Arya Vichar
ॐ इंद्रम् वर्धन्तो अप्तुरः कृण्वन्तो विश्वमार्यम् अपघ्नन्तो अराव्णः अर्थात् क्रियाशील ऐश्वर्यवान बनो
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नमस्ते जी
वेद - यजुर्वेद
अध्याय - सप्तविंशोऽध्यायः
मन्त्र - २१
भाष्यकार :- महर्षि दयानन्द सरस्वती ।
*वन॑स्य॒तेऽव॑सृजा॒ ररा॑ण॒स्त्मना॑ दे॒वेषु । अ॒ग्निर्हव्यँश॑मि॒ता सूंदयाति ।।*
*भावार्थ :-*
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे शुद्ध आकाश आदि में अग्नि शोभायमान होता है, वैसे विद्वानों में स्थित जिज्ञासु पुरुष सुन्दर प्रकाशित स्वरूपवाला होता है ।
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नमस्ते जी
वेद - यजुर्वेद
अध्याय - सप्तविंशोऽध्यायः
मन्त्र - २०
भाष्यकार :- महर्षि दयानन्द सरस्वती ।
*तन्न॑स्तुरीप॒मद्भुतं पुरुक्षु त्वष्टा सुवीर्यम् । रा॒यस्पोषं विष्य॑तु नाभिम॒स्मे ।।*
*भावार्थ :-*
हे मनुष्यो ! जो शीघ्रकारी आश्चर्यरूप बहुतों में व्यापक धन वा बल है, उसको तुम लोग ईश्वर की प्रार्थना से प्राप्त होके आनन्दित होओ ।
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नमस्ते जी
वेद - यजुर्वेद
अध्याय - सप्तविंशोऽध्यायः
मन्त्र - १३
भाष्यकार :- महर्षि दयानन्द सरस्वती ।
*मध्वा॑ य॒ज्ञं न॑क्षसे प्रीणा॒नो नरा॒शँसनो॑ अग्ने । सुकृदे॒वः स॑वि॒ता वि॒श्ववा॑रः ।।*
*भावार्थ :-*
जो मनुष्य यज्ञ में सुगन्धादि पदार्थों के होम से वायु जल को शुद्ध कर सबको सुखी करते हैं, वे सब सुखों को प्राप्त होते हैं ।
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नमस्ते जी
वेद - यजुर्वेद
अध्याय - सप्तविंशोऽध्यायः
मन्त्र - ११
भाष्यकार :- महर्षि दयानन्द सरस्वती ।
*ऊर्ध्वाऽअ॑स्य स॒मिधो भवन्त्यूर्ध्वा शुक्रा शोचीष्य॒ग्नेः। द्युमत्तमा सुप्रतीकस्य सूनोः ।।*
*भावार्थ :-*
हे मनुष्यो ! जो यह ऊपर को उठनेवाला सबके देखने का हेतु सबकी रक्षा का निमित्त अग्नि है, उसको जानके कार्यों को निरन्तर सिद्ध किया करो ।
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नमस्ते जी
वेद - यजुर्वेद
अध्याय - सप्तविंशोऽध्यायः
मन्त्र - १०
भाष्यकार :- महर्षि दयानन्द सरस्वती ।
*उद्वयन्तम॑स॒स्परि॒ स्वः पश्य॑न्त॒ऽउत्त॑रम् । दे॒वं दे॑व॒त्रा सूर्यमग॑न्म॒ ज्योति॑रुत्त॒मम् ।।*
*भावार्थ :-*
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य सूर्य के समान अविद्यारूप अन्धकार से पृथक् हुए स्वयं प्रकाशित बड़े देवता, सबसे उत्तम सबके अन्तर्यामी परमात्मा की ही उपासना करते हैं, वे मुक्ति के सुख को भी अवश्य निर्विघ्न प्रीतिपूर्वक प्राप्त होते हैं ।
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नमस्ते जी
वेद - यजुर्वेद
अध्याय - सप्तविंशोऽध्यायः
मन्त्र - ०९
भाष्यकार :- महर्षि दयानन्द सरस्वती ।
*अ॒मुत्र भूया॒दध॒ यद्य॒मस्य॒ बृह॑स्पतेऽअ॒भिश॑स्तेरमुञ्चः । प्रत्यौहताम॒श्विनना॑ मृत्युम॑स्माद्देवाना॑मग्ने भिषजा॒ शचीभिः ।।*
*भावार्थ :-*
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। वे ही श्रेष्ठ अध्यापक और उपदेशक हैं, जो इस लोक और परलोक में सुख होने के लिए सबको अच्छी शिक्षा करें। जिससे ब्रह्मचर्यादि कर्मों का सेवन कर मनुष्य अल्पावस्था में मृत्यु और आनन्द की हानि को न प्राप्त होवें ।
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नमस्ते जी
वेद - यजुर्वेद
अध्याय - सप्तविंशोऽध्यायः
मन्त्र - ०८
भाष्यकार :- महर्षि दयानन्द सरस्वती ।
*बृह॑स्पते सवितर्बोधयैनसँशितं चित्सन्त॒रासँशिंशाधि । व॒र्धयैनं महते सौभ॑गाय॒ विश्व॑ऽएन॒मनु॑ मदन्तु दे॒वाः ।।*
*भावार्थ :-*
जो राजसभा का उपदेशक है, वह इन राजादि को दुर्व्यसनों से पृथक् कर और सुशीलता को प्राप्त कराके बड़े ऐश्वर्य की वृद्धि के लिए प्रवृत्त करे ।
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नमस्ते जी
वेद - यजुर्वेद
अध्याय - सप्तविंशोऽध्यायः
मन्त्र - ०७
भाष्यकार :- महर्षि दयानन्द सरस्वती ।
*अ॒नाधृष्यो जा॒तवे॑दा॒ऽअनिष्टृतो वि॒राडग्ने क्षत्रभृद्दिदिहीह । विश्वा॒ऽआशाः प्रमुञ्चन्मानु॑षीर्भियः शिवेभिर॒द्य परिपाहि नो वृधे ।।*
*भावार्थ :-*
जो राजा वा राजपुरुष प्रजाओं को सन्तुष्ट कर मङ्गलरूप आचरण करने और विद्याओं से युक्त न्याय में प्रसन्न रहते हुए प्रजाओं की रक्षा करें, वे सब दिशाओं में प्रवृत्त कीर्त्तिवाले होवें ।
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नमस्ते जी
वेद - यजुर्वेद
अध्याय - सप्तविंशोऽध्यायः
मन्त्र - ०५
भाष्यकार :- महर्षि दयानन्द सरस्वती ।
*क्षत्रेणाग्ने॒ स्वायुः सँरभस्व मित्रेणाग्ने मि॒त्रधेये यतस्व । स॒जातानां मध्यम॒स्थाऽएधि राज्ञामग्ने विह॒व्यो दीदिहीह ।।*
*भावार्थ :-*
सभापति राजा सदा ब्रह्मचर्य से दीर्घायु सत्य धर्म में प्रीति रखनेवाले मन्त्रियों के साथ विचारकर्त्ता अन्य राजाओं के साथ अच्छी सन्धि रखने वाला, पक्षपात को छोड़ न्यायाधीश सब शुभ लक्षणों से युक्त हुआ दुष्ट व्यसनों से पृथक् होके धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को धीरज, शान्ति, अप्रमाद से धीरे-धीरे सिद्ध करे ।
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नमस्ते जी
वेद - यजुर्वेद
अध्याय - सप्तविंशोऽध्यायः
मन्त्र - ०४
भाष्यकार :- महर्षि दयानन्द सरस्वती ।
*इहैवाग्ने॒ ऽअधिधारया र॒यिं मा त्वा॒ निक्रन्पूर्वचितो निका॒रिणः । क्षत्रम॑ग्ने सुयम॑मस्तु तुभ्य॑मुपस॒त्ता व॑र्द्धतां तेऽ-अनिष्टृतः ।।*
*भावार्थ :-*
हे राजन् ! आप ऐसे उत्तम विनय को धारण कीजिए, जिससे प्राचीन वृद्ध जन आपको बड़ा माना करें। राज्य में अच्छे नियमों को प्रवृत्त कीजिए, जिससे आप और आपका राज्य विघ्न से रहित होकर सब ओर से बढ़े और प्रजाजन आपको सर्वोपरि माना करें ।
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नमस्ते जी
वेद - यजुर्वेद
अध्याय - सप्तविंशोऽध्यायः
मन्त्र - ०३
भाष्यकार :- महर्षि दयानन्द सरस्वती ।
*त्वाम॑ग्ने वृणते ब्राह्मणाऽइ॒मे शिवोऽअ॑ग्ने संवर॑णे भवा नः । सपत्नहा नोऽअभिमाति॒जिच्च स्वे गये जागृह्यप्र॑युच्छन् ।।*
*भावार्थ :-*
जैसे विद्वान् लोग ब्रह्म को स्वीकार करके आनन्द मङ्गल को प्राप्त होते और दोषों को निर्मूल नष्ट कर देते हैं, वैसे जिज्ञासु लोग ब्रह्मवेत्ता विद्वानों को प्राप्त होके आनन्द मङ्गल का आचरण करते हुए बुरे स्वभावों के मूल को नष्ट करें और असत्य और आलस्य को छोड़ के विद्या की उन्नति किया करें ।
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नमस्ते जी
वेद - यजुर्वेद
अध्याय - सप्तविंशोऽध्यायः
मन्त्र - ०२
भाष्यकार :- महर्षि दयानन्द सरस्वती ।
*स॑ चेध्यस्वा॑ग्ने॒ प्र च॑ बोधयैन॒मुच्च॑ तिष्ठ महते सौभगाय । मा च॑ रिषदुपसत्ता ते॑ अग्ने ब्रह्माण॑स्ते य॒शसः सन्तु माऽन्ये ।।*
*भावार्थ :-*
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो विद्वानों से भिन्न इतर जनों को उत्तम अधिकार में नहीं युक्त करते, सदा उन्नति के लिए प्रयत्न करते और अन्याय से किसी को नहीं मारते हैं, वे कीर्त्ति और ऐश्वर्य से युक्त हो जाते हैं ।
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