सो गया।
🙂
ये लड़के भी न ☺️
🙂🙃
डिप्रेशन ग्रस्त एक सज्जन जब पचास साल की उम्र से ज्यादा के हुए तो उनकी पत्नी ने एक काउंसलर का अपॉइंटमेंट लिया जो ज्योतिषी भी थे।
पत्नी बोली:- "ये भयंकर डिप्रेशन में हैं, कुंडली भी देखिए इनकी।"
ज्योतिषी ने कुंडली देखी सब सही पाया। अब उन्होंने काउंसलिंग शुरू की, कुछ पर्सनल बातें भी पूछी और सज्जन की पत्नी को बाहर बैठने को कहा।
सज्जन बोलते गए...
बहुत परेशान हूं...
चिंताओं से दब गया हूं...
नौकरी का प्रेशर...
बच्चों के एजूकेशन और जॉब की टेंशन...
घर का लोन, कार का लोन...
कुछ मन नही करता...
दुनिया मुझे तोप समझती है...
पर मेरे पास कारतूस जितना भी सामान नही....
मैं वहुत डिप्रेशन में हूं...
कहते हुए पूरे जीवन की किताब खोल दी।
तब विद्वान काउंसलर ने कुछ सोचा और पूछा, "दसवीं में किस स्कूल में पढ़ते थे?"
सज्जन ने उन्हें स्कूल का नाम बता दिया।
काउंसलर ने कहा:-
"आपको उस स्कूल में जाना होगा। आप वहां से आपकी दसवीं क्लास का रजिस्टर लेकर आना, अपने साथियों के नाम देखना और उन्हें ढूंढकर उनके वर्तमान हालचाल की जानकारी लेने की कोशिश करना। सारी जानकारी को डायरी में लिखना और एक महिने बाद फिर मुझे मिलना।"
सज्जन स्कूल गए, मिन्नतें कर रजिस्टर ढूँढवाया फिर उसकी कॉपी करा लाए जिसमें 120 नाम थे। महीना भर दिन-रात कोशिश की फिर भी बमुश्किल अपने 75-80 सहपाठियों के बारे में जानकारी एकत्रित कर पाए।
आश्चर्य!!!
उसमें से 20 लोग मर चुके थे...
7 विधवा/विधुर और 13 तलाकशुदा थे...10 नशेड़ी निकले जो बात करने के भी लायक नहीं थे...
कुछ का पता ही नहीं चला कि अब वो कहां हैं...
5 इतने ग़रीब निकले की पूछो मत...
6 इतने अमीर निकले की यकीन नहीं हुआ...
कुछ केंसर ग्रस्त, कुछ लकवा, डायबिटीज़, अस्थमा या दिल के रोगी निकले...
एक दो लोग एक्सीडेंट्स में हाथ/पाँव या रीढ़ की हड्डी में चोट से बिस्तर पर थे...
कुछ के बच्चे पागल, आवारा या निकम्मे निकले...
२ जेल में सजा काट रहे थे...
एक 50 की उम्र में सैटल हुआ था इसलिए अब शादी करना चाहता था, एक अभी भी सैटल नहीं था पर , दो तलाक़ के बावजूद तीसरी शादी की फिराक में था...
महीने भर में दसवीं कक्षा का रजिस्टर भाग्य की व्यथा ख़ुद व खुद सुना रहा था...
काउंसलर ने पूछा:- "अब बताओ डिप्रेशन कैसा है?"
इन सज्जन को समझ में आ गया कि *उसे कोई बीमारी नहीं है, वो भूखा नहीं मर रहा, दिमाग एकदम सही है, कचहरी पुलिस-वकीलों से उसका पाला नही पड़ा, उसके बीवी-बच्चे बहुत अच्छे हैं, स्वस्थ हैं, वो भी स्वस्थ है, डाक्टर, अस्पताल से पाला नहीं पड़ा*...
सज्जन को महसूस हुआ कि दुनिया में वाकई बहुत दुख है और मैं बहुत सुखी और भाग्यशाली हूँ।
*दूसरों की थाली में झाँकने की आदत छोड़ कर, अपनी थाली का भोजन प्रेम से ग्रहण करें।*
तुलनात्मक चिन्तन न करें, सबका अपना प्रारब्ध होता है।
और फिर भी आपको लगता है कि आप डिप्रेशन में हैं तो आप भी अपने स्कूल जाकर दसवीं कक्षा का रजिस्टर ले आएं और.
क्या।।।
18/06/2023
वैसे तो ये father's day कोई एक दिन मनाकर हम अपना पितृ ऋण नहीं चुका सकते लेकिन फिर भी इस दिन को कुछ स्पेशल तरीके से मना कर उनके जीवन में कुछ खुशी के पल जोड़ सकें। हमारे जीवन में एक ऐसी शख्सियत जिसने हमारी जीत के लिए अपना सब कुछ हार दिया।
आपके ही नाम से जाना जाता हूँ “पापा”.
भला इस से बड़ी शोहरत मेरे लिए क्या होगी|
🙏🙏🙏
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