Osho osho

Osho osho

only about osho You are asking me how to stop the mind, its constant questioning, its silly crowd of questions. That is where everybody takes the wrong step.

If you try to stop it, you will never be able to stop it. Ignore it! Be indifferent to it! Let it chatter! Be aloof, unconcerned -- as if it does matter whether it chatters or not, whether there are questions or not! Only this aloofness, this ignoring -- Buddha has given it the right name, upeksha, the indifference -- slowly, slowly makes the miracle happen.
Beyond Enlightenment

[04/17/18]   "Life is not given to you to murder, to destroy. Life has been given to you to create, and to rejoice, and to celebrate"

[08/10/17]   Osho ❤
don't be angry at life. It is not life that is frustrating you, it is you who are not listening to life. And this I call a criterion, a touchstone: if you see a saint who is against life, bitter against life, know well he has not understood yet. Otherwise he will bow down to life in deep respect and reverence, because life has awakened him out of his dreams. Life is very shocking, that's why. Life is painful. The pain comes because you are desiring something which is not possible. It doesn't come from life, it comes from your expectation.

Book : The Art of Dying
Chapter 7

[05/20/17]   "Remember, it is your vibration that needs transformation. The world is already always vibrating in ecstasy; only you are not tuned. The problem is not with the world, it is with you: you are not tuned to it. The world is dancing, always celebrating, every moment it is in a festivity. The festival goes on from eternity to eternity, only you are not tuned to it. You have fallen apart from it, and you are very serious, very knowing, very mature. You are closed. Throw this enclosure! Move again into the current of life.

When the storm comes, the trees will be dancing, you also dance. When the night comes and everything is dark, you also be dark. And in the morning when the sun rises, let it rise in you also.

Be childlike and enjoying, not thinking of the past. A child never thinks of the past. Really, he has no past to think about. A child is not worried about the future; he has no time consciousness. He lives totally unworried. He moves in the moment; he never carries any hangover." ~ #Osho

[03/22/17]   What is Life?

It is a sacred fire ritual, but only for those who offer themselves for the sake of truth.
What is life?
A precious opportunity, but only for those who can muster up courage, determination and effort.
What is life?
A challenging blessing, but only for those who accept it and face it.
What is life?
A great struggle, but only for those who gather all their power and fight for victory.
What is life?
A grand awakening, but only for those who fight against their sleep and unconsciousness.
What is life?
A divine song, but only for those who have made themselves an instrument of the divine.
Otherwise, life is nothing buys protracted and slow death.
Life becomes what we make it.
Life is not given, it has to be won.
Life is a constant creation of the self by the self.
It is not destiny, it is creation.

If life is sleepy experience then we should understand that we have done something to make it go to sleep.
If life is an experience of pain then we should know that we have done something which has made it painful.
Life is as echo on oneself.
Life is one's own reflection.

Earthen lamps

[02/15/17]   THOUGHTS

Mind doesn´t exist as an entity – this is the first thing. Only thoughts exist.

The second thing: thoughts exist separate from you, they are not one with your nature, they come and go – you remain, you persist. You are like the sky: it never comes, it never goes, it is always there. Clouds come and go, they are momentary phenomena, they are not eternal. Even if you try to cling to a thought, you cannot retain it for long; it has to go, it has its own birth and death. Thoughts are not yours, they don´t belong to you. They come as visitors, guests, but they are not the host.

Watch deeply, then you will become the host and thoughts will be the guests. And as guests they are beautiful, but if you forget completely that you are the host and they become the hosts, then you are in a mess. This is what hell is. You are the master of the house, the house belongs to you, but the guests have become the masters. Receive them, take care of them, but don´t get identified with them; otherwise they will become the masters.

The mind becomes the problem because you have taken thoughts so deeply inside you that you have forgotten completely the distance; that they are visitors, they come and go. Always remember that which abides: that is your nature, your tao. Always be attentive to that which never comes and never goes, just like the sky. Change the gestalt: don´t be focused on the visitors, remain rooted in the host; the visitors will come and go.

Osho, Ta**ra: the Supreme Understanding , Talk #2

[09/17/16]   Life is a flux, nothing abides. Still we are such fools, we go on clinging. If change is the nature of life, then clinging is stupidity, because your clinging is not going to change the law of life. Your clinging is only going to make you miserable. Things are bound to change; whether you cling or not does not matter. If you cling you become miserable: you cling and they change, you feel frustrated. If you don`t cling they still change, but then there is no frustration because you were perfectly aware that they are bound to change. This is how things are, this is the suchness of life.

[08/01/16]   जब मैं कहता हूँ कि समस्या पर ध्यान दो तो मेरा यह अर्थ नहीं है कि उसके बारे में सोचो, मेरा यह अर्थ नहीं है कि उस पर मनन करो, उस पर चिंतन करो।

जब मैं कहता हूँ कि उस पर ध्यान दो तो मेरा अर्थ है उसे देखो, उसके साक्षी बनो। जो भी समस्या हो -- क्रोध, काम, ईर्ष्या, लोभ, अहंकार -- जो भी समस्या हो, सबकी औषधि एक ही है।

यदि तुम ईर्ष्या से परेशान हो, तो बस देखो कि यह तुममें कैसे उठती है, कैसे तुम्हें अपने पाश में ले लेती है, कैसे तुम पर आच्छादित हो जाती है, कैसे तुमसे वे चीजें करवा लेती है और उन रास्तों पर ले जाती है जहाँ तुम जाना ही नहीं चाहते थे! देखो कि किस प्रकार यह तुम्हें हताशा में ले जाती है, कैसे तुम्हारी ऊर्जा को नष्ट करती है, तुम्हारी ऊर्जा को इतना शिथिल कर देती है कि तुम नकारात्मकता और विषाद में डूब जाते हो। पूरी बात को देखो कि वह कैसे घटती है।

और याद रहे कि उसकी निंदा नहीं करनी है, क्योंकि तुमने निंदा की तो तुमने उसके बारे में सोचना शुरू कर दिया। नहीं, मैं निंदा करने को नहीं कहता।

बिना निंदा और बिना प्रशंसा के समस्या के तथ्य को देखो, पक्ष या विपक्ष में बिना कोई भी निर्णय लिए। दूर से निष्पक्ष होकर समस्या को ऐसे देखो जैसे उससे तुम्हारा कोई लेना-देना ही न हो।

साक्षी होने में वैज्ञानिकता लाओ। समस्या जो भी हो, वह स्वयं ही गिर जाएगी; तुम्हें उसे गिराने की जरूरत नहीं होगी।

परम प्यारे ओशो

[06/11/16]   मन नकारात्मक होता है, हृदय सकारात्मक होता है!

मन की भाषा की जड़ें 'नहीं' में होती हैं, क्योंकि मन 'नहीं' कहने का बहुत मजा लेता है। जितना तुम 'नहीं' कहते हो, उतना ही तुम सोचते हो कि तुम एक बहुत महान विचारक हो।

लेकिन मन ऐसा ही है! यह 'नहीं' में जीता है, यह बार-बार 'नहीं' कहने वाला है, इसका पोषण हर बात में 'नहीं' कहने से होता है। मौलिक रूप से मन नास्तिक है, नकारात्मक है; विधायक, सकारात्मक मन जैसी कोई चीज नहीं होती।

हृदय विधायक और सकारात्मक होता है। जैसे मन 'नहीं' कहता है, हृदय 'हाँ' कहता है। निश्चित ही, 'नहीं' कहने से अधिक शुभ 'हाँ' कहना है, क्योंकि 'नहीं' से जिंदगी नहीं चलती है।

जितना अधिक तुम 'नहीं' कहते हो, उतना ही तुम सिकुड़ते हो, बंद हो जाते हो। जितना अधिक तुम 'नहीं' कहते हो, उतना ही तुम कम जीते हो।

हो सकता है कि लोग सोचें कि तुम एक महान विचारक हो, लेकिन तुम सिकुड़ रहे हो और मर रहे हो; धीरे-धीरे तुम आत्महत्या कर रहे हो।

यदि तुम प्रेम को 'नहीं' कहते हो, तो तुम जितना पहले थे, उससे कम हो जाते हो। यदि तुम सौंदर्य को 'नहीं' कहते हो, तो तुम पहले से कम हो जाते हो। और यदि तुम हर चीज को 'नहीं' कहे चले जाते हो, तो तुम धीरे-धीरे विदा हो जाते हो। अंततः, तुम्हारे पास बहुत सूनी जिंदगी बची रह जाती है -- अर्थहीन, बिना महत्व के, बिना आनंद के, बिना नृत्य के, बिना उत्सव के!

प्यारे ओशो
"दि धम्मपदा: दि वे ऑफ दि बुद्धा" पुस्तक के एक प्रवचनांश का अनुवा

[06/01/16]   नाचो अहोभाव है नाच !परमात्मा की आरती हैं! नाच रहा है सृष्टि का कण कण परमाणु अपने आप वॄॄॄत में नॄत्य कर रहे ! एक-एक कण कण नृत्य कर रहा है! नॄत्य करना परमात्मा की प्रकृति के साथ अपने को आत्मसात करना हैं! वृक्ष झूम रहे हैं! नर्तन चल रहा है! वायु का कण-कण कंपन में है! मानो अनंत नॄत्य में लीन है! समुद्र की लहरें एक नर्तन है। ज्वार भाटा तांडव है! सुनामी वह भी नृत्य है ।महा तांडव नृत्य करना मानो खुले आसमान में रंगों कें चित्र बनाना है। हवा में चित्रों को उकेंरना है। ध्वनिं में भी कंपन है ।विद्युत आवृत्ति है कंपन की आवृत्ति जब पूरा संसार ही नाच रहा है। सब परमात्मा के केस महा नृत्य में शामिल हैं। फिर तू क्यों उदास है

[05/16/16]   लेट गो इस घटना की गहरी समझ है कि हम इस अस्तित्व के हिस्से हैं। अलग से अहंकार रखना हमारी सामर्थ्य नहीं है; हम सब के साथ एक हैं। और सब विशाल है, बहुत विशाल।

तुम्हारी समझ संपूर्ण के साथ प्रवाहित होने में मदद करेगी। पूर्ण से अलग तुम्हारा कोई लक्ष्य नहीं है, और पूर्ण का कोई लक्ष्य नहीं है। यह कहीं भी नहीं जा रहा है।

लेट गो की समझ, बिना किसी लक्ष्य के, बिना कुछ प्राप्ति के विचार के, बिना किसी द्वंद्व या संघर्ष के, यह जानते हुए कि स्वयं के साथ संघर्ष मूर्खतापूर्ण है, बस यहां होने मात्र में मदद करती है।

[04/24/16]   'सब तरफ से अस्तित्व एक सेलीब्रेशन है, एक उत्सव है। और परमात्मा हंस रहा है, रो नहीं रहा है। रोती शक्लें उसे भाती ही नहीं। उदासी का अस्तित्व से क्या लेना-देना? उदास होने का अर्थ ही यह है कि तुम अस्तित्व से कहीं टूट गए। कहीं परमात्मा के विपरीत पड़ गए।

जब तुम्हारे जीवन में उदासी छा जाए, तो जानना कि तुमने कोई कदम गलत लिया। जब तुम दुख से भर जाओ, तो जानना कि तुम कहीं भटके। दुख तो केवल सूचक है। दुख को तुम जीवन की विधि मत बना लेना। दुख को जीवन की शैली मत बना लेना। आत्मपीड़क मत बन जाना। क्योंकि आत्मपीड़क होना तो एक रोग है।'
सब तरफ से अस्तित्व एक सेलीब्रेशन है, एक उत्सव है। और परमात्मा हंस रहा है, रो नहीं रहा है। रोती शक्लें उसे भाती ही नहीं। उदासी का अस्तित्व से क्या लेना-देना? उदास होने का अर्थ ही यह है कि तुम अस्तित्व से कहीं टूट गए। कहीं परमात्मा के विपरीत पड़ गए।

जब तुम्हारे जीवन में उदासी छा जाए, तो जानना कि तुमने कोई कदम गलत लिया। जब तुम दुख से भर जाओ, तो जानना कि तुम कहीं भटके। दुख तो केवल सूचक है। दुख को तुम जीवन की विधि मत बना लेना। दुख को जीवन की शैली मत बना लेना। आत्मपीड़क मत बन जाना। क्योंकि आत्मपीड़क होना तो एक रोग है।


Prem Aabha

विचार की जो धाराएं हमारे चित्त पर दौड़ती हैं, कभी उनके मात्र निरीक्षक हो जाएं। जैसे कोई नदी के किनारे बैठा हो और नदी की भागती हुई धार को देखे; सिर्फ किनारे बैठा हो और देखे। या जैसे कोई जंगल में बैठा हो, पक्षियों की उड़ती हुई कतार को देखे; सिर्फ बैठा हो और देखे। या कोई वर्षा के आकाश को देखे और बादलों की दौड़ती हुई, भागती पंक्तियों को देखे। वैसे ही अपने मन के आकाश में विचार के दौड़ते हुए मेघों को, विचार के उड़ते हुए पक्षियों को, विचार की बहती हुई नदी को चुपचाप तट पर खड़े होकर देखना है। जैसे हम किनारे पर बैठे हैं और विचार को देख रहे हैं। विचार को उन्मुक्त छोड़ दें, विचार को बहने दें और भागने दें और दौड़ने दें और आप चुप बैठकर देखें। आप कुछ भी न करें। कोई छेड़छाड़ न करें। कोई रुकाव न डालें। कोई दमन न करें। कोई विचार आता हो, तो रोकें न; न आता हो, तो लाने की चेष्टा न करें। आप मात्र निरीक्षक हों।

उस मात्र निरीक्षण में दिखायी पड़ता है, अनुभव होता है, विचार अलग हैं और मैं अलग हूं। क्योंकि बोध होता है कि जो विचारों को देख रहा है, वह विचारों से पृथक होगा, अलग होगा, भिन्न होगा। और जब यह बोध होता है, तो अदभुत शांति घनी होने लगती है। क्योंकि तब कोई चिंता आपकी नहीं है। आप चिंताओं के बीच में हो सकते हैं, चिंता आपकी नहीं है। आप समस्याओं के बीच में हो सकते हैं, समस्या आपकी नहीं है। आप विचारों से घिरे हो सकते हैं, विचार आप नहीं हैं।

और अगर यह खयाल आ जाए कि मैं विचार नहीं हूं, तो विचारों के प्राण टूटने शुरू हो जाते हैं, विचार निर्जीव होने लगते हैं। विचारों की शक्ति इसमें है कि हम यह समझें कि वे हमारे हैं। जब आप किसी से विवाद करने पर उतर जाते हैं, तो आप कहते हैं, 'मेरा विचार!' कोई विचार आपका नहीं है। सब विचार अन्य हैं और भिन्न हैं, आपसे अलग हैं। उनका निरीक्षण।

एक कहानी कहूं, समझ में आए। बुद्ध के पास ऐसा हुआ था। एक राजकुमार दीक्षित हुआ था। पहले दिन ही वह भिक्षा मांगने गया था। उसने, जिस द्वार पर बुद्ध ने भेजा था, भिक्षा मांगी। उसे भिक्षा मिली। उसने भोजन किया, वह भोजन करके वापस लौटा। लेकिन उसने बुद्ध को जाकर कहा, क्षमा करें, वहां मैं दुबारा नहीं जा सकूंगा। बुद्ध ने कहा, 'क्या हुआ?'

उसने कहा कि 'यह हुआ कि जब मैं गया, दो मील का फासला था, रास्ते में मुझे वे भोजन स्मरण आए, जो मुझे प्रीतिकर हैं। और जब मैं उस द्वार पर गया, तो उस श्राविका ने वे ही भोजन बनाए थे। मैं हैरान हुआ। मैंने सोचा, संयोग है। लेकिन फिर यह हुआ कि जब मैं भोजन करने बैठा, तो मेरे मन में यह खयाल आया कि रोज अपने घर था, भोजन के बाद दो क्षण विश्राम करता था। आज कौन विश्राम करने को कहेगा! और जब मैं यह सोचता था, तभी उस श्राविका ने कहा, भंते, अगर भोजन के बाद दो क्षण रुकेंगे और विश्राम करेंगे, तो अनुग्रह होगा, तो कृपा होगी, तो मेरा घर पवित्र होगा। तो मैं हैरान हुआ था। फिर भी मैंने सोचा कि संयोग होगा कि मेरे मन में खयाल आया और उसने भी कह दिया। फिर मैं लेटा और विश्राम करने को था कि मेरे मन में यह खयाल उठा कि आज न अपनी कोई शय्या है, न कोई साया है। आज दूसरे का छप्पर और दूसरे की दरी पर, दूसरे की चटाई पर लेटा हूं।

और तभी उस श्राविका ने पीछे से कहा, भिक्षु, न शय्या आपकी है, न मेरी है। और न साया आपका है, न मेरा है। और तब मैं घबरा गया। अब संयोग बार-बार होने मुश्किल थे। मैंने उस श्राविका को कहा, क्या मेरे विचार तुम तक पहुंच जाते हैं? क्या मेरे भीतर चलने वाली विचारधाराएं तुम्हें परिचित हो जाती हैं? उस श्राविका ने कहा, ध्यान को निरंतर करते-करते अपने विचार शून्य हो गए हैं और अब दूसरों के विचार भी दिखायी पड़ते हैं। तब मैं घबरा गया और मैं भागा हुआ आया हूं। और मैं क्षमा चाहता हूं, कल मैं वहां नहीं जा सकूंगा।'

बुद्ध ने कहा, 'क्यों?' उसने कहा कि 'इसलिए कि...कैसे कहूं, क्षमा कर दें और न कहें वहां जाने को।' लेकिन बुद्ध ने आग्रह किया और उस भिक्षु को बताना पड़ा। उस भिक्षु ने कहा, 'उस सुंदर युवती को देखकर मेरे मन में विकार भी उठे थे, वे भी पढ़ लिए गए होंगे। मैं किस मुंह से वहां जाऊं? कैसे मैं उस द्वार पर खड़ा होऊंगा? अब दुबारा मैं नहीं जा सकता हूं।' बुद्ध ने कहा, 'वहीं जाना होगा। यह तुम्हारी साधना का हिस्सा है। इस भांति तुम्हें विचारों के प्रति जागरण पैदा होगा और विचारों के तुम निरीक्षक बन सकोगे।'

मजबूरी थी, उसे दूसरे दिन फिर जाना पड़ा। लेकिन दूसरे दिन वही आदमी नहीं जा रहा था। पहले दिन वह सोया हुआ गया था रास्ते पर। पता भी न था कि मन में कौन-से विचार चल रहे थे। दूसरे दिन वह सजग गया, क्योंकि अब डर था। वह होशपूर्वक गया। और जब उसके द्वार पर गया, तो क्षणभर ठहर गया सीढ़ियां चढ़ने के पहले। अपने को उसने सचेत कर लिया। उसने भीतर आंख गड़ा ली। बुद्ध ने कहा था, भीतर देखना और कुछ मत करना। इतना ही स्मरण रहे कि अनदेखा कोई विचार न हो, अनदेखा कोई विचार न हो। बिना देखे हुए कोई विचार निकल न जाए, इतना ही स्मरण रखना बस।

वह सीढ़ियां चढ़ा, अपने भीतर देखता हुआ। उसे अपनी सांस भी दिखायी पड़ने लगी। उसे अपने हाथ-पैर का हलन-चलन भी दिखायी पड़ने लगा। उसने भोजन किया, एक कौर भी उठाया, तो उसे दिखायी पड़ा। जैसे कोई और भोजन कर रहा था और वह देखता था।

जब आप दर्शक बनेंगे अपने ही, तो आपके भीतर दो तत्व हो जाएंगे, एक जो क्रियमाण है और एक जो केवल साक्षी है। आपके भीतर दो हिस्से हो जाएंगे, एक जो कर्ता है और एक जो केवल द्रष्टा है।
उस घड़ी उसने भोजन किया। लेकिन भोजन कोई और कर रहा था और देख कोई और रहा था। और हमारा मुल्क कहता है--और सारी दुनिया के जिन लोगों ने जाना है, वे कहते हैं--कि जो देख रहा है, वह आप हैं; और जो कर रहा है, वह आप नहीं हैं।

उसने देखा, वह हैरान हुआ। वह नाचता हुआ वापस लौटा। और उसने बुद्ध को जाकर कहा, 'धन्य है, मुझे कुछ मिल गया। दो अनुभव हुए हैं; एक तो यह अनुभव हुआ कि जब मैं बिलकुल सजग हो जाता था, तो विचार बंद हो जाते थे।' उसने कहा, 'एक अनुभव तो यह हुआ कि जब मैं बिलकुल सजग होकर देखता था भीतर, तो विचार बंद हो जाते थे। दूसरा अनुभव यह हुआ कि जब विचार बंद हो जाते थे, तब मैंने देखा, कर्ता अलग है और द्रष्टा अलग है।' बुद्ध ने कहा, 'इतना ही सूत्र है। जो इसे साध लेता है, वह सब साध लेता है।'
विचार के द्रष्टा बनना है, विचारक नहीं। स्मरण रहे, विचारक नहीं, विचार के द्रष्टा।

इसलिए हम अपने ऋषियों को द्रष्टा कहते हैं, विचारक नहीं। महावीर विचारक नहीं हैं, बुद्ध विचारक नहीं हैं। ये द्रष्टा हैं। विचारक तो बीमार आदमी है। विचार वे करते हैं, जो जानते नहीं हैं। जो जानते हैं, वे विचार नहीं करते, वे देखते हैं। उन्हें दिखायी पड़ता है, उन्हें दर्शन होता है। और दर्शन की पद्धति अपने भीतर विचार का निरीक्षण है। उठते-बैठते, सोते-जागते, अपने भीतर जो भी विचार की धारा चलती हो, उसे देखें। और किसी भी विचार के साथ तादात्म्य न करें कि इस विचार के साथ मैं एक हो गया। विचार को अलग चलने दें, आप अलग चलें। आपके भीतर दो धाराएं होनी चाहिए। विचार की और दर्शन की ~~~~ ओशो

[04/03/16]   प्रफुल्लता स्वास्थ्य का लक्षण है। प्रफुल्लित होओ!

और धीरे-धीरे जैसे-जैसे तुम्हारे जीवन में हँसी की किरणें फैलेंगी, तुम चकित होओगे कि कितना हँसने को है। खुद के जीवन में हँसने को है, औरों के जीवन में हँसने को है। चारों ओर हँसने ही हँसने की घटनाएँ हैं।

वह तो हम देखते नहीं, कंजूस हैं हम, कि कहीं हँसना न पड़े, तो हमने देखना ही बंद कर दिया है। नहीं तो चारों तरफ प्रतिपल क्या-क्या नहीं घट रहा है! हर चीज हँसने की है!

कोई ऐसा थोड़े ही है कि कभी-कभी कोई केले के छिलके पर फिसल कर गिर पड़ता है-- हर आदमी यहाँ केले के छिलके पर फिसल रहा है। सडकें केलों के छिलकों से भरी पड़ी हैं। यहाँ तुम हर आदमी को गिरते देखोगे।

और ऐसा नहीं है कि दूसरे ही गिर रहे हैं!

दूसरों के लिये हँसे तो वह हँसी ठीक नहीं, काफी नहीं, पूरी नहीं, सम्यक नहीं। तुम अपने को भी गिरते देखोगे। और हँसी तो तुम्हें तब आयेगी जब देखोगे कि उन्हीं छिलकों पर गिर रहे हो जो तुम्हीं ने बिछाये हैं, उन्हें कोई और नहीं बिछा गया। और, उन्हीं गड्ढों में गिर रहे हो जो तुम्हीं ने बनाये हैं।

तुम हँसों! बाँटों हँसी के मोती!

और कुछ संकोच न करना कि बाँटा तो कहीं हँसी बँट न जाये, कहीं ऐसा न हो कि एक दिन हँसी से हम खाली हो जायें।

नहीं, जितना हँसोगे उतना भरोगे!

प्यारे ओशो

[03/26/16]   ❤ महोत्सव ❤
मेरे ये अंतिम शब्द हैं :
प्रत्येक क्षण को
महोत्सव बना लो…
तब फिर तुम्हे
परमात्मा को
नहीं खोजना पड़ेगा।
तुम जहां भी होओगे,
परमात्मा खुद
तुम्हें खोजता हुआ
आ जायेगा।
!! ओशो !!
[कनोपनिष ]

[03/19/16]   If the whole existence is one, and if the existence goes on taking care
of trees, of animals, of mountains, of oceans -- from the smallest
blade of grass to the biggest star -- then it will take care of you too. Why be possessive? The possessiveness shows simply one thing --
that you cannot trust existence. You have to arrange separate
security for yourself, safety for yourself; you cannot trust existence. Non-possessiveness is basically trust in existence. There is no need to possess, because the whole is already ours. "Osho"



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