Ravi Arora
विभिन्न विद्वानों के उत्तम ज्ञान, धर्म, व्यवहार, आचार, विचार लाकर प्रेषित करने का प्रयास है जी।🚩🕉️
08/10/2025
हर पिता के भाग्य में बेटी नहीं होती।
राजा दशरथ जब अपने बेटे कि बारात लेकर राजा जनक के द्वार पर पहुंचे तो राजा जनक ने सम्मान पूर्वक बारात का स्वागत किया।
तभी दशरथ जी ने आगे बढ़ कर जनक जी के पांव छू लिए,
चौंक कर जनक जी ने दशरथ जी को थाम लिया, और कहा - महाराज आप बड़े हैं वर पक्ष वाले हैं, ये उल्टी गंगा कैसे बहा रहे हैं?
इस पर दशरथ जी ने बड़ी सुंदर बात कही,
महाराज आप दाता हैं, कन्या दान कर रहे हैं मैं तो याचक हूं, आपके द्वार कन्या लेने आया हूं।
अब आप हीं बताइए दाता और याचक में कौन बड़ा है?
यह सुनकर जनक जी के आंखों से अश्रुधारा बह निकली।
भाग्यशाली हैं वो जिनके घर होती हैं बेटियाँ। हर बेटी के भाग्य में पिता होता है लेकिन हर पिता के भाग्य में बेटी नहीं होती।
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04/10/2025
नाथ सम्प्रदाय के बारह पंथ :-*
नाथ सम्प्रदाय के मठ: बारह शाखाओं में विभक्त हैं, जिन्हें बारह पंथ कहते हैं। इन बारह पंथों के कारण
नाथ संप्रदाय को 'बारह-पंथी' योगी भी कहते हैं।
प्रत्येक पंथ का एक-एक विशेष स्थान है, जिसमें नाथ लोग अपना पुण्य क्षेत्र मानते हैं। प्रत्येक पंथ एक पौराणिक कथा देवता सिद्ध योगी को अपना आदि प्रवर्तक मानता है। नाथ सम्प्रदाय के बारह पंथों का स्वरूप
परिचय इस प्रकार है -
1॰ सत्यनाथ पंथ - इनकी संख्या 31 बतलायी गयी है।
इसके मूल प्रवर्तक सत्यनाथ (भगवान् ब्रह्माजी) थे।
इसीलिये सत्यनाथी पंथ के अनुयायियों को “ब्रह्मा के।”
योगी'' भी कहते हैं। इस पंथ का प्रधान उड़ीसा प्रदेश
पाताल लोक का स्थान है।
2॰ धर्मनाथ पंथ – इनकी संख्या 25 है। इस पंथ के मूल
प्रवर्तक धर्मराज युधिष्ठिर माने जाते हैं। धर्मनाथ पंथ का मुख्य पृष्ट नेपाल राष्ट्र का डुलुडेलक स्थान है। भारत इस पृष्ण कच्छ प्रदेश में धिनोधर स्थान पर हैं।
3॰ राम का पंथ-उपयोगी संख्या 61 है। इस पंथ के मूल प्रवर्तक
भगवान श्रीरामचन्द्र माने गये हैं। ये प्रधान उत्तर-प्रदेश का गोरखपुर स्थान है।
4॰ नटेश्वरी पंथ या लक्ष्मणनाथ पंथ –इनकी संख्या 43 है। इस पंथ के मूल प्रवर्तक लक्ष्मणजी माने जाते हैं। इस पंथ का मुख्य पंजाब
प्रान्त का गोरखटीला (झेलम) स्थान है। इस पंथ दरियानाथ व तुलनाथ पंथ से का संबंध यह भी बताया गया है.
5॰ कंथड पंथ - दस लाख की संख्या में है। कंथड़ पंथ के मूल प्रवर्तक गणेशजी कहे गये हैं। यह प्रधान पृष्ण कच्छ है प्रदेश का मनफरा स्थान है।
6॰ कपिलानी पंथ - अन्य संख्या 26 है। इस पंथ गढ़वाल के राजा अजयपाल ने बनाई जिम्मेदारी। इस पंथ के प्रधान प्रचारक कपिल मुनिजी बता रहे हैं।
कपिलानी पंथ का प्रधान पूर्वी बंगाल प्रदेश का गंगासागर स्थान है । कलकट्टे (कोलकाता) के पास दमदम
गोरख वंशीय भी इनकी एक मुख्य पृष्टभूमि है।
7॰ वैराग्य पंथ - उनकी संख्या 124 है। इस पंथ के मूल प्रवर्तक भर्तृहरिजी हैं। वैराग्य पंथ की प्रधान पृच्छा राजस्थान प्रदेश के नागौर में राताढुंधा स्थान है
भोटंगनाथी पंथ का सम्बन्ध भोटंगनाथी पंथ से है।
8॰ फ़ेलथ पंथ - इनकी 100 संख्या है। इस पंथ के मूल
प्रवर्तक राजा गोपीचंद्रजी माने गए हैं। इस समय फेलथ पंथ का पृथिवी राजस्थान प्रदेश का जोधपुर महा-
मंदिर नामक स्थान के बारे में बताया गया है।
9॰ आई पंथ - दस संख्या है। इस पंथ का मूल प्रवर्तिका गुरु गोरखनाथ
की शिष्या भगवती विमला देवी हैं। आई पंथ का मुख्य पृष्ट बंगाल प्रदेश के दिनाजपुर जिले में जोगी गुफा या गोरखकुई नामित स्थान हैं। ये एक पृष्णि हरिद्वार में है यह भी बताया गया है. इस पंथ का संबंध घोड़ा चौली से है
10॰ पागल पंथ - इनकी संख्या 4 है। इस पंथ के मूल प्रवर्तक श्री चौरंगनाथ थे। जो पूर्ण भगत के नाम से ये भी हैं मशहूर. यह मुख्य पंजाब है- हरियाणा का अबोहर स्थान है।
11॰ ध्वजनाथ पंथ - उनकी संख्या 3 है। इस पंथ के मूल प्रवर्तक हनुमानजी माने जाते हैं। वर्तमान में यह मुख्य है पृष्णि संभाव्यतः अम्बाला में है।
12॰ गंगानाथ पंथ-इनकी संख्या 6 है। इस पंथ के मूल प्रवर्तक श्री भीष्म पितामह माने जाते हैं। यह मुख्य है पंजाब के गुरुदासपुर जिले का जखबार स्थान है।
कालांतर में नाथ सम्प्रदाय के इन बारह पंथों में छह पंथ और
सम्बंधित - 1॰ रावल (संख्या-71), 2॰ पंक (पंख), 3॰ वन, 4॰
कंठर पंथी, 5॰ गोपाल पंथ तथा 6॰ हेठ नाथी।
इस प्रकार कुल बारह-अठारह पंथ कहलाते हैं। बाद में अनेक
पंथ जुड़ते गए, ये सभी बारह-अठारह पंथों की उपशाखाएँ
या उप-पंथ है। कुछ के नाम इस प्रकार हैं - अर्धनारी,
तंजानिया, अमापंथी। उदयनाथी, कायिकनाथी, कामज,
कषाय, गणेशनाथ, चर्पटनाथी, तारकनाथी, नाथन निरंजनी,
नायरी, पीलानाथी, पाव पंथ, फिल नाथी, भृंगनाथ इत्यादि
27/09/2025
काशी में मणिकर्णिका घाट पर चिता जब शांत हो जाती है तब मुखाग्नि देने वाला व्यक्ति चिता भस्म पर 94 लिखता है।
यह सभी को नहीं मालूम है। खांटी बनारसी लोग या अगल बगल के लोग ही इस परम्परा को जानते हैं। बाहर से आये शवदाहक जन इस बात को नहीं जानते।
जीवन के शतपथ होते हैं। 100 शुभ कर्मों को करने वाला व्यक्ति मरने के बाद उसी के आधार पर अगला जीवन शुभ या अशुभ प्राप्त करता है। 94 कर्म मनुष्य के अधीन हैं। वह इन्हें करने में समर्थ है पर 6 कर्म का परिणाम ब्रह्मा जी के अधीन होता है।हानि-लाभ, जीवन-मरण, यश- अपयश ये 6 कर्म विधि के नियंत्रण में होते हैं।
अतः आज चिता के साथ ही तुम्हारे 94 कर्म भस्म हो गये। आगे के 6 कर्म अब तुम्हारे लिए नया जीवन सृजित करेंगे।
अतः 100 - 6 = 94 लिखा जाता है।
गीता में भी प्रतिपादित है कि मृत्यु के बाद मन अपने साथ 5 ज्ञानेन्द्रियों को लेकर जाता है। यह संख्या 6 होती है। मन और पांच ज्ञान इन्द्रियाँ।
अगला जन्म किस देश में कहाँ और किन लोगों के बीच होगा यह प्रकृति के अतिरिक्त किसी को ज्ञात नहीं होता है। अतः 94 कर्म भस्म हुए 6 साथ जा रहे हैं।
विदा यात्री। तुम्हारे 6 कर्म तुम्हारे साथ हैं।
आपके लिए इन 100 शुभ कर्मों का विस्तृत विवरण दिया जा रहा है जो जीवन को धर्म और सत्कर्म की ओर ले जाते हैं एवं यह सूची आपके जीवन को सत्कर्म करने की प्रेरणा देगी......
100 शुभ कर्मों की गणना धर्म और नैतिकता के कर्म-
1.सत्य बोलना
2.अहिंसा का पालन
3.चोरी न करना
4.लोभ से बचना
5.क्रोध पर नियंत्रण
6.क्षमा करना
7.दया भाव रखना
8.दूसरों की सहायता करना
9.दान देना (अन्न, वस्त्र, धन)
10.गुरु की सेवा
11.माता-पिता का सम्मान
12.अतिथि सत्कार
13.धर्मग्रंथों का अध्ययन
14.वेदों और शास्त्रों का पाठ
15.तीर्थ यात्रा करना
16.यज्ञ और हवन करना
17.मंदिर में पूजा-अर्चना
18.पवित्र नदियों में स्नान
19.संयम और ब्रह्मचर्य का पालन
20.नियमित ध्यान और योग सामाजिक और पारिवारिक कर्म
21.परिवार का पालन-पोषण
22.बच्चों को अच्छी शिक्षा देना
23.गरीबों को भोजन देना
24.रोगियों की सेवा
25.अनाथों की सहायता
26.वृद्धों का सम्मान
27.समाज में शांति स्थापना
28.झूठे वाद-विवाद से बचना
29.दूसरों की निंदा न करना
30.सत्य और न्याय का समर्थन
31.परोपकार करना
32.सामाजिक कार्यों में भाग लेना
33.पर्यावरण की रक्षा
34.वृक्षारोपण करना
35.जल संरक्षण
36.पशु-पक्षियों की रक्षा
37.सामाजिक एकता को बढ़ावा देना
38.दूसरों को प्रेरित करना
39.समाज में कमजोर वर्गों का उत्थान
40.धर्म के प्रचार में सहयोग आध्यात्मिक और व्यक्तिगत कर्म
41.नियमित जप करना
42.भगवान का स्मरण
43.प्राणायाम करना
44.आत्मचिंतन
45.मन की शुद्धि
46.इंद्रियों पर नियंत्रण
47.लालच से मुक्ति
48.मोह-माया से दूरी
49.सादा जीवन जीना
50.स्वाध्याय (आत्म-अध्ययन)
51.संतों का सान्निध्य
52.सत्संग में भाग लेना
53.भक्ति में लीन होना
54.कर्मफल भगवान को समर्पित करना
55.तृष्णा का त्याग
56.ईर्ष्या से बचना
57.शांति का प्रसार
58.आत्मविश्वास बनाए रखना
59.दूसरों के प्रति उदारता
60.सकारात्मक सोच रखना सेवा और दान के कर्म
61.भूखों को भोजन देना
62.नग्न को वस्त्र देना
63.बेघर को आश्रय देना
64.शिक्षा के लिए दान
65.चिकित्सा के लिए सहायता
66.धार्मिक स्थानों का निर्माण
67.गौ सेवा
68.पशुओं को चारा देना
69.जलाशयों की सफाई
70.रास्तों का निर्माण
71.यात्री निवास बनवाना
72.स्कूलों को सहायता
73.पुस्तकालय स्थापना
74.धार्मिक उत्सवों में सहयोग
75.गरीबों के लिए निःशुल्क भोजन
76.वस्त्र दान
77.औषधि दान
78.विद्या दान
79.कन्या दान
80.भूमि दान, नैतिक और मानवीय कर्म
81.विश्वासघात न करना
82.वचन का पालन
83.कर्तव्यनिष्ठा
84.समय की प्रतिबद्धता
85.धैर्य रखना
86.दूसरों की भावनाओं का सम्मान
87.सत्य के लिए संघर्ष
88.अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना
89.दुखियों के आँसू पोंछना
90.बच्चों को नैतिक शिक्षा
91.प्रकृति के प्रति कृतज्ञता
92.दूसरों को प्रोत्साहन
93.मन, वचन, कर्म से शुद्धता
94.जीवन में संतुलन बनाए रखना
विधि के अधीन 6 कर्म
95.हानि
96.लाभ
97.जीवन
98.मरण
99.यश
100.अपयश
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11/09/2025
जिनका जन्म 1955,1956,1957,1958,1959,1960,1961,1962,1963, 1964,1965,1966,1967,1968,1969,1970,1971,1972, 1973,1974,1975,1976,1977,1978,1979,1980 में हुआ है – खास उन्हीं के लिए यह लेख
यह पीढ़ी अब 45 पार करके 65- 70 की ओर बढ़ रही है।
इस पीढ़ी की सबसे बड़ी सफलता यह है कि इसने ज़िंदगी में बहुत बड़े बदलाव देखे और उन्हें आत्मसात भी किया।…
1, 2, 5, 10, 20, 25, 50 पैसे देखने वाली यह पीढ़ी बिना झिझक मेहमानों से पैसे ले लिया करती थी।
स्याही–कलम/पेंसिल/पेन से शुरुआत कर आज यह पीढ़ी स्मार्टफोन, लैपटॉप, पीसी को बखूबी चला रही है।
जिसके बचपन में साइकिल भी एक विलासिता थी, वही पीढ़ी आज बखूबी स्कूटर और कार चलाती है।
कभी चंचल तो कभी गंभीर… बहुत सहा और भोगा लेकिन संस्कारों में पली–बढ़ी यह पीढ़ी।
टेप रिकॉर्डर, पॉकेट ट्रांजिस्टर – कभी बड़ी कमाई का प्रतीक थे।
मार्कशीट और टीवी के आने से जिनका बचपन बरबाद नहीं हुआ, वही आखिरी पीढ़ी है।
कुकर की रिंग्स, टायर लेकर बचपन में “गाड़ी–गाड़ी खेलना” इन्हें कभी छोटा नहीं लगता था।
“सलाई को ज़मीन में गाड़ते जाना” – यह भी खेल था, और मज़ेदार भी।
“कैरी (कच्चे आम) तोड़ना” इनके लिए चोरी नहीं था।
किसी भी वक्त किसी के भी घर की कुंडी खटखटाना गलत नहीं माना जाता था।
“दोस्त की माँ ने खाना खिला दिया” – इसमें कोई उपकार का भाव नहीं, और
“उसके पिताजी ने डांटा” – इसमें कोई ईर्ष्या भी नहीं… यही आखिरी पीढ़ी थी।
कक्षा में या स्कूल में अपनी बहन से भी मज़ाक में उल्टा–सीधा बोल देने वाली पीढ़ी।
दो दिन अगर कोई दोस्त स्कूल न आया तो स्कूल छूटते ही बस्ता लेकर उसके घर पहुँच जाने वाली पीढ़ी।
किसी भी दोस्त के पिताजी स्कूल में आ जाएँ तो –
मित्र कहीं भी खेल रहा हो, दौड़ते हुए जाकर खबर देना:
“तेरे पापा आ गए हैं, चल जल्दी” – यही उस समय की ब्रेकिंग न्यूज़ थी।
लेकिन मोहल्ले में किसी भी घर में कोई कार्यक्रम हो तो बिना संकोच, बिना विधिनिषेध काम करने वाली पीढ़ी।
कपिल, सुनील गावस्कर, वेंकट, प्रसन्ना की गेंदबाज़ी देखी,
पीट सम्प्रस, भूपति, स्टेफी ग्राफ, अगासी का टेनिस देखा,
राज, दिलीप, धर्मेंद्र, जितेंद्र, अमिताभ, राजेश खन्ना, आमिर, सलमान, शाहरुख, माधुरी – इन सब पर फिदा रहने वाली यही पीढ़ी।
पैसे मिलाकर भाड़े पर VCR लाकर 4–5 फिल्में एक साथ देखने वाली पीढ़ी।
लक्ष्या–अशोक के विनोद पर खिलखिलाकर हँसने वाली,
नाना, ओम पुरी, शबाना, स्मिता पाटिल, गोविंदा, जग्गू दादा, सोनाली जैसे कलाकारों को देखने वाली पीढ़ी।
“शिक्षक से पिटना” – इसमें कोई बुराई नहीं थी, बस डर यह रहता था कि घरवालों को न पता चले, वरना वहाँ भी पिटाई होगी।
शिक्षक पर आवाज़ ऊँची न करने वाली पीढ़ी।
चाहे जितना भी पिटाई हुई हो, दशहरे पर उन्हें सोना अर्पण करने वाली और आज भी कहीं रिटायर्ड शिक्षक दिख जाएँ तो निसंकोच झुककर प्रणाम करने वाली पीढ़ी।
कॉलेज में छुट्टी हो तो यादों में सपने बुनने वाली पीढ़ी…
न मोबाइल, न SMS, न व्हाट्सऐप…
सिर्फ मिलने की आतुर प्रतीक्षा करने वाली पीढ़ी।
पंकज उधास की ग़ज़ल “तूने पैसा बहुत कमाया, इस पैसे ने देश छुड़ाया” सुनकर आँखें पोंछने वाली।
दीवाली की पाँच दिन की कहानी जानने वाली।
लिव–इन तो छोड़िए, लव मैरिज भी बहुत बड़ा “डेरिंग” समझने वाली।
स्कूल–कॉलेज में लड़कियों से बात करने वाले लड़के भी एडवांस कहलाते थे।
फिर से आँखें मूँदें तो…
वो दस, बीस… अस्सी, नब्बे… वही सुनहरी यादें।
गुज़रे दिन तो नहीं आते, लेकिन यादें हमेशा साथ रहती हैं।
और यह समझने वाली समझदार पीढ़ी थी कि –
आज के दिन भी कल की सुनहरी यादें बनेंगे।
वो भी एक ज़माना था…
तब बालवाड़ी (प्ले स्कूल) जैसा कोई कॉन्सेप्ट ही नहीं था।
6–7 साल पूरे होने के बाद ही सीधे स्कूल भेजा जाता था।
अगर स्कूल न भी जाएँ तो किसी को फर्क नहीं पड़ता।
न साइकिल से, न बस से भेजने का रिवाज़ था।
बच्चे अकेले स्कूल जाएँ, कुछ अनहोनी होगी –
ऐसा डर माता–पिता को कभी नहीं हुआ।
पास/फेल यही सब चलता था।
प्रतिशत (%) से हमारा कोई वास्ता नहीं था।
ट्यूशन लगाना शर्मनाक माना जाता था।
क्योंकि यह “ढीठ” कहलाता था।
किताब में पत्तियाँ और मोरपंख रखकर पढ़ाई में तेज हो जाएँगे –
यह हमारा दृढ़ विश्वास था।
कपड़े की थैली में किताबें रखना,
बाद में टिन के बक्से में किताबें सजाना –
यह हमारा क्रिएटिव स्किल था।
हर साल नई कक्षा के लिए किताब–कॉपी पर कवर चढ़ाना –
यह तो मानो वार्षिक उत्सव होता था।
साल के अंत में पुरानी किताबें बेचना और नई खरीदना –
हमें इसमें कभी शर्म नहीं आई।
दोस्त की साइकिल के डंडे पर एक बैठता, कैरियर पर दूसरा –
और सड़क–सड़क घूमना… यही हमारी मस्ती थी।
स्कूल में सर से पिटाई खाना,
पैरों के अंगूठे पकड़कर खड़ा होना,
कान मरोड़कर लाल कर देना –
फिर भी हमारा “ईगो” आड़े नहीं आता था।
असल में हमें “ईगो” का मतलब ही नहीं पता था।
मार खाना तो रोज़मर्रा का हिस्सा था।
मारने वाला और खाने वाला – दोनों ही खुश रहते थे।
खाने वाला इसलिए कि “चलो, आज कल से कम पड़ा।”
मारने वाला इसलिए कि “आज फिर मौका मिला।”
नंगे पाँव, लकड़ी की बैट और किसी भी बॉल से
गली–गली क्रिकेट खेलना – वही असली सुख था।
जिन्होंने कभी पॉकेट मनी नहीं माँगा,
और न माता–पिता ने दिया।
उनकी ज़रूरतें बहुत छोटी थीं,
जो परिवार पूरा कर देता था।
छह महीने में एक बार मुरमुरे या फरसाण मिल जाए –
तो बेहद खुश हो जाते थे।
दिवाली में लवंगी फुलझड़ी की लड़ी खोलकर
एक–एक पटाखा फोड़ना – बिल्कुल भी छोटा नहीं लगता था।
कोई और पटाखे फोड़ रहा हो तो उसके पीछे–पीछे भागना –
यही सबकी मौज थी।
कभी अपने माता–पिता से यह नहीं कहा कि
“हम आपसे बहुत प्यार करते हैं” –
क्योंकि हमें “I Love You” कहना आता ही नहीं था।
आज जीवन में संघर्ष करते हुए
दुनिया का हिस्सा बने हैं।
कुछ ने वह पाया जो चाहा था,
कुछ अब भी सोचते हैं – “क्या पता…”
स्कूल के बाहर हाफ पैंट वाले गोलियों के ठेले पर
दोस्तों की मेहरबानी से जो मिलता –
वो कहाँ चला गया?
वो दुनिया के किसी भी कोने में रहें,
लेकिन सच यह है कि –
उन्होंने ही हकीकत में जीया और हकीकत में बड़े हुए।
कपड़ों में सिलवटें न आएँ,
रिश्तों में औपचारिकता रहे –
यह उनको कभी नहीं आया।
रोटी–सब्ज़ी के बिना डिब्बा हो सकता है –
यह मालूम ही नहीं था।
जिन्होंने कभी अपनी किस्मत को दोष नहीं दिया।
आज भी वे महान लोग सपनों में जीते हैं,
शायद वही सपने उन सबको जीने की ताक़त देते हैं।
उन सबका जीवन वर्तमान से कभी तुलना नहीं कर सकता।
वह लोग अच्छे हों या बुरे –
लेकिन वो भी एक “ज़माना” था…!
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️
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07/09/2025
टिटहरी,,,,, सात बात पते की,,,
वैज्ञानिक फेल है,,,इनके आगे
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इस बार टिटहरी ने कई जगह छत पर अंडे दिये,, ये पिछले 50 वर्ष में राजस्थान में पहली बार देखा गया है ----
1.टिटहरी ने 4 अंडे दिये तो समझो 4 माह बारिश
2. टिटहरी ने ऊँचाई पर जमीन पर अंडे दिये तो समझो बहुत अच्छी बारिश
3. टिटहरी पेड़, दीवार, खम्बे, रस्सी या जहाँ तक हो छत पर नही बैठती है,,
4. यदि टिटहरी ने छत पर अंडे दे दिये तो समझो पानी से तबाही,,,
5.कभी आप टिटहरी को कुरुक्षेत्र के अलावा देश मे मृत नही देख सकते,,
6 टिटहरी जिस खेत मे अंडे देती है वो खेत खाली नही रहता।
7 जिस वर्ष टिटहरी अंडे न दे समझ लो भयंकर अकाल है।
प्रकृति इनसे है,,, ये प्रकृति के पोषक है,,, जब विज्ञान नही था तब ये थे,, प्रभु ने इसलिये इन्हें बनाया,,, हम खो रहे भुगत रहे है अचेत है इनको इग्नोर कर,,, संभलो मुंह नही बोलते पर सन्देश,,, अटल है।
🙏🙏💐💐🙏🙏
।। जय हो प्रभु ।।
🙏🙏💐💐🙏🙏
07/09/2025
क्या आप जानते हैं आसमान में ऊँचाई पर उड़ते हुए बाज़ को एक ही परिंदा तंग करता है… और वो है कौआ।
कौआ इतना जुर्रत वाला होता है कि बाज़ की पीठ पर बैठकर उसकी गर्दन पर चोंच मारता है, परेशान करता है, उसे तकलीफ़ देता है।
लेकिन हैरानी की बात ये है कि बाज़ कभी पलटकर झगड़ता नहीं।
वो न फड़फड़ाता है, न अपनी ताक़त बर्बाद करता है।
वो सिर्फ़ एक काम करता है और ऊँचा उड़ता है।
जैसे-जैसे बाज़ ऊँचाई पकड़ता जाता है, हवा का दबाव तेज़ हो जाता है
और वो कौआ… उस बुलंदी को बर्दाश्त ही नहीं कर पाता।
आख़िरकार, उसकी साँसें फूलने लगती हैं, उसकी ताक़त जवाब देने लगती है… और वो नीचे गिर जाता है।
इसलिए नहीं कि बाज़ ने हमला किया,
इसलिए कि बाज़ ने अपनी उड़ान ऊँची कर दी।
दोस्तों, ज़िंदगी में भी यही हक़ीक़त है।
लोग बोलेंगे, ताने कसेंगे, परेशान करेंगे।
लेकिन तुम्हें जवाब देने की ज़रूरत नहीं। उनके पीछे अपनी एनर्जी बर्बाद करने की जरूरत नहीं।
बस अपनी मेहनत और किरदार से ऊँचाई हासिल करते जाओ।
क्योंकि तुम्हारी तरक़्क़ी ही उनकी आवाज़ को खामोश कर देगी।
तुम्हारी बुलंदी ही उनका पीछा छुड़ा देगी।
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27/08/2025
कुत्ता भौंकता है, कुत्ता संगठित है, कुत्ता गिरोह में रहता है, कुत्ता काटता है, तो सुप्रीम कोर्ट से लेकर भारत का अभिजात्य समाज कुत्तागिरी को लेकर सड़कों पर आ गया। कुत्ते का प्रभाव इतना कि सुप्रीम कोर्ट को अपना फैसला बदलना पड़ा।
गाय काटती नहीं। गाय चिल्लाती नहीं। वह संगठित नहीं है। गाय का कोई गिरोह नहीं है। दूध देकर मनुष्य का और गोबर-मूत्र से धरती का पोषण करती है। इसलिए कोर्ट और अभिजात्य समाज की नजर में वह बेकार है..निरर्थक है।
तो सन्देश यह है...
कि लोकतंत्र में जो चिल्लाता है, भौंकता है, काटता है, सत्ता, कोर्ट और अभिजात्य वर्ग उससे समझौता करता है। उसकी चिन्ता करता है।
हिन्दू वास्तव में गौपूजक समाज है। जो काटता नहीं, जो भौंकता नहीं और वह गिरोह बनाकर भी नहीं रहता। यह एक सभ्य विकसित व प्रगतिशील समाज का वह गुण है जो सनातन धर्म को सर्वश्रेष्ठ बनाता हैं।
जय गौ माता।
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15/08/2025
Psychologists say most people in their later years regret not what they did, but what they DIDN'T dare to do.
🙏Top 3 mistakes that cost too much:
🙏Fear of the new — While some wait for the "right moment", others capitalize on trends.
🙏The illusion of time — "I'll do it later"- the most dangerous thought.
🙏Blind faith in traditional systems — Banks, cash, stable jobs — these are no longer guarantees.
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14/08/2025
काकभुशुण्डिजी को कैसे मिला कौये का रूप?
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* गुर के बचन सुरति करि राम चरन मनु लाग।
रघुपति जस गावत फिरउँ छन छन नव अनुराग॥
भावार्थ:-गुरुजी के वचनों का स्मरण करके मेरा मन श्री रामजी के चरणों में लग गया। मैं क्षण-क्षण नया-नया प्रेम प्राप्त करता हुआ श्री रघुनाथजी का यश गाता फिरता था॥
काकभुशुण्डि रामचरितमानस के एक पात्र हैं। संत तुलसीदास जी ने रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में लिखा है कि काकभुशुण्डि परमज्ञानी रामभक्त हैं। रावण के पुत्र मेघनाथ ने राम से युद्ध करते हुये राम को नागपाश से बाँध दिया था। देवर्षि नारद के कहने पर गरूड़, जो कि सर्पभक्षी थे, ने नागपाश के समस्त नागों को खाकर राम को नागपाश के बंधन से छुड़ाया।
राम के इस तरह नागपाश में बँध जाने पर राम के परमब्रह्म होने पर गरुड़ को सन्देह हो गया। गरुड़ का सन्देह दूर करने के लिये देवर्षि नारद उन्हें ब्रह्मा जी के पास भेजा। ब्रह्मा जी ने उनसे कहा कि तुम्हारा सन्देह भगवान शंकर दूर कर सकते हैं।
भगवान शंकर ने भी गरुड़ को उनका सन्देह मिटाने के लिये काकभुशुण्डि जी के पास भेज दिया। अन्त में काकभुशुण्डि जी ने राम के चरित्र की पवित्र कथा सुना कर गरुड़ के सन्देह को दूर किया। गरुड़ के सन्देह समाप्त हो जाने के पश्चात् काकभुशुण्डि जी गरुड़ को स्वयं की कथा सुनाया जो इस प्रकार हैः
पूर्व के एक कल्प में कलियुग का समय चल रहा था। उसी समय काकभुशुण्डि जी का प्रथम जन्म अयोध्या पुरी में एक शूद्र के घर में हुआ।
उस जन्म में वे भगवान शिव के भक्त थे किन्तु अभिमानपूर्वक अन्य देवताओं की निन्दा करते थे। एक बार अयोध्या में अकाल पड़ जाने पर वे उज्जैन चले गये। वहाँ वे एक दयालु ब्राह्मण की सेवा करते हुये उन्हीं के साथ रहने लगे। वे ब्राह्मण भगवान शंकर के बहुत बड़े भक्त थे किन्तु भगवान विष्णु की निन्दा कभी नहीं करते थे। उन्होंने उस शूद्र को शिव जी का मन्त्र दिया।
मन्त्र पाकर उसका अभिमान और भी बढ़ गया। वह अन्य द्विजों से ईर्ष्या और भगवान विष्णु से द्रोह करने लगा। उसके इस व्यवहार से उनके गुरु (वे ब्राह्मण) अत्यन्त दुःखी होकर उसे श्री राम की भक्ति का उपदेश दिया करते थे।
एक बार उस शूद्र ने भगवान शंकर के मन्दिर में अपने गुरु, अर्थात् जिस ब्राह्मण के साथ वह रहता था, का अपमान कर दिया। इस पर भगवान शंकर ने आकाशवाणी करके उसे शाप दे दिया कि रे पापी! तूने गुरु का निरादर किया है इसलिये तू सर्प की अधम योनि में चला जा और सर्प योनि के बाद तुझे 1000 बार अनेक योनि में जन्म लेना पड़े। गुरु बड़े दयालु थे इसलिये उन्होंने शिव जी की स्तुति करके अपने शिष्य के लिये क्षमा प्रार्थना की।
गुरु के द्वारा क्षमा याचना करने पर भगवान शंकर ने आकाशवाणी करके कहा, "हे ब्राह्मण! मेरा शाप व्यर्थ नहीं जायेगा। इस शूद्र को 1000 बार जन्म अवश्य ही लेना पड़ेगा किन्तु जन्मने और मरने में जो दुःसह दुःख होता है वह इसे नहीं होगा और किसी भी जन्म में इसका ज्ञान नहीं मिटेगा।
इसे अपने प्रत्येक जन्म का स्मरण बना रहेगा जगत् में इसे कुछ भी दुर्लभ न होगा और इसकी सर्वत्र अबाध गति होगी मेरी कृपा से इसे भगवान श्री राम के चरणों के प्रति भक्ति भी प्राप्त होगी।"
इसके पश्चात् उस शूद्र ने विन्ध्याचल में जाकर सर्प योनि प्राप्त किया। कुछ काल बीतने पर उसने उस शरीर को बिना किसी कष्ट के त्याग दिया वह जो भी शरीर धारण करता था उसे बिना कष्ट के सुखपूर्वक त्याग देता था, जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र को त्याग कर नया वस्त्र पहन लेता है।
प्रत्येक जन्म की याद उसे बनी रहती थी। श्री रामचन्द्र जी के प्रति भक्ति भी उसमें उत्पन्न हो गई। अन्तिम शरीर उसने ब्राह्मण का पाया। ब्राह्मण हो जाने पर ज्ञानप्राप्ति के लिये वह लोमश ऋषि के पास गया। जब लोमश ऋषि उसे ज्ञान देते थे तो वह उनसे अनेक प्रकार के तर्क-कुतर्क करता था।
उसके इस व्यवहार से कुपित होकर लोमश ऋषि ने उसे शाप दे दिया कि जा तू चाण्डाल पक्षी (कौआ) हो जा। वह तत्काल कौआ बनकर उड़ गया। शाप देने के पश्चात् लोमश ऋषि को अपने इस शाप पर पश्चाताप हुआ और उन्होंने उस कौए को वापस बुला कर राममन्त्र दिया तथा इच्छा मृत्यु का वरदान भी दिया।
कौए का शरीर पाने के बाद ही राममन्त्र मिलने के कारण उस शरीर से उन्हें प्रेम हो गया और वे कौए के रूप में ही रहने लगे तथा काकभुशुण्डि के नाम से विख्यात हुऐ।
* ताते यह तन मोहि प्रिय भयउ राम पद नेह।
निज प्रभु दरसन पायउँ गए सकल संदेह॥
भावार्थ:-मुझे अपना यह काक शरीर इसीलिए प्रिय है कि इसमें मुझे श्री रामजी के चरणों का प्रेम प्राप्त हुआ। इसी शरीर से मैंने अपने प्रभु के दर्शन पाए और मेरे सब संदेह जाते रहे (दूर हुए)॥
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09/08/2025
शूटिंग के दौरान एक छोटा गरीब लड़का अक्षय कुमार की कार साफ कर रहा था।
जब अक्षय उस गरीब लड़के पास गए, तो वो लड़का डर गया
रोने लगा, बोला-"साहब आप मुझे गाड़ी साफ करने के पैसे भले ही मत देना, पर मुझे मारना मत... मैनें 2 दिन से कुछ नहीं खाया
उसके बाद जो हुआ, उसे जानकर आपका सीना गर्व से चौड़ा हो जाएगा
अक्षय ने उसी समय उस लड़के का हाथ पकड़ कर चल दिए। लड़का डरा...सहमा...
अक्की बोले डरो मत हम तुम्हें नहीं मारेंगे सेट पर जाकर उसे अपने पास बिठाया उससे कुछ बातें की और खाना खिलाया करीबियों के अनुसार, अक्षय ने उस लड़के से उसके माता-पिता के बारे में पूछा, लेकिन उस लड़के ने कहा की उसे अपने मां-बाप के बारे में कुछ याद नहीं है, तो अक्षय की आंखें भर आईं।
हम आपको बता दें कि अक्षय ने उस भीख मांगनेवाले लड़के की पढ़ाई की जिम्मेदारी ली खाना खिलाने के बाद अक्षय ने उसे अच्छे बोर्डिंग में भेज दिया अक्षय से जब इस बारे में पूछा गया, तो उन्होंने जो जवाब दिया, वो वाकई लाजवाब है
अक्षय ने कहा-देश के लोग मुझे करोड़पति बना सकते हैं, तो क्या मैं उनके लिए इतना भी नहीं कर सकता क्या?
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