Shaktisadhna

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02/04/2026

मध्ये सुधाब्धि मणिमण्डय रत्नवेदी-
सिंहासनोपरिगतां परिपीत वर्णाम। पीताम्बराभरणमाल्यविभूषितांगी।
देवीं स्मरामि धृतमुद्गरवैरिजिव्हाम।।
जिव्हाग्रमादाय करेण देवीं
वामेन शत्रुन परिपीडयन्तीम।
गदाभिघातेन च दक्षिणेन
पीताम्बराढयाँ द्विभुजां नमामि।।

जय मा पीतांबरा

26/03/2026

श्री बुट भवानी माता - अरनेज

माता बूट भवानी का मंदिर गुजरात के अहमदाबाद जिले के धोलका तालुका में स्थित अरनेज नाम के गांव में आया हुआ अत्यंत पावन और प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है। यह मंदिर चारण समाज की कुलदेवी आई श्री बूट भवानी को समर्पित है और अपनी आध्यात्मिक शांति और भक्तों की अटूट आस्था के लिए जाना जाता है।

लोककथाओं के अनुसार, माता बूट भवानी का जन्म करीब 500-600 साल पहले गुजरात के सुरेंद्रनगर जिले के सापड़का गांव में एक चारण परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम बापल देथा और माता का नाम देवल बाई था, जो मा हिंगलाज के परम भक्त थे। माना जाता है कि माता हिंगलाज ने ही उनके घर पुत्री के रूप में अवतार लिया था। उनकी तीन और बहनें और थीं—आई बहुचरा जी, आई बलाड़ और आई बालवी ।

माता जी ने अपने भक्त तोड़ा बापा को स्वप्न में दर्शन दिए और बताया कि वे अरनेज गांव के पास एक पीपल के पेड़ के नीचे विराजमान हैं। जब उन्होंने उस स्थान की खुदाई की, तो वहां से माता जी की मूर्ति, त्रिशूल और चावल (अक्षत) निकले। इसके बाद अरनेज गांव में माता जी का भव्य मंदिर स्थापित किया गया।

बूट' नाम के पीछे की मान्यता यूं है कि एक प्रचलित कथा के अनुसार, माता जी के 'बूट' नाम का संबंध उनके एक भक्त मेहरिया भुवा की भक्ति से है। कहा जाता है कि मेरिया भुवा माताजी के साथ पर्दे में रहकर बात करता था और हमेशा मा से प्रत्यक्ष दर्शन की विनती करता था । मा ने कहा कि वो आएगी तो भी पहचान नहीं पाएगा फिर भी मेरिया जिद पर अड़ा रहा । मा ने उसकी परीक्षा लेने के लिए वृद्धा और युवा स्वरूप लेकर उसके सामने आए । मेरिया ने वृद्धा को अपमानित करके भगा दिया लेकिन युवा स्वरूप माता को अपने साथ लेकर चला । बीच राह में कामवश उसकी नीयत बिगड़ी और माताजी ने कई बार रोका कि वो अपनी भूल सुधार के पर जब वह नहीं मान तो मा ने रौद्र स्वरूप धारण करके उसका वध कर किया । 'बूट' शब्द का स्थानीय संदर्भ उनके शक्तिशाली और रक्षक स्वरूप से भी जोड़ा जाता है। यह कथा का तात्पर्य है कि अगर शक्ति का उपासक हॉट हुए भी अगर आप स्त्री का सम्मान नहीं कर सकते हो या अपनी सीमा से बाहर जाते हो तो वही शक्ति आपका नाश भी कर सकती है ।

रेलवे और अंग्रेजों से जुड़ा चमत्कार :
इस मंदिर का एक आधुनिक इतिहास बहुत प्रसिद्ध है, जो ब्रिटिश काल से जुड़ा है । जब अंग्रेज इस क्षेत्र (भावनगर-अहमदाबाद रेल लाइन) में पटरी बिछा रहे थे, तो अरनेज के पास काम कर रहे इंजीनियरों को कई रहस्यमयी अनुभव हुए और काम में बाधाएं आने लगीं। कहा जाता है कि भावनगर के महाराजा ने भी अंग्रेजों को माता जी की शक्ति के बारे में बताया था। जब अंग्रेज अधिकारियों ने माता जी की शक्ति को स्वीकार किया और वहां शीश झुकाया, तब जाकर रेल लाइन का काम बिना किसी बाधा के पूरा हुआ। आज भी परंपरा है कि आज भी जब कोई ट्रेन अरनेज रेलवे स्टेशन से गुजरती है, तो वह माता जी के सम्मान में धीमी होती है या 'सलाम' के तौर पर तीन बार हॉर्न बजाती है। रेलवे की ओर से आज भी माता जी को चुनरी और नारियल भेंट करने की परंपरा निभाई जाती है।

जय अंबे जय गुरुदेव

26/03/2026

लोकाभिरामं रणरङ्गधीरं, राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम् |
कारुण्यरूपं करुणाकरं तं, श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये ॥

अर्थ: जो समस्त संसार में सुंदर हैं, युद्धभूमि में धीर (वीर) हैं, कमल के समान नेत्र वाले हैं, रघुवंश के नाथ हैं, दया के सागर हैं, उन श्रीरामचंद्र जी की मैं शरण लेता हूँ।

आप सभी को राम नवमी की हार्दिक शुभकामना

25/03/2026

जय मोढेश्वरी (मातंगी) माता - मोढेरा

श्री मोढेश्वरी माताजी, मोढ ब्राह्मणों और मोढ़ वैश्यों की कुलदेवी हैं। इनका मुख्य स्थानक गुजरात के मेहसाणा जिले के पास और बहुचराजी शक्तिपीठ से करीबन 20 किमी के अंतर पर है । यहां माता की अठारह भुजाओवाला विग्रह स्थापित है । पास ही में मा भगवती की वाव है, जिसके अंदर भी भगवती का स्थानक और अखंड ज्योत प्रज्वलित है ।

उत्पत्ति और इतिहास :

पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब कर्णाट नामक राक्षस ऋषियों और धर्म के कार्यों में बाधा डाल रहा था, तब ब्राह्मणों ने भगवान शिव से सहायता मांगी। भगवान शिव के आशीर्वाद और देवी पार्वती के अंश से माता का प्राकट्य हुआ।

माता का स्वरूप :
माता के अठारह हाथ (18 भुजाएं) हैं, जिनमें विभिन्न शस्त्र सुसज्जित हैं। उनका मुख्य वाहन सिंह (शेर) है। मोढेरा में माता का जो स्वरूप है उन्हें श्रीविद्या की देवी राजश्यामला मातंगी से जोड़ा जाता है । उन्हें ज्ञान, कला और शक्ति की देवी माना जाता है।

मा भगवती मातंगी सभी का कल्याण करे ऐसी प्रार्थना के साथ जय अंबे जय गुरुदेव

24/03/2026

श्री चामुंडा माताजी - चोटिला (गुजरात)

गुजरात के सुरेंद्रनगर जिले में स्थित चोटिला पर्वत पर माँ चामुंडा का अत्यंत प्राचीन और जाग्रत मंदिर स्थित है। राजकोट-अहमदाबाद नेशनल हाईवे पर स्थित यह स्थान लाखों भक्तों की आस्था का केंद्र है। पर्वत की चोटी पर स्थित यह मंदिर करीब 1173 फीट की ऊँचाई पर है, जहाँ पहुँचने के लिए भक्तों को लगभग 700 से अधिक सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं।

चोटिला का इतिहास और महत्व निम्नलिखित है:

पौराणिक कथा: शास्त्रों के अनुसार, जब 'चंड' और 'मुंड' नामक राक्षसों ने आतंक मचाया था, तब देवी ने उनका संहार किया था। इन दोनों असुरों को मारने के कारण देवी का नाम 'चामुंडा' पड़ा। माना जाता है कि माँ आज भी साक्षात रूप में यहाँ वास करती हैं।

स्वयंभू प्रतिमा: मंदिर के गर्भगृह में माँ चामुंडा की दो प्रतिमाएँ हैं। कहा जाता है कि ये मूर्तियाँ स्वयंभू (स्वयं प्रकट) हैं। यहाँ माताजी के दर्शन अत्यंत शांत और ओजस्वी प्रतीत होते हैं।

अनोखी परंपरा: इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि सूर्यास्त के बाद पर्वत पर कोई भी मनुष्य, यहाँ तक कि पुजारी भी नहीं रुकते, आरती के बाद वह भी नीचे उतर आते है। रात के समय मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं और माना जाता है कि रात में यहाँ शेर, सोमनंदी (माताजी की सवारी) स्वयं मंदिर की रक्षा के लिए प्रकट होता है, पर्वत पर पहरा देता है और माताजी के दरबार की सुरक्षा करता है। और स्वयं देवी विश्राम करती हैं।

नवरात्रि का उत्सव: आशापुरा माताजी के मढ़ की तरह ही, चोटिला में भी आसो और चैत्री नवरात्रि का बहुत बड़ा महत्व है। नवरात्रि के दौरान यहाँ विशाल मेला लगता है और भक्त दूर-दूर से पदयात्रा करके माँ के चरणों में शीश झुकाने आते हैं।

सांस्कृतिक महत्व: चामुंडा माताजी कई समुदायों की कुलदेवी हैं। मंदिर परिसर से नीचे का दृश्य अत्यंत सुंदर दिखता है और यहाँ आने वाले हर भक्त की मनोकामना पूर्ण होती है, इसीलिए इन्हें 'मनोकामना पूर्ण करने वाली माँ' भी कहा जाता है।

- Aadit Sshah Shaakt

21/03/2026

श्री जगदम्बा का बालिका स्वरूप : श्री बालात्रिपुरसुंदरी (बहुचराजी)

गुजरात के तीन शक्तिपीठों में से एक शक्तिपीठ मेहसाणा जिले में बहुचराजी शक्तिपीठ है जो कालरी, डेडाना और बेचर गांवों के तिराहे पर स्थित है। यह मंदिर बेचर गांव के आसपास स्थित होने के कारण उस समय अंग्रेजों ने इस स्थान का नाम बेचराजी रखा था, लेकिन स्थानीय भाषा में लोग इसे माताजी के बहुचराजी नाम के साथ जोड़कर इस स्थान को कई वर्षों से बहुचराजी के नाम से ही जानते हैं।

नवरात्रि के दिनों में देश के कोने-कोने से लाखों भाविक श्रद्धालु इन तीनों शक्तिपीठों के दर्शन के लिए आते हैं।

बहुचराजी यात्राधाम में माताजी को श्री बालात्रिपुरसुंदरी के रूप में पूजा जाता है। यहां माताजी के मंदिर के मुख्य गोख में माताजी का स्फटिक का बाला यंत्र स्थापित है, जो सोने से मढ़ा हुआ है।

वड़ोदरा राज्य के राजा श्री मानाजीराव गायकवाड़ ने इस यंत्र को काशी से बनवाकर विद्वान ब्राह्मणों से इसकी पूजा कराकर स्थापित करवाया। श्रीमान मानाजीराव जब बड़ोदरा स्टेट के राजवी थे तब उन्हे पाठा का दर्द (अल्सर) हुआ था, तब उन्होंने माता की मन्नत मानी थी । माता के मंदिर से कुछ दूरी पर स्थित वाव की मिट्टी का लेप करने से उनका वह दर्द दूर हुआ था और राजाजी ने इस भव्य मंदिर का निर्माण करवाया था ।

बहुचराजी मंदिर परिसर में कुल तीन मंदिर हैं । इन तीन स्थानों को आद्यस्थान, मध्यस्थान और मुख्य स्थान के नाम से जाना जाता है। माताजी के मुख्य मंदिर के पीछे एक वरखडी के पेड़ के नीचे माताजी का मूल मंदिर है, जहाँ माताजी ने सोलंकी राजा को दर्शन दिये थे।

यहां माताजी को सप्ताह के सातों दिन अलग-अलग सवारी दी जाती है। माताजी सोमवार को नंदी की सवारी पर, मंगलवार को सिंह पर, बुधवार को बाघ पर, गुरुवार को हंस पर, शुक्रवार को मोर पर, शनिवार को हाथी पर और रविवार को मुर्गे और पूनम पर विराजमान रहती हैं।

हर पूर्णिमा को रात 9:30 बजे माताजी की पालकी निकलती है और पूरे गांव में घूमती है। चैत्र सूद पूनम और आश्विन सूद पूनम के दिन माताजी की सवारी शंखलपुर स्थानक तक बहुचराजी मंदिर से जाती है। नगर यात्रा के दौरान स्थानीय पुलिस व्यवस्था द्वारा माताजी को गार्ड ऑफ ऑनर दिया जाता है। दशहरे के दिन माताजी को नवलखा हार भेंट किया जाता है जो गायकवाड़ राज्य के समय का उपहार है और इस दिन माताजी की सवारी शस्त्र पूजन के लिए बेचर गांव के खिजड़ियाली नामक स्थान पर जाती है।

जय अम्बे जय गुरुदेव
जय बहुचर

आदित शाह

21/03/2026

प्रौढ़ स्वरूपा देवी महाकाली का स्थानक : शक्तिपीठ पावागढ़

- पावागढ़ शक्तिपीठ गुजरात के पंचमहल जिले में हालोल के पास स्थित एक अत्यंत प्राचीन और जागृत शक्तिपीठ है, जो 51 शक्तिपीठों में से एक है। समुद्र स्तर से 822 मीटर (लगभग 2600 फीट) की ऊँचाई पर और कर्णावती से 155 और बड़ौदा से 46 किमी स्थित इस मंदिर में महाकाली माता की दक्षिणमुखी मूर्ति विराजित है। मान्यता है कि यहाँ माता सती के दाहिने पैर का अंगूठा गिरा था। यहां माता महाकाली की नेत्र प्रतिमा स्थापित है, जिसकी स्थापना ऋषि विश्वामित्र ने की थी । यहां ऋषि विश्वामित्र ने भगवती को जागृत किया था ।

पावागढ़ महाकाली मंदिर की प्रमुख बातें:

• पौराणिक मान्यता: पुराणों के अनुसार, यहाँ माता सती के दाहिने पैर का अंगूठा गिरने से यह सिद्धपीठ बनी। यहाँ माता महाकाली की पूजा तांत्रिक पद्धति से की जाती है।

• स्थान और दर्शन: यह मंदिर चंपानेर-पावागढ़ पुरातत्व पार्क (यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल) के ऊपर स्थित है। मंदिर मुख्य गर्भगृह में महाकाली के साथ भद्रकाली और बहुचरा माता के भी दर्शन होते हैं। नूतन मंदिर के प्रांगण में कालभैरव और बटुक भैरव की प्रतिमा भी स्थापित है ।

• जीर्णोद्धार: पुराने मंदिर के ऊपर कुछ समय पहले मंदिर तंत्र एवं गुजरात सरकार के सहयोग द्वारा भव्य जीर्णोद्धार के बाद अब यहाँ 500 साल बाद फिर से धर्म ध्वजा लहरा रही है।

- पावागढ़ पर्वत के दो शिखर है : महाकाली और भद्रकाली ।

- इस मंदिर पर आते समय मार्ग पर किले के कुछ अवशेष मिलते है जिसे राजा पतई रावल के द्वारा की गई माता रानी के अपमान की झूठी वायकाओं के साथ जोड़ा जाता है ।

Photos from Shaktisadhna's post 19/03/2026

अंबाज़ी शक्तिपीठ

गुजरात के बनासकांठा जिले में अरावली की पहाड़ियों के मध्य में भगवती दुर्गा का एक शक्तिपीठ है, अंबाजी । कहते है यहां गब्बर पहाड़ पर माता सती का हृदय अंग गिरा था । यहाँ आज भी कई वर्षों पूर्व प्रगटित घी की अखंड ज्योत प्रज्वलित है । शक्तिपीठ का मूल स्थान गब्बर पर्वत है, जब की ठीक उसके सामने ही 2 किमी की दूरी पर तलहटी क्षेत्र में माता का विशाल शिखरबद्ध संगेमरमर का मंदिर है, जिसके गोख में भगवती अम्बा का वीसा यंत्र स्थापित है । मंदिर के विशेष गुप्त स्थान में भगवती बालात्रिपुरसुंदरी, बटुक भैरव और श्रीयंत्र की पूजा की जाती है ।

- यह मंदिर लगभग 1200 वर्ष प्राचीन माना जाता है।

- यहाँ किसी प्रकार की प्रतिमा नहीं है, बल्कि एक विशेष “वीसायंत्र" है जिसे ही माँ का स्वरूप माना जाता है। इसकी पूजा केवल दांता नरेश के वंशज पुजारी ही करते हैं और वह भी आँखों पर पट्टी बांधकर। यहां मा को श्रृंगार कुछ इस तरह से किया जाता है कि मानो मा स्वयं प्रतिमा स्वरूप में बिराजमान हो ऐसी अनुभूति होती है ।

- माँ अंबा यहाँ सप्ताह के सातो दिन अलग-अलग सवारी पर विराजमान दिखाई देती हैं :
- रविवार – बाघ
- सोमवार – नंदी
- मंगलवार – सिंह
- बुधवार – ऐरावत हाथी
- गुरुवार – गरुड़
- शुक्रवार – हंस
- शनिवार – हाथी

- गर्भगृह में माँ को भव्य श्रृंगार से सजाया जाता है। यहां कोई इलेक्ट्रिक लाइट नहीं है, सिर्फ दीपकों के उजाले में मा के दर्शन होते है।
- मंदिर का मुख्य शिखर हाल ही में भक्तों द्वारा चढ़ाए गए सोने से मढ़ा गया है। यह मंदिर पूरे विश्व में सबसे ज्यादा सुवर्ण कलशों से युक्त मंदिर है, जिसमें कुल 358 सुवर्ण कलश लगे हुए है ।
- गर्भगृह के सामने गब्बर पर्वत स्थित है, जहाँ माँ सती का हृदय गिरा था। वहाँ कई युगों से माता की अखंड ज्योति प्रज्वलित है।
- यह मंदिर में पिछले वर्ष विश्व का सबसे बड़ा सुवर्ण श्रीयंत्र स्थापित हुआ है, जिसकी प्राणप्रतिष्ठा हमारी गुरु अम्बा ने की है ।

***

“मिनी अंबाजी” स्थल

जो भक्त आरासुर अंबाजी तक नहीं जा पाते वे समीप के अंबा मंदिरों में जाकर निमंत्रण देते हैं –
- गांधीनगर का गियोड मंदिर
- महुडी के पास पेढामली गाँव
- सूरत का अंबिका निकेतन मंदिर एवं भागल चौक विस्तार में स्थित अंबाजी मंदिर
- कर्णावती में माधुपुरा स्थित अंबाजी मंदिर

जय अम्बे जय गुरुदेव

- आदित शाह

जगदंबा सभी का कल्याण करे ।

18/03/2026

शक्तिसाधना आप सभी माईभक्तो के लिए लेकर आ रहा है एक विशेष श्रेणी, जिसमें गुजरात के अलग अलग क्षेत्रों में स्थित शक्तिपीठों एवं सिद्धपीठो के विषय में आपको माहिती दी जाएगी । जय अंबे जय गुरुदेव।

Disclaimer:
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17/03/2026

अष्ट पाश

पिछले अंकों में हमने घृणा, शंका, भय, लज्जा एवं जुगुप्सा के विषय में माहिती प्राप्त की । आज हम अंतिम तीन पाश - कुल, शील एवं जाति के विषय पर बात करेंगे ।

६. कुल : उच्च कुल या वंश में जन्म कुल-भाव से हैं, जैसे उच्च कुल में पैदा हुआ अपने आप को उच्च मानता हैं तथा दूसरे के कुल को छोटा। यह भाव मनुष्य के अन्दर छोटा या बड़ा होने के प्रवृति को उदित करता हैं तथा उसके विचार भेद-भाव युक्त हो जाते हैं। सूक्ष्म रूप से अगर इस विषय कर चर्चा करे तो समझेंगे कि साधना में कई पथ और परंपराएं है । मुख्य तौर पर शैव, शाक्त, वैष्णव, सौर एवं गाणपत्य, और भीतर उतरे तो जैसे शाक्त परंपरा में श्रीकुल एवं काली कुल । साधना के पद्धतियों की बात करे तो वामाचार, दक्षिणाचार, वेदाचार, समायाचार, कौलाचार ऐसी अनेक विविधताएं है जो अलग अलग स्तर पर कार्यसिद्ध होती है । कभी कभी देखा गया है कि कई बार साधक अपनी परंपरा में इतना लीन हो जाता है कि उसे बाकी सब कुछ तुच्छ लगने लगता है या मानो वो दूसरी कोई पद्धति या परंपरा का अस्तित्व ही स्वीकार नहीं कर पाता । उसके मनोमस्तिष्क पर स्वयं के कुल का आवरण इतना मजबूती से जड़ गया होता है कि बाकी सारी पद्धतियां एवं परंपराएं उसे गलत और अर्थहीन लगने लगती है । बाला की उपासना साधक को इसी से मुक्त करती है । जब तक साधक में सर्वस्तरीय समानता की दृष्टि जागृत नहीं होती तब तक बाला साधक को आगे नहीं बढ़ने देती । कुल भेदभाव की शुद्धि के बाद ही साधक साधना में अग्रिम स्तर पर जा सकता है ।

७. शील : शिष्टाचार का अभिप्राय शील हैं, अन्य लोगों के प्रति मानव का व्यवहार, सेवा, उठने-बैठने का तरीका शिष्टाचार या शील कहलाती हैं। शीलता के बंधन को काट देने पर साधक विचार तथा कर्म में स्वतंत्र हो जाता हैं तथा उसे ये चिंता नहीं रहती हैं की कोई अन्य उसके बारे में क्या सोच रहा हैं। आजकल की युवा पीढ़ी को देखे तो साधना के लिए तो सब उत्सुक है लेकिन क्रिया एवं नित्य कर्म करने के लिए शर्म आती है । आज की रेडी टू गो जनरेशन को सीधा दक्षिणकाली एवं तारा या बगलामुखी की साधना चाहिए लेकिन प्रातः संध्या करने में शर्म आती है । गणपति या प्रारंभिककी साधना इन्हें एक "इन्वेस्टमेंट" लगती है । अनुष्ठान तो दूर ये लोग किसी के सामने बैठकर आचमन तक करने में हिचकिचाते है कि कही लोग इन्हें "पुराने जमाने का" ना सोच लेवे । इसके अलावा सामाजिक स्तर पर भी अगल बगल के पड़ोसी या रिश्तेदार को या मित्र को जब पता चलेगा तब वो क्या सोचेंगे ? यही है शील नाम का पाश जिससे बाला की उपासना के द्वारा साधक मुक्त हो सकता है । यह मेरा निजी अनुभव रहा है । बाला भगवती की साधना में जैसे ही आगे बढ़ेंगे, एक स्तर के बाद आपको देश दुनिया की कोई फिक्र नहीं रहेगी । कोई आपके विषय में क्या सोच रहा है उसका विचार तक आपके अंदर नहीं उत्पन्न होगा, उससे प्रभावित होना तो बहुत दूर की बात है ।

८. जाती : मनुष्य का अपना जात्यभिमान, उसके हृदय में बड़े या छोटे भावना का प्रतिपादन करता हैं। जाती भेद को समदर्शी न मानने वाला पशु भाव से ग्रस्त हैं, चारों जातियां क्षत्रिय, ब्राह्मण, वैश्य तथा शूद्र सभी उस पराशक्ति के ही संतान हैं। अगर आप ब्राह्मण हो और एक चांडाल के साथ बैठकर भोजन लेने में आपको शर्म आती है तो जाती पाश से बंधित हो आप । बाला की उपासना आपको एकदम निर्दोष और सरल बना देती है । जैसे एक छोटा बालक बिना कोई जात पात पूछे अपनी उम्र के सभी बच्चों के साथ सहजता से घुलमिलकर खेलने लगता है वैसे भी बाला की उपासना से साधक उसके संपर्क में आनेवाले सभी लोगों से घुलमिलकर व्यवहार करता है । उसके वाणी, व्यवहार एवं वर्तन में समानता आती है ।

सार : इस श्रेणी का सार मूलतः यही है कि जो कार्य एवं व्यवहार आप अपने पुख्त मानसिकता के साथ अपने वर्तन में नहीं ला सकते, वो सब कुछ बाला की उपासना से बिना आपकी जानकारी के आपके वर्तन में आने लगता है । साधक बिल्कुल एक बालक जैसा बन जाता है और फिर गुरु के मार्गदर्शन अनुसार वो भगवती के और स्वरूपों के सानिध्य में जाने के लिए आगे की साधना के और अग्रसर होता है ।

जय अंबे जय गुरुदेव

छवि : श्री बहुचराजी शक्तिपीठ, उत्तर गुजरात

10/03/2026

पिछले लेख में अब तक हमने अष्टपाश श्रेणी अंतर्गत घृणा, शंका एवं भय के विषय में माहिती प्राप्त की । आइए अब समझते है लज्जा और जुगुप्सा के विषय में । देखने जाए तो यह दोनों पाश एकदम सामान्य है लेकिन साधना जीवन में बहुत विकट समस्याएं पैदा कर सकते है ।

४. लज्जा : सामान्यतः मनुष्य के हृदय में मान-अपमान भावना का उदय होना लज्जा कहलाता हैं। मनुष्य का शरीर नश्वर हैं, फिर शरीर के मान-अपमान का कितना महत्व हो सकता हैं या फिर कितना होना चाहिए जब की हम जानते है शरीर को जीवन देने वाली आत्म साक्षात् परमात्मा ही हैं तथा मान-अपमान से परे हैं। सामान्यतया गृहस्थ साधक जब साधना जीवन में नूतन दीक्षित होता है ऐसे समय में कभी कभी कुछ क्रियाओं को लेकर लज्जा रहती है । खासकर के गृहस्थ जीवन में ब्रह्मचर्य और समागम जैसी बातों के विषय में जब गुरु या किसी वरिष्ठ साधक से बात करना जरूरी बन जाए तब मन में लज्जा का भाव उत्पन्न होता है । व्यक्ति यह सोचने लगता है कि अगर मैने किसी को ये पूछ लिया तो वह इंसान मेरे विषय में क्या धारणा बना लेगा या वो मेरे बारे में क्या सोचेगा ? इसी लज्जा के कारण उसकी शंकाओं का उसे समाधान नहीं मिल पाता और इसी वजह से उसे साधना या उपासना में जो आनंद आना चाहिए वो प्राप्त नहीं होता। व्यक्ति मन लगाकर क्रिया, ध्यान या उपासना कुछ नहीं कर सकता । बाला भगवती की साधना उपासना से वाकबीज जागृत होता है और व्यक्ति स्पष्टवक्ता बन जाता है । स्पष्ट वक्ता का अर्थ ये नहीं कि कही भी कुछ भी बोल दे, अर्थ ये है कि व्यक्ति को इतना विवेक प्राप्त होता है कि उसे ये समझ आ जाए कि कौन से स्थान पर कौन से विषय में किस हद तक बात की जा सकती है और बिना किसी हिचकिचाहट के की जा सकती है ।

५. जुगुप्सा : दूसरों की निंदा-चर्चा करना जुगुप्सा कहलाती हैं, मनुष्य दूसरों के गुण तथा दोषों को देखता हैं तथा अपने दोषों का मनन नहीं कर पाता। साधना में सब से बड़ी शत्रु जुगुप्सा है । यह एक ऐसा पाश है जिसमें बाला भगवती की कृपा के साथ साथ व्यक्ति का स्वयं अनुशासित होना भी इतना ही जरूरी है । माँ लीजिए किसी साधक ने कोटि जप का अनुष्ठान किया किन्तु फिर भी मंत्र जप करते समय उसका ध्यान भगवती की जगह पर कौन क्या कर रहा है उस विषय में हो या फिर भेदजनित दृष्टि हो तो उसके इतने सारे जप का कोई अर्थ ही नहीं रहता । तात्पर्य ये नहीं कि कोटि जप का कोई फल या पुण्य मिलेगा ही नहीं, अर्थ यह है कि व्यक्ति जैसे जैसे जाप करता जाए, वैसे वैसे भगवती उनके जीवन में प्रकाश का मार्ग प्रशस्त करती है लेकिन साथ में साधक का भी उसी मार्ग पर आगे बढ़ना भी तो उतना ही जरूरी है । कई साधक ऐसे भी होते है जिनका ध्यान उनने गुरु भाई या और कोई साधक कौन से मंत्र का जप कर रहे या कौन सी महाविद्या तक पहुँचे है या फिर "पूर्णाभिषेक साधक" कैसे बन सकते है उसी पर होता है, जो अर्थहीन है। गुरु प्रदत्त मंत्र का जप करते हुए, जैसे जैसे कर्म कटेंगे वैसे योग्यता अनुसार मंत्र भी प्राप्त होते ही है । सभी महाविद्याएं भी अंततः तो बाला में ही समाहित होती है, तभी तक बाला को "दशमयी" कहा गया है। सिर्फ सभी मंत्रों का जपक्रम पूर्ण कर लेना पूर्णाभिषेक साधक बनना नहीं है । जो मंत्र प्राप्त हुए है, उसके एक एक बीजाक्षर के एक एक तत्व को आत्मसात करना पूर्णाभिषेक होना है । अगर कई सारे जप करने के बाद भी बाला और दुर्गा, श्री और काली में भेद दिख रहा हो तो वह इंसान कुछ भी हो सकता है लेकिन पूर्णाभिषेक नहीं हो सकता ।

जय अंबे जय गुरुदेव

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