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14/06/2026
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मढ़ौरा नगर पंचायत का “अद्भुत मूत्रालय” — जहाँ पहले तैराकी, फिर शौचालय!

बिहार के छपरा ज़िले के अंतर्गत मढ़ौरा नगर पंचायत में विकास ने ऐसा लेवल छू लिया है कि अब इंसान नहीं, बल्कि सुपरहीरो ही यहाँ की सुविधाओं का लाभ उठा सकता है। जी हाँ, तस्वीरों में दिख रहा यह कोई आम मूत्रालय नहीं, बल्कि नगर पंचायत की सोच का लाइव डेमो है—एक ऐसा मूत्रालय, जहाँ पहुँचने के लिए पहले नदी से दोस्ती करनी पड़ेगी, फिर तैराकी में पीएचडी करनी होगी।

एक तरफ आधी-अधूरी रेलिंग ऐसे खड़ी है जैसे खुद शर्मिंदा हो, दूसरी तरफ गंदगी, कचरा और नदी का सीधा रास्ता। मतलब साफ है—अगर आपको शौच जाना है तो पहले जान की बाज़ी लगाइए। सवाल ये है कि ये मूत्रालय आम नागरिकों के लिए बना है या किसी एडवेंचर पार्क का हिस्सा है? टिकट कहाँ से मिलेगा—नगर पंचायत ऑफिस से या सीधे नदी किनारे?

नगर पंचायत शायद यह संदेश देना चाहती है कि “स्वच्छ भारत” अब सिर्फ ज़मीन पर नहीं, बल्कि पानी के अंदर भी लागू है। पहले नदी में डुबकी लगाओ, फिर मूत्रालय पहुँचो—फिट इंडिया मूवमेंट का फ्री पैकेज! अगर फिसल गए तो कोई बात नहीं, इलाज के लिए सरकारी अस्पताल भी तो है… अगर वहाँ तक पहुँच पाए तो।

सबसे मज़ेदार बात ये है कि इस मूत्रालय के ठीक ऊपर बिजली का पोल, ट्रांसफार्मर और तारों का जाल है। यानी एक तरफ पानी, दूसरी तरफ करंट—डबल थ्रिल, डबल रिस्क। नगर पंचायत ने शायद सोचा होगा कि जनता को एक्साइटमेंट चाहिए, सिर्फ सुविधा नहीं।

अब सवाल उठता है—क्या किसी इंजीनियर ने इस लोकेशन को अप्रूव किया था? क्या किसी जनप्रतिनिधि ने यहाँ आकर खुद देखा कि आम आदमी कैसे जाएगा? या फिर फाइलों में ही सब कुछ “ऑल ओके” लिखकर बिल पास कर दिया गया? अगर यही विकास है, तो फिर अविकास किसे कहते हैं?

यह मूत्रालय नहीं, बल्कि सिस्टम पर एक बड़ा सवालिया निशान है। यह दिखाता है कि योजनाएँ ज़मीन पर नहीं, बल्कि हवा में बनती हैं। फोटो खिंचवाने और उद्घाटन की जल्दी में जनता की सुरक्षा, सुविधा और सम्मान सब भूल गए।

मढ़ौरा नगर पंचायत से सीधा सवाल है—क्या आप चाहते हैं कि लोग तैरकर मूत्रालय जाएँ? या फिर किसी हादसे का इंतज़ार है ताकि बाद में “जाँच के आदेश” दिए जा सकें? विकास का मतलब सिर्फ दीवार खड़ी करना नहीं होता, रास्ता भी देना पड़ता है।

अब वक्त है कि इस “अद्भुत मंत्रालय” को मज़ाक नहीं, चेतावनी की तरह लिया जाए। क्योंकि आज ये मूत्रालय है, कल कोई और सुविधा होगी—और अगर सोच नहीं बदली, तो जनता हर बार यूँ ही नदी में डूबती रहेगी।

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