Kumar Ravindra Sahil
यह पेज जीवन, समाज और आत्मचिंतन पर आधारित हिंदी कविताओं का संग्रह है। उद्देश्य शब्दों के ज़रिए सोच को
बुरा इंसान होता है कोई मज़हब नहीं होता
18/01/2026
मेरी तामीर की हुई एक नई, ताज़ा तरीन ग़ज़ल ✍️
ये अल्फ़ाज़ सिर्फ़ शायरी नहीं,
बल्कि उस समाज से सवाल हैं
जो इंसानियत को धर्म, जाति और दिखावे में बाँट देता है।
जो सच सुन नहीं पाते,
जो आईना देख कर भी मुँह फेर लेते हैं,
ये ग़ज़ल उन्हीं के नाम है।
अगर अल्फ़ाज़ चुभें,
तो समझ लेना निशाने पर सही जगह लगी है।
— कुमार रविन्द्र “साहिल”
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