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01/01/2026
नया साल शुरू हो रहा है और दुनिया अनजाने में एक ही सवाल पूछ रही है — तुम कहाँ पहुँचे?
fकिसी की रफ्तार तेज़ दिखती है, किसी का रास्ता ज़्यादा चमकदार लगता है, किसी का जीवन ज़्यादा “सही” दिखाई देता है, और यहीं से भीतर एक हल्की-सी बेचैनी जन्म लेती है — शायद मैं गलत दिशा में हूँ.
महाभारत में कृष्ण ने इस उलझन को युद्ध से बहुत पहले पहचान लिया था, और उन्होंने एक वाक्य में उसका समाधान दे दिया:
“स्वधर्मे निधनं श्रेयः, परधर्मो भयावहः.”
आज यह श्लोक तffलवारों की नहीं, बल्कि comparison की लड़ाई की बात करता है. परधर्म आज यह है कि किसी और की timeline अपनाई जाए, किसी और की सफलता को अपना लक्ष्य मान लिया जाए, किसी और की आवाज़ में अपने फैसले लिए जाएँ. और स्वधर्म? वह शोर नहीं करता. वह भीतर से बहुत धीरे-से कहता है. तू जहाँ है, वहीं से चल. नए साल की शुरुआत किसी तेज़ दौड़ से नहीं होती, बल्कि उस क्षण से होती है जब हम रुककर खुद से पूछते हैं — क्या मैं सच में अपना रास्ता चल रहा हूँ, या किसी और की गति को पकड़ने की कोशिश कर रहा हूँ? क्योंकि जिस दिन तुलना थमती है, उसी दिन दिशा साफ़ होने लगती है. तो इस साल की शुरुआत एक ईमानदार सवाल से कीजिए: अगर आज किसी और की ज़िंदगी देखना बंद कर दूँ, तो क्या मेरा रास्ता मुझे सही नहीं लगेगा?
14/12/2025
"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन |
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ||"
महाभारत में एक क्षण आता है जब अर्जुन यही प्रश्न भीतर ही भीतर पूछ रहे थे.
शक्ति थी, सामर्थ्य था, पर मन फल की चिंता से बंध गया था.
तभी श्रीकृष्ण ने वह वाक्य कहा, जो केवल अर्जुन के लिए नहीं, हम सभी के लिए था:
कृष्ण ने अर्जुन को युद्ध नहीं सिखाया,
उन्होंने उसे मन की गाँठ खोलना सिखाया.
उन्होंने कहा: कर्म करो, पर परिणाम को अपने कंधों पर मत ढोओ.
अर्जुन उसी क्षण समझ गए कि
डर कर्म से नहीं,
फल की अपेक्षा से जन्म लेता है.
सुबह का समय हमेशा ईश्वर की ओर से एक नया निमंत्रण होता है.
बीता हुआ कल पीछे रह जाता है, और आज का दिन एक प्रश्न छोड़ जाता है:
“क्या आज मैं अपने कर्म को पूरे मन से जियूँगा?”
आज बस इतना करिए:
जो काम आप टालते आ रहे थे,
उसे आज ईमानदारी से शुरू कर दीजिए.
परिणाम भगवान पर छोड़ दीजिए.
13/12/2025
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः
शाम का समय हमेशा थोड़ा सच्चा होता है.
सुबह की भागदौड़ थम जाती है और भीतर की आवाज़ साफ़ सुनाई देने लगती है.
कभी-कभी ऐसा लगता है कि दिन भर का शोर शांत होते ही मन कुछ पूछने लगता है:
“क्या मैं आज अपने धर्म के अनुसार जिया?”
महाभारत में भी एक ऐसा ही शांत पल आया था.
युद्ध शुरू होने से ठीक पहले, सूर्य ढल रहा था और अर्जुन अपने रथ में बैठे दूर क्षितिज को देख रहे थे.
वह बोले, “मधुसूदन, क्या मैं यह सब कर पाऊँगा?”
कृष्ण मुस्कुराए. प्रकाश कम हो रहा था, पर उनके शब्दों में अपूर्व उजाला था.
उन्होंने कहा:
"स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः"
भाव यह कि
जो आपका धर्म है, वही आपका पथ है.
दूसरों का मार्ग अपनाने से सिर्फ भ्रम पैदा होता है.
अर्जुन ने उस एक वाक्य में अपना उत्तर पा लिया.
दिन ढला था, पर उनके भीतर एक नया प्रकाश उग आया.
Khatu Shyam ji की कृपा भी इसी भाव को स्पर्श करती है.
शाम के शांत माहौल में जब आप धीरे से कहते हैं:
“श्याम, जो मेरा धर्म है, उसमें मुझे दृढ़ बनाइए,”
तो भीतर की उलझनें ढीली पड़ने लगती हैं.
आज की रात बस इतना कीजिए:
दिन कैसा भी बीता हो,
अपने मन से यह एक प्रश्न पूछिए:
“क्या मैं आज अपने सत्य से दूर गया या उसके थोड़ा-सा और पास आया?”
उत्तर चाहे जो हो,
कृष्ण का सदैव यही संदेश है:
कल आपके लिए एक नई शुरुआत इंतज़ार कर रही है.
13/12/2025
कभी-कभी दिन अपने आप संकेत देता है कि आज मन को थोड़ी स्थिरता चाहिए, थोड़ी गहराई, और थोड़ा साहस. आज की तिथि का गुण भी यही कहता है:
“जो कदम भीतर से जन्म ले, वही आपको आगे ले जाए.”
महाभारत में एक बिल्कुल ऐसा ही क्षण आया था. अर्जुन खड़े थे, पर मन बैठ गया था.
दुनिया सामने थी, लेकिन दृष्टि धुंधली.
और उसी समय श्रीकृष्ण ने वह अमर वाक्य कहा जिसने योद्धा को फिर से जन्म दे दिया:
"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन |
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ||"
भाव बहुत सरल है.
कर्म का अधिकार आपका है,
लेकिन परिणाम का बोझ आपका नहीं.
मन फल के गणित में उलझते ही निर्णय कमजोर हो जाता है,
और कृष्ण यही गांठ काटते हैं.
कहते हैं अर्जुन ने उस क्षण पहली बार महसूस किया कि
भय निर्णय नहीं रोकता,
फल की चिंता रोकती है.
Khatu Shyam ji की कृपा भी इसी सत्य को और सहज बना देती है.
जो भक्त कहता है,
“श्याम, मैं अपना प्रयास आपको समर्पित करता हूँ,”
उसके रास्ते से अवरोध धीरे-धीरे हटने लगते हैं.
क्योंकि समर्पण मन को हल्का कर देता है,
और हल्का मन आगे बढ़ने से डरता नहीं.
आज बस इतना करिए:
एक काम जिसे आप टाल रहे थे,
उसे बिना परिणाम का बोझ लिए शुरू कर दीजिए.
आपका कदम छोटा हो सकता है,
लेकिन उसका प्रभाव बहुत बड़ा हो सकता है.
कृष्ण का ज्ञान और श्याम की कृपा
जब एक साथ चलने लगते हैं,
तो रास्ते कठिन नहीं, बल्कि अर्थपूर्ण लगने लगते हैं.
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