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06/07/2026
दिव्यांगजन सेवा के अग्रदूत स्व:श्री विनय पाण्डेय जी को संस्थान परिवार ने दी भावभीनी श्रद्धांजलि
अयोध्या। मंदबुद्धि मूक-बधिर विद्यालय, तुलसी नगर, अयोध्या में दिव्यांगजन सेवा एवं शिक्षा के क्षेत्र में आजीवन समर्पित रहे वरिष्ठ शिक्षक एवं समाजसेवी स्वर्गीय श्री विनय पाण्डेय को संस्थान परिवार द्वारा उनके चित्र पर माल्यार्पण, पुष्पांजलि एवं दीप प्रज्ज्वलित कर भावभीनी एवं सजल श्रद्धांजलि अर्पित की गई।
इस अवसर पर उपस्थित सभी शिक्षकों एवं कर्मचारियों ने दो मिनट का मौन रखकर दिवंगत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की तथा उनके दिव्यांगजन हित में किए गए अतुलनीय योगदान को स्मरण किया।
संस्थान परिवार ने कहा कि श्री विनय पाण्डेय ने लगभग 35 वर्षों से अधिक समय तक दिव्यांग बच्चों की शिक्षा, प्रशिक्षण, पुनर्वास एवं रोजगारोन्मुखी विकास के लिए निष्ठापूर्वक अपनी सेवाएं प्रदान कीं। वे केवल एक शिक्षक ही नहीं, बल्कि दिव्यांगजनों के अधिकारों के सजग प्रहरी भी थे। फैजाबाद (अयोध्या) सहित अन्य जनपदों में जब भी किसी दिव्यांगजन के साथ कोई दुर्घटना अथवा अन्य विधिक समस्या उत्पन्न होती थी, तब वे न्यायालय एवं प्रशासनिक स्तर पर आवश्यक सहायता उपलब्ध कराने तथा सांकेतिक भाषा के माध्यम से निःशुल्क सहयोग करने के लिए सदैव तत्पर रहते थे। उनका संपूर्ण जीवन मानव सेवा, समर्पण और संवेदनशीलता का प्रेरणादायी उदाहरण रहेगा।
संस्थान की अध्यक्ष श्रीमती अनीता पाठक ने श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा, "श्री विनय पाण्डेय का जीवन सेवा, सादगी और समर्पण का अनुपम उदाहरण था। दिव्यांगजनों के प्रति उनकी करुणा और निःस्वार्थ सेवा सदैव हमें प्रेरित करती रहेगी। उनके बताए आदर्शों पर चलना ही उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।"
संस्थान के प्रबंधक श्री प्रदीप कुमार तिवारी ने कहा, "श्री विनय पाण्डेय जी ने अपना संपूर्ण जीवन दिव्यांग बच्चों के उज्ज्वल भविष्य और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए समर्पित कर दिया। उनका योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा तथा उनकी कमी संस्थान परिवार को हमेशा खलती रहेगी।"
श्रद्धांजलि सभा में प्रधानाचार्य श्री अंकित मिश्रा, शरद तिवारी, अभय द्विवेदी, दिनेश राय, सुरेंद्र प्रसाद मिश्रा, रानी श्रीवास्तव, सरिता शर्मा, सचिन तिवारी, दिलीप शर्मा, विकास पाण्डेय सहित संस्थान के समस्त शिक्षक एवं कर्मचारियों ने पुष्प अर्पित कर स्वर्गीय श्री विनय पाण्डेय को अपनी भावभीनी एवं सजल श्रद्धांजलि अर्पित की।
कार्यक्रम का समापन दिवंगत आत्मा की शांति एवं दिव्यांगजन सेवा के उनके अधूरे सपनों को आगे बढ़ाने के संकल्प के साथ हुआ।
बिहार की हुई घटना जिसमें श्री भारत भूषण का एनकाउंटर हुआ इस घटना के परिपेक्ष में बार एसोसिएशन फैजाबाद के पूर्व उपाध्यक्ष श्री राजीव पांडे जी के साथ खास बातचीत
28/05/2026
उर्दू शायरी की दुनिया के महान शायर बशीर बद्र का 28 मई 2026 को भोपाल में 91 वर्ष की आयु में निधन हो गया। वे लंबे समय से डिमेंशिया बीमारी से पीड़ित थे। उनके निधन से साहित्य और शायरी जगत में शोक की लहर दौड़ गई।
जन्म और प्रारम्भिक जीवन
बशीर बद्र का असली नाम सैयद मोहम्मद बशीर था।
उनका जन्म 15 फरवरी 1935 को अयोध्या में हुआ था।
बाद में उनका परिवार मध्य प्रदेश और फिर उत्तर प्रदेश के विभिन्न शहरों में रहा।
उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त की और उर्दू साहित्य में पीएचडी की।
बशीर बद्र ने उर्दू ग़ज़ल को आम आदमी की भाषा से जोड़ दिया। उनकी शायरी में प्रेम, दर्द, तन्हाई, रिश्ते, समय और इंसानी भावनाओं की गहराई दिखाई देती है।
वे आधुनिक उर्दू ग़ज़ल के सबसे लोकप्रिय शायरों में गिने जाते थे।
मेरठ दंगों में उनका घर जल गया था, जिसके बाद वे भोपाल में बस गए। इस घटना का असर उनकी शायरी में भी दिखाई देता है।
प्रमुख उपलब्धियाँ
भारत सरकार द्वारा पद्मश्री सम्मान
अनेक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मुशायरों में भागीदारी
आधुनिक उर्दू ग़ज़ल को नई पहचान दिलाई
उनकी ग़ज़लों को फिल्मों और गायकों ने भी लोकप्रिय बनाया
हिंदी और उर्दू दोनों पाठकों में अत्यंत लोकप्रिय रहे
“उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।”
“दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे,
जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों।”
“कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी,
यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता।”
“लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में।”
“कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो।”
“हज़ार सफ़्हों का दीवान कौन पढ़ता है,
‘बशीर बद्र’ का कोई इंतिख़ाब दे जाओ।”
उनकी शायरी की विशेषता
सरल और आम बोलचाल की भाषा
दिल को छू लेने वाली भावनाएँ
प्रेम और मानवीय रिश्तों की गहराई
दर्द को खूबसूरती से बयान करना
आधुनिक सोच और पारंपरिक ग़ज़ल का मेल
अंतिम समय
बशीर बद्र पिछले लगभग 14 वर्षों से डिमेंशिया से पीड़ित थे। उम्र बढ़ने के साथ उनकी याददाश्त कमजोर हो गई थी। उन्होंने भोपाल में अंतिम सांस ली। �
लोगों की श्रद्धांजलि
22/05/2026
अयोध्या। उत्तर प्रदेश लोक एवं जनजाति संस्कृति संस्थान, लखनऊ एवं अखिल भारतीय दिव्यांग जन कल्याण समिति के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित “सृजन” लोक चित्रकला कार्यशाला का भव्य शुभारंभ अयोध्या में संपन्न हुआ। कार्यक्रम का उद्घाटन जिला होमगार्ड कमांडेंट राघवेंद्र शुक्ला एवं जिला दिव्यांगजन सशक्तिकरण अधिकारी चंद्रेश त्रिपाठी के करकमलों द्वारा दीप प्रज्ज्वलित कर किया गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में दिव्यांग बच्चे, अभिभावक, प्रशिक्षक, सामाजिक कार्यकर्ता एवं कला प्रेमी उपस्थित रहे।
कार्यक्रम का उद्देश्य दिव्यांग बच्चों के भीतर छिपी रचनात्मक प्रतिभा को मंच प्रदान करना, उन्हें लोक कला एवं संस्कृति से जोड़ना तथा आत्मनिर्भरता की दिशा में प्रेरित करना है। कार्यशाला के माध्यम से बच्चों को लोक चित्रकला की विभिन्न विधाओं का प्रशिक्षण दिया जाएगा, जिसमें रंग संयोजन, पारंपरिक चित्रांकन, रेखांकन तथा सांस्कृतिक कलात्मक अभिव्यक्ति की विशेष जानकारी प्रदान की जाएगी। प्रशिक्षकों द्वारा बच्चों को सरल एवं रचनात्मक तरीके से कला की बारीकियां सिखाई जा रही हैं ताकि वे अपनी प्रतिभा को विकसित कर सकें।
मुख्य अतिथियों ने अपने संबोधन में कहा कि दिव्यांग बच्चे किसी भी दृष्टि से प्रतिभा में कम नहीं हैं, आवश्यकता केवल उन्हें उचित अवसर, मार्गदर्शन और प्रोत्साहन देने की है। उन्होंने कहा कि कला केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं बल्कि आत्मविश्वास बढ़ाने और मानसिक विकास का भी सशक्त साधन है। इस प्रकार की कार्यशालाएं बच्चों के भीतर नई ऊर्जा और सकारात्मक सोच विकसित करती हैं।
कार्यक्रम के दौरान दिव्यांग बच्चों को कलर बॉक्स, ड्राइंग शीट, पेंटिंग सामग्री एवं अन्य चित्रकला उपकरण वितरित किए गए। बच्चों ने उत्साहपूर्वक लोक चित्रकला से संबंधित विभिन्न कलाकृतियां बनाकर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया। कार्यशाला में बच्चों के चेहरों पर उत्साह और आत्मविश्वास स्पष्ट रूप से दिखाई दिया।
आयोजकों ने बताया कि “सृजन” कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य दिव्यांग बच्चों को कला के माध्यम से समाज की मुख्यधारा से जोड़ना तथा उन्हें आत्मनिर्भर एवं आत्मविश्वासी बनाना है। इस पहल के माध्यम से बच्चों की रचनात्मक क्षमता को नई पहचान मिलेगी और भविष्य में उन्हें स्वरोजगार एवं सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़ने का अवसर प्राप्त होगा।
कार्यक्रम के अंत में सभी अतिथियों, प्रशिक्षकों एवं सहयोगियों का आभार व्यक्त किया गया तथा दिव्यांग बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की कामना की गई।
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12/04/2026
पूरा नाम: आशा भोसले
जन्म: 8 सितम्बर 1933, Sangli
पिता: Deenanath Mangeshkar (प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक)
माता: शेवंतिबाई मंगेशकर
बहनें:
Lata Mangeshkar
Usha Mangeshkar
Meena Khadikar
भाई: Hridaynath Mangeshkar
👉 आशा भोसले जी का जन्म एक संगीत परिवार में हुआ, इसलिए बचपन से ही संगीत का वातावरण मिला।
🎶 संगीत यात्रा की शुरुआत
पिता के निधन के बाद परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर हुई
मात्र 10 वर्ष की आयु में गाना शुरू किया
1943 में पहली बार मराठी फिल्म में गाना गाया
धीरे-धीरे हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में जगह बनाई
शुरुआत में उन्हें छोटे-मोटे गाने मिलते थे, लेकिन मेहनत और प्रतिभा से उन्होंने अपना अलग मुकाम बनाया
👉 उन्होंने हर प्रकार के गीत गाए—ग़ज़ल, पॉप, भजन, लोकगीत, कैबरे—जो उन्हें सबसे अलग बनाता है।
🌟 संगीत परंपरा में योगदान
20 से अधिक भाषाओं में 12,000+ गीत गाए
भारतीय फिल्म संगीत में विविधता (Versatility) का नया आयाम दिया
1950–2000 तक लगातार शीर्ष गायिकाओं में रहीं
पॉप, ग़ज़ल, और वेस्टर्न स्टाइल को भारतीय संगीत में लोकप्रिय बनाया
R. D. Burman के साथ उनकी जोड़ी ऐतिहासिक मानी जाती है
🏆 प्रमुख पुरस्कार और सम्मान
दादा साहेब फाल्के पुरस्कार (2000)
पद्म विभूषण (2008)
राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार – 2 बार
फिल्मफेयर पुरस्कार – 7 बार (Best Female Playback Singer)
लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड (Filmfare)
BBC Lifetime Achievement Award
👉 यह सम्मान उनके असाधारण योगदान को दर्शाते हैं।
1. 🎵 “पिया तू अब तो आजा”
“पिया तू अब तो आजा,
शोला सा मन दहके आके बुझा जा…”
2. 🎵 “दम मारो दम”
“दम मारो दम, मिट जाए ग़म,
बोलो सुबह शाम, हरे कृष्ण हरे राम…”
3. 🎵 “इन आंखों की मस्ती”
“इन आंखों की मस्ती के मस्ताने हजारों हैं,
इन आंखों से वाबस्ता अफसाने हजारों हैं…”
4. 🎵 “चुरा लिया है तुमने”
“चुरा लिया है तुमने जो दिल को,
नज़र नहीं चुराना सनम…”
5. 🎵 “ये मेरा दिल”
“ये मेरा दिल प्यार का दीवाना,
दीवाना दीवाना प्यार का परवाना…”
6. 🎵 “रात अकेली है”
“रात अकेली है, बुझ गए दीये,
आके मेरे पास कानों में मेरे…”
7. 🎵 “ओ हसीना जुल्फों वाली”
“ओ हसीना जुल्फों वाली जाने जहां,
ढूंढती है किसको निगाहें…”
8. 🎵 “दिल चीज़ क्या है”
“दिल चीज़ क्या है, आप मेरी जान लीजिए,
बस एक बार मेरा कहा मान लीजिए…”
9. 🎵 “झुमका गिरा रे”
“झुमका गिरा रे बरेली के बाजार में,
झुमका गिरा रे…”
10. 🎵 “मेरा कुछ सामान”
“मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है,
सावन के कुछ भीगे भीगे दिन रखे हैं…”
आशा भोसले लता मंगेशकर की छोटी बहन हैं
उन्होंने सबसे अधिक विविध शैली में गाने गाए
उन्हें दादा साहेब फाल्के पुरस्कार मिला
उनका नाम Guinness World Records में भी शामिल रहा
वे भारत की सबसे बहुमुखी गायिकाओं में गिनी जाती हैं
आशा भोसले केवल एक गायिका नहीं, बल्कि भारतीय संगीत की जीवित विरासत हैं। उन्होंने अपने स्वर से न केवल गीतों को अमर किया, बल्कि भारतीय संगीत को वैश्विक पहचान भी दिलाई। उनका जीवन संघर्ष, मेहनत और प्रतिभा का प्रेरणादायक उदाहरण है—जो आने वाली पीढ़ियों को निरंतर प्रेरित करता रहेगा।
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04/04/2026
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आचार्य श्रेष्ठ श्री प्रशांत जी महाराज का जन्मदिन दिव्यांग बच्चों के बीच मनाया गया
फल, मिष्ठान व आवश्यक सामग्री वितरण कर सेवा का दिया संदेश
अयोध्या के तुलसी नगर स्थित मंद बुद्धि मूक बधिर संस्थान में आचार्य श्रेष्ठ, राम कथा के मर्मज्ञ एवं सरस गायक श्री प्रशांत जी महाराज का जन्मदिन अत्यंत सेवा भाव और भक्ति भावना के साथ मनाया गया।
इस अवसर पर “एक शाम राम जी के नाम” संकीर्तन के माध्यम से भगवान श्रीराम की महिमा, गुण एवं आदर्श चरित्र को समाज तक पहुंचाने वाले पूज्य महाराज जी के सम्मान में विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया।
संस्थान परिवार द्वारा दिव्यांग बच्चों के बीच फल, मिष्ठान, कॉपी-किताब, बैग एवं दैनिक उपयोग की आवश्यक सामग्री का वितरण किया गया। इस सेवा कार्य के माध्यम से बच्चों के चेहरे पर खुशी देखने को मिली।
पूज्य महाराज जी सदैव दिव्यांग बच्चों के हित में समर्पित भाव से सेवा करते हैं और समय-समय पर उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु संस्थान परिवार के साथ मिलकर सहयोग प्रदान करते रहते हैं।
जन्मदिन के इस पावन अवसर पर संस्थान परिवार ने दिव्यांग बच्चों के साथ मिलकर उनका जन्मदिन मनाया और उनके स्वस्थ, सुखमय एवं दीर्घायु जीवन की कामना की।
👉 “सेवा ही सच्ची साधना है – श्री प्रशांत जी महाराज”
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🟥 BREAKING / SPECIAL REPORT
🇮🇳 शहीद-ए-आजम भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को श्रद्धांजलि: बलिदान, क्रांति और विचारों की अमर गाथा
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📍 अयोध्या से विशेष रिपोर्ट
आज 23 मार्च (शहीद दिवस) के पावन अवसर पर
अखिल भारतीय विकलांग (दिव्यांगजन) कल्याण समिति एवं
मंद बुद्धि मूक-बधिर विद्यालय, तुलसी नगर अयोध्याएवं मानस फाउंडेशन अयोध्या
के संयुक्त तत्वावधान में
भारत के अमर क्रांतिकारी भगत सिंह, सुखदेव एवं राजगुरु को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई।
🟡 जन्म, परिवार और प्रारंभिक जीवन
भगत सिंह का जन्म 27/28 सितंबर 1907 को पंजाब के बंगा गाँव (अब पाकिस्तान) में एक देशभक्त परिवार में हुआ।
पिता सरदार किशन सिंह और माता विद्यावती कौर के संस्कारों ने उन्हें बचपन से ही देशभक्ति के मार्ग पर अग्रसर किया।
1919 के जलियाँवाला बाग हत्याकांड ने उनके मन पर गहरा प्रभाव डाला और यहीं से उनके भीतर क्रांति की ज्वाला प्रज्वलित हुई।
🔴 क्रांतिकारी जीवन और संगठन
उन्होंने नौजवान भारत सभा की स्थापना की और बाद में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) से जुड़े।
चन्द्रशेखर आजाद और राम प्रसाद बिस्मिल जैसे क्रांतिकारियों से प्रेरित होकर उन्होंने सशस्त्र क्रांति को स्वतंत्रता का मार्ग माना।
⚫ लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला
1928 में लाला लाजपत राय की मृत्यु के बाद
भगत सिंह और राजगुरु ने अंग्रेज अधिकारी सांडर्स की हत्या कर अन्याय का प्रतिकार किया।
💣 असेम्बली बम कांड – “इंकलाब जिंदाबाद”
8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने दिल्ली की सेंट्रल असेम्बली में बम फेंका।
यह बम किसी को नुकसान पहुँचाने के लिए नहीं, बल्कि अंग्रेजी हुकूमत को चेताने के लिए था।
उन्होंने स्वयं गिरफ्तारी दी और नारा लगाया—
“इंकलाब जिंदाबाद, साम्राज्यवाद मुर्दाबाद!”
🟢 जेल जीवन और विचारधारा
जेल में रहते हुए उन्होंने समाजवाद, समानता और शोषण के खिलाफ लेख लिखे।
64 दिन की ऐतिहासिक भूख हड़ताल ने पूरे देश का ध्यान आकर्षित किया।
उनका प्रसिद्ध लेख “मैं नास्तिक क्यों हूँ?” आज भी युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत है।
⚖️ फाँसी और अमर बलिदान
7 अक्टूबर 1930 को अदालत ने तीनों वीरों को फाँसी की सजा सुनाई।
23 मार्च 1931 की शाम, तीनों क्रांतिकारी हँसते-हँसते फाँसी के फंदे पर झूल गए और अमर हो गए।
🟢 श्रद्धांजलि कार्यक्रम – अयोध्या
अयोध्या में आयोजित इस श्रद्धांजलि कार्यक्रम में
संस्थान के प्रबंधक प्रदीप कुमार तिवारी (एडवोकेट) ने शहीदों को नमन करते हुए उनके जीवन, संघर्ष और विचारों पर विस्तार से प्रकाश डाला।
प्रधानाचार्य अंकित मिश्रा एवं संस्थान की अध्यक्ष अनीता पाठक ने भी श्रद्धांजलि सुमन अर्पित कर शहीदों के आदर्शों को अपनाने का संदेश दिया।
कार्यक्रम में
शरद तिवारी, अभय द्विवेदी, दिनेश राय, सरिता, अनिल, अभिनव, सचिन तिवारी, विकास पांडे, रानी श्रीवास्तव एवं एस.पी. मिश्रा सहित सभी उपस्थित जनों ने शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की।
दिव्यांग बच्चों, शिक्षकों एवं समाजसेवियों ने पुष्प अर्पित कर देशभक्ति गीतों और विचार गोष्ठी के माध्यम से शहीदों को याद किया।
🔥 निष्कर्ष
23 वर्ष की आयु में
भगत सिंह ने जो साहस, त्याग और विचारों की मशाल जलाई—
वह आज भी हर भारतीय के दिल में प्रज्वलित है।
👉 उनकी शहादत केवल इतिहास नहीं,
बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा है।
🔴 UNCUT LIVE | 24×7 News | SPEAK UP INDIA
“सत्य के साथ, राष्ट्र के साथ” 🇮🇳
23/03/2026
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भगत सिंह (जन्म: 27 सितम्बर 1907[a] , वीरगति: 23 मार्च 1931) भारत के एक महान स्वतंत्रता सेनानी एवं क्रान्तिकारी थे। चन्द्रशेखर आजाद व पार्टी के अन्य सदस्यों के साथ मिलकर इन्होंने भारत की स्वतंत्रता के लिए अभूतपूर्व साहस के साथ शक्तिशाली ब्रिटिश सरकार का मुक़ाबला किया। पहले लाहौर में बर्नी सैंडर्स की हत्या और उसके बाद दिल्ली की केन्द्रीय संसद (सेण्ट्रल असेम्बली) में बम-विस्फोट करके ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध खुले विद्रोह को बुलन्दी प्रदान की। इन्होंने असेम्बली में बम फेंककर भी भागने से मना कर दिया। जिसके फलस्वरूप अंग्रेज सरकार ने इन्हें २३ मार्च १९३१ को इनके दो अन्य साथियों, राजगुरु तथा सुखदेव के साथ फाँसी पर लटका दिया।
ਭਗਤ ਸਿੰਘ
भगत सिंह
28 सितम्बर 1907[a] से 23 मार्च 1931 ई०
शहीद भगत सिंह 1929 ई० में
जन्मस्थल :
गाँव बंगा, जिला लायलपुर, पंजाब (अब पाकिस्तान में)
आन्दोलन:
भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम
प्रमुख संगठन:
नौजवान भारत सभा, हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोशिएसन
शहीद भगत सिंह, शहीद सुुुखदेव, शहीद राजगुरु को फांसी पर लटकाये जाने की ख़बर - लाहौर से प्रकाशित द ट्रिब्युन के मुख्य पृष्ठ
जन्म और परिवेश
भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर 1907 (अश्विन कृष्णपक्ष सप्तमी) को प्रचलित है परन्तु तत्कालीन अनेक साक्ष्यों के अनुसार उनका जन्म 27 सितंबर 1907 ई० को एक सिख परिवार में हुआ था। इनकी जन्म भूमि बंगा गांव , पश्चिमी पंजाब में है जो अब पाकिस्तान में है।[a] उनके पिता का नाम सरदार किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती कौर था। यह एक किसान[9] परिवार से थे। अमृतसर में १३ अप्रैल १९१९ को हुए जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड ने भगत सिंह की सोच पर गहरा प्रभाव डाला था। लाहौर के नेशनल कॉलेज़ की पढ़ाई छोड़कर भगत सिंह ने भारत की आज़ादी के लिए नौजवान भारत सभा की स्थापना की थी।
वर्ष 1922 में चौरी-चौरा हत्याकांड के बाद गाँधी जी ने जब किसानों का साथ नहीं दिया तब भगत सिंह बहुत निराश हुए। उसके बाद उनका अहिंसा से विश्वास कमजोर हो गया और वह इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि सशस्त्र क्रांति ही स्वतंत्रता दिलाने का एक मात्र रास्ता है। उसके बाद वह चन्द्रशेखर आजाद के नेतृत्व में गठित हुई गदर दल के हिस्सा बन गए। काकोरी काण्ड में राम प्रसाद 'बिस्मिल' सहित ०४ क्रान्तिकारियों को फाँसी व १६ अन्य को कारावास की सजाओं से भगत सिंह इतने अधिक उद्विग्न हुए कि चन्द्रशेखर आजाद के साथ उनकी पार्टी हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन से जुड़ गए और उसे एक नया नाम दिया हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन। इस संगठन का उद्देश्य सेवा, त्याग और पीड़ा झेल सकने वाले नवयुवक तैयार करना था।
भगत सिंह ने राजगुरु के साथ मिलकर १७ दिसम्बर १९२८ को लाहौर में सहायक पुलिस अधीक्षक रहे अंग्रेज़ अधिकारी जे० पी० सांडर्स को मारा था। इस कार्रवाई में क्रान्तिकारी चन्द्रशेखर आज़ाद ने उनकी पूरी सहायता की थी। क्रान्तिकारी साथी बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर भगत सिंह ने वर्तमान नई दिल्ली स्थित ब्रिटिश भारत की तत्कालीन सेण्ट्रल एसेम्बली के सभागार संसद भवन में ८ अप्रैल १९२९ को अंग्रेज़ सरकार को जगाने के लिये बम और पर्चे फेंके थे। बम फेंकने के बाद वहीं पर दोनों ने अपनी गिरफ्तारी भी दी।
क्रान्तिकारी गतिविधियाँ
भगत सिंह,राजगुरु एवं सुखदेव
भगत सिंह
उस समय भगत सिंह करीब बारह वर्ष के थे जब जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड हुआ था। इसकी सूचना मिलते ही भगत सिंह अपने स्कूल से १२ मील पैदल चलकर जलियाँवाला बाग पहुँच गए। इस उम्र में भगत सिंह अपने चाचाओं की क्रान्तिकारी किताबें पढ़ कर सोचते थे कि इनका रास्ता सही है कि नहीं ? गांधी जी का असहयोग आन्दोलन छिड़ने के बाद वे गान्धी जी के अहिंसात्मक तरीकों और क्रान्तिकारियों के हिंसक आन्दोलन में से अपने लिए रास्ता चुनने लगे। गाँधी जी के असहयोग आन्दोलन को रद्द कर देने के कारण उनमें थोड़ा रोष उत्पन्न हुआ, पर पूरे राष्ट्र की तरह वो भी महात्मा गाँधी का सम्मान करते थे। पर उन्होंने गाँधी जी के अहिंसात्मक आन्दोलन की जगह देश की स्वतन्त्रता के लिए हिंसात्मक क्रांति का मार्ग अपनाना अनुचित नहीं समझा। उन्होंने जुलूसों में भाग लेना प्रारम्भ किया तथा कई क्रान्तिकारी दलों के सदस्य बने। उनके दल के प्रमुख क्रान्तिकारियों में चन्द्रशेखर आजाद, सुखदेव, राजगुरु इत्यादि थे। काकोरी काण्ड में ४ क्रान्तिकारियों को फाँसी व १६ अन्य को कारावास की सजाओं से भगत सिंह इतने अधिक उद्विग्न हुए कि उन्होंने १९२८ में अपनी पार्टी नौजवान भारत सभा का हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन में विलय कर दिया और उसे एक नया नाम दिया हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन।[10]
लाला जी की मृत्यु का प्रतिशोध
सॉण्डर्स की हत्या के बाद एचएसआरए द्वारा लगाए गए परचे
१९२८ में साइमन कमीशन के बहिष्कार के लिए भयानक प्रदर्शन हुए। इन प्रदर्शनों में भाग लेने वालों पर अंग्रेजी शासन ने लाठी चार्ज भी किया। इसी लाठी चार्ज से आहत होकर लाला लाजपत राय की मृत्यु हो गई। अब इनसे रहा न गया। एक गुप्त योजना के तहत इन्होंने पुलिस सुपरिण्टेण्डेण्ट स्काट को मारने की योजना सोची। सोची गई योजना के अनुसार भगत सिंह और राजगुरु लाहौर कोतवाली के सामने व्यस्त मुद्रा में टहलने लगे। उधर जयगोपाल अपनी साइकिल को लेकर ऐसे बैठ गए जैसे कि वो ख़राब हो गई हो। गोपाल के इशारे पर दोनों सचेत हो गए। उधर चन्द्रशेखर आज़ाद पास के डी० ए० lवी० स्कूल की चहारदीवारी के पास छिपकर घटना को अंजाम देने में रक्षक का काम कर रहे थे।
१७ दिसंबर १९२८ को करीब सवा चार बजे, ए० एस० पी० सॉण्डर्स के आते ही राजगुरु ने एक गोली सीधी उसके सर में मारी जिससे वह पहले ही मर जाता। लेकिन तुरन्त बाद भगत सिंह ने भी ३-४ गोली दाग कर उसके मरने का पूरा इन्तज़ाम कर दिया। ये दोनों जैसे ही भाग रहे थे कि एक सिपाही चनन सिंह ने इनका पीछा करना शुरू कर दिया। चन्द्रशेखर आज़ाद ने उसे सावधान किया - "आगे बढ़े तो गोली मार दूँगा।" नहीं मानने पर आज़ाद ने उसे गोली मार दी और वो वहीं पर मर गया। इस तरह इन लोगों ने लाला लाजपत राय की मौत का बदला ले लिया।
एसेम्बली में बम फेंकना
भगत सिंह यद्यपि रक्तपात के पक्षधर नहीं थे परन्तु वे वामपंथी विचारधारा को मानते थे, तथा कार्ल मार्क्स के सिद्धान्तों से उनका ताल्लुक था और उन्हीं विचारधारा को वे आगे बढ़ा रहे थे। यद्यपि, वे समाजवाद के पक्के पोषक भी थे। कलान्तर में उनके विरोधी द्वारा उनको अपने विचारधारा बता कर युवाओ को भगत सिंह के नाम पर बरगलाने के आरोप लगते रहे है। कॉंग्रेस के सत्ता में रहने के बावजूद भगत सिंह को काँग्रेस शहीद का दर्जा नही दिलवा पाए, क्योंकि वे केवल भगत सिंह के नाम का इस्तेमाल युवाओं को अपनी पार्टी से जोड़ने के लिए करते थे। उन्हें पूँजीपतियों की मजदूरों के प्रति शोषण की नीति पसन्द नहीं आती थी। उस समय चूँकि अँग्रेज ही सर्वेसर्वा थे तथा बहुत कम भारतीय उद्योगपति उन्नति कर पाये थे, अतः अँग्रेजों के मजदूरों के प्रति अत्याचार से उनका विरोध स्वाभाविक था। मजदूर विरोधी ऐसी नीतियों को ब्रिटिश संसद में पारित न होने देना उनके दल का निर्णय था। सभी चाहते थे कि अँग्रेजों को पता चलना चाहिए कि हिन्दुस्तानी जाग चुके हैं और उनके हृदय में ऐसी नीतियों के प्रति आक्रोश है। ऐसा करने के लिये ही उन्होंने दिल्ली की केन्द्रीय एसेम्बली में बम फेंकने की योजना बनाई थी।
भगत सिंह चाहते थे कि इसमें कोई खून खराबा न हो और अँग्रेजों तक उनकी 'आवाज़' भी पहुँचे। हालाँकि प्रारम्भ में उनके दल के सब लोग ऐसा नहीं सोचते थे पर अन्त में सर्वसम्मति से भगत सिंह तथा बटुकेश्वर दत्त का नाम चुना गया। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार ८ अप्रैल १९२९ को केन्द्रीय असेम्बली में इन दोनों ने एक ऐसे स्थान पर बम फेंका जहाँ कोई मौजूद न था, अन्यथा उसे चोट लग सकती थी। पूरा हाल धुएँ से भर गया। भगत सिंह चाहते तो भाग भी सकते थे पर उन्होंने पहले ही सोच रखा था कि उन्हें दण्ड स्वीकार है चाहें वह फाँसी ही क्यों न हो; अतः उन्होंने भागने से मना कर दिया। उस समय वे दोनों खाकी कमीज़ तथा निकर पहने हुए थे। बम फटने के बाद उन्होंने "इंकलाब-जिन्दाबाद, साम्राज्यवाद-मुर्दाबाद!" का नारा[11] लगाया और अपने साथ लाये हुए पर्चे हवा में उछाल दिए। इसके कुछ ही देर बाद पुलिस आ गई और दोनों को ग़िरफ़्तार कर लिया गया।
जेल के दिन
सिन्ध से प्रकाशित बिस्मिल की आत्मकथा का प्रथम पृष्ठ। यही पुस्तक भगतसिंह को लाहौर जेल में भेजी गयी थी।
जेल में भगत सिंह करीब २ साल रहे। इस दौरान वे लेख लिखकर अपने क्रान्तिकारी विचार व्यक्त करते रहते थे। जेल में रहते हुए भी उनका अध्ययन लगातार जारी रहा। उनके उस दौरान लिखे गये लेख व सगे सम्बन्धियों को लिखे गये पत्र आज भी उनके विचारों के दर्पण हैं। अपने लेखों में उन्होंने कई तरह से पूँजीपतियों को अपना शत्रु बताया है। उन्होंने लिखा कि मजदूरों का शोषण करने वाला चाहें एक भारतीय ही क्यों न हो, वह उनका शत्रु है। उन्होंने जेल में अंग्रेज़ी में एक लेख भी लिखा जिसका शीर्षक था मैं नास्तिक क्यों हूँ?[12][13] जेल में भगत सिंह व उनके साथियों ने ६४ दिनों तक भूख हडताल की। उनके एक साथी यतीन्द्रनाथ दास ने तो भूख हड़ताल में अपने प्राण ही त्याग दिये थे।
फाँसी
भगत सिंह का मृत्यु प्रमाण पत्र
26 अगस्त, 1930 को अदालत ने भगत सिंह को भारतीय दंड संहिता की धारा 129, 302 तथा विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धारा 4 और 6एफ तथा आईपीसी की धारा 120 के अंतर्गत अपराधी सिद्ध किया। 7 अक्तूबर, 1930 को अदालत के द्वारा 68 पृष्ठों का निर्णय दिया, जिसमें भगत सिंह, सुखदेव तथा राजगुरु को फाँसी की सजा सुनाई गई। फाँसी की सजा सुनाए जाने के साथ ही लाहौर में धारा 144 लगा दी गई। इसके बाद भगत सिंह की फाँसी की माफी के लिए प्रिवी परिषद में अपील दायर की गई परन्तु यह अपील 10 जनवरी, 1931 को रद्द कर दी गई। इसके बाद तत्कालीन काँग्रेस अध्यक्ष पं. मदन मोहन मालवीय ने वायसराय के सामने सजा माफी के लिए 14 फरवरी, 1931 को अपील दायर की कि वह अपने विशेषाधिकार का प्रयोग करते हुए मानवता के आधार पर फांसी की सजा माफ कर दें। भगत सिंह की फाँसी की सज़ा माफ़ करवाने हेतु महात्मा गाँधी ने 17 फरवरी 1931 को वायसराय से बात की फिर 18 फरवरी, 1931 को आम जनता की ओर से भी वायसराय के सामने विभिन्न तर्को के साथ सजा माफी के लिए अपील दायर की। यह सब कुछ भगत सिंह की इच्छा के खिलाफ हो रहा था क्यों कि भगत सिंह नहीं चाहते थे कि उनकी सजा माफ की जाए।
23 मार्च 1931 को शाम में करीब 7 बजकर 33 मिनट पर भगत सिंह तथा इनके दो साथियों सुखदेव व राजगुरु को फाँसी दे दी गई।[14] फाँसी पर जाने से पहले वे लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे और जब उनसे उनकी आखरी इच्छा पूछी गई तो उन्होंने कहा कि वह लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे और उन्हें वह पूरी करने का समय दिया जाए।[15] कहा जाता है कि जेल के अधिकारियों ने जब उन्हें यह सूचना दी कि उनके फाँसी का वक्त आ गया है तो उन्होंने कहा था- "ठहरिए! पहले एक क्रान्तिकारी दूसरे से मिल तो ले।" फिर एक मिनट बाद किताब छत की ओर उछाल कर बोले - "ठीक है अब चलो।"
फाँसी पर जाते समय वे तीनों मस्ती से गा रहे थे -
मेरा रँग दे बसन्ती चोला, मेरा रँग दे।
मेरा रँग दे बसन्ती चोला। माय रँग दे बसन्ती चोला॥
फाँसी के बाद कहीं कोई आन्दोलन न भड़क जाये इसके डर से अंग्रेजों ने पहले इनके मृत शरीर के टुकड़े किये फिर इसे बोरियों में भरकर फिरोजपुर की ओर ले गये जहाँ घी के बदले मिट्टी का तेल डालकर ही इनको जलाया जाने लगा। गाँव के लोगों ने आग जलती देखी तो करीब आए। इससे डरकर अंग्रेजों ने इनकी लाश के अधजले टुकड़ों को सतलुज नदी में फेंका और भाग गए। जब गाँव वाले पास आए तब उन्होंने इनके मृत शरीर के टुकड़ो कों एकत्रित कर विधिवत दाह संस्कार किया। और भगत सिंह हमेशा के लिए अमर हो गये। इसके बाद लोग अंग्रेजों के साथ-साथ गाँधी को भी इनकी मौत का जिम्मेवार समझने लगे। इस कारण जब गान्धी काँग्रेस के लाहौर अधिवेशन में हिस्सा लेने जा रहे थे तो लोगों ने काले झण्डों के साथ गाँधी जी का स्वागत किया। एकाध जग़ह पर गाँधी पर हमला भी हुआ, किन्तु सादी वर्दी में उनके साथ चल रही पुलिस ने बचा लिया।
व्यक्तित्व
जेल के दिनों में उनके लिखे खतों व लेखों से उनके विचारों का अन्दाजा लगता है। उन्होंने भारतीय समाज में लिपि (पंजाबी की गुरुमुखी व शाहमुखी तथा हिन्दी और अरबी एवं उर्दू के सन्दर्भ में विशेष रूप से), जाति और धर्म के कारण आयी दूरियों पर दुःख व्यक्त किया था। उन्होंने समाज के कमजोर वर्ग पर किसी भारतीय के प्रहार को भी उसी सख्ती से सोचा जितना कि किसी अंग्रेज के द्वारा किये गये अत्याचार को।
भगत सिंह को हिन्दी, उर्दू, पंजाबी तथा अंग्रेजी के अलावा बांग्ला भी आती थी जो उन्होंने बटुकेश्वर दत्त से सीखी थी। उनका विश्वास था कि उनकी शहादत से भारतीय जनता और उद्विग्न हो जायेगी और ऐसा उनके जिन्दा रहने से शायद ही हो पाये। इसी कारण उन्होंने मौत की सजा सुनाने के बाद भी माफ़ीनामा लिखने से साफ मना कर दिया था। पं० राम प्रसाद 'बिस्मिल' ने अपनी आत्मकथा में जो-जो दिशा-निर्देश दिये थे, भगत सिंह ने उनका अक्षरश: पालन किया[16]। उन्होंने अंग्रेज सरकार को एक पत्र भी लिखा, जिसमें कहा गया था कि उन्हें अंग्रेज़ी सरकार के ख़िलाफ़ भारतीयों के युद्ध का प्रतीक एक युद्धबन्दी समझा जाये तथा फाँसी देने के बजाय गोली से उड़ा दिया जाये।[17] फाँसी के पहले ३ मार्च को अपने भाई कुलतार को भेजे एक पत्र में भगत सिंह ने लिखा था।
उन्हें यह फ़िक्र है हरदम, नयी तर्ज़-ए-ज़फ़ा क्या है?
हमें यह शौक है देखें, सितम की इन्तहा क्या है?
दहर से क्यों ख़फ़ा रहें, चर्ख का क्या ग़िला करें।
सारा जहाँ अदू सही, आओ! मुक़ाबला करें॥
इन जोशीली पंक्तियों से उनके शौर्य का अनुमान लगाया जा सकता है। चन्द्रशेखर आजाद से पहली मुलाकात के समय जलती हुई मोमबती पर हाथ रखकर उन्होंने कसम खायी थी कि उनकी जिन्दगी देश पर ही कुर्बान होगी और उन्होंने अपनी वह कसम पूरी कर दिखायी।
“किसी ने सच ही कहा है, सुधार बूढ़े आदमी नहीं कर सकते । वे तो बहुत ही बुद्धिमान और समझदार होते हैं। सुधार तो होते हैं युवकों के परिश्रम, साहस, बलिदान और निष्ठा से, जिनको भयभीत होना आता ही नहीं और जो विचार कम और अनुभव अधिक करते हैं ।”~ भगत सिंह
क्या आप कल्पना कर सकते हैं, एक हुकूमत, जिसका दुनिया के इतने बड़े हिस्से पर शासन था, इसके बार में कहा जाता था कि उनके शासन में सूर्य कभी अस्त नहीं होता। इतनी ताकतवर हुकूमत, एक 23 साल के युवक से भयभीत हो गई थी।
ख्याति और सम्मान
हुसैनीवाला में तीनों शहीदों का स्मारक
उनकी मृत्यु की ख़बर को लाहौर के दैनिक ट्रिब्यून तथा न्यूयॉर्क के एक पत्र डेली वर्कर ने छापा। इसके बाद भी कई मार्क्सवादी पत्रों में उन पर लेख छपे, पर चूँकि भारत में उन दिनों मार्क्सवादी पत्रों के आने पर प्रतिबन्ध लगा था इसलिए भारतीय बुद्धिजीवियों को इसकी ख़बर नहीं थी। देशभर में उनकी शहादत को याद किया गया।
22/03/2026
संपादकीय | बिहार दिवस: इतिहास, विस्तार और लोकतांत्रिक यात्रा
22 मार्च का दिन भारतीय संघीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव का प्रतीक है। इसी दिन 1912 में बिहार को बंगाल से अलग कर एक स्वतंत्र प्रांत के रूप में स्थापित किया गया—जिसे आज हम बिहार दिवस के रूप में मनाते हैं। यह केवल एक तिथि नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक चेतना का प्रतीक है जिसने प्राचीन मगध से लेकर आधुनिक लोकतांत्रिक भारत तक अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है।
भौगोलिक दृष्टि से बिहार लगभग 94,163 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। प्रशासनिक रूप से यह 38 जिलों और 9 प्रमंडलों—पटना, तिरहुत, दरभंगा, कोसी, पूर्णिया, भागलपुर, मुंगेर, मगध और सारण—में विभाजित है। यह विस्तृत संरचना राज्य की विविधता, सांस्कृतिक बहुलता और प्रशासनिक जटिलताओं को दर्शाती है। गंगा, कोसी और सोन जैसी नदियाँ जहाँ इसे उपजाऊ बनाती हैं, वहीं बाढ़ जैसी समस्याएँ विकास के मार्ग में चुनौती भी खड़ी करती हैं।
जनसंख्या के लिहाज से बिहार देश के सबसे बड़े राज्यों में शामिल है। 2011 की जनगणना के अनुसार यहाँ 10 करोड़ से अधिक लोग निवास करते हैं। यह विशाल जनसंख्या एक ओर श्रमशक्ति के रूप में अपार संभावनाएँ रखती है, तो दूसरी ओर शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और बुनियादी ढांचे पर दबाव भी बनाती है।
राजनीतिक इतिहास की बात करें तो स्वतंत्रता के बाद शुरुआती दशकों में कांग्रेस का प्रभुत्व रहा। 1952 से 1967 तक लगातार सरकारें बनीं। इसके बाद गठबंधन राजनीति का दौर आया, जिसने राज्य की राजनीतिक दिशा को बदल दिया। 1990 के दशक में सामाजिक न्याय की राजनीति ने नई धारा दी, जब जनता दल के नेतृत्व में परिवर्तन हुआ और आगे चलकर राष्ट्रीय जनता दल (RJD), जनता दल (यूनाइटेड) [JDU] और भारतीय जनता पार्टी (BJP) जैसे दलों ने सत्ता में अहम भूमिका निभाई।
बिहार की राजनीति को आकार देने में कई प्रमुख नेताओं का योगदान रहा है—श्रीकृष्ण सिंह, लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार जैसे नाम न केवल सत्ता के प्रतीक हैं, बल्कि अलग-अलग दौर की विचारधाराओं और नीतियों का प्रतिनिधित्व भी करते हैं। अब तक राज्य में 23 से अधिक मुख्यमंत्री और लगभग 30 राज्यपाल रह चुके हैं, जिन्होंने संवैधानिक व्यवस्था को बनाए रखने में अपनी भूमिका निभाई।
लेकिन बिहार की पहचान केवल राजनीति तक सीमित नहीं है। यह वह भूमि है जहाँ नालंदा और विक्रमशिला जैसे प्राचीन विश्वविद्यालयों ने विश्व को ज्ञान का प्रकाश दिया। यह वही धरती है जहाँ से बुद्ध और महावीर की शिक्षाओं ने मानवता को नई दिशा दी। आधुनिक दौर में भी बिहार ने शिक्षा, प्रशासन और सामाजिक आंदोलनों के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
फिर भी चुनौतियाँ कम नहीं हैं—बेरोजगारी, पलायन, बुनियादी सुविधाओं की कमी और प्राकृतिक आपदाएँ आज भी राज्य के सामने गंभीर प्रश्न खड़े करती हैं। लेकिन हर चुनौती के साथ एक संभावना भी छिपी होती है। बिहार की युवा शक्ति, उसकी मेहनतकश जनता और तेजी से विकसित हो रही अधोसंरचना इस बात का संकेत देती है कि यह राज्य आने वाले समय में नई ऊँचाइयों को छू सकता है।
बिहार दिवस केवल अतीत का स्मरण नहीं, बल्कि भविष्य के संकल्प का भी दिन है। यह अवसर है यह सोचने का कि कैसे यह ऐतिहासिक राज्य अपनी प्रशासनिक क्षमता, संसाधनों और मानव शक्ति का समुचित उपयोग कर देश के अग्रणी राज्यों में स्थान बना सकता है।
बिहार आज एक सवाल भी है और एक संभावना भी—और उसका उत्तर उसके अपने लोगों के हाथ में है।
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