Amod Kumar Sharma
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09/01/2026
नए साल की शुरुआत महादेव के साथ
01 जनवरी की ठंडी सुबह थी। नया साल अपने साथ नई उम्मीदें और नई खुशियाँ लेकर आया था। हम और हमारी एक प्रिय दोस्त ने तय किया कि इस साल की शुरुआत किसी पार्टी या घूमने-फिरने से नहीं, बल्कि महादेव के दर्शन से करेंगे।
सुबह-सुबह हम महादेव के प्राचीन मंदिर पहुँचे। मंदिर की घंटियों की मधुर ध्वनि और धूप-दीप की खुशबू से पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया था। ऐसा लग रहा था मानो स्वयं भोलेनाथ हमें अपने पास बुला रहे हों।
हमने शिवलिंग पर जल, बेलपत्र और दूध अर्पित किया। “ॐ नमः शिवाय” के जाप के साथ मन पूरी तरह शांत हो गया। पूजा के बाद हम दोनों ने मंदिर की परिक्रमा की। हर परिक्रमा के साथ ऐसा महसूस हो रहा था कि मन का बोझ हल्का हो रहा है और जीवन में नई ऊर्जा भर रही है।
परिक्रमा करते समय हमारी दोस्त ने कहा,
“अगर साल की शुरुआत महादेव के चरणों में हो, तो पूरा साल अच्छा ही जाता है।”
उसकी बात सुनकर हम मुस्कुरा उठे।
पूजा के बाद हम मंदिर की सीढ़ियों पर कुछ देर बैठ गए। ठंडी हवा, उगता सूरज और मंदिर का शांत वातावरण—सब मिलकर उस पल को बहुत खास बना रहे थे। हमने एक-दूसरे से वादा किया कि चाहे जीवन में कितनी भी परेशानियाँ आएँ, हम हमेशा सच्चाई, मित्रता और विश्वास के रास्ते पर चलेंगे—जैसे महादेव सिखाते हैं।
मंदिर से निकलते समय मन में एक अजीब-सी शांति थी। ऐसा लग रहा था कि महादेव ने हमारे नए साल को आशीर्वाद दे दिया हो।
उस दिन हमें समझ आया कि सच्ची खुशी मंदिरों में बिताए गए उन पलों में होती है, जहाँ मन, मित्रता और भगवान—तीनों एक साथ होते हैं।
09/01/2026
तुलसी पौधा हिन्दू धर्म, आयुर्वेद और भारतीय संस्कृति में अत्यंत पवित्र और उपयोगी माना जाता है। इसे विष्णु प्रिया कहा जाता है और लगभग हर हिन्दू घर में इसकी पूजा की जाती है। तुलसी केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, पर्यावरण और आध्यात्मिक शुद्धता का भी स्रोत है।
तुलसी पौधा वातावरण की हवा को शुद्ध करता है और नकारात्मक ऊर्जा को दूर करता है। आयुर्वेद में तुलसी को अनेक रोगों की औषधि माना गया है। सर्दी-खाँसी, बुखार, दमा, तनाव और प्रतिरक्षा शक्ति बढ़ाने में तुलसी अत्यंत लाभकारी है। इसके पत्तों में मौजूद औषधीय गुण शरीर को रोगों से लड़ने की शक्ति देते हैं।
धार्मिक मान्यता के अनुसार तुलसी पूजन से घर में सुख-शांति और सकारात्मकता बनी रहती है। प्रातः और सायं तुलसी के सामने दीपक जलाना और जल अर्पित करना शुभ माना जाता है। तुलसी विवाह और तुलसी जयंती जैसे पर्व हमारी सनातन परंपरा की सुंदर पहचान हैं।
आज के समय में तुलसी पौधा लगाना केवल आस्था ही नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का भी एक महत्वपूर्ण कदम है। आइए, हम हर घर में तुलसी लगाएँ, उसकी सेवा करें और आने वाली पीढ़ियों को इसके महत्व से परिचित
तुलसी जयंती मनाना है
सभी हिन्दू भाइयों और बहनों से यह एक विनम्र, भावनात्मक और जागरूकता भरा अनुरोध है कि हम अपनी सनातन संस्कृति, परंपराओं और मूल्यों को समझें और उन्हें सम्मान दें। आज के समय में हम देखते हैं कि विदेशी पर्वों और संस्कृतियों का प्रभाव हमारे समाज पर तेज़ी से बढ़ रहा है। इसी क्रम में 25 दिसंबर को बड़े स्तर पर क्रिसमस डे मनाया जाता है, जबकि बहुत से लोगों को यह ज्ञात भी नहीं है कि इसी दिन हमारी सनातन परंपरा में तुलसी जयंती का अत्यंत पावन पर्व भी आता है।
तुलसी माता केवल एक पौधा नहीं हैं। वे हिन्दू धर्म में देवी स्वरूप मानी जाती हैं। पुराणों में तुलसी को विष्णु प्रिय कहा गया है और बिना तुलसी के भगवान विष्णु का भोग भी अधूरा माना जाता है। तुलसी हमारे जीवन में आध्यात्मिक, धार्मिक, पर्यावरणीय और आयुर्वेदिक – हर दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। हमारे पूर्वजों ने हर घर के आँगन में तुलसी का स्थान इसलिए सुनिश्चित किया, ताकि परिवार सदैव शुद्ध विचार, स्वास्थ्य और सकारात्मक ऊर्जा से जुड़ा रहे।
तुलसी माता वायु को शुद्ध करती हैं, रोगों से रक्षा करती हैं और मानसिक शांति प्रदान करती हैं। आयुर्वेद में तुलसी को अमृत समान माना गया है। आज जब पूरा विश्व पर्यावरण संकट और बीमारियों से जूझ रहा है, तब तुलसी का महत्व और भी बढ़ जाता है। इसके बावजूद दुख की बात यह है कि हम अपनी ही संस्कृति के पर्वों को भूलते जा रहे हैं और बाहरी त्योहारों को अपनाते जा रहे हैं।
यह आग्रह किसी धर्म या समुदाय के विरोध में नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने विश्वास और पर्व मनाने की स्वतंत्रता है। परंतु एक हिन्दू होने के नाते यह हमारा नैतिक और सांस्कृतिक दायित्व है कि हम पहले अपनी परंपराओं को जानें, समझें और उन्हें आगे बढ़ाएँ। यदि हम स्वयं अपनी पहचान को महत्व नहीं देंगे, तो आने वाली पीढ़ियाँ उसे कैसे जान पाएँगी?
आइए, हम संकल्प लें कि 25 दिसंबर को क्रिसमस डे के स्थान पर तुलसी जयंती को श्रद्धा, भक्ति और जागरूकता के साथ मनाएँ। घर-घर तुलसी पूजन करें, बच्चों को तुलसी माता की कथा सुनाएँ, तुलसी का पौधा लगाएँ और समाज में इसके महत्व का प्रचार करें। सोशल मीडिया, परिवार और मित्रों के माध्यम से इस संदेश को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाएँ।
तुलसी जयंती मनाना केवल एक पर्व नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़ने का अवसर है। यह हमारी संस्कृति, पर्यावरण और स्वास्थ्य की रक्षा का प्रतीक है। जब हम अपनी परंपराओं पर गर्व करेंगे, तभी हमारा समाज सशक्त और संस्कारित बनेगा।
तुलसी जयंती मनाएँ – सनातन संस्कृति बचाएँ, पहचान बनाएँ।
19/12/2025
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