Azhar Sabri
Educating minds by profession, but my heart lives between the lines. Proud author of 3 books. Living life one chapter at a time.
गुज़रे हुए दिनों का न इतना मलाल कर।
आईना सामने है तो ख़ुद से सवाल कर।
काँटों से डर के राह में रुकना नहीं कभी,
गुलशन में अपने ख़्वाबों की फ़सलें बहाल कर।
सच की डगर पे चलना तो मुश्किल है दोस्तों,
हँसते हैं लोग पाँव में छाले उछाल कर।
ख़ामोश रह के सहना भी इक जुर्म है यहाँ,
ज़ालिम के सामने तू ज़रा सा सवाल कर।
सूरज की सम्त देख के चलता नहीं है जो,
बैठा है अपनी राह में ज़ुल्मत को पाल कर।
किरदार में अगर तेरे पाकीज़गी नहीं,
क्या फ़ायदा जो चेहरा तू रखे संभाल कर।
दुनिया के ऐब देखने की तुझको धुन है क्यूँ,
'अज़हर' तू अपने आप से पहले सवाल कर।
~ Azhar Sabri ~
हम तो यादों को मिटाते हुए मर जाते हैं।
अपने अश्कों को छुपाते हुए मर जाते हैं।
जिनके हिस्से में वफ़ाओं के सिवा कुछ भी न था,
वो ही अश्कों को बहाते हुए मर जाते हैं।
ज़हर मिलता है जिन्हें हमसे अदावत में सदा,
हम उन्हें भी दुआ देते हुए मर जाते हैं।
अपने हिस्से की थकन बाँट के लोगों में सदा,
ख़ुद को तन्हा ही सुलाते हुए मर जाते हैं।
उम्र भर धूप की शिद्दत से लड़ाई करके,
ख़्वाब पलकों पे सजाते हुए मर जाते हैं।
कितने मासूम हैं इस शहर के रहने वाले,
काँच के घर को बचाते हुए मर जाते हैं।
कितने चेहरे यहाँ नफ़रत की धुआँ ओढ़े हैं,
हम मुहब्बत को बचाते हुए मर जाते हैं।
उनको ज़िद है कि वो पत्थर ही रहेंगे ता-उम्र,
हम तो आईना दिखाते हुए मर जाते हैं।
जो अँधेरों में भी उम्मीद का सूरज रख दें,
वो ही दुनिया को जगाते हुए मर जाते हैं।
हमको मालूम है दुनिया है फकत एक सराय,
फिर भी ईंटों को सजाते हुए मर जाते हैं।
उनको अपनों की भी परवाह नहीं है अज़हर,
जो चराग़ों को बुझाते हुए मर जाते है
मुस्कुराकर ग़म छुपाना आ गया मुझको।
ज़िंदगी को आज़माना आ गया मुझको।
वो जिसे कहते थे मंज़िल कल तलक अपनी,
उस गली को अब भुलाना आ गया मुझको।
जिन अँधेरों से कभी डरता था ये दिल मेरा,
अब उन्हीं रातों में जलना आ गया मुझको।
बे-वजह रोने की आदत छोड़ दी मैंने,
हर सितम पे मुस्कुराना आ गया मुझको।
वक़्त के हर वार को सीने पे सहता ही रहा,
दर्द को ताक़त बनाना आ गया मुझको।
ख़्वाब आँखों ने जो देखे थे अँधेरों में कभी,
अब उन्हें सूरज बनाना आ गया मुझको।
रौशनी से दूर रहने की जो आदत थी मेरी,
अब चिरागों को जलाना आ गया मुझको।
कल तलक जो नाम लेते डर रहे थे लोग,
उनसे अब आँखें मिलाना आ गया मुझको।
जिनके क़दमों में कभी रखता था सर 'अज़हर',
उनको आईना दिखाना आ गया मुझको।
~ Azhar Sabri ~
खुद को मैं ढालता रहा हर इम्तिहान में।
जलता रहा चराग़-ए-सफ़र इस जहान में।
हर रोज़ ख़ुद को जीतने का सिलसिला रहा,
ये फ़तह कम नहीं है मेरी दास्तान में।
सीरत में अपनी रखी है सच्चाई की चमक,
आईना बोलता है मेरे हर बयान में।
किरदार की चमक को ज़माना भी देख ले,
सूरज भी फीका पड़ गया है मेरी आन में।
पहचान मेरी देख के हैराँ है ये जहाँ,
मैं चल पड़ा हूँ अपनी ही मंज़िल की आन में।
दीवारें तोड़ कर मैं फ़लक तक निकल गया,
अब कौन बाँध पाएगा मुझको मकान में।
~ Azhar Sabri ~
हम कलम की धार में इक वार रखते हैं।
सामने दुश्मन हो तो तलवार रखते हैं।
मंज़िलों को आँख में दिन-रात रखते हैं,
हौसलों में इक नई रफ़्तार रखते हैं।
मुल्क की ख़ातिर जिएँगे, ये यक़ीं कर लो,
अपने सीने में वतन का प्यार रखते हैं।
झुक के जीना तो हमें आता नहीं हरगिज़,
सामने ज़ुल्मत के हम इंकार रखते हैं।
भीड़ में भी अपनी राहों का हुनर रखते हैं,
अपनी आँखों में नया संसार रखते हैं।
तल्ख़ियों से डर के हम पीछे नहीं हटते,
लब पे हंसी दिल में हम अँगार रखते हैं।
हार की आहट से हम घबराए ही कब हैं,
ज़ख़्म खाकर भी नया किरदार रखते हैं।
वक़्त के तूफ़ाँ से हम डरते नहीं हरगिज़,
जीतने का हौसला हर बार रखते हैं।
~ Azhar Sabri ~
चमकते ख़्वाब आँखों के मेरी ताबीर पर रख दो,
उजालों के परिंदों को मेरी तक़दीर पर रख दो।
सितारों सी चमकती है जो पलकों पर दुआ बन कर,
उसी एहसास की लौ को मेरी तस्वीर पर रख दो।
बहुत अरसे से ठहरी है मेरे चेहरे पे ये हसरत,
तबस्सुम का असर थोड़ा मिरी तासीर पर रख दो।
किसी की याद का मंज़र सजा कर दिल के आँगन में,
सुकूँ के चंद लम्हों को मेरी जागीर पर रख दो।
बहुत सा शोर है दुनिया का, तन्हाई में रहना है,
मोहब्बत का कोई पहरा मिरी ज़ंजीर पर रख दो।
दुआएँ माँ की शामिल हैं, तो डर किस बात का हमको,
खुदा की दी हुई रहमत मेरी तदबीर पर रख दो।
लिखा है नाम जो तेरा, उसी को पढ़ के जीते हैं,
मिरी इस रूह का क़िस्सा मेरी तहरीर पर रख दो।
~ Azhar Sabri ~
ज़मीं पर चाँद का टुकड़ा सजा कर देख लेते हैं।
अँधेरी रात में ख़ुद को जला कर देख लेते हैं।
मुसाफ़िर हैं सितारे भी, सफ़र जारी है सदियों से,
किसी के नूर में ख़ुद को मिला कर देख लेते हैं।
दिखाई जो न दे आँखों को, वो मंज़र मुकम्मल है,
उसी की रौशनी दिल में बसा कर देख लेते हैं।
हवाएँ ज़िक्र करती हैं कभी जो उसकी महफ़िल का,
वहाँ की धूल को माथे लगा कर देख लेते हैं।
कभी तो साज़िशें होंगी, कभी तो रौशनी होगी,
किसी दिन चाँद को घर में बुला कर देख लेते हैं।
भटकना ही अगर क़िस्मत है इस वीरान दुनिया में,
किसी दीवार को दर सा बना कर देख लेते हैं।
मोहब्बत में ज़रूरी तो नहीं हर बात हो पूरी,
चलो कुछ ख़्वाब आँखों में सजा कर देख लेते हैं।
लिखी क्या है हथेली पर, ये किसने ठीक से जाना,
चलो तक़दीर से आगे भी जा कर देख लेते हैं।
मुकद्दर का लिखा क्या है, किसे मालूम है आखिर,
कि अब हर एक लम्हा मुस्कुरा कर देख लेते हैं।
बहुत रो लीं ये आँखें अब, अँधेरा और क्या देगा,
कोई बुझता हुआ सपना बचा कर देख लेते हैं।
वो अपने फ़ैसलों में है, हम अपनी ज़िद पे क़ायम हैं,
चलो ख़ामोश रह कर भी मना कर देख लेते हैं।
जो दरिया डूबने वालों को साहिल तक नहीं लाया,
उसी दरिया में इक कश्ती बहा कर देख लेते हैं।
सभी ने आईनों में अपनी सूरत ढूँढ़ रखी है,
किसी टूटे हुए दिल में समा कर देख लेते हैं।
हमें मालूम है मिलना नहीं आसान अब 'अज़हर',
मगर हर मोड़ पर आँखें बिछा कर देख लेते हैं।
~ Azhar Sabri ~
हवाओं के हाथों में पाला था हमने।
वो बुझता दिया जो संभाला था हमने।
चमकती हुई धूप ओढ़ी थी सबने,
अंधेरों को सीने में डाला था हमने।
जो काँटा हमें आज चुभने लगा है,
उसे फूल कहकर सजाया था हमने।
जिसे आज मंज़िल का दावा बहुत है,
उसी को सफ़र में चलाया था हमने।
हमारी ही आँखों में आँसू थे लेकिन,
ज़माने को हँस कर दिखाया था हमने।
हमें क्या डराएगा अब ये अंधेरा,
दिये की जगह दिल जलाया था हमने।
वो इक ख़्वाब जो डूबने ही लगा था,
उसे आँख में फिर बसाया था हमने।
जहाँ लोग गिर कर सँभलते नहीं थे,
वहाँ अपना रस्ता निकाला था हमने।
वही अब हमें देखकर चुप खड़ा है,
जिसे आइना खुद बनाया था हमने।
वही अब हमें भूल बैठे हैं 'अज़हर',
जिन्हें गिरते-गिरते संभाला था हमने।
~ Azhar Sabri ~
हर किसी को मेरी चाहत हो ज़रूरी तो नहीं।
उसकी नीयत में मुहब्बत हो ज़रूरी तो नहीं।
हम ही बिखरे हैं सदा याद के वीरानों में
उस पे भी ऐसी क़यामत हो ज़रूरी तो नहीं
हम ने सोचा था कि वो भी हमें समझेंगे कभी
उन को मेरी ये ज़रूरत हो ज़रूरी तो नहीं
इक नज़र मुझ पे ठहर जाए तो ये मत समझो
उस के लहजे में भी चाहत हो ज़रूरी तो नहीं
मुस्कुराते हुए जीते हैं कई दर्द के साथ
हर खुशी के लिए राहत हो ज़रूरी तो नहीं
वक़्त की धूल में गुम कितने ही मंज़र होंगे
सब में बाकी वही हसरत हो ज़रूरी तो नहीं
एक ही राह पे चलने से कोई अपना नहीं
हर सफ़र में वही उल्फ़त हो ज़रूरी तो नहीं
ख़्वाब आँखों ने कई देख लिए हैं लेकिन
हर दुआ की वही क़िस्मत हो ज़रूरी तो नहीं
हर त'अल्लुक़ का नतीजा हो मुहब्बत 'अज़हर'
ज़िंदगी की यही फितरत हो ज़रूरी तो नहीं
~ Azhar Sabri ~
हुकूमत ने वफ़ा की हर निशानी बेच डाली है।
नए दौर-ए-सियासत ने कहानी बेच डाली है।
कभी जो घर की छत थी, आसमाँ तक जो सहारा थी,
उसी ने अब तो हर इक मेहरबानी बेच डाली है।
नज़र कुर्सी पे इतनी थी कि चेहरा खो दिया उसने,
हक़ीक़त के उजालों की रवानी बेच डाली है।
उम्मीदों के नगर में अब उजाला भी थका सा है,
सियासत के बाज़ारों ने जवानी बेच डाली है।
न डर बाकी रहा है अब, ना ही अंजाम की परवाह,
मोहब्बत तक सियासत ने निशानी बेच डाली है।
तमाशा हम बने बैठे, वो किरदारों के मालिक हैं,
सियासत के इशारों में ज़ुबानी बेच डाली है।
जो वादे थे, जो सपने थे, हवाओं में बिखरते थे,
हक़ीक़त के बदन की हर रवानी बेच डाली है।
भरोसा टूटता जाता है अब हर एक साये से,
कि इस बाज़ार ने हर शय फ़ानी बेच डाली है।
वो कुर्सी के नशे में इस कदर से चूर बैठे हैं,
कि बेबस मुफ़्लिसों की भी कहानी बेच डाली है।
~ Azhar Sabri ~
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