Positive Thoughts

Positive Thoughts

Share

*There is No Need To Lose Smthng to Get Smthing But You Need To Do Something*

"Spreading positivity and inspiration every day.

Join me on a journey of uplifting thoughts and empowering ideas. Let's make the world a better place, one thought at a time!"

29/04/2026

लापरवाही न बरतें आपका भी परिवार आपके इंतजार में रहता हैं घर मे Part 7

29/04/2026

लापरवाही न बरतें आपका भी परिवार आपके इंतजार में रहता हैं घर मे Part 6

29/04/2026

लापरवाही न बरतें आपका भी परिवार आपके इंतजार में रहता हैं घर मे Part 5

29/04/2026

लापरवाही न बरतें आपका भी परिवार आपके इंतजार में रहता हैं घर मे Part 4

29/04/2026

लापरवाही न बरतें आपका भी परिवार आपके इंतजार में रहता हैं घर मे Part 3

29/04/2026

लापरवाही न बरतें आपका भी परिवार आपके इंतजार में रहता हैं घर मे Part 2

29/04/2026

लापरवाही न बरतें आपका भी परिवार आपके इंतजार में रहता हैं घर मे Part 1

25/04/2026

घरौंदा - "एक टूटे-बिखरे घर की वापसी"

हैदराबाद के बंजारा हिल्स में अर्जुन और काव्या मेहरा का हँसता-खेलता परिवार रहता था। अर्जुन IT कंपनी में सीनियर मैनेजर था और काव्या गृहिणी। दोनों एक-दूसरे से बेइंतहा प्यार करते थे। घर में सास सुधा जी और ससुर रमेश जी भी थे, जिन्हें काव्या माँ-बाप की तरह मानती थी और उनकी सेवा करती थी। उनके दो बच्चे थे - दस साल का आरव और पाँच साल की अनाया, दोनों स्कूल जाते थे। पैसे की कोई कमी नहीं थी, बड़ा फ्लैट, दो गाड़ियाँ और साल में दो बार घूमना-फिरना - ज़िंदगी एकदम परफेक्ट थी। अर्जुन ऑफिस से आते ही काव्या को गले लगा लेता, काव्या सास-ससुर के पैर दबाती और बच्चों को कहानी सुनाकर सुलाती। रविवार का मतलब था पूरा परिवार, पिकनिक और गोलगप्पे।

पर इस खुशी को किसी की नज़र लग गई। वो नज़र थी काव्या के बड़े भाई विक्रांत की। प्रॉपर्टी डीलर विक्रांत के मन में लालच था। वो रोज काव्या को फोन करके कहता, "दीदी, जीजाजी तुमसे बहुत प्यार करते हैं, पर प्यार से पेट नहीं भरता। अपने नाम पे फ्लैट करवाओ। सास-ससुर तुझे नौकरानी बना के रखे हैं, तू बस सेवा कर रही है।" धीरे-धीरे ये ज़हर काव्या के दिमाग में असर करने लगा। उसे लगने लगा कि सच में इस घर में उसका अपना क्या है? एक दिन उसने अर्जुन से फ्लैट अपने नाम करने को कहा। अर्जुन चौंक गया, "काव्या, तुम्हें मुझपे भरोसा नहीं? मेरा सब कुछ तुम्हारा ही तो है।" बात बढ़ गई। विक्रांत ने आग में और घी डाला, "देखा दीदी, जीजाजी टाल रहे हैं। मतलब दाल में काला है।" अब काव्या को सास की हर रोक-टोक और ससुर की हर सलाह डाँट लगने लगी। जो घर मंदिर था, वो जेल लगने लगा। काव्या की सहेली नेहा ने उसे बहुत समझाया कि विक्रांत उसका घर तोड़ रहा है, अर्जुन जैसा पति नहीं मिलेगा, पर काव्या को लगा कि हाउसवाइफ होने के कारण उसकी कोई वैल्यू नहीं है।

आखिर एक दिन झगड़ा इतना बढ़ा कि विक्रांत काव्या को मायके ले गया। बच्चे "मम्मा मत जाओ" कहकर रोते रहे, पर काव्या का ईगो बीच में आ गया और वो नहीं रुकी। एक महीने बाद अर्जुन के घर तलाक का नोटिस आ गया, जिसमें वजह लिखी थी मानसिक प्रताड़ना और दहेज की मांग। नोटिस पढ़कर सुधा जी बेहोश हो गईं और रमेश जी की आँखों में आँसू आ गए कि जिस बहू को बेटी माना, उसने उन्हें कोर्ट में खड़ा कर दिया। आरव ने स्कूल जाना बंद कर दिया और अनाया रात-रात भर "मम्मा-मम्मा" करके रोती रही। अर्जुन पूरी तरह टूट गया। उसके दोस्त और वकील रोहन ने उसे संभाला और कहा कि वो केस लड़ेगा क्योंकि अर्जुन ने कुछ गलत नहीं किया।

14 फरवरी, वैलेंटाइन्स डे के दिन फैमिली कोर्ट में तारीख थी। काव्या एक तरफ और अर्जुन दूसरी तरफ, बीच में दस फीट की दूरी। जज ने पूछा कि अलग क्यों होना चाहते हैं, बच्चों का क्या होगा? तभी पाँच साल की अनाया दौड़ते हुए अंदर आ गई और जज के सामने खड़ी होकर बोली, "अंकल, मेरे पापा-मम्मा को तलाक मत देना। मम्मा रात को बिना कहानी सुनाए सो जाती थी तो पापा मेरी पीठ सहलाते थे। पापा को बुखार आया था तो मम्मा रात भर जागी थी। वो दोनों लड़ते नहीं हैं अंकल, वो बस गुम हो गए हैं। प्लीज़ मेरी मम्मा को वापस कर दो।" बच्ची की बात सुनकर पूरा कोर्ट खामोश हो गया और काव्या फूट-फूट कर रो पड़ी। अर्जुन से रहा नहीं गया और उसने अनाया को गोद में उठा लिया। तभी आरव भी अंदर आया और जेब से अपना 'मेरा परिवार' नाम का निबंध निकालकर बोला, "जज अंकल, मैंने लिखा है कि मेरी मम्मा दुनिया की बेस्ट मम्मा है और पापा मेरे सुपरहीरो। अगर आज आप इनका तलाक कर दोगे तो मेरा निबंध झूठा हो जाएगा।" जज की आँखें भी नम हो गईं।

कोर्ट से बाहर आते ही विक्रांत ने काव्या से कहा कि साइन कर दे ताकि अगला फ्लैट देखें। पहली बार काव्या ने भाई के चेहरे पर सिर्फ लालच देखा। तभी नेहा भागती हुई आई और बताया कि सुधा जी की तबीयत खराब है, वो हॉस्पिटल में ICU में हैं और सुबह से काव्या का नाम ले रही हैं कि आखिरी बार बहू को देख लूँ। काव्या के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वो भागते-भागते हॉस्पिटल पहुँची। बाहर रमेश जी बैठे थे, बोले, "आ गई बेटा? तेरी माँ तेरा इंतज़ार कर रही थी, कह रही थी कि बहू को मत बुलाना वो नाराज़ है, पर मैं मर जाऊँ तो मेरे कपड़े वही पहनाए।" ICU में जाकर काव्या ने देखा सुधा जी की आँख खुली। सुधा जी ने उसका हाथ पकड़कर कहा, "मुझे फ्लैट नहीं चाहिए बेटा, मुझे तू चाहिए। तू रूठेगी तो मैं किससे लडूंगी? आरव-अनाया को कौन कहानी सुनाएगा? अर्जुन ऑफिस से आके किसे जादू की झप्पी देगा?" काव्या उनके पैरों में गिरकर रोने लगी, "माँ, मुझे माफ कर दो, मैं बहक गई थी। मुझे पैसा नहीं, मेरा घरौंदा वापस चाहिए।" तभी अर्जुन बच्चों को लेकर आ गया। अनाया बोली, "दादी, देखो मम्मा आ गई! अब आप जल्दी ठीक हो जाओ, हमें पिकनिक पे जाना है!" अर्जुन ने कुछ नहीं कहा, बस जेब से वो पुराना रुमाल निकाला जो काव्या ने उसे पहली करवाचौथ पर दिया था और जिसे उसने आज तक संभाल कर रखा था। काव्या सब समझ गई और दौड़कर अर्जुन के गले लग गई, "मुझे माफ कर दो अर्जुन, मैंने हमारा घर तोड़ दिया था।" अर्जुन रोते हुए बोला, "घर टूटता नहीं काव्या, बस कभी-कभी दरवाज़े बंद हो जाते हैं। चाभी हमेशा प्यार के पास होती है।"

छह महीने बाद का नज़ारा बदला हुआ था। वही घर, वही रविवार। सुधा जी बिल्कुल ठीक होकर किचन में काव्या के साथ हँस-हँस के खाना बना रही थीं। रमेश जी आरव को साइकिल सिखा रहे थे और अनाया अर्जुन की गोद में बैठी थी। काव्या ने विक्रांत से रिश्ता तोड़ दिया था, कह दिया था कि जो भाई बहन का घर तोड़े वो दुश्मन से बदतर होता है। रोहन और नेहा भी घर आए हुए थे। नेहा ने कहा, "देखा काव्या, मैंने कहा था ना, अदालत तलाक दे सकती है, पर प्यार वापस नहीं दे सकती। प्यार तो तुम दोनों को खुद ही वापस लाना पड़ेगा।" अर्जुन ने पूरे परिवार की फोटो खींची और दीवार पर टाँगते हुए बोला, "ये है हमारा घरौंदा। ईंट-सीमेंट से नहीं, भरोसे से बना है। एक बार टूटा था, पर अब इतना मजबूत है कि कोई आँधी भी नहीं हिला सकती।" अनाया ताली बजाकर बोली, "और इस घर में सबसे ज़रूरी है मम्मी-पापा का प्यार और दादी-दादू की दुआ!" सब हँस पड़े।

सीख: मायके की बात सुनो, पर दिमाग अपना लगाओ। ईगो से घर टूटते हैं, सॉरी से बनते हैं। बच्चे सब समझते हैं। और वकील दोस्त हो तो केस जीत जाओगे, पर परिवार दोस्त हो तो ज़िंदगी जीत जाओगे।

अगर कहानी दिल को छू जाए तो शेयर ज़रूर करना, क्योंकि शायद किसी का टूटता घर बच जाए। ❤️

---
ऐसे ही और कहानी पढ़ने के लिए फॉलो करें!!
जय हिंद 🇮🇳







Photo credit

25/04/2026

"ऑटो वाले भैया की दरियादिली"
मीटर 380 का, दिल करोड़ों का 👇
📖 कहानी: "चालीस रुपये में खरीदी इंसानियत
मैं नई दिल्ली से हैदराबाद आया था। पहली बार!
कंधे पर भारी बैग, जेब में कुल 200 रुपये।
जाना था जुबली हिल्स - मौसी के घर

स्टेशन से बाहर निकला। कतार में ऑटो खड़े थे।
एक ऑटो वाले भैया के पास गया - उम्र लगभग 45 साल, चेहरे पर धूप की लकीरें, पर आँखों में अपनापन।

मैं: "भैया, जुबली हिल्स चलेंगे? कितना लेंगे?"
भैया: "बैठो बेटा। मीटर से चलेंगे। चिंता मत करो।"

मैं बैठ गया। ऑटो चला। 5 मिनट बाद भैया बोले:
"बेटा, पहली बार हैदराबाद आए हो?"
मैं: "जी भैया। इंटरव्यू है कल।"
भैया: "कोई चिंता नहीं। मेहनत करो, सफलता मिलेगी।
मेरा बेटा भी कल इंटरव्यू देने गया था। बैंक में।"

रास्ते में ट्रैफिक मिला। भैया ने शॉर्टकट लिया - गलियों से, छाँव से।
बोले: "मुख्य सड़क पर धूप बहुत है। तुम्हें थकान हो जाएगी।
इंटरव्यू से पहले तरोताज़ा रहना चाहिए।"

20 मिनट में मौसी का घर आ गया।
मीटर देखकर मैं चौंक गया - 380 रुपये।
मेरे पास कुल 200 थे। चेहरा उतर गया।

मैंने हिचकिचाते हुए कहा: "भैया... मेरे पास तो 200 ही हैं।
मैं ATM से निकालकर लाता हूँ, आप 5 मिनट रुकिए।"

भैया ने मीटर बंद किया। मुझे देखा। मेरे कपड़े, बैग, चेहरे की परेशानी।
फिर जेब से 40 रुपये का एक नोट निकाला और बोले:

"बेटा, रख लो। चाय-पानी पी लेना। इंटरव्यू में दिमाग शांत रखना।"

मैं अवाक: "भैया, आप पैसे...? मीटर तो 380 का है!"

भैया हँस पड़े: "अरे बेटा, मीटर तो मशीन है। दिल नहीं।
तू मेरे बेटे जैसा है। कल मेरा बेटा भी किसी अनजान शहर में होगा।
अगर वहाँ कोई उसे 40 रुपये दे दे, तो मेरा सीना चौड़ा हो जाएगा।
तू बस सफल होकर लौटना। यही मेरा मीटर है।
और हाँ, 380 नहीं, 40 रुपये ही बहुत हैं। बाकी मेरी तरफ से आशीर्वाद।"

मेरी आँखें भर आईं। मैंने पैर छूने चाहे।
भैया बोले: "अरे नहीं बेटा। आशीर्वाद खाली हाथ दिया जाता है।
जा, मौसी इंतज़ार कर रही होंगी। और सुन जब तू बड़ा आदमी बन जाए, तो किसी और बच्चे की मदद कर देना।
मेरा किराया वहीं वसूल हो जाएगा।"

मैंने 40 रुपये नहीं लिए। बल्कि 200 में से 150 उन्हें दिए।
बोला: "भैया, बाकी 50 रख लीजिए। आपकी चाय के लिए।"
भैया ने 100 वापस कर दिए: "50 बहुत हैं बेटा। लालच बुरी बला है।"

अगले दिन इंटरव्यू था। भैया की बात याद थी - "दिमाग शांत रखना।"
चयन हो गया। आज मैं उसी हैदराबाद में सॉफ्टवेयर इंजीनियर हूँ।

आज भी हर महीने की 1 तारीख को सिकंदराबाद स्टेशन जाता हूँ।
किसी नए लड़के को देखता हूँ - बैग टाँगे, परेशान चेहरे वाला।
उसके ऑटो का किराया चुपके से दे देता हूँ।
ड्राइवर को बोलता हूँ: "भैया, इससे पैसे मत लेना। कह देना किसी 'ऑटो वाले भैया' का आशीर्वाद है।"

रमेश भैया अब नहीं हैं। पर उनका मीटर आज भी चल रहा है - दिल से दिल तक।

---

💡 इस कहानी की सीख::

1. किराया पैसे से नहीं, दुआ से चुकता है,
किसी की मदद करो, ब्रह्मांड तुम्हारी मदद करेगा।

3. सही समय पर दी गई सहायता का मोल नहीं होता "

---

कैसी लगी मित्रों ये कहानी आपको कॉमेंट मे जरूर बताना? 😊
आँख नम हुई न? रमेश भैया जैसे लोग ही भारत की असली पहचान हैं।

आप भी किसी 'रमेश भैया' से मिले हैं? अपना अनुभव साझा करें कॉमेंट बॉक्स उसी के लिऐ ही है! और फोलो करना न भूलें!
जय हिंद 💥🇮🇳!!

आपका दिन शुभ हो! 🙏✨

Want your business to be the top-listed Media Company in Delhi?
Click here to claim your Sponsored Listing.

Category

Address

Delhi