Unknown Realm
यहां निर्णय दिया जाता है, मत नहीं पूछा जाता!
31/01/2026
*पुरश्चरण में स्नानादि विधि - निषेध*
पुरश्चरण से तीन दिन पहले प्रयोजन होने पर क्षौरकार्य करना चाहिये । ब्रह्मचारी, जटी, साधु, पञ्चकेशी, वानप्रस्थी आदि के लिये तथा स्त्री के लिये क्षौरादि का प्रयोजन नहीं है ।
पञ्चगव्य अथवा केवल आमलकी रस- युक्त पवित्रीकृत जल से, स्नानमन्त्र अथवा सङ्कल्प वाक्य से मन्त्र को मन्त्रपूत करके स्नान करना चाहिये । समर्थ होने पर त्रिसन्ध्या में, अभाव होने पर दो सन्ध्या में, उसके अभाव में एक बार ही नित्य स्नान करना चाहिये । उससे भी असमर्थ हो जाने पर मान्त्रिक स्नान तथा मार्जनादि द्वारा देहशुद्धि करनी चाहिये। स्नानान्त में आचमन, तर्पण तथा देव पूजनादि सम्पन्न करना चाहिये । अपवित्र हाथ से, नग्न अथवा अनावृत्त देह से जप - पुरश्चरण नहीं करना चाहिये । इससे सब कर्म विफल होता है ।
जाते समय, शयनकाल में, भोजनकाल में, व्याकुल चित्त से, क्रुद्ध, भ्रान्त तथा क्षुधार्थ होकर, पथ में, अमङ्गल स्थान में, अन्धकार-भरे गृह में, जूता-मोजा द्वारा पैर आवृत की स्थिति में, यज्ञकाष्ठ, पाषाण तथा मृत्तिका में बैठकर, उत्कट आसन अथवा पदद्वय प्रसारित करके जप नहीं करना चाहिये । जपकाल में बिड़ाल, कुक्कुट, बक, कुक्कुर, नीचात्मा, शूद्रादि व्यक्ति, वानर एवं गर्दभ का दर्शन होने पर प्रत्येक बार आचमन कर लेना चाहिये । तथापि निर्दिष्ट जप-पुरश्चरण काल के अतिरिक्त मानस - जपकाल में यह सब नियम पालन करना आवश्यक नहीं है । शुचि - अशुचि, गमन - उपवेशन, शयन- स्वप्न आदि सभी स्थिति में ज्ञानी व्यक्ति को निर्विकार होकर मानस जप करते रहना चाहिये; इसमें दोष नहीं होता ।
जप के समय शब्दोच्चारण नहीं करना चाहिये । यदि असावधानी से शब्दोच्चारण हो जाता है, तब प्रणव-जप कर पुनः जप में प्रवृत्त हो जाना चाहिये । यदि म्लेच्छों का शब्द सुनाई पड़ जाय तब प्राणायाम करके पुनः जप प्रारम्भ कर देना चाहिये । जपकाल में हिचकी आने अथवा अस्पृश्य वस्तु का स्पर्श होने पर आचमनादि करना चाहिये। अन्त्यज तथा पतित के आगमन पर, असत् आलाप-श्रवण करके अथवा अधोवायु निःसृत होने पर जप छोड़कर पुनः आचमन, अङ्गन्यास आदि करके सूर्य-अग्नि, दीप, ब्राह्मण, देवता अथवा इष्टगुरु की प्रतिमूर्ति में से किसी को देखकर पुनः जपारम्भ करना चाहिये ।
यदि मल-मूत्रादि का वेग अनुभूत होने पर जप किया जा रहा हो । तब सब कुछ अपवित्र हो जाता है । मलिन तथा दुर्गन्धयुक्त वस्त्र परिधान धारण करके अथवा केश- मुख अपवित्र रहते अथवा इनके दुर्गन्धमय रहते देवता क्रुद्ध हो जाते हैं । जपकाल में जंभाई, आलस्य, निद्रा, तन्द्रा, हिचकी, थूकना, भय, निम्नाङ्ग-स्पर्श जपकारी को नष्ट कर देता है।
मन्त्रसिद्धि में सहायक द्वादश विधि - (१) भू-शय्या, (२) ब्रह्मचर्य, (३) मौन, (४) गुरु- - आचार्य की सेवा, (५) यथाविधि नित्य स्नान, (६) नित्य पूजा, (७) दान-त्याग, (८) गुरु - इष्ट की स्तुति, (९) नैमित्तिक पूजा, (१०) इष्ट-गुरु में विश्वास, (११) जपयज्ञ में निष्ठा, (१२) क्षुधा, हिचकी, आलस्य आदि क्षुद्रकर्म का परित्याग । ये मन्त्रसिद्धि में सहायक विधान शिव द्वारा कहे गये हैं ।
पुरश्चरण-काल में पवित्र वस्त्र पहन कर कुश - कम्बलादि की शय्या पर निद्रा करनी चाहिये । प्रातः वस्त्र को धोकर शय्या को यथास्थान परिशुद्ध कर लेना चाहिये । एक वस्त्र पहनकर अथवा दो से अधिक वस्त्र पहन कर अथवा नग्न होकर, सङ्गी-साथियों से आवृत होकर, बातें करते हुये जप नहीं करना चाहिये ।
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💐जय माँ भगवती ललिताम्बिका 💐
संकलन : पं.हिरेनभाई त्रिवेदी, Unknown_Realm
श्रीवैदिकब्राह्मणः🚩गुजरात
परमधर्मसंसद १००८
30/01/2026
यज्ञोपवीत संस्कार का समय-
यज्ञोपवीत संस्कार का सामान्य काल :
ब्राह्मण-बालकका गर्भसे आठवें वर्ष में, क्षत्रिय - बालकका गर्भसे ग्यारहवें वर्ष में और वैश्य - बालकका गर्भसे बारहवें वर्ष में 'उपवीत' (यज्ञोपवीत ) संस्कार कराना चाहिये।
यज्ञोपवीत संस्कार का विशेष काल :
अधिक ज्ञानादिप्राप्ति के लिये प्रतिवर्णके यज्ञोपवीतका समय वेदाध्ययन और ज्ञानाधिक्य-प्राप्ति आदि तेजके लिये ब्राह्मण-बालकका गर्भसे पाँचवें वर्ष में; हाथी, घोड़ा और पराक्रम आदि प्राप्तिके लिये क्षत्रिय-बालकका गर्भसे छठे वर्ष में और अधिक धन तथा खेती आदिकी प्राप्ति के लिये वैश्य- बालकका गर्भसे आठवें वर्ष में 'यज्ञोपवीत' संस्कार कराना चाहिये।
यज्ञोपवीत संस्कारका अन्तिमकाल :
सोलह वर्षतक ब्राह्मणकी, बाईस वर्षतक क्षत्रियकी और चौबीस वर्षतक वैश्य की सावित्रीका उल्लङ्घन नहीं होता । अतः उक्त अवस्था होने के पहले ही तीनों वर्णोंका यज्ञोपवीत संस्कार हो जाना चाहिये)।
यज्ञोपवीत संस्कार समय उल्लंघन पर लगता है व्रात्य दोष :
इसके बाद यथासमय (ब्राह्मण १६, क्षत्रिय २२ और वैश्य २४ वर्ष तक ) उपवीत ( यज्ञोपवीत) संस्कारसे रहित ये तीनों वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ) सावित्री से पतित (भ्रष्ट) तथा शिष्टोंसे निन्दित होकर "व्रात्य" कहलाते हैं।
व्रात्य के साथ व्यवहार - त्याग आवश्यक :
अपवित्र में कथित यज्ञोपवीत-समय बीत जानेपर प्रायश्चित्त- ग्रहण-पूर्वक यज्ञोपवीत धारण नहीं किये हुए इन व्रात्योंके साथ आपत्ति में -भी कभी वेदाध्ययन न करावे और व्रात्य दोषित ब्राह्मण के साथ कुलीन ब्राह्मण विवाहादि सम्बन्धको ब्राह्मण नहीं करे।
गर्भाष्टमेऽब्दे कुर्वीत ब्राह्मणस्योपनायनम्।
गर्भादेकादशे राज्ञो गर्भात्तु द्वादशे विशः॥
ब्रह्मवर्चसकामस्य कार्यं विप्रस्य पञ्चमे।
राज्ञो बलार्थिनः षष्ठे वैश्यस्येहार्थिनोऽष्टमे॥
आषोडशाद्ब्राह्मणस्य सावित्री नातिवर्तते।
आद्वाविंशात्क्षत्रबन्धोराचतुर्विंशतेर्विशः॥
अत ऊर्ध्वं त्रयोऽप्येते यथाकालमसंस्कृता:।
सावित्रीपतिता व्रात्या भवन्त्यार्यविगर्हिताः॥
नैतैरपूतैर्विधिवदापद्यपि हि कर्हिचित् ।
ब्राह्मान्यौनांश्च सम्बन्धानाचरेद् ब्राह्मणः सह॥
मनु० ३६ - ४०
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💐जय माँ भगवती गायत्री 💐
संकलन : पं.हिरेनभाई त्रिवेदी, Unknown_Realm
श्रीवैदिकब्राह्मणः🚩गुजरात
परमधर्मसंसद १००८
चैनल लिंक : https://whatsapp.com/channel/0029Va9y0ez545uoGlaYP02o
14/01/2026
आप क्या खा रहे है आपको पता तक है? आप जो फूड पैकेट खरीद रहे है उसके पीछे E के साथ कोड लिखे होते है उसको पढ़े और समझे आप मांसाहार को हाथ न लगाने वाले कहीं अंजाने में प्राणी के अंश का तो उपभोग नहीं कर रहे। फूड कम्पनियां या सरकार आपको नहीं बताएंगी।
(श्रीवैदिकब्राह्मणः🚩गुजरात द्वारा जनहित में जारी।)
ई कोड्स जिनमें नॉन-वेज कंटेंट होता है:
· E120 कार्माइन कीड़ों से प्राप्त एक लाल रंग है।
· E441 जानवरों की हड्डियों और खाल से बनने वाला जिलेटिन(खासकर गौ मारकर) है।
· E542 जानवरों की हड्डियों से बनने वाला खाद्य-ग्रेड बोन फॉस्फेट है।
· E901 मधुमक्खियों द्वारा बनाया गया मोम है।
· E904 लैक कीटों के स्राव से बनने वाला शेलैक है।
· E913 भेड़ की ऊन के तेल से प्राप्त लैनोलिन है।
· E966 दूध के शर्करा से बनने वाला लैक्टिटोल है।
· E1105 अंडे की सफेदी या कुछ जीवों से प्राप्त लाइसोजाइम एंजाइम है।
संदिग्ध कोड्स (पौधे या जानवर दोनों से बन सकते हैं):
· E471 वसा अम्लों से बने एमल्सिफायर हैं जो पौधों या जानवरों से आ सकते हैं।
· E472e एसिटाइलेटेड मोनो- और डाइग्लिसराइड्स हैं जिनके स्रोत पौधे या जानवर हो सकते हैं।
· E473 चीनी और वसा अम्लों से बने एस्टर हैं जिनके स्रोत पौधे या जानवर हो सकते हैं।
· E474 चीनी, ग्लिसरॉल और वसा अम्लों के मिश्रण से बने सुक्रोग्लिसराइड्स हैं।
· E475 पॉलीग्लिसरॉल और वसा अम्लों से संश्लेषित एस्टर हैं।
· E476 अरंडी के तेल और वसा अम्लों से बने पॉलीग्लिसरॉल पॉलीरिसिनोलेएट हैं।
· E481 स्टीयरिक एसिड से बना एक एमल्सिफायर है जो पौधों या जानवरों से आ सकता है।
· E482 कैल्शियम स्टीयरॉयल लैक्टिलेट है जिसका स्रोत पौधे या जानवर हो सकता है।
· E483 स्टीयरिक एसिड से बना स्टीरिल टार्टरेट है।
· E491 सोर्बिटोल और स्टीयरिक एसिड से बना एक एमल्सिफायर है।
· E492 सोर्बिटोल और स्टीयरिक एसिड से बना ट्राइस्टीयरेट है।
· E493 सोर्बिटोल और लॉरिक एसिड से बना मोनोलौरेट है।
· E494 सोर्बिटोल और ओलिक एसिड से बना मोनोओलेट है।
· E495 सोर्बिटोल और पैल्मिटिक एसिड से बना मोनोपैल्मिटेट है।
· E570 प्राकृतिक वसा से प्राप्त स्टीयरिक एसिड है।
· E631 मांस या मछली से प्राप्त सोडियम इनोसिनेट है।
· E635 सोडियम गुआनिलेट और इनोसिनेट का मिश्रण है।
· E920 मानव बाल, पंख या सूअर की खाल से प्राप्त एल-सिस्टीन है।
तो अगली बार कोई भी फूड पैकेट ले तो कोड़ जानकर और जांच कर ले।
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श्रीमन्नारायण 💐
Unknown_Realm
श्रीवैदिकब्राह्मणः🚩गुजरात
13/01/2026
*परिष्कृत रुचि की आवश्यकता १*
- प्रातःस्मरणीय ब्रह्मलीन जगद्गुरु शङ्कराचार्य स्वामी श्रीस्वरूपानन्द सरस्वतीजी महाराज
आज का समाज नैतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से पतनोन्मुख होता जा रहा है। हम देखते हैं कि व्यक्ति, समाज और राष्ट्र कोई भी अपनी वर्तमान स्थिति से सन्तुष्ट नहीं है । उनको यह भी पता नहीं है कि वह वस्तुतः चाहता क्या है ?
जीवन के चरम लक्ष्य का अज्ञान और उसके साधनों के सम्बन्ध में भ्रान्ति ही उसकी दिशाशून्यता का कारक है। स्वाभाविक रूप में मनुष्य विविध उपायों से प्राप्त होने वाले सुखों से परिचित होकर उसकी प्राप्ति का अभिलाषी बन जाता है किन्तु वह स्वल्प से सन्तुष्ट नहीं होता है । सुख की प्राप्ति में आने वाले अन्तरायों को वह दूर करना चाहता है, सदा के लिए ।
वस्तुतः समस्त दुःखों की आत्यन्तिक निवृत्ति और परमानन्द की प्राप्ति प्राणिमात्र का अभिलषित है। पुरुष का परम प्रयोजन होने के कारण यही पुरुषार्थ कहलाता है। का संसार के सभी बुद्धिमान मनुष्य इसी उद्देश्य से विविध प्रकार के कर्म करते हैं । किन्तु यह देखा जाता है कि जिस सुख को वो चाहते हैं वह तो दूर ही रहता है और जो दुःख सर्वथा अनपेक्षित है वह सदा सम्मुख उपस्थित रहता है किसी भी उद्देश्य की सिद्धि के लिए लक्ष्य निर्धारण ही पर्याप्त नहीं होता उपाय भी सही होना आवश्यक हुआ करता है, क्योंकि सदुपाय से ही सदुद्देश्य की प्राप्ति हो सकती है असदुपाय से नहीं ।
अध्यात्म शास्त्रों के अनुशीलन और अनुभव से हमारे देश के मनीषियों ने यह निश्चय किया है कि परमात्मा को छोड़कर सुख और कहीं नहीं है। जो सुख का अन्यत्र अन्वेषण करते हैं वे मानों काई से आच्छन्न जल को छोड़कर मृगतृष्णा की ओर दौड़ रहे हैं। आनन्द परमात्मा का स्वरूप ही है, वह सर्वव्यापक होने के कारण समस्त प्राणियों की हृदय गुहा में विद्यमान है । इस प्रकार देखा जाय तो हम जिस सुख का अन्वेषण करते हैं, वह हमसे दूर नहीं फिर भी अभिव्यक्ति के अभाव में अनुपलब्ध सा हो गया है । यद्यपि परमात्मा समस्त प्राणियों के परम प्रेमास्पद स्वप्रकाश आत्मा से अभिन्न होने के कारण एकरस है तथापि अभिव्यक्ति के माध्यम और तारतम्य से ही उसमें उत्कृष्टता निकृष्टता और तारतम्य की प्रतीति होती है । माध्यम (उपाधि) के ही आधार पर उसमें हेयता उपादेयता आती है।
आनन्द की अभिव्यक्ति का माध्यम निर्मल निश्चल अन्तःकरण होता है । जिस प्रकार चञ्चल और मलिन सरोवर में दिखलाई पड़ने वाला चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब चञ्चल और मलिन प्रतीत होता है तथा स्वच्छ सुस्थिर सरोवर में स्वच्छ सुस्थिर । जितनी जितनी सरोवर में स्वच्छता तथा सुस्थिरता बढ़ती जाती है उतनी प्रतिबिम्ब में स्पष्टता और निश्चलता प्रतीत होती है । उसी प्रकार अन्तःकरण जितना निर्मल एवं निश्चल होता जाता है उतनी ही आनन्द की अभिव्यक्ति में स्पष्टता आती है । अभिव्यक्ति के माध्यम के भेद से आनन्द के भी तीन भेद किये गये हैं विषयानन्द, भगवदानन्द और ब्रह्मानन्द। यह नियम है कि प्राणी के प्राकृत पुण्य-पाप कर्मों के अनुसार ही उन विषयों की प्राप्ति होती है जो सुख-दुःख के निमित्त बनते हैं। किन जब प्राणी के मन में संस्कारवश किसी कामना का उदय होता है तब वह काँटे के समान-चुभती हुई उसको उस विषय की प्राप्ति के प्रयत्न में लगाती है तथा क्रमशः प्रबल और घनीभूत होकर अन्य कामनाओं को अभिभूत कर देती है। मन की ऐसी दशा में पूर्व-पुण्यों के फलस्वरूप जब कामित-विषय की प्राप्ति होती है तब उसके साथ इन्द्रिय का संयोग होने पर हर्ष और तद्विषयक कामना
की निवृत्ति से अन्तःकरण में क्षणिक स्वच्छता और स्थिरता आती है। उस अवस्था में पड़ने वाला परमानन्दस्वरूप परमात्मा का प्रतिबिम्ब ही विषयानन्द है । किन्तु कामनानिवृत्ति और हर्ष के सात्विकता की क्षणिकता, अनुकूल विषयों की प्राप्ति एवं इन्द्रियों की परतन्त्रता तथा बाह्य विषयों में सुख-बुद्धि की पोषकता के कारण यह आनन्द क्षणिक, दुःखजनक और हेय होता है।
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श्रीमन्नारायण
संकलित : श्रीवैदिकब्राह्मणः🚩गुजरात
31/10/2025
*तंत्र में वर्णित लोकाचार*
- संन्यासियों द्वारा स्वस्थ चित्त से अहंकाररहित होकर मानस ज्ञानपूर्वक जो कर्म किया जाता है, वही शुद्ध आचार होता है।
- उसी प्रकार के आचार यदि भक्तिपूर्वक गृहस्थ, दरिद्र, रोगी, पथिक या कैदी करते है, तो उसे मिश्र आचार कहा जाता है।
- बाह्य पूजा का अधिकार होने के कारण, शीत आदि के भय से, धनहीनता के कारण, अन्य कार्य के कारण, स्त्रीनियोग के फलस्वरूप गृहियों द्वारा किया जाने वाला मानसिक आचार गलित कहा जाता है।
- जो जो बाह्य पूजा एकान्त में नियमानुसार भक्तिपूर्वक गृहस्थ द्वारा की जाती है, वह शुद्ध राजस आचार कहलाता हैं।
- श्रद्धा-भक्तिपूर्वक लोकभय से अथवा देवभय से जो पूजा बोलकर की जाती है, वह आयास-मिश्रित कहलाता है।
- लोककल्याण हेतु देवता के नाम पर जो द्रव्य एकत्रित करते हैं, उस आचार को राजस गलित कहा जाता है।
- वाममार्ग का आश्रयण करके एवं कौल धर्म का विचार करके अन्य धर्म से द्वेषरहित होकर जो आचार किया जाता है, वह शुद्ध तामस आचार कहलाता है ।
- वाममार्ग का आश्रयण करके कामना-सहित जो ऐहिक और पारलौकिक आचार किया जाता है, वह तामस मिश्रित आचार कहलाता है ।
- जिह्वासुख के लिये जो पान अथवा भक्षण किया जाता है अथवा कामना के वशीभूत होकर मैथुन किया जाता है, अथवा जो मारण कर्म किया जाता है, वह तामसिक गलित आचार होता है।
यह श्रीमेरुतंत्र का उद्घोष है :
- सात्त्विक शुद्ध आचार के पालन से मोक्ष की प्राप्ति होती है एवं सात्त्विक मिश्र आचार के पालन से स्वर्ग की प्राप्ति होती है।
- गलित सत्त्व आचार से लौकिक सुख एवं मनुष्यत्व की प्राप्ति होती है।
- शुद्ध राजस आचार से स्वर्ग मिलता है एवं मिश्र राजस आचार से काम की प्राप्ति होती है।
- गलित राजस आचार से तिर्यक् योनि में भी सुख प्राप्त होता है।
- सात्त्विक तामस आचार से मनुष्य देवयोनि प्राप्त करता है।
- मिश्र तामस आचार से दुखी होता है एवं गलित तामस आचार से नरक प्राप्त करता है।
कर्म(देव मंदीर के आचार):
१. मंदिर में प्रसर्पण अर्थात् प्रवेश करना
२. उपादान अर्थात् सामग्री प्रदान करना
३. इज्याध्याय अर्थात् यज्ञ
कराना
४. दीप जलाना एवं
५. सम्मार्जन-लेपन करना देवमंदिर के ये पाँच संस्कार होते हैं।
*आचार फ़ल*
भक्त का देवता के प्रति आर्जव सर्पण अर्थात् उदारतापूर्वक गमन आरोग्यकारक होता है। पूजा की सामग्री द्वारा सेवा से भक्त का देवता से मिलन होता है। देवता से प्रीति करने से भक्त को देवता का रूप प्राप्त होता है। पीठपूर्वक एवं अङ्गपूर्वक सोलह उपचारों से मूर्ति अथवा यन्त्र की पूजारूप इज्या इष्टकारिका होती है। उसके शास्त्र का.सम्यक् अध्ययन करने से मन्त्रों के अर्थ का सम्यक् ज्ञान होता है । मन्त्र के जप से देवता का सायुज्य प्राप्त होता है।
अंततः : गुरु, देवता, आत्मा और काल में सम्यक् ऐक्य की भावना करने से लिङ्गशरीर से संयोग होता है, जिससे काल का प्रभाव नहीं पड़ता।
गुरुदेवात्मकालानां सम्यगैक्यविभावनम् ॥२५/२
संयोगो लिङ्गदेहस्य नाशक: कालयागकृत्।२६/१
इतिश्रीमेरुतन्त्रेपंचमपटले।
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💐 जय माँ भगवती देवी त्रिपुराम्बिका 💐
संकलन : पं.हिरेनभाई त्रिवेदी(Unknown_Realm)
श्रीवैदिकब्राह्मणः🚩गुजरात
मनोनिग्रह क्यों?
कारण मनोनिग्रही एक स्त्री अनावृत या कोई भी स्त्री को जीवनभर अनावृत देखे न देखे कोई अंतर नहीं पड़ता। कारण की उसमें वासना का निग्रह हो चुका है।किन्तु अनियन्त्रित मन तो वासना की पराकाष्ठा का चरम है कि यदि पुरुष संसार की तमाम स्त्रियों को भी अनावृत देख ले। फ़िर भी उसका मन नहीं भरता।
अतः ोविन्दम्
12/10/2025
💐हरिहर💐
12/10/2025
*शरीरस्थ नाडी एवं षट्चक्र*
यह पञ्चभूतनिर्मित शरीर ही विश्व कहा जाता है। चन्द्र सूर्य अग्नि रूप तेज से समन्वित यह जीवरूपी ब्रह्म वाला है। इस शरीर में साढ़े तीन करोड़ नाड़ियाँ स्थित मानी गयी हैं। उनमें दश मुख्य हैं । उन दश में भी तीन सर्वप्रमुख हैं। इनमें सर्वप्रधान नाडी मेरुदण्ड में स्थित है । ये तीनों नाड़ियाँ चन्द्र सूर्य और अग्नि रूप हैं । वह अर्थात् ल सुषुम्ना नाड़ी शक्तिरूपा है । जो साक्षात् अमृतरूपा है वह इडा नाडी मेरुदण्ड के बायें भाग में स्थित है । यहननाडी शुक्ल वर्ण की तथा चन्द्ररूपिणीनहै । पिङ्गला नाडी जो कि मेरुदण्ड के दायें पार्श्व में स्थित है, पुरुषरूपा तथा सूर्यविग्रहा है । यह अनार के फूल के रंग की है। दूसरी अर्थात् पिङ्गला नाडी साक्षात् विष कही गयी है । जो मेरु के अन्दर स्थित है तथा मूलाधार से ब्रह्मरन्ध्र तक जाती है; सर्वतेजोमयी वह सुषुम्ना है जो कि अग्निरूपिणी है । उस सुषुम्नाके मध्य में एक विचित्रा नाम की नाडी है । यह अमृतस्राव करने वाली शुभ नाडी सर्वदेवमयी और योगियों की अत्यन्त प्रिय है । यह विसर्ग से लेकर बिन्दु पर्यन्त व्याप्त होकर विराजमान है।
कुंडलिनी अभिसार क्रम से गुणवृद्धिशून्य अचल पति के पास जाकर प्रकाशित होती है तथा कौलमार्ग के द्वारा गुणयुक्त होती हुई आनन्द का विस्तार करती है; जो सोये हुए सर्प के बच्चे के समान कुटिल होकर मेरुदण्ड के मूल में स्थित हुई मुरजित् अर्थात् विष्णु आदि सैकड़ों प्रमुख पुत्रों की सृष्टि करती है, वह आपकी रक्षा करें । कुण्डलिनी नामक चित्शक्ति प्रत्येक प्राणी के शरीर मेंनवर्त्तमान रहती है । वह मेरुदण्ड के नीचे साढ़े तीन गोलाई में स्थित रहती है । साधना के द्वारा यह ऊपर चलती है और अनेक चक्रों का भेदन करती हुई शिर में स्थित सहस्रदल कमल में पहुँचती है । वहाँ वह परम शिव, जो कि उसके पति के रूप में शास्त्रों में वर्णित है, से मिलकर तन्मय हो जाती है । यह कुण्डलिनी विश्वशक्तिमयी है जो ब्रह्मा विष्णु रुद्र तथा शिव के साथ समस्त संसार की सृष्टि करती हुई उसका पालन और संहार भी करती है।
भर्तारं गुणवृद्धिशून्यमचलं गत्वाभिसारक्रमाद्
दीव्यन्ती कुलवर्त्मनैव गुणवत्यानन्दमातन्वती।
शेते सुप्तभुजङ्गपोतकुटिला या मेरुमूलं गता
सूते शतानि तानि मुरजिन्मुख्यानि पायादसौ॥
- इतिश्रीमेरुतन्त्रे
लहसुन प्याज़ आदि इतने निंदित है कि बलिदान किए पशु को मंत्रो से संस्कृत किया जाता है और बलिदान के बाद वाममार्गी उस मांस प्रसाद में भी लहसुन प्याज नहीं डालते।
(यहां पर तात्पर्य बलि का न होकर प्याज लहसुन का है।)
31/08/2025
30/08/2025
भगवान शिव कि "चतुःषष्टिकला। - षडाम्नाय तन्त्र १.९४"
शैवतन्त्र के अनुसार चौंसठ कलायें हैं - १. गीत, २. वाद्य, ३. नृत्य, ४. नाट्य, ५. आलेख्य, ६. विशेष कच्छेद्य, ७. तण्डुलकुसुमबलि विकार, ८. पुष्पास्तरण दशनवसनाङ्गराग, ९. मणिभूमिका कर्म, १०. मणिभूमिका कम्र्म्म, ११. शयनरचन, १२. उदकवाद्य, १३. उदकघात, १४. चित्रायोग, १५. माल्य ग्रथन विकल्प, १६. शेखरामीडयोजन, १७. नेपथ्ययोग, १८. कर्णपत्र भंग, १९. गन्धयुक्ति, २०. भूषणयोजन, २१. ऐन्द्रजाल, २२. कौचुमारयोग, २३. हस्तलाघव, २४. चित्रशाक पूयभक्ष्यविकारक्रिया, २५. पानकरसरागासव योजन, २६. सूचीवाप कर्म्म, २७. सूत्रक्रीडा, २८. प्रहेलिका, २९. प्रतिमाला, ३०. दुर्व्वचक योग, ३१. पुस्तकवाचन कला, ३२. नाटिकाख्यायिका दर्शन कला, ३३. काव्यसमस्या पूरणकला, ३४. पट्टिका वेत्रवाण विकल्प, ३५. तर्कुकर्म्मकला, ३६. तक्षणकला, ३७. वास्तुविद्या, ३८. रूप्यरत्नपरीक्षा, ३९. धातुवाद, ४०. मणिराग ज्ञान, ४१. आकर ज्ञान, ४२. वृक्षायुर्वेद योग, ४३. मेषकुक्कुटलावक युद्धविधि, ४४. शुकशारिका प्रलापन, ४५. उत्सादन, ४६. केशमार्जन कौशल, ४७. अक्षरमुष्टिका कथन, ४८. म्लेच्छितक विकल्प, ४९. देशभाषा ज्ञान, ५०. पुष्पशकटिका निमित्तज्ञान, ५१. यन्त्रमातृका, ५२. धारणमातृका, ५३. सम्पाद्यम्, ५४. मानसीकाव्य क्रिया, ५५. क्रियाविकल्पा, ५६. छलितक योग, ५७. अभिधानकोष छन्दोज्ञान, ५८. वस्त्रगोपन, ५९. द्यूतविशेष, ६०. आकर्षण क्रीडा, ६१. बालक क्रीडनक कला, ६२. वैनायिकी विद्याओं का ज्ञान, ६३. वैषयिकी विद्याओं का ज्ञान, ६४. वैतालिकी विद्याओं का ज्ञान।
नमःशिवाय।
संकलित : पं हिरेन भाई त्रिवेदी,Unknown_Realm
श्रीवैदिकब्राह्मणः🚩गुजरात
25/08/2025
जय जय श्रीगणेश (१)
गणेश
१. शिवधर्म के अनुसार- गणेश का सर्वप्रथम आविर्भाव माता पार्वती के यहाँ माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को हुआ है । शिवपुराण के अनुसार- भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष की चतुर्थी तिथि को चन्द्रमा का शुभोदय होने पर माता पार्वती के यहाँ गणेश का आविर्भाव हुआ।
२. गणेशजी अपने आराधकों के सभी संकटों तथा कष्टों को नष्ट कर देते हैं । अतः उनके प्रादुर्भाव की तिथि संकष्ट चतुर्थी कहलाती है। सभी कार्यों में सिद्धि प्राप्ति के लिये गणेशजी के साथ शिव, विष्णु, सूर्य तथा दुर्गा की पूजा करनी चाहिये ।
३. शास्त्रों के मतानुसार केवल एक देवता की मूर्ति पूजा का निषेध कहा गया है इसलिये जो प्राणी अपनी कामनाओं को पूर्ण करना चाहते हैं । उन्हें पंच देवताओं की पूजा करनी चाहिये ।
४. पंचायतन देवताओं में प्रत्येक देव के प्रति समान रूप से भक्ति हो तो कर्ता को सर्वप्रथम सूर्य की उपरान्त गणेश की फिर दुर्गा की उसके पश्चात् शंकर तथा विष्णु की पूजा करनी चाहिये । तथा अपना हित चाहने वाले प्राणी को अपने गृह में तीन गणेश प्रतिमाओं को कभी भी पूजित व स्थापित नहीं करना चाहये ।
५. मत्स्यपुराण के अनुसार गृह में कर्ता के अंगुष्ठ पर्व से लेकर वितस्तिपर्यन्त अर्थात् बारह अंगुल परिमाण तक के आकार वाली मूर्ति की स्थापना प्रशस्त कही गयी है ।
६. गणेशजी आदिदेवताओं का मन्दिर घर के ईशानकोण में ही होना चाहिये और उनकी स्थापना इस क्रम से करनी चाहिये कि उनके मुख पश्चिमदिशा की ओर रहें । कर्ता को ग्राम अथवा शहर के दक्षिण भाग की ओर उत्तरमुख गणेश की प्रतिष्ठा करनी चाहिये ।
७. यदि कर्ता के इष्टदेव गणेश हैं तो उनकी स्थापना मध्य में करके ईशानकोण में विष्णु, अग्निकोण में शिव, नैर्ऋत्यकोण में सूर्य, तथा वायुकोण में भगवती दुर्गा को स्थापित करना चाहिये ।
८. शास्त्रों के मतानुसार गणेशजी की एक परिक्रमा ही कही गयी है । किन्तु तीन परिक्रमा करने का भी शास्त्रों में प्रमाण मिलता है । गणेशपूजा में तुलसी का निषेध किया गया है। क्योंकि गणेश के द्वारा तुलसी शापित हुई थीं । गणेश के नैवेद्य में मोदक की विशेष महत्ता है ।
९. जो यज्ञोपवीतधारी द्विज हों वे वैदिक मन्त्रों से और पौराणिक मन्त्रों से गणपति की पूजा कर सकते हैं । किन्तु जिनके यज्ञोपवीत न हो वे केवल पौराणिक मन्त्रों के द्वारा इनका पूजन कर सकते हैं । गणेश की पूजा अधिकार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र को भी है ।
१०. गणेश की पूजा का मुख्य समय पूर्वाह्नकाल है,प्रातः मध्याह्न तथा सायंकाल तीनों कालों में इनकी पूजा अपना सुख चाहने वाले प्रत्येक प्राणी को करनी चाहिये ।गणेश पूजा में दूर्वाङ्कुर अत्यन्त महत्वपूर्ण है । जो मनुष्य इसके द्वारा इनकी पूजा करते हैं वे सबकुछ प्राप्त कर लेते हैं ।
११. जो पुष्प कीड़ों से दूषित हो, बासी हो, स्वयं पेड़ से नीचे गिर रहे हों ऐसे पुष्प गणपति पूजा के योग्य नहीं होते।
१२. गणेश मन्दिर में प्रधान मूर्ति से बायीं ओर गजकर्ण की तथा दाहिनी ओर सिद्धि की मूर्ति होनी चाहिये। उत्तर दिशा की ओर गौरी की पूर्व की ओर बुद्धि की, आग्नेयदिशा में बालचन्द्रमा की, दक्षिण दिशा में सरस्वती की, पश्चिम दिशा में कुबेर की तथा पीछे की ओर धूम्रक की मूर्ति विद्यमान होनी चाहिये।
१३. गणेशजी के देवालय में चारों द्वारों पर दो-दो द्वारपाल को स्थापित करना चाहिये । पूर्वी द्वार के द्वारपालों के नाम, अविघ्न तथा विघ्नराज हैं, दक्षिण द्वार वालों के सुवक्त्र तथा बलवान्, पश्चिम द्वार के गजकर्ण तथा गोकर्ण और उत्तर के सुसौम्य और सुभदायक हैं।
१४. द्वारपालों की ये सभी प्रतिमाएँ वामनाकृति तथा घोररूपी प्रशस्त की गयी है। सभी के चार हाथों में से एक हाथ में दण्ड तथा एक हाथ तर्जनी मुद्रा में हो । अविघ्न तथा विघ्नराज के शेष दो हाथों में परशु तथा पद्म होनी चाहिये । सुवक्त्र व बलवान् के खड्ग और खेटक, गजकर्ण व गोकर्ण के धनुष तथा बाण तथा सुसौम्य व शुभदायक के पद्म तथा अङ्कुश प्रशस्त कहे गये हैं।
- संकलित
हर हर गंगे। नमामि गंगे।
©️पं.हिरेनभाई त्रिवेदी, Unknown Realm
श्रीवैदिकब्राह्मणः।🚩गुजरात
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