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NEWS 24*7

Photos from UNCUT LIVE 's post 12/04/2026

पूरा नाम: आशा भोसले
जन्म: 8 सितम्बर 1933, Sangli
पिता: Deenanath Mangeshkar (प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक)
माता: शेवंतिबाई मंगेशकर
बहनें:
Lata Mangeshkar
Usha Mangeshkar
Meena Khadikar
भाई: Hridaynath Mangeshkar
👉 आशा भोसले जी का जन्म एक संगीत परिवार में हुआ, इसलिए बचपन से ही संगीत का वातावरण मिला।
🎶 संगीत यात्रा की शुरुआत
पिता के निधन के बाद परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर हुई
मात्र 10 वर्ष की आयु में गाना शुरू किया
1943 में पहली बार मराठी फिल्म में गाना गाया
धीरे-धीरे हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में जगह बनाई
शुरुआत में उन्हें छोटे-मोटे गाने मिलते थे, लेकिन मेहनत और प्रतिभा से उन्होंने अपना अलग मुकाम बनाया
👉 उन्होंने हर प्रकार के गीत गाए—ग़ज़ल, पॉप, भजन, लोकगीत, कैबरे—जो उन्हें सबसे अलग बनाता है।
🌟 संगीत परंपरा में योगदान
20 से अधिक भाषाओं में 12,000+ गीत गाए
भारतीय फिल्म संगीत में विविधता (Versatility) का नया आयाम दिया
1950–2000 तक लगातार शीर्ष गायिकाओं में रहीं
पॉप, ग़ज़ल, और वेस्टर्न स्टाइल को भारतीय संगीत में लोकप्रिय बनाया
R. D. Burman के साथ उनकी जोड़ी ऐतिहासिक मानी जाती है
🏆 प्रमुख पुरस्कार और सम्मान
दादा साहेब फाल्के पुरस्कार (2000)
पद्म विभूषण (2008)
राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार – 2 बार
फिल्मफेयर पुरस्कार – 7 बार (Best Female Playback Singer)
लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड (Filmfare)
BBC Lifetime Achievement Award
👉 यह सम्मान उनके असाधारण योगदान को दर्शाते हैं।
1. 🎵 “पिया तू अब तो आजा”
“पिया तू अब तो आजा,
शोला सा मन दहके आके बुझा जा…”
2. 🎵 “दम मारो दम”
“दम मारो दम, मिट जाए ग़म,
बोलो सुबह शाम, हरे कृष्ण हरे राम…”
3. 🎵 “इन आंखों की मस्ती”
“इन आंखों की मस्ती के मस्ताने हजारों हैं,
इन आंखों से वाबस्ता अफसाने हजारों हैं…”
4. 🎵 “चुरा लिया है तुमने”
“चुरा लिया है तुमने जो दिल को,
नज़र नहीं चुराना सनम…”
5. 🎵 “ये मेरा दिल”
“ये मेरा दिल प्यार का दीवाना,
दीवाना दीवाना प्यार का परवाना…”
6. 🎵 “रात अकेली है”
“रात अकेली है, बुझ गए दीये,
आके मेरे पास कानों में मेरे…”
7. 🎵 “ओ हसीना जुल्फों वाली”
“ओ हसीना जुल्फों वाली जाने जहां,
ढूंढती है किसको निगाहें…”
8. 🎵 “दिल चीज़ क्या है”
“दिल चीज़ क्या है, आप मेरी जान लीजिए,
बस एक बार मेरा कहा मान लीजिए…”
9. 🎵 “झुमका गिरा रे”
“झुमका गिरा रे बरेली के बाजार में,
झुमका गिरा रे…”
10. 🎵 “मेरा कुछ सामान”
“मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है,
सावन के कुछ भीगे भीगे दिन रखे हैं…”
आशा भोसले लता मंगेशकर की छोटी बहन हैं
उन्होंने सबसे अधिक विविध शैली में गाने गाए
उन्हें दादा साहेब फाल्के पुरस्कार मिला
उनका नाम Guinness World Records में भी शामिल रहा
वे भारत की सबसे बहुमुखी गायिकाओं में गिनी जाती हैं
आशा भोसले केवल एक गायिका नहीं, बल्कि भारतीय संगीत की जीवित विरासत हैं। उन्होंने अपने स्वर से न केवल गीतों को अमर किया, बल्कि भारतीय संगीत को वैश्विक पहचान भी दिलाई। उनका जीवन संघर्ष, मेहनत और प्रतिभा का प्रेरणादायक उदाहरण है—जो आने वाली पीढ़ियों को निरंतर प्रेरित करता रहेगा।
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आचार्य श्रेष्ठ श्री प्रशांत जी महाराज का जन्मदिन दिव्यांग बच्चों के बीच मनाया गया
फल, मिष्ठान व आवश्यक सामग्री वितरण कर सेवा का दिया संदेश

अयोध्या के तुलसी नगर स्थित मंद बुद्धि मूक बधिर संस्थान में आचार्य श्रेष्ठ, राम कथा के मर्मज्ञ एवं सरस गायक श्री प्रशांत जी महाराज का जन्मदिन अत्यंत सेवा भाव और भक्ति भावना के साथ मनाया गया।
इस अवसर पर “एक शाम राम जी के नाम” संकीर्तन के माध्यम से भगवान श्रीराम की महिमा, गुण एवं आदर्श चरित्र को समाज तक पहुंचाने वाले पूज्य महाराज जी के सम्मान में विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया।
संस्थान परिवार द्वारा दिव्यांग बच्चों के बीच फल, मिष्ठान, कॉपी-किताब, बैग एवं दैनिक उपयोग की आवश्यक सामग्री का वितरण किया गया। इस सेवा कार्य के माध्यम से बच्चों के चेहरे पर खुशी देखने को मिली।
पूज्य महाराज जी सदैव दिव्यांग बच्चों के हित में समर्पित भाव से सेवा करते हैं और समय-समय पर उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु संस्थान परिवार के साथ मिलकर सहयोग प्रदान करते रहते हैं।
जन्मदिन के इस पावन अवसर पर संस्थान परिवार ने दिव्यांग बच्चों के साथ मिलकर उनका जन्मदिन मनाया और उनके स्वस्थ, सुखमय एवं दीर्घायु जीवन की कामना की।
👉 “सेवा ही सच्ची साधना है – श्री प्रशांत जी महाराज”
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23/03/2026

🟥 BREAKING / SPECIAL REPORT
🇮🇳 शहीद-ए-आजम भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को श्रद्धांजलि: बलिदान, क्रांति और विचारों की अमर गाथा
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📍 अयोध्या से विशेष रिपोर्ट
आज 23 मार्च (शहीद दिवस) के पावन अवसर पर
अखिल भारतीय विकलांग (दिव्यांगजन) कल्याण समिति एवं
मंद बुद्धि मूक-बधिर विद्यालय, तुलसी नगर अयोध्याएवं मानस फाउंडेशन अयोध्या
के संयुक्त तत्वावधान में
भारत के अमर क्रांतिकारी भगत सिंह, सुखदेव एवं राजगुरु को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई।
🟡 जन्म, परिवार और प्रारंभिक जीवन
भगत सिंह का जन्म 27/28 सितंबर 1907 को पंजाब के बंगा गाँव (अब पाकिस्तान) में एक देशभक्त परिवार में हुआ।
पिता सरदार किशन सिंह और माता विद्यावती कौर के संस्कारों ने उन्हें बचपन से ही देशभक्ति के मार्ग पर अग्रसर किया।
1919 के जलियाँवाला बाग हत्याकांड ने उनके मन पर गहरा प्रभाव डाला और यहीं से उनके भीतर क्रांति की ज्वाला प्रज्वलित हुई।
🔴 क्रांतिकारी जीवन और संगठन
उन्होंने नौजवान भारत सभा की स्थापना की और बाद में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) से जुड़े।
चन्द्रशेखर आजाद और राम प्रसाद बिस्मिल जैसे क्रांतिकारियों से प्रेरित होकर उन्होंने सशस्त्र क्रांति को स्वतंत्रता का मार्ग माना।
⚫ लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला
1928 में लाला लाजपत राय की मृत्यु के बाद
भगत सिंह और राजगुरु ने अंग्रेज अधिकारी सांडर्स की हत्या कर अन्याय का प्रतिकार किया।
💣 असेम्बली बम कांड – “इंकलाब जिंदाबाद”
8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने दिल्ली की सेंट्रल असेम्बली में बम फेंका।
यह बम किसी को नुकसान पहुँचाने के लिए नहीं, बल्कि अंग्रेजी हुकूमत को चेताने के लिए था।
उन्होंने स्वयं गिरफ्तारी दी और नारा लगाया—
“इंकलाब जिंदाबाद, साम्राज्यवाद मुर्दाबाद!”
🟢 जेल जीवन और विचारधारा
जेल में रहते हुए उन्होंने समाजवाद, समानता और शोषण के खिलाफ लेख लिखे।
64 दिन की ऐतिहासिक भूख हड़ताल ने पूरे देश का ध्यान आकर्षित किया।
उनका प्रसिद्ध लेख “मैं नास्तिक क्यों हूँ?” आज भी युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत है।
⚖️ फाँसी और अमर बलिदान
7 अक्टूबर 1930 को अदालत ने तीनों वीरों को फाँसी की सजा सुनाई।
23 मार्च 1931 की शाम, तीनों क्रांतिकारी हँसते-हँसते फाँसी के फंदे पर झूल गए और अमर हो गए।
🟢 श्रद्धांजलि कार्यक्रम – अयोध्या
अयोध्या में आयोजित इस श्रद्धांजलि कार्यक्रम में
संस्थान के प्रबंधक प्रदीप कुमार तिवारी (एडवोकेट) ने शहीदों को नमन करते हुए उनके जीवन, संघर्ष और विचारों पर विस्तार से प्रकाश डाला।
प्रधानाचार्य अंकित मिश्रा एवं संस्थान की अध्यक्ष अनीता पाठक ने भी श्रद्धांजलि सुमन अर्पित कर शहीदों के आदर्शों को अपनाने का संदेश दिया।
कार्यक्रम में
शरद तिवारी, अभय द्विवेदी, दिनेश राय, सरिता, अनिल, अभिनव, सचिन तिवारी, विकास पांडे, रानी श्रीवास्तव एवं एस.पी. मिश्रा सहित सभी उपस्थित जनों ने शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की।
दिव्यांग बच्चों, शिक्षकों एवं समाजसेवियों ने पुष्प अर्पित कर देशभक्ति गीतों और विचार गोष्ठी के माध्यम से शहीदों को याद किया।
🔥 निष्कर्ष
23 वर्ष की आयु में
भगत सिंह ने जो साहस, त्याग और विचारों की मशाल जलाई—
वह आज भी हर भारतीय के दिल में प्रज्वलित है।
👉 उनकी शहादत केवल इतिहास नहीं,
बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा है।
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“सत्य के साथ, राष्ट्र के साथ” 🇮🇳

Photos from UNCUT LIVE 's post 23/03/2026

UNCUT LIVE NEWS
भगत सिंह (जन्म: 27 सितम्बर 1907[a] , वीरगति: 23 मार्च 1931) भारत के एक महान स्वतंत्रता सेनानी एवं क्रान्तिकारी थे। चन्द्रशेखर आजाद व पार्टी के अन्य सदस्यों के साथ मिलकर इन्होंने भारत की स्वतंत्रता के लिए अभूतपूर्व साहस के साथ शक्तिशाली ब्रिटिश सरकार का मुक़ाबला किया। पहले लाहौर में बर्नी सैंडर्स की हत्या और उसके बाद दिल्ली की केन्द्रीय संसद (सेण्ट्रल असेम्बली) में बम-विस्फोट करके ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध खुले विद्रोह को बुलन्दी प्रदान की। इन्होंने असेम्बली में बम फेंककर भी भागने से मना कर दिया। जिसके फलस्वरूप अंग्रेज सरकार ने इन्हें २३ मार्च १९३१ को इनके दो अन्य साथियों, राजगुरु तथा सुखदेव के साथ फाँसी पर लटका दिया।

ਭਗਤ ਸਿੰਘ
भगत सिंह
28 सितम्बर 1907[a] से 23 मार्च 1931 ई०

शहीद भगत सिंह 1929 ई० में
जन्मस्थल :
गाँव बंगा, जिला लायलपुर, पंजाब (अब पाकिस्तान में)
आन्दोलन:
भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम
प्रमुख संगठन:
नौजवान भारत सभा, हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोशिएसन

शहीद भगत सिंह, शहीद सुुुखदेव, शहीद राजगुरु को फांसी पर लटकाये जाने की ख़बर - लाहौर से प्रकाशित द ट्रिब्युन के मुख्य पृष्ठ
जन्म और परिवेश
भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर 1907 (अश्विन कृष्णपक्ष सप्तमी) को प्रचलित है परन्तु तत्कालीन अनेक साक्ष्यों के अनुसार उनका जन्म 27 सितंबर 1907 ई० को एक सिख परिवार में हुआ था। इनकी जन्म भूमि बंगा गांव , पश्चिमी पंजाब में है जो अब पाकिस्तान में है।[a] उनके पिता का नाम सरदार किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती कौर था। यह एक किसान[9] परिवार से थे। अमृतसर में १३ अप्रैल १९१९ को हुए जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड ने भगत सिंह की सोच पर गहरा प्रभाव डाला था। लाहौर के नेशनल कॉलेज़ की पढ़ाई छोड़कर भगत सिंह ने भारत की आज़ादी के लिए नौजवान भारत सभा की स्थापना की थी।

वर्ष 1922 में चौरी-चौरा हत्‍याकांड के बाद गाँधी जी ने जब किसानों का साथ नहीं दिया तब भगत सिंह बहुत निराश हुए। उसके बाद उनका अहिंसा से विश्वास कमजोर हो गया और वह इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि सशस्त्र क्रांति ही स्वतंत्रता दिलाने का एक मात्र रास्ता है। उसके बाद वह चन्द्रशेखर आजाद के नेतृत्‍व में गठित हुई गदर दल के हिस्‍सा बन गए। काकोरी काण्ड में राम प्रसाद 'बिस्मिल' सहित ०४ क्रान्तिकारियों को फाँसी व १६ अन्य को कारावास की सजाओं से भगत सिंह इतने अधिक उद्विग्न हुए कि चन्द्रशेखर आजाद के साथ उनकी पार्टी हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन से जुड़ गए और उसे एक नया नाम दिया हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन। इस संगठन का उद्देश्य सेवा, त्याग और पीड़ा झेल सकने वाले नवयुवक तैयार करना था।

भगत सिंह ने राजगुरु के साथ मिलकर १७ दिसम्बर १९२८ को लाहौर में सहायक पुलिस अधीक्षक रहे अंग्रेज़ अधिकारी जे० पी० सांडर्स को मारा था। इस कार्रवाई में क्रान्तिकारी चन्द्रशेखर आज़ाद ने उनकी पूरी सहायता की थी। क्रान्तिकारी साथी बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर भगत सिंह ने वर्तमान नई दिल्ली स्थित ब्रिटिश भारत की तत्कालीन सेण्ट्रल एसेम्बली के सभागार संसद भवन में ८ अप्रैल १९२९ को अंग्रेज़ सरकार को जगाने के लिये बम और पर्चे फेंके थे। बम फेंकने के बाद वहीं पर दोनों ने अपनी गिरफ्तारी भी दी।

क्रान्तिकारी गतिविधियाँ

भगत सिंह,राजगुरु एवं सुखदेव

भगत सिंह
उस समय भगत सिंह करीब बारह वर्ष के थे जब जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड हुआ था। इसकी सूचना मिलते ही भगत सिंह अपने स्कूल से १२ मील पैदल चलकर जलियाँवाला बाग पहुँच गए। इस उम्र में भगत सिंह अपने चाचाओं की क्रान्तिकारी किताबें पढ़ कर सोचते थे कि इनका रास्ता सही है कि नहीं ? गांधी जी का असहयोग आन्दोलन छिड़ने के बाद वे गान्धी जी के अहिंसात्मक तरीकों और क्रान्तिकारियों के हिंसक आन्दोलन में से अपने लिए रास्ता चुनने लगे। गाँधी जी के असहयोग आन्दोलन को रद्द कर देने के कारण उनमें थोड़ा रोष उत्पन्न हुआ, पर पूरे राष्ट्र की तरह वो भी महात्मा गाँधी का सम्मान करते थे। पर उन्होंने गाँधी जी के अहिंसात्मक आन्दोलन की जगह देश की स्वतन्त्रता के लिए हिंसात्मक क्रांति का मार्ग अपनाना अनुचित नहीं समझा। उन्होंने जुलूसों में भाग लेना प्रारम्भ किया तथा कई क्रान्तिकारी दलों के सदस्य बने। उनके दल के प्रमुख क्रान्तिकारियों में चन्द्रशेखर आजाद, सुखदेव, राजगुरु इत्यादि थे। काकोरी काण्ड में ४ क्रान्तिकारियों को फाँसी व १६ अन्य को कारावास की सजाओं से भगत सिंह इतने अधिक उद्विग्न हुए कि उन्होंने १९२८ में अपनी पार्टी नौजवान भारत सभा का हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन में विलय कर दिया और उसे एक नया नाम दिया हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन।[10]

लाला जी की मृत्यु का प्रतिशोध

सॉण्डर्स की हत्या के बाद एचएसआरए द्वारा लगाए गए परचे
१९२८ में साइमन कमीशन के बहिष्कार के लिए भयानक प्रदर्शन हुए। इन प्रदर्शनों में भाग लेने वालों पर अंग्रेजी शासन ने लाठी चार्ज भी किया। इसी लाठी चार्ज से आहत होकर लाला लाजपत राय की मृत्यु हो गई। अब इनसे रहा न गया। एक गुप्त योजना के तहत इन्होंने पुलिस सुपरिण्टेण्डेण्ट स्काट को मारने की योजना सोची। सोची गई योजना के अनुसार भगत सिंह और राजगुरु लाहौर कोतवाली के सामने व्यस्त मुद्रा में टहलने लगे। उधर जयगोपाल अपनी साइकिल को लेकर ऐसे बैठ गए जैसे कि वो ख़राब हो गई हो। गोपाल के इशारे पर दोनों सचेत हो गए। उधर चन्द्रशेखर आज़ाद पास के डी० ए० lवी० स्कूल की चहारदीवारी के पास छिपकर घटना को अंजाम देने में रक्षक का काम कर रहे थे।

१७ दिसंबर १९२८ को करीब सवा चार बजे, ए० एस० पी० सॉण्डर्स के आते ही राजगुरु ने एक गोली सीधी उसके सर में मारी जिससे वह पहले ही मर जाता। लेकिन तुरन्त बाद भगत सिंह ने भी ३-४ गोली दाग कर उसके मरने का पूरा इन्तज़ाम कर दिया। ये दोनों जैसे ही भाग रहे थे कि एक सिपाही चनन सिंह ने इनका पीछा करना शुरू कर दिया। चन्द्रशेखर आज़ाद ने उसे सावधान किया - "आगे बढ़े तो गोली मार दूँगा।" नहीं मानने पर आज़ाद ने उसे गोली मार दी और वो वहीं पर मर गया। इस तरह इन लोगों ने लाला लाजपत राय की मौत का बदला ले लिया।

एसेम्बली में बम फेंकना
भगत सिंह यद्यपि रक्तपात के पक्षधर नहीं थे परन्तु वे वामपंथी विचारधारा को मानते थे, तथा कार्ल मार्क्स के सिद्धान्तों से उनका ताल्लुक था और उन्हीं विचारधारा को वे आगे बढ़ा रहे थे। यद्यपि, वे समाजवाद के पक्के पोषक भी थे। कलान्तर में उनके विरोधी द्वारा उनको अपने विचारधारा बता कर युवाओ को भगत सिंह के नाम पर बरगलाने के आरोप लगते रहे है। कॉंग्रेस के सत्ता में रहने के बावजूद भगत सिंह को काँग्रेस शहीद का दर्जा नही दिलवा पाए, क्योंकि वे केवल भगत सिंह के नाम का इस्तेमाल युवाओं को अपनी पार्टी से जोड़ने के लिए करते थे। उन्हें पूँजीपतियों की मजदूरों के प्रति शोषण की नीति पसन्द नहीं आती थी। उस समय चूँकि अँग्रेज ही सर्वेसर्वा थे तथा बहुत कम भारतीय उद्योगपति उन्नति कर पाये थे, अतः अँग्रेजों के मजदूरों के प्रति अत्याचार से उनका विरोध स्वाभाविक था। मजदूर विरोधी ऐसी नीतियों को ब्रिटिश संसद में पारित न होने देना उनके दल का निर्णय था। सभी चाहते थे कि अँग्रेजों को पता चलना चाहिए कि हिन्दुस्तानी जाग चुके हैं और उनके हृदय में ऐसी नीतियों के प्रति आक्रोश है। ऐसा करने के लिये ही उन्होंने दिल्ली की केन्द्रीय एसेम्बली में बम फेंकने की योजना बनाई थी।

भगत सिंह चाहते थे कि इसमें कोई खून खराबा न हो और अँग्रेजों तक उनकी 'आवाज़' भी पहुँचे। हालाँकि प्रारम्भ में उनके दल के सब लोग ऐसा नहीं सोचते थे पर अन्त में सर्वसम्मति से भगत सिंह तथा बटुकेश्वर दत्त का नाम चुना गया। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार ८ अप्रैल १९२९ को केन्द्रीय असेम्बली में इन दोनों ने एक ऐसे स्थान पर बम फेंका जहाँ कोई मौजूद न था, अन्यथा उसे चोट लग सकती थी। पूरा हाल धुएँ से भर गया। भगत सिंह चाहते तो भाग भी सकते थे पर उन्होंने पहले ही सोच रखा था कि उन्हें दण्ड स्वीकार है चाहें वह फाँसी ही क्यों न हो; अतः उन्होंने भागने से मना कर दिया। उस समय वे दोनों खाकी कमीज़ तथा निकर पहने हुए थे। बम फटने के बाद उन्होंने "इंकलाब-जिन्दाबाद, साम्राज्यवाद-मुर्दाबाद!" का नारा[11] लगाया और अपने साथ लाये हुए पर्चे हवा में उछाल दिए। इसके कुछ ही देर बाद पुलिस आ गई और दोनों को ग़िरफ़्तार कर लिया गया।

जेल के दिन

सिन्ध से प्रकाशित बिस्मिल की आत्मकथा का प्रथम पृष्ठ। यही पुस्तक भगतसिंह को लाहौर जेल में भेजी गयी थी।
जेल में भगत सिंह करीब २ साल रहे। इस दौरान वे लेख लिखकर अपने क्रान्तिकारी विचार व्यक्त करते रहते थे। जेल में रहते हुए भी उनका अध्ययन लगातार जारी रहा। उनके उस दौरान लिखे गये लेख व सगे सम्बन्धियों को लिखे गये पत्र आज भी उनके विचारों के दर्पण हैं। अपने लेखों में उन्होंने कई तरह से पूँजीपतियों को अपना शत्रु बताया है। उन्होंने लिखा कि मजदूरों का शोषण करने वाला चाहें एक भारतीय ही क्यों न हो, वह उनका शत्रु है। उन्होंने जेल में अंग्रेज़ी में एक लेख भी लिखा जिसका शीर्षक था मैं नास्तिक क्यों हूँ?[12][13] जेल में भगत सिंह व उनके साथियों ने ६४ दिनों तक भूख हडताल की। उनके एक साथी यतीन्द्रनाथ दास ने तो भूख हड़ताल में अपने प्राण ही त्याग दिये थे।

फाँसी

भगत सिंह का मृत्यु प्रमाण पत्र
26 अगस्त, 1930 को अदालत ने भगत सिंह को भारतीय दंड संहिता की धारा 129, 302 तथा विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धारा 4 और 6एफ तथा आईपीसी की धारा 120 के अंतर्गत अपराधी सिद्ध किया। 7 अक्तूबर, 1930 को अदालत के द्वारा 68 पृष्ठों का निर्णय दिया, जिसमें भगत सिंह, सुखदेव तथा राजगुरु को फाँसी की सजा सुनाई गई। फाँसी की सजा सुनाए जाने के साथ ही लाहौर में धारा 144 लगा दी गई। इसके बाद भगत सिंह की फाँसी की माफी के लिए प्रिवी परिषद में अपील दायर की गई परन्तु यह अपील 10 जनवरी, 1931 को रद्द कर दी गई। इसके बाद तत्कालीन काँग्रेस अध्यक्ष पं. मदन मोहन मालवीय ने वायसराय के सामने सजा माफी के लिए 14 फरवरी, 1931 को अपील दायर की कि वह अपने विशेषाधिकार का प्रयोग करते हुए मानवता के आधार पर फांसी की सजा माफ कर दें। भगत सिंह की फाँसी की सज़ा माफ़ करवाने हेतु महात्मा गाँधी ने 17 फरवरी 1931 को वायसराय से बात की फिर 18 फरवरी, 1931 को आम जनता की ओर से भी वायसराय के सामने विभिन्न तर्को के साथ सजा माफी के लिए अपील दायर की। यह सब कुछ भगत सिंह की इच्छा के खिलाफ हो रहा था क्यों कि भगत सिंह नहीं चाहते थे कि उनकी सजा माफ की जाए।

23 मार्च 1931 को शाम में करीब 7 बजकर 33 मिनट पर भगत सिंह तथा इनके दो साथियों सुखदेव व राजगुरु को फाँसी दे दी गई।[14] फाँसी पर जाने से पहले वे लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे और जब उनसे उनकी आखरी इच्छा पूछी गई तो उन्होंने कहा कि वह लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे और उन्हें वह पूरी करने का समय दिया जाए।[15] कहा जाता है कि जेल के अधिकारियों ने जब उन्हें यह सूचना दी कि उनके फाँसी का वक्त आ गया है तो उन्होंने कहा था- "ठहरिए! पहले एक क्रान्तिकारी दूसरे से मिल तो ले।" फिर एक मिनट बाद किताब छत की ओर उछाल कर बोले - "ठीक है अब चलो।"

फाँसी पर जाते समय वे तीनों मस्ती से गा रहे थे -

मेरा रँग दे बसन्ती चोला, मेरा रँग दे।
मेरा रँग दे बसन्ती चोला। माय रँग दे बसन्ती चोला॥
फाँसी के बाद कहीं कोई आन्दोलन न भड़क जाये इसके डर से अंग्रेजों ने पहले इनके मृत शरीर के टुकड़े किये फिर इसे बोरियों में भरकर फिरोजपुर की ओर ले गये जहाँ घी के बदले मिट्टी का तेल डालकर ही इनको जलाया जाने लगा। गाँव के लोगों ने आग जलती देखी तो करीब आए। इससे डरकर अंग्रेजों ने इनकी लाश के अधजले टुकड़ों को सतलुज नदी में फेंका और भाग गए। जब गाँव वाले पास आए तब उन्होंने इनके मृत शरीर के टुकड़ो कों एकत्रित कर विधिवत दाह संस्कार किया। और भगत सिंह हमेशा के लिए अमर हो गये। इसके बाद लोग अंग्रेजों के साथ-साथ गाँधी को भी इनकी मौत का जिम्मेवार समझने लगे। इस कारण जब गान्धी काँग्रेस के लाहौर अधिवेशन में हिस्सा लेने जा रहे थे तो लोगों ने काले झण्डों के साथ गाँधी जी का स्वागत किया। एकाध जग़ह पर गाँधी पर हमला भी हुआ, किन्तु सादी वर्दी में उनके साथ चल रही पुलिस ने बचा लिया।

व्यक्तित्व
जेल के दिनों में उनके लिखे खतों व लेखों से उनके विचारों का अन्दाजा लगता है। उन्होंने भारतीय समाज में लिपि (पंजाबी की गुरुमुखी व शाहमुखी तथा हिन्दी और अरबी एवं उर्दू के सन्दर्भ में विशेष रूप से), जाति और धर्म के कारण आयी दूरियों पर दुःख व्यक्त किया था। उन्होंने समाज के कमजोर वर्ग पर किसी भारतीय के प्रहार को भी उसी सख्ती से सोचा जितना कि किसी अंग्रेज के द्वारा किये गये अत्याचार को।

भगत सिंह को हिन्दी, उर्दू, पंजाबी तथा अंग्रेजी के अलावा बांग्ला भी आती थी जो उन्होंने बटुकेश्वर दत्त से सीखी थी। उनका विश्वास था कि उनकी शहादत से भारतीय जनता और उद्विग्न हो जायेगी और ऐसा उनके जिन्दा रहने से शायद ही हो पाये। इसी कारण उन्होंने मौत की सजा सुनाने के बाद भी माफ़ीनामा लिखने से साफ मना कर दिया था। पं० राम प्रसाद 'बिस्मिल' ने अपनी आत्मकथा में जो-जो दिशा-निर्देश दिये थे, भगत सिंह ने उनका अक्षरश: पालन किया[16]। उन्होंने अंग्रेज सरकार को एक पत्र भी लिखा, जिसमें कहा गया था कि उन्हें अंग्रेज़ी सरकार के ख़िलाफ़ भारतीयों के युद्ध का प्रतीक एक युद्धबन्दी समझा जाये तथा फाँसी देने के बजाय गोली से उड़ा दिया जाये।[17] फाँसी के पहले ३ मार्च को अपने भाई कुलतार को भेजे एक पत्र में भगत सिंह ने लिखा था।

उन्हें यह फ़िक्र है हरदम, नयी तर्ज़-ए-ज़फ़ा क्या है?
हमें यह शौक है देखें, सितम की इन्तहा क्या है?
दहर से क्यों ख़फ़ा रहें, चर्ख का क्या ग़िला करें।
सारा जहाँ अदू सही, आओ! मुक़ाबला करें॥
इन जोशीली पंक्तियों से उनके शौर्य का अनुमान लगाया जा सकता है। चन्द्रशेखर आजाद से पहली मुलाकात के समय जलती हुई मोमबती पर हाथ रखकर उन्होंने कसम खायी थी कि उनकी जिन्दगी देश पर ही कुर्बान होगी और उन्होंने अपनी वह कसम पूरी कर दिखायी।

“किसी ने सच ही कहा है, सुधार बूढ़े आदमी नहीं कर सकते । वे तो बहुत ही बुद्धिमान और समझदार होते हैं। सुधार तो होते हैं युवकों के परिश्रम, साहस, बलिदान और निष्ठा से, जिनको भयभीत होना आता ही नहीं और जो विचार कम और अनुभव अधिक करते हैं ।”~ भगत सिंह

क्या आप कल्पना कर सकते हैं, एक हुकूमत, जिसका दुनिया के इतने बड़े हिस्से पर शासन था, इसके बार में कहा जाता था कि उनके शासन में सूर्य कभी अस्त नहीं होता। इतनी ताकतवर हुकूमत, एक 23 साल के युवक से भयभीत हो गई थी।

ख्याति और सम्मान

हुसैनीवाला में तीनों शहीदों का स्मारक
उनकी मृत्यु की ख़बर को लाहौर के दैनिक ट्रिब्यून तथा न्यूयॉर्क के एक पत्र डेली वर्कर ने छापा। इसके बाद भी कई मार्क्सवादी पत्रों में उन पर लेख छपे, पर चूँकि भारत में उन दिनों मार्क्सवादी पत्रों के आने पर प्रतिबन्ध लगा था इसलिए भारतीय बुद्धिजीवियों को इसकी ख़बर नहीं थी। देशभर में उनकी शहादत को याद किया गया।

Photos from UNCUT LIVE 's post 22/03/2026

संपादकीय | बिहार दिवस: इतिहास, विस्तार और लोकतांत्रिक यात्रा
22 मार्च का दिन भारतीय संघीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव का प्रतीक है। इसी दिन 1912 में बिहार को बंगाल से अलग कर एक स्वतंत्र प्रांत के रूप में स्थापित किया गया—जिसे आज हम बिहार दिवस के रूप में मनाते हैं। यह केवल एक तिथि नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक चेतना का प्रतीक है जिसने प्राचीन मगध से लेकर आधुनिक लोकतांत्रिक भारत तक अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है।
भौगोलिक दृष्टि से बिहार लगभग 94,163 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। प्रशासनिक रूप से यह 38 जिलों और 9 प्रमंडलों—पटना, तिरहुत, दरभंगा, कोसी, पूर्णिया, भागलपुर, मुंगेर, मगध और सारण—में विभाजित है। यह विस्तृत संरचना राज्य की विविधता, सांस्कृतिक बहुलता और प्रशासनिक जटिलताओं को दर्शाती है। गंगा, कोसी और सोन जैसी नदियाँ जहाँ इसे उपजाऊ बनाती हैं, वहीं बाढ़ जैसी समस्याएँ विकास के मार्ग में चुनौती भी खड़ी करती हैं।
जनसंख्या के लिहाज से बिहार देश के सबसे बड़े राज्यों में शामिल है। 2011 की जनगणना के अनुसार यहाँ 10 करोड़ से अधिक लोग निवास करते हैं। यह विशाल जनसंख्या एक ओर श्रमशक्ति के रूप में अपार संभावनाएँ रखती है, तो दूसरी ओर शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और बुनियादी ढांचे पर दबाव भी बनाती है।
राजनीतिक इतिहास की बात करें तो स्वतंत्रता के बाद शुरुआती दशकों में कांग्रेस का प्रभुत्व रहा। 1952 से 1967 तक लगातार सरकारें बनीं। इसके बाद गठबंधन राजनीति का दौर आया, जिसने राज्य की राजनीतिक दिशा को बदल दिया। 1990 के दशक में सामाजिक न्याय की राजनीति ने नई धारा दी, जब जनता दल के नेतृत्व में परिवर्तन हुआ और आगे चलकर राष्ट्रीय जनता दल (RJD), जनता दल (यूनाइटेड) [JDU] और भारतीय जनता पार्टी (BJP) जैसे दलों ने सत्ता में अहम भूमिका निभाई।
बिहार की राजनीति को आकार देने में कई प्रमुख नेताओं का योगदान रहा है—श्रीकृष्ण सिंह, लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार जैसे नाम न केवल सत्ता के प्रतीक हैं, बल्कि अलग-अलग दौर की विचारधाराओं और नीतियों का प्रतिनिधित्व भी करते हैं। अब तक राज्य में 23 से अधिक मुख्यमंत्री और लगभग 30 राज्यपाल रह चुके हैं, जिन्होंने संवैधानिक व्यवस्था को बनाए रखने में अपनी भूमिका निभाई।
लेकिन बिहार की पहचान केवल राजनीति तक सीमित नहीं है। यह वह भूमि है जहाँ नालंदा और विक्रमशिला जैसे प्राचीन विश्वविद्यालयों ने विश्व को ज्ञान का प्रकाश दिया। यह वही धरती है जहाँ से बुद्ध और महावीर की शिक्षाओं ने मानवता को नई दिशा दी। आधुनिक दौर में भी बिहार ने शिक्षा, प्रशासन और सामाजिक आंदोलनों के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
फिर भी चुनौतियाँ कम नहीं हैं—बेरोजगारी, पलायन, बुनियादी सुविधाओं की कमी और प्राकृतिक आपदाएँ आज भी राज्य के सामने गंभीर प्रश्न खड़े करती हैं। लेकिन हर चुनौती के साथ एक संभावना भी छिपी होती है। बिहार की युवा शक्ति, उसकी मेहनतकश जनता और तेजी से विकसित हो रही अधोसंरचना इस बात का संकेत देती है कि यह राज्य आने वाले समय में नई ऊँचाइयों को छू सकता है।
बिहार दिवस केवल अतीत का स्मरण नहीं, बल्कि भविष्य के संकल्प का भी दिन है। यह अवसर है यह सोचने का कि कैसे यह ऐतिहासिक राज्य अपनी प्रशासनिक क्षमता, संसाधनों और मानव शक्ति का समुचित उपयोग कर देश के अग्रणी राज्यों में स्थान बना सकता है।
बिहार आज एक सवाल भी है और एक संभावना भी—और उसका उत्तर उसके अपने लोगों के हाथ में है।

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विशेष रिपोर्ट | अयोध्या से ग्राउंड रिपोर्ट
माननीया राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू जी का अयोध्या दौरा – श्रीराम मंदिर में ‘राम यंत्र’ की स्थापना, देशभर में आस्था का उत्सव
अयोध्या धाम एक बार फिर ऐतिहासिक पल का साक्षी बना जब भारत की माननीया राष्ट्रपति ने श्रीराम जन्मभूमि मंदिर पहुंचकर भव्य धार्मिक अनुष्ठान में भाग लिया और 150 किलो वजनी स्वर्णमंडित ‘श्रीराम यंत्र’ की स्थापना की।
👉 यह कार्यक्रम चैत्र नवरात्रि और नवसंवत्सर के शुभ अवसर पर आयोजित हुआ, जिससे पूरे देश में आध्यात्मिक उत्साह का माहौल देखने को मिला।
🔹 1. श्रीराम यंत्र की स्थापना
राष्ट्रपति ने वैदिक मंत्रोच्चार के बीच राम मंदिर में श्रीराम यंत्र स्थापित किया
यह यंत्र वैदिक गणित और बीज मंत्रों पर आधारित है और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है
🔹 2. पूजा-अर्चना और आरती
माननीया राष्ट्रपति ने रामलला के दर्शन कर पूजा और आरती की
देश की सुख-समृद्धि और शांति के लिए प्रार्थना की
🔹 3. रामराज्य पर संदेश
माननीया राष्ट्रपति ने कहा कि “रामराज्य के आदर्श भारत को विकसित और नैतिक राष्ट्र बनाएंगे”
2047 तक विकसित भारत की कामना व्यक्त की
🟣 भव्य आयोजन और तैयारियां
अयोध्या में राष्ट्रपति के स्वागत के लिए 20+ सांस्कृतिक मंच लगाए गए
देशभर से आए कलाकारों ने प्रस्तुतियां दीं
लगभग 7000 संत, श्रद्धालु और विशिष्ट अतिथि कार्यक्रम में शामिल हुए
कड़े सुरक्षा इंतजाम और विशेष पास व्यवस्था लागू रही
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ
राज्यपाल आनंदीबेन पटेल
प्रसिद्ध संत माता अमृतानंदमयी (अम्मा)
मंदिर ट्रस्ट, संत समाज और निर्माण में जुड़े कारीगर
👉 श्रीराम मंदिर आज भारत की आस्था, संस्कृति और पुनर्जागरण का प्रतीक बन चुका है
👉 इस आयोजन को “नए भारत की आध्यात्मिक शक्ति” के रूप में देखा जा रहा है
“अयोध्या में राष्ट्रपति का यह दौरा केवल एक धार्मिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक पहचान और सनातन परंपरा की वैश्विक पुनर्स्थापना का संदेश है।”

19/03/2026

SPECIAL REPORT
नवरात्रि, भारतीय नव वर्ष और चैत्र राम नवमी: आस्था, शक्ति और नवचेतना का अद्भुत संगम
UNCUT LIVE | 24×7 News | SPEAK UP INDIA
भारत एक ऐसा देश है जहां हर पर्व केवल उत्सव नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला सिखाता है। चैत्र मास का आगमन अपने साथ तीन महत्वपूर्ण पर्व लेकर आता है—नवरात्रि, भारतीय नव वर्ष और चैत्र राम नवमी। यह तीनों पर्व मिलकर भारतीय संस्कृति, आस्था, आध्यात्म और जीवन के मूल्यों का अद्भुत संगम प्रस्तुत करते हैं।
🌺 नवरात्रि: शक्ति और साधना का पर्व
नवरात्रि —“जो मां दुर्गा के नौ स्वरूपों को समर्पित होती हैं। इन नौ दिनों में भक्त मां के अलग-अलग रूपों की पूजा करते हैं—शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री।
नवरात्रि केवल पूजा-पाठ का पर्व नहीं है, बल्कि यह आत्मशुद्धि और आत्मबल बढ़ाने का अवसर भी है। उपवास, साधना और भक्ति के माध्यम से व्यक्ति अपने अंदर की नकारात्मक ऊर्जा को दूर कर सकारात्मकता को अपनाता है।
यह पर्व हमें यह भी सिखाता है कि जीवन में संघर्ष चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, शक्ति और विश्वास से हर बाधा को पार किया जा सकता है।
🌸 भारतीय नव वर्ष: नव आरंभ और नई दिशा
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से भारतीय नव वर्ष की शुरुआत होती है, जिसे देश के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है—गुड़ी पड़वा, उगादी, नव संवत्सर आदि।
यह नव वर्ष प्रकृति के साथ तालमेल का प्रतीक है। इस समय पेड़ों पर नई पत्तियां आती हैं, मौसम में बदलाव होता है और चारों ओर नवजीवन का संचार होता है।
भारतीय संस्कृति में यह दिन केवल नया साल नहीं, बल्कि नए संकल्प, नई सोच और नई दिशा का प्रतीक है।
यह हमें प्रेरणा देता है कि हम अपने जीवन में पुराने दोषों को त्यागकर एक नई शुरुआत करें और समाज के प्रति अपने कर्तव्यों को समझें।
🚩 चैत्र राम नवमी: आदर्श और मर्यादा का संदेश
चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को भगवान श्रीराम का जन्म हुआ, जिन्हें “मर्यादा पुरुषोत्तम” कहा जाता है।
भगवान राम का जीवन सत्य, धर्म, त्याग, कर्तव्य और आदर्शों का सर्वोत्तम उदाहरण है।
राम नवमी का पर्व हमें यह सिखाता है कि जीवन में चाहे कितनी भी कठिन परिस्थितियां क्यों न हों, हमें हमेशा सत्य और धर्म के मार्ग पर चलना चाहिए।
भगवान राम का चरित्र हमें परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों को निभाने की प्रेरणा देता है।
📍 अयोध्या: आस्था और उल्लास का केंद्र
भगवान श्रीराम की जन्मभूमि अयोध्या में इन पर्वों का विशेष महत्व होता है। यहां नवरात्रि से लेकर राम नवमी तक भव्य आयोजन होते हैं।
मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना, रामायण पाठ, भजन-कीर्तन और झांकियों के माध्यम से पूरा शहर भक्तिमय हो जाता है।
राम नवमी के दिन सरयू तट पर स्नान और रामलला के दर्शन के लिए लाखों श्रद्धालु अयोध्या पहुंचते हैं।
अयोध्या की यह दिव्यता न केवल धार्मिक आस्था को दर्शाती है, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विरासत को भी जीवंत करती है।
यदि हम इन तीनों पर्वों को एक साथ देखें, तो यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि जीवन के तीन महत्वपूर्ण सिद्धांतों को दर्शाते हैं—
नवरात्रि हमें शक्ति और साहस देती है
भारतीय नव वर्ष हमें नई शुरुआत और नई दिशा देता है
राम नवमी हमें आदर्श जीवन जीने की प्रेरणा देती है
ये तीनों मिलकर हमें यह सिखाते हैं कि
👉 शक्ति के बिना जीवन अधूरा है,
संकल्प के बिना प्रगति संभव नहीं,
और मर्यादा के बिना सम्मान नहीं।
आज के समय में जब समाज अनेक चुनौतियों से जूझ रहा है, तब इन पर्वों का महत्व और भी बढ़ जाता है।
हमें इनसे प्रेरणा लेकर अपने जीवन को सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ाना चाहिए।
नवरात्रि हमें आत्मबल देती है,
भारतीय नव वर्ष हमें नई ऊर्जा देता है,
और राम नवमी हमें आदर्श जीवन का मार्ग दिखाती है।
👉 यही है भारत की संस्कृति की विशेषता—जहां हर पर्व केवल उत्सव नहीं, बल्कि जीवन का मार्गदर्शन है।
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Photos from UNCUT LIVE 's post 18/03/2026

UNCUT LIVE NEWS
🌸 रामनवमी: अयोध्या की दिव्यता और श्रीराम जन्म का अलौकिक उत्सव 🌸
अयोध्या केवल एक नगर नहीं, बल्कि भारतीय आस्था, संस्कृति और मर्यादा का जीवंत प्रतीक है। यह वही पावन भूमि है जहाँ मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम का अवतरण हुआ—धर्म की स्थापना, सत्य के पालन और आदर्श जीवन के संदेश के लिए।
चैत्र मास की शुक्ल पक्ष नवमी तिथि, जब सूर्य मध्य आकाश में विराजमान था, उसी पावन क्षण में अयोध्या के राजमहल में भगवान श्रीराम का जन्म हुआ। मान्यता है कि उस समय सम्पूर्ण सृष्टि आनंद से भर उठी—
आकाश से देवताओं ने पुष्प वर्षा की
गंधर्वों ने मधुर गीत गाए
अप्सराओं ने नृत्य किया
ऋषि-मुनियों ने वेद मंत्रों से वातावरण को पवित्र किया
अयोध्या नगरी दीपों, ध्वजों और पुष्पों से सुसज्जित हो उठी। हर घर में उत्सव, हर हृदय में उल्लास और हर मुख पर “जय श्रीराम” की ध्वनि गूंज उठी।
गोस्वामी तुलसीदास ने इस दिव्य क्षण का अत्यंत सुंदर वर्णन किया है—
“जन्म लिए प्रभु अयोध्या माहीं। हरषित भए सुर नर मुनि नाहीं॥”
🛕 अयोध्या के प्रमुख मंदिर और रामनवमी का उत्सव
अयोध्या के मंदिर केवल स्थापत्य नहीं, बल्कि जीवंत भक्ति केंद्र हैं जहाँ रामनवमी का उत्सव अत्यंत भव्य रूप से मनाया जाता है।
🛕 श्री राम जन्मभूमि मंदिर
यह वह पावन स्थल है जहाँ श्रीराम का प्राकट्य हुआ। रामनवमी के दिन यहाँ विशेष अभिषेक, श्रृंगार और आरती होती है। दोपहर 12 बजे “जन्म महोत्सव” का दृश्य अत्यंत अलौकिक होता है।
🛕 हनुमानगढ़ी
यहाँ बजरंगबली की आराधना के बिना रामदर्शन अधूरा माना जाता है। रामनवमी पर हनुमान चालीसा, सुंदरकांड और भव्य कीर्तन होते हैं।
🛕 कनक भवन
यह श्रीराम और माता सीता का अत्यंत सुंदर मंदिर है। रामनवमी पर यहाँ विशेष श्रृंगार और झांकी सजाई जाती है, जो भक्तों को भाव-विभोर कर देती है।
🛕 नागेश्वरनाथ मंदिर
भगवान शिव को समर्पित यह मंदिर रामभक्ति और शिवभक्ति का अद्भुत संगम है। रामनवमी पर यहाँ भी विशेष पूजा-अर्चना होती है।
इसके साथ ही अयोध्या के प्रतिष्ठित मंदिरों में जिसमें बड़ी छावनी, छोटी छावनी, तिवारी मंदिर, छोटी देवकाली मंदिर, परमहंस आश्रम वासुदेव घाट, आज जगह पर राम जन्म का उत्सव बनाया जाता है
रामनवमी के अवसर पर तुलसीदास के दोहे हर भक्त के हृदय में भक्ति की ज्योति प्रज्वलित करते हैं—
“राम भरोसो राम बल, राम नाम बिस्वास।
सुमिरत सुभ मंगल कुसल, मांगत तुलसीदास॥”
यह दोहा बताता है कि रामनाम ही जीवन का सबसे बड़ा आधार है।
“तुलसी ममता राम सों, समता सब संसार।”
इसमें समता, प्रेम और करुणा का संदेश निहित है—जो श्रीराम के आदर्शों का मूल है।
रामनवमी केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि आत्मचिंतन का अवसर है। यह हमें सिखाती है—
धर्म का पालन करें
सत्य और मर्यादा का अनुसरण करें
सबके प्रति समान भाव रखें
रामनाम का स्मरण करें
श्रीराम का जीवन हमें यह सिखाता है कि विपरीत परिस्थितियों में भी आदर्शों का त्याग नहीं करना चाहिए।
रामनवमी के दिन अयोध्या का वातावरण अद्भुत हो जाता है—
सरयू तट पर स्नान और दीपदान
मंदिरों में घंटों की ध्वनि और भजन
साधु-संतों के प्रवचन
भक्तों की अपार भीड़ और श्रद्धा
ऐसा प्रतीत होता है मानो त्रेता युग पुनः जीवित हो उठा हो।
अयोध्या की रामनवमी केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि आस्था, संस्कृति और आदर्श जीवन का उत्सव है।
यह हमें श्रीराम के चरित्र को अपने जीवन में उतारने की प्रेरणा देती है।
जब भी हम “जय श्रीराम” कहते हैं, वह केवल एक उद्घोष नहीं, बल्कि एक संकल्प होता है—
सत्य, धर्म और मर्यादा के मार्ग पर चलने का।

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